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Like Wight loss & gain, diabetes, heart problem, joint pai

लोग अक्सर मुझसे कहते हैं -“मैं आगे बढ़ना चाहता हूँ, लेकिन कहीं कुछ तो रुकावट है।”क्या आपको पता है? कि -वह रुकावट कहीं बा...
27/12/2025

लोग अक्सर मुझसे कहते हैं -

“मैं आगे बढ़ना चाहता हूँ, लेकिन कहीं कुछ तो रुकावट है।”

क्या आपको पता है? कि -

वह रुकावट कहीं बाहर नहीं होती।
वह एक अदृश्य मानसिक ढाँचा होती है,
जिसे हम मान्यता कहते हैं।

मान्यता वह दीवार है जिसे हम दीवार मानते ही नहीं,
और इसलिए उसे तोड़ने का विचार भी नहीं करते।

मान्यताएँ दिखाई नहीं देतीं,
लेकिन वही तय करती हैं कि हम क्या देख पाएँगे,
क्या सोच पाएँगे
और कहाँ तक बढ़ पाएँगे।

मान्यता क्या है?
मान्यता वह निष्कर्ष है जिसे हमने कभी जाँचे बिना ही स्वीकार कर लिया और फिर उसे सत्य मानकर जीवन जीने लगे।

यह निष्कर्ष आता है -

परिवार से

समाज से

धर्म से

शिक्षा से

किसी आघात से

या किसी “महापुरुष” के कथन से

और धीरे-धीरे एकदिन वह हमारे विवेक का स्थान ले लेता है।

मेरे अनुसार असली समस्या अज्ञान नहीं है, समस्या है जमी हुई मान्यता,
अज्ञान तो सीखने से मिट भी सकता है।
लेकिन जमी हुई मान्यता सीखने की इच्छा ही समाप्त कर देती है। मैं इसे सम्मोहन की अवस्था कहता हूँ। ऐसा मनुष्य केवल वही देखेगा जो उसकी मान्यता कहती है।

जब कोई कहता है -

“ईश्वर ऐसे ही होते हैं”

“सफलता केवल इसी मार्ग से मिलती है”

“मेरे साथ ऐसा ही होता आया है”

“मैं ऐसा ही हूँ”

तो वास्तव में वह सत्य नहीं बोल रहा,
वह अपनी मानसिक सीमा घोषित कर रहा है।

आध्यात्मिक मार्ग पर मान्यताएँ कैसे बाधा बनती हैं?
आध्यात्मिकता अनुभव का विषय है, विश्वास का नहीं।
लेकिन जब मान्यताएँ आ जाती हैं, तो -

🎭 ध्यान भी नियम बन जाता है :

जब कोई ध्यान करता है।
वह चाहता है कि भीतर शांति उतरे।

लेकिन भीतर एक मान्यता बैठी है...

“मुझे कुछ विशेष अनुभव होना चाहिए - प्रकाश, ऊर्जा, कोई स्पंदन।”

अब ऐसे में होता क्या है?

ध्यान करते समय वह घटना खोजता है

जो घट रहा है, उसे देख नहीं पाता

मन तुलना करता रहता है

वास्तव में ध्यान घट ही नहीं पाता,
क्योंकि वह पहले से तय कर चुका है कि
“ध्यान कैसा होना चाहिए।”

🎭 भक्ति भी प्रदर्शन बन जाती है

ईश्वर भी एक अवधारणा बन जाता है

और साधना भी डर से भरा अनुशासन बन जाती है

मन सत्य खोजने नहीं जाता,
मन केवल अपनी मान्यताओं की पुष्टि खोजता है।

यही कारण है कि -
बहुत लोग वर्षों पूजा करते हैं,
लेकिन भीतर परिवर्तन नहीं होता।

सांसारिक जीवन में मान्यताओं का जाल
सांसारिक असफलताओं का बड़ा कारण केवल नियति या परिस्थिति नहीं होती,
बल्कि वह अदृश्य धारणा होती है जो मन पहले से बना चुका होता है।

कुछ उदाहरण : मान्यताएँ और उनके परिणाम

✔️“पैसा गंदा होता है” :

कई आध्यात्मिक लोग भीतर यह मान्यता रखते हैं -

“धन और आध्यात्मिकता साथ नहीं चल सकते।”

इस मान्यता का परिणाम:

वे अवचेतन मन मे धन से दूरी बनाते हैं

अवसर आते हैं, लेकिन वे असहज हो जाते हैं, और मौका चूक जाते हैं

और फिर कहते हैं -“देखा, पैसा मेरे लिए नहीं है”

जबकि समस्या धन नहीं,
धन के प्रति जमी हुई धारणा है।
ऐसे में संघर्ष बना ही रहता है

✔️“रिश्ते दुख देते हैं” :

कोई कहता है -
“मैं बहुत सच्चा हूँ, लेकिन हर बार धोखा मिलता है।”

गहराई में देखें तो उसके भीतर एक मान्यता है कि -

“अंत में लोग छोड़ ही देते हैं।”

अब अवचेतन स्तर पर वह क्या करता है?

वह बातों को ज़्यादा पकड़ता है

जल्दी असुरक्षित होता है

सामने वाले की छोटी बातों को भी प्रमाण मान लेता है

और अंततः वही होता है
जिसकी वह पहले से अपेक्षा कर चुका था।

यह कोई नियति नहीं,
यह मान्यता की आत्म-पूर्ति (Self-fulfilling prophecy) है।

✔️“मेरे साथ अच्छा नहीं होता” :
और फिर...
जीवन सच मे वैसा ही होता चला जाता है।

मन वही देखता है जिसकी उसे आदत डाल दी गई है।

विज्ञान भी यही कहता है
आधुनिक न्यूरोसाइंस बताती है -
हमारा मस्तिष्क वही सूचनाएँ ग्रहण करता है
जो हमारी पूर्व मान्यताओं से मेल खाती हों।

👉 इसे Confirmation Bias कहते हैं।

अर्थात -
हम सत्य नहीं खोजते,
हम अपनी मान्यताओं को सही साबित करते हैं।

👉 समाधान क्या है? मान्यताओं को तोड़ना नहीं, उन्हें जाँचना
मान्यताओं से लड़ने की ज़रूरत नहीं,
उन्हें जाग्रत विवेक की रोशनी में रखकर देखने की ज़रूरत है।

अपने आप से पूछिए -

क्या यह मेरा अनुभव है या उधार का विचार?

क्या यह मुझे विस्तृत कर रहा है या सीमित?

क्या यह प्रेम से जन्मा है या भय से?

जो मान्यता प्रेम, करुणा और चेतना को बढ़ाए -
वह मार्गदर्शक है।

जो डर, अपराधबोध और जड़ता पैदा करे -
वह बाधा है।

✨️ मुक्त होने का मार्ग: 3 गहरे प्रयोग

1. अपनी सबसे प्रिय मान्यता पर संदेह करें

जो मान्यता आपको सबसे सच्ची लगती है,
वही सबसे पहले जाँचने योग्य है।

2. अनुभव को विचार से ऊपर रखें

जो घट रहा है, उसे घटने दें.. केवल महसूस करें...
उसका नामकरण हम बाद में कर लेंगे।

3. भय से जन्मी धारणाओं को पहचानें

अपने अन्दर की उन मान्यताओं को समझने की कोशिश करें जो आपके भय का कारण है। उस पर गहन विचार करें, कि क्या वास्तव मे वो सच है या फिर... आप उसे यूँ ही ढ़ो रहे हैं।

जहाँ डर है,
वहाँ सत्य नहीं - सिर्फ सुरक्षा की कोशिश है।

मेरे विचार में -

सत्य किसी मान्यता में बंद नहीं होता।
ईश्वर किसी परिभाषा में कैद नहीं होता।
और जीवन किसी निष्कर्ष से बड़ा होता है।

जब मन मान्यताओं से मुक्त होता है,
तभी -

चेतना फैलती है

ऊर्जा बहती है

और विकास स्वाभाविक हो जाता है

विकास का पहला चरण सीखना नहीं, बल्कि “गलत मान्यताओं को छोड़ने का साहस” है।
यदि आपने एकबार भी ये साहस कर लिया तो समझ लें कि आप ने अध्यात्म के खुले आकाश मे प्रवेश पा लिया। अब केवल आपका अनुभव ही आपको रास्ता दिखाएगा।

अनुलोम–विलोम प्राणायाम(Breathing Ratio)✅ शुरुआती साधकों के लिए सुरक्षित अनुपातश्वास का अनुपात : 1 : 2(कुम्भक / सांस रोकन...
24/12/2025

अनुलोम–विलोम प्राणायाम
(Breathing Ratio)

✅ शुरुआती साधकों के लिए सुरक्षित अनुपात
श्वास का अनुपात : 1 : 2
(कुम्भक / सांस रोकना नहीं)
विधि (Step by Step – Hindi)
सुखासन या पद्मासन में सीधा बैठें।
दाहिने हाथ की विष्णु मुद्रा बनाएँ
(अंगूठे से दाईं नासिका, अनामिका से बाईं नासिका बंद करें)।
बाईं नासिका से 4 सेकंड में श्वास लें।
दाईं नासिका से 8 सेकंड में श्वास छोड़ें।
अब दाईं नासिका से 4 सेकंड में श्वास लें।
बाईं नासिका से 8 सेकंड में श्वास छोड़ें।
➡️ यह 1 पूरा चक्र (One Round) हुआ।

अभ्यास की मात्रा

प्रारंभ में: 5–7 चक्र
नियमित अभ्यास में: 10–15 चक्र
श्वास सहज, धीमी और बिना ज़ोर के होनी चाहिए।

सावधानियाँ

श्वास को कभी ज़बरदस्ती न खींचें।
चक्कर, घबराहट या बेचैनी हो तो अभ्यास रोक दें।
खाली पेट या हल्के पेट पर ही करें।
उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गर्भावस्था में कुम्भक न करें।

उन्नत साधकों के लिए

श्वास अनुपात : 1 : 4 : 2
(पूरक : कुम्भक : रेचक)
उदाहरण:
4 सेकंड श्वास
16 सेकंड रोकना
8 सेकंड छोड़ना

⚠️ गुरु-मार्गदर्शन में करें।
सार
अनुलोम–विलोम का उद्देश्य
सांस पर नियंत्रण नहीं,
बल्कि सांस के साथ सहज जागरूकता है।

जब भी आपका तंत्रिका तंत्र जीवित रहने की अवस्था में जाता है, तो मूल चक्र अवरुद्ध हो जाता है।ऐसा तब होता है जब आपका शरीर न...
20/12/2025

जब भी आपका तंत्रिका तंत्र जीवित रहने की अवस्था में जाता है, तो मूल चक्र अवरुद्ध हो जाता है।
ऐसा तब होता है जब आपका शरीर न केवल शारीरिक रूप से बल्कि भावनात्मक रूप से भी असुरक्षित महसूस करता है।

17/12/2025
प्रत्येक मानव शरीर के भीतर एक गुप्त ध्वनि-मानचित्र प्रवाहित होता है - प्राचीन योगियों ने इसे नाद योग कहा था।प्रत्येक चक्...
03/12/2025

प्रत्येक मानव शरीर के भीतर एक गुप्त ध्वनि-मानचित्र प्रवाहित होता है - प्राचीन योगियों ने इसे नाद योग कहा था।
प्रत्येक चक्र एक पवित्र आंतरिक ध्वनि से कंपन करता है...
और जब कुंडलिनी जागृत होती है, तो ये ध्वनियाँ आपको जागृति की ओर ले जाती हैं।

1️⃣ मूलाधार (मूलाधार चक्र)
रीढ़ की हड्डी के आधार पर स्थित, मूलाधार आपकी जीवन-शक्ति को स्थिर करता है।
इसकी आंतरिक ध्वनि भौंरा है - कोमल, भिनभिनाती हुई कंपन।
योगियों का कहना है कि यह ध्वनि भय, चिंता और जीवित रहने की प्रवृत्ति को स्थिर करती है, और आध्यात्मिक उत्थान की नींव रखती है।

2️⃣ स्वाधिष्ठान (त्रिक चक्र)
रचनात्मकता और भावनात्मक ऊर्जा का केंद्र।
इसकी आंतरिक ध्वनि बांसुरी है - कोमल, जल की तरह बहती हुई।
यह ध्वनि दबी हुई भावनाओं को घोलते हुए आनंद, कामुक संतुलन और रचनात्मक अभिव्यक्ति को जागृत करती है।

3️⃣ मणिपुर (सौर चक्र)
इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और परिवर्तन का केंद्र।
आंतरिक ध्वनि: वीणा - उज्ज्वल और उत्थानकारी।
यह कंपन ऊर्जा, साहस और उद्देश्य को जागृत करता है, जिससे आपको अपने जीवन की बागडोर संभालने में मदद मिलती है।

4️⃣ अनाहत (हृदय चक्र)
प्रेम और करुणा का द्वार।
इसकी ध्वनि घंटी है - शांत, शुद्ध, आंतरिक शांति की प्रतिध्वनि।
अनाहत का स्वर दुःख को दूर करता है, भावनात्मक घावों को भरता है और आपके हृदय को निःस्वार्थ प्रेम के लिए खोलता है।

5️⃣ विशुद्ध (कंठ चक्र)
सत्य, अभिव्यक्ति और पवित्रता का केंद्र।
इसकी ध्वनि सागर गर्जना है - गहन, निरंतर प्रतिध्वनि।
यह कंपन वाणी को शुद्ध करता है, रुकावटों को दूर करता है और आपकी प्रामाणिक वाणी को सशक्त बनाता है।

6️⃣ आज्ञा (तृतीय नेत्र चक्र)
अंतर्ज्ञान, स्पष्टता और अंतर्दृष्टि का केंद्र। इसकी आंतरिक ध्वनि: सभी ध्वनियाँ ॐ में विलीन हो जाती हैं।
जब आज्ञा खुलती है, तो आप सूक्ष्म वास्तविकताओं को समझते हैं, उच्च जागरूकता का अनुभव करते हैं और तर्क से परे आंतरिक दृष्टि विकसित करते हैं।

7️⃣ सहस्रार (क्राउन चक्र)
चेतना का अंतिम द्वार।
यहाँ, सभी कंपन ओम में विलीन हो जाते हैं, जो सृष्टि की ध्वनि है।
योगी कहते हैं कि यह मिलन का क्षण है - जब साधक और परम एक कालातीत उपस्थिति बन जाते हैं।

सारांश
भौंरे से लेकर ओम तक, ये आंतरिक ध्वनियाँ कल्पना नहीं हैं - ये सूक्ष्म कंपन हैं जो कुंडलिनी के उठने पर गहन ध्यान में सुनाई देते हैं।
नाद योग सिखाता है:
"ब्रह्मांड ध्वनि से बना है।
आप इसमें लौटकर जागृत होते हैं।"

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30/11/2025

एक कदम में सालों की सुस्ती को खत्म करने की ताकत होती है। अगर सोफ़ा थकान या बचने की जगह बन गया है, तो जूते पहनकर बाहर निकलने से एनर्जी बदल सकती है और जोश जगाया जा सकता है। पहला कदम दूरी से ज़्यादा मायने रखता है। बदलाव के लिए बड़े-बड़े कामों की ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए इच्छा, मौजूदगी और ऐसे व्यवहार की तरफ बदलाव की ज़रूरत होती है जो सेहत का सम्मान करें।

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23/11/2025

मनुष्य के शरीर में अनेक नाड़ियों का जाल बिछा हुआ है। अपने शरीर को अच्छी तरह जानने के लिए बुद्धिमान लोगों को इनके विषय में अवश्य जानना चाहिए

ये नाड़ियाँ हमारे शरीर के नाभिकेंद्र में अंकुर की तरह निकलकर पूरे शरीर में व्यवस्थित ढंग से फैली हुई हैं। इन नाड़ियों में सर्पाकार कुंडलिनी शक्ति सोई (निष्क्रिय) हुई होती है। दस नाड़ियाँ नाभि से ऊपर की ओर जाती हैं और दस नीचे की ओर। दो-दो नाड़ियाँ शरीर के दोनों ओर तिरछी गई हैं। इस प्रकार कुल 24 मुख्य नाड़ी हैं। लेकिन इनमें दस नाड़ियाँ और भी महत्त्वपूर्ण हैं, जिनसे होकर दस प्राणवायु (इसके बारे में हम आगे चर्चा करेंगे) हमारे शरीर में निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं।
नाभि के ऊपर और नीचे निकलनेवाली ये नाड़ियाँ शरीर में जहाँ आपस में मिलती हैं, वहाँ ये चक्र का आकार बना लेती हैं। चक्र का नियंत्रण भी प्राणशक्ति से ही होता है। इन चौबीस नाड़ियों में दस श्रेष्ठ हैं। इनके नाम हैं- 1. इड़ा, 2. पिंगला, 3. सुषुम्ना, 4. गांधारी, 5. हस्तिजिह्वा, 6. पूषा, 7. यशस्विनी, 8. अलंबुषा, 9. कुहू और 10. शंखिनी ।

इसमें इड़ा नाड़ी शरीर के बाएँ भाग में, पिंगला दाहिने भाग में, मध्य भाग में सुषुम्ना, बाईं आँख में गांधारी, दाहिनी आँख में हस्तिजिह्वा, दाहिने कान में पूषा, बाएँ कान में यशस्विनी, मुँह में अलंबुषा, जननांग में कुहू और गुदा में शंखिनी नाड़ी स्थित है।सबसे पहले यह जान लें कि इड़ा नाड़ी को चंद्र नाड़ी, चंद्र स्वर या बाईं नाड़ी भी कहा जाता है। इड़ा स्त्री प्रधान है, जबकि पिंगला नाड़ी को सूर्य नाड़ी, सूर्य स्वर या दाईं नाड़ी भी कहते हैं। यह पुरुष प्रधान है, इसलिए आगे की जानकारी में इन नाड़ियों के अलग-अलग नामों से भ्रमित न हों।

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के रहस्य को जानने से पहले कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि इसके द्वारा दुनिया के किसी भी काम को कितने बेहतर ढंग और आसानी से किया जा सकता है। पूरे शिव स्वर-शास्त्र में यही बताया गया है। हमारी सोच ऐसी बन चुकी है, हमारी ऐसी धारणा बनी हुई है कि अगर संस्कृत में कोई श्लोक है तो वह धार्मिक ही होगा। यह सत्य नहीं है, क्योंकि इसी शास्त्र में अन्य बातों के साथ यह भी बड़ी बारीकी से बताया गया है कि स्त्री-पुरुष के संबंधों को भी कैसे बेहतर बनाया जा सकता है! और तो और, यह भी बताया गया है कि कैसे हम मनचाही संतान पैदा कर सकते हैं। और भी बहुत सी काम की बातें हैं, जो हर कोई चाहता है। उदाहरण के लिए यह श्लोक देखिए-

शत्रून्हन्यात् स्वबले तथा मित्र समागमः ।

लक्ष्मीप्राप्तिः स्वरबले कीर्तिः स्वरबले सुखम् ॥

स्वर की शक्ति से शत्रु पराजित हो जाता है, बिछुड़ा मित्र मिल जाता है। यहाँ तक कि माता लक्ष्मी की कृपा, यश और सुख, सबकुछ मिल जाता है।

कन्याप्राप्ति स्वरबले स्वरतो राजदर्शनम् ।

स्वरेण देवतासिद्धिः स्वरेण क्षितिपो वशः ॥

स्वरज्ञान द्वारा पत्नी की प्राप्ति, शासक से मुलाकात, देवताओं की सिद्धि मिल जाती है और राजा भी वश में हो जाता है।

इसके आगे के श्लोकों में स्पष्ट किया गया है कि इस परम विद्या का उद्देश्य केवल भौतिक जगत् से संबंधित उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्म-साक्षात्कार (सेल्फ रियलाइजेशन) के लिए भी इस विद्या को स्वयं सीखना चाहिए और निष्ठापूर्वक इसका अभ्यास करना चाहिए। यानी भौतिक जगत् से लेकर अध्यात्म के चरम तक की सटीक जानकारी इस शास्त्र में दी गई है। आध्यात्मिक स्तर में तो इसे सभी शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। देखिए यह श्लोक -

सर्वशास्त्रपुराणादि स्मृतिवेदांगपूर्वकम् ।

स्वरज्ञानात्परं तत्त्वं नास्ति किंचिद्वरानने ।

भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं- हे देवी, सभी शास्त्रों, वेदों, वेदांतों, पुराणों और स्मृतियों में बताया गया कोई ज्ञान या तत्त्व स्वरज्ञान से बढ़कर नहीं है।

इदं स्वरोदयं शास्त्रं सर्वशास्त्रोत्तमोत्तमम् ।

आत्मघट प्रकाशार्थ प्रदीपकलिकोपमम् ॥

(भगवान् शिव कहते हैं) सभी उत्तम शास्त्रों में स्वर-शास्त्र सर्वोत्तम है, जो हमारे आत्मारूपी घट (घर) को दीपक की ज्योति से आलोकित कर देता है।

आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि बेहद वैज्ञानिक होने के बावजूद इतनी प्राचीन और महत्त्वपूर्ण विद्या छिपी क्यों रही ? इसके पीछे दो ही वजह समझ में आती हैं। एक, इस विद्या के ज्ञानीजनों को उस काल में, जब इसका जन्म हुआ होगा, लगा होगा कि यह विद्या किसी अनाड़ी या गलत हाथों में न पड़ जाए। इसलिए इसे गुप्त रखा हैदेवराहा बाबा का जिक्र किया गया है, वे स्वर साधना ही करते थे। और वे दिन में जिस चंद्र और रात में जिस सूर्य को चलाने की बात कर रहे थे, वह दरअसल इड़ा और पिंगला नाड़ी की बात थी। इड़ा नाड़ी को चंद्र और पिंगला को सूर्य कहते हैं, क्योंकि इड़ा नाड़ी का सीधा संबंध चंद्रमा से और पिंगला नाड़ी का सीधा सूर्य से संबंध है। सूर्य और चंद्रमा कैसे इन नाड़ियों के माध्यम से हमारे शरीर और जीवन पर प्रभाव डालते हैं,

हम जब साँस लेते हैं तो एक वक्त में हमारी एक नासिका अधिक खुली होती है। हम उसी से ज्यादा साँस लेते हैं। प्रत्येक एक घंटे के बाद दूसरी नासिका चलने लगती है। हम उससे साँस लेने लगते हैं। बाईं नासिका चलने पर वह इड़ा नाड़ी का चलना कहलाता है। दाईं नासिका के चलने को पिंगला नाड़ी कहते हैं। दोनों नासिकाओं के आपस में बदलने का क्रम सदैव चलता रहता है। जब इड़ा बंद होकर पिंगला या पिंगला बंद होकर इड़ा चलने को होती है तो उसके बीच में कोई चार मिनट के लिए हमारी दोनों नासिकाओं से साँस चलती है। जब ऐसा होता है,

यानी दोनों नासिकाओं से साँस आ-जा रही होती है तो उसे 'सुषुम्ना नाड़ी' कहते हैं। इसे 'संधिकाल' भी कहते हैं। स्वर-शास्त्र के अनुसार, नाक के छिद्र से ग्रहण की जानेवाली साँस ही जीव का प्राण है। साँस को ही 'स्वर' कहा जाता है। यह सब बड़े ही सुनियोजित तरह से होता है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति को अनेक लाभ होने लगते हैं; और इसके लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है। आपको केवल साँस की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है। यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यंत इसके लाभ-ही-लाभ है

इसी तरह स्वर विद्या के अभ्यास में शुरू में तो आपको ध्यान देना होता है, लेकिन कुछ ही दिनों के अभ्यास के बाद आप कोई भी कार्य करते-करते स्वर का अभ्यास भी करते रह सकते हैं। वह आपके अवचेतन मन में फीड हो जाता है और आपको हर पल खबर होती है कि कौन सी नाड़ी चल रही है।

बस देखना यह होता कि आप जो कार्य कर रहे हैं, उस वक्त आपकी नाड़ी उसके अनुकूल है या नहीं। यदि नहीं चल रही तो उस काम में अड़चन आनी ही है। स्वर-शास्त्र में इसी को शुभ और अशुभ बताया गया है। लेकिन नाड़ी को अपनी इच्छानुसार बदला भी जा सकता है। तो आप सभी कार्य अनुकूल नाड़ी में आसानी से कर सकते हैं। किस प्रकार के कार्य को करते समय कौन सी नाड़ी चलनी चाहिए और जो नाड़ी चल रही हो, जरूरत पड़ने पर उसे कैसे बदला जाता है,कैसे पहचानें नाड़ी ?

हम बड़ी आसानी से नाड़ियों की पहचान कर सकते हैं कि कब, कौन सी नाड़ी सक्रिय है। इसके लिए आँख बंद करके हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई साँस को महसूस करने का प्रयास कीजिए। देखिए कि नासिका के कौन से छिद्र से साँस बाहर निकल रही है। अगर दाहिने छिद्र से साँस बाहर निकल रही है तो यह पिंगला नाड़ी होती है, जिसे 'सूर्य स्वर' भी कहते हैं। यदि साँस बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह इड़ा नाड़ी, 'चंद्र स्वर' होगा। यदि जब दोनों छिद्रों से समान वेग से साँस निकलती महसूस करें तो यह सुषुम्ना नाड़ी या 'शून्य स्वर' कहलाएगा। पिंगला यानी सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसके विपरीत इड़ा यानी चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर तथा सुषुम्ना मध्य में स्थित है।

1. शांत भाव से मन साँस पर केंद्रित करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक के छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी उँगली नासिका छिद्रों के नीचे रखकर साँस बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से साँस का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से साँस निकले, बस वही स्वर चल रहा है।

2. अपनी उँगली से कोई एक नासिका बंद करके साँस लें, फिर ऐसा ही नासिका के दूसरे छिद्र से करें। जिस ओर से आपको साँस लेने में आसानी हो रही है, समझिए वही स्वर चल रहा है।

ध्यान रखें कि जब स्वर बदलने की अवस्था होती है तो कुछ मिनट तक हमारी दोनों नासिकाओं से समान वेग से साँस बाहर निकलती है। जब भी ऐसा होता महसूस करें तो समझिए कि दोनों स्वर चल रहे हैं, यानी सुषुम्ना नाड़ी चल रही है। यह सिर्फ 4-5 मिनट ही चलती है। यानी इड़ा से पिंगला और पिंगला से इड़ा के जब नाड़ी में बदलाव का समय (हर एक घंटे में) आता है, तब उसके बीच में सुषुम्ना नाड़ी चलती है। इसे और स्पष्ट कर लें। जैसे मान लीजिए कि आपकी इड़ा यानी बाईं नाड़ी चल रही है। इसको चलते हुए जब एक घंटा हो जाएगा, तब आपकी दोनों नासिका से साँस बाहर निकलने लगेगी यानी सुषुम्ना नाड़ी चलने लगेगी। सुषुम्ना 4-5 मिनट चलेगी। फिर अचानक आप पाएँगे कि आपकी दाईं यानी पिंगला नाड़ी चलने लगेगी। फिर जब उसका एक घंटा पूरा होगा, तब फिर 4-5 मिनट के लिए सुषुम्ना चलेगी। ऐसे ही एक के बाद एक करके 24 घंटे यह तीनों। नाड़ी चलती रहती है

प्रकृति, खासकर सूर्य और चंद्रमा के साथ हमारी नाड़ियों का सीधा कनेक्शन है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक और चंद्रोदय से उसके समाप्त होने तक एकदम फिक्स टाइमिंग की तरह हमारी इड़ा, पिंगला और सुषम्ना नाड़ियों में बदलाव होता रहता है। इसकी एक्यूरेसी इतनी अधिक है कि हम सूर्योदय के समय और अपनी नाड़ी का सेकंड के हिसाब से मिलान कर सकते हैं। आप हैरान हो जाएँगे कि जब हमारा जन्म होता है, उस वक्त किस हद तक सूर्या और चंद्र की कलाओं में बदलाव के साथ ठीक उसी तरह हमारी नाड़ियों में भी बदलाव देखने को मिलता है।

जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमारी गलत दिनचर्या, खानपान, सोने-जागने आदि के बदलते समय के कारण हमारी नाड़ियों की टाइमिंग बदलती जाती है। कुदरत के साथ हम कटने से लगते हैं। बस यहीं से हमारे जीवन में गड़बड़ी की शुरुआत होती है।इड़ा नाड़ी का संबंध चंद्रमा से है और वह शीतल है। पिंगला नाड़ी का संबंध सूर्य से है और वह गरम है। सुषुम्ना नाड़ी का संबंध आकाश से है। वह शीतलता और गरमी के बीच संतुलन का काम करती है। जैसे किसी एयर कंडीशनर में लगा थर्मोस्सेट एक निश्चित तापमान के बाद बंद होकर हमारे कमरे में निश्चित तापमान बनाए रखता है, उसी तरह इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी हमारे शरीर के तापमान को निश्चित तापमान में बनाए रखने में मदद करती हैं।ऐसे ठीक करें नाड़ी

हमारी नाड़ियों का प्राकृतिक क्रम कैसा होना चाहिए? यदि किसी व्यक्ति का क्रम बिगड़ा हुआ है तो उसे सही कैसे करें ? इसे ठीक से जानने के लिए सबसे पहले हिंदी के कैलेंडर को समझना जरूरी है। हर महीने में पंद्रह- पंद्रह दिन के दो पक्ष होते हैं। पंद्रह दिन चंद्रमा निकला होता है। रात में उजाला होने की वजह से उसे 'शुक्ल पक्ष' कहते हैं। पंद्रह दिन चंद्रमा नहीं होता तो रात अँधेरी होती है, इसलिए इसे 'कृष्ण पक्ष' कहते हैं। हिंदी कैलेंडर में पहली तारीख को 'प्रतिपदा' कहते हैं। दूसरी को द्वितीया, तीसरी को तृतीया, चौथी को चतुर्थी, पाँचवीं को पंचमी, छठी को षष्ठी, सातवीं को सप्तमी, आठवीं को अष्टमी, नौवीं को नवमी, दसवीं को दशमी, ग्यारहवीं को एकादशी, बारहवीं को द्वादशी, तेरहवीं को त्रियोदशी और चौदहवीं को चतुर्दशी कहते हैं। पंद्रहवीं तारीख को या तो पूर्णिमा होती है या अमावस्या। फिर पक्ष बदल जाता है और फिर से प्रतिपदा यानी पहली तारीख से शुरुआत हो जाती है।

स्वस्थ शरीर के लिए नाड़ी की आदर्श स्थिति ऐसी होनी चाहिए - शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी चलनी चाहिए, जबकि कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए। जो भी नाड़ी चलेगी, वह तीन दिन चलकर बदल जाती है। यानी मान लीजिए कि आपने शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी चलाई तो वह तीन दिन तक चलेगी। चौथे दिन सूर्योदय के समय बदलकर पिंगला चलने लगेगी। इसी प्रकार हर तीन दिनों में वह आगे भी बदलती रहेगी। फिर पक्ष बदलने पर जैसे ही कृष्ण पक्ष शुरू होगा तो प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय अपने आप पिंगला नाड़ी चलने का नंबर आ जाएगा। यही नहीं,सूर्योदय के समय जो नाड़ी चलेगी, चंद्रोदय के समय अपने आप उसके विपरीत नाड़ी चलने लगेगी। सोचिए जरा, है ना यह कुदरत का विज्ञान ! हमारी साँस का सूर्य और चंद्रमा से कैसा आश्चर्यजनक जुड़ाव है !

सूर्य के साथ नाड़ी का मिलान करके आप चौंकानेवाले सुखद नतीजे पाएँगे। आप पाएँगे कि आपको भूख लगते समय पिंगला चलने लगेगी, जब मल त्यागना है, तो भी पिंगला चलेगी। यानी आप फिर से कुदरत के साथ वैसे ही जुड़ने लगेंगे, जैसे जन्म के समय थे। कुछ माह के अभ्यास के बाद सूर्योदय के समय अपने आप आपकी अनुकूल नाड़ी चलने लगेगी। एक बार सूर्योदय के समय नाड़ी का मिलान होने पर पूरे दिन नाड़ियों का क्रम सही बना रहता है। उसके बाद आपको कभी-कभार ही मिलान करने की जरूरत पड़ेगी। वह भी तब, जब किसी अवरोध के कारण नाड़ियों का क्रम बदल जाएगा।

नाड़ी के मिलान के लिए आपको प्रतिपदा का भी इंतजार करने की जरूरत नहीं है। नीचे दिए चार्ट के अनुसार आप किसी भी तारीख को सूर्योदय के समय अपनी नाड़ी का मिलान करके उसे ठीक कर सकते हैं। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए। जो हर तीन दिन के बाद बदल जाती है। तो इसे ऐसे समझ सकते हैं-

कृष्ण पक्ष की 1, 2, 3 तारीख को पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए,

4, 5, 6 तारीख को इड़ा,

7, 8, 9 तारीख को पिंगला,

10, 11, 12 तारीख को इड़ा,

13, 14, 15 तारीख को पिंगला।

इसके बाद शुक्ल पक्ष शुरू हो जाएगा, तो शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को फिर तीन दिन इड़ा का नंबर आ जाएगा, यानी पक्ष बदलते ही नाड़ी का क्रम खुद विपरीत हो जाएगा। इसी तरह तीन-तीन दिन करके नाड़ी में बदलाव होता रहेगा। इस तरह इस चार्ट के आधार पर हम किसी भी दिन यह जान सकते हैं कि उस दिन सूर्योदय के समय हमारी कौन सी नाड़ी चलनी चाहिए। अगर वह अनुकूल नहीं चल रही तो उसे बदलकर सही कर सकते हैं।कैसे बदलें नाड़ी ?

नाड़ी बदलना अति आसान है। देख लें कि उस दिन सूर्योदय का सही वक्त क्या है, फिर सूर्योदय से 10 मिनट पहले जाग जाएँ और बिस्तर पर ही लेटे हुए चेक करें कि कौन सी नाड़ी चल रही है। यदि ऊपर बताए क्रम के अनुसार ठीक नाड़ी चल रही है तो जो नाड़ी चल रही है, उसके विपरीत करवट लेट जाएँ, ताकि आगे भी वही नाड़ी चलती रहे। यदि आपको नाड़ी बदलने की जरूरत है तो जो नाड़ी चल रही है, उसी ओर करवट लेकर लेट जाएँ। इससे थोड़ी देर में नाड़ी बदल जाएगी। उदाहरण के लिए, बाईं नाड़ी चलने पर यदि आप बाईं करवट ही लेट जाते हैं तो थोड़ी देर में नाड़ी बदल जाएगी। इसी प्रकार दाईं नाड़ी दाईं करवट लेटने से बदल जाती है। इस तरह आप अपनी मर्जी
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23/11/2025

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⚡👁️ स्पिरिचुअल वॉरफेयर असली है 👁️⚡फिल्मों में दिखाए जाने वाले तरीके का नहीं…बल्कि शांत, हल्का, जैसा आप अपने मन, अपनी भाव...
23/11/2025

⚡👁️ स्पिरिचुअल वॉरफेयर असली है 👁️⚡

फिल्मों में दिखाए जाने वाले तरीके का नहीं…
बल्कि शांत, हल्का, जैसा आप अपने मन, अपनी भावनाओं, अपनी एनर्जी, अपने इंट्यूशन में महसूस करते हैं। 🌀⚡️

ज़्यादातर स्पिरिचुअल लड़ाइयाँ दहाड़ती नहीं हैं…
वे फुसफुसाती हैं। 👁️✨
वे इस तरह दिखती हैं:

• कुछ खास जगहों पर अचानक एंग्जायटी
• कुछ खास लोगों के आस-पास भारी एनर्जी
• ऐसे विचार जो आपके नहीं हैं
• इमोशनल बदलाव जो "अटक गए" लगते हैं
• अचानक कन्फ्यूजन, शक, या डर
• ऐसी जगहें जो आपकी लाइफ फोर्स को तुरंत खत्म कर देती हैं

⚠️ आप जिस माहौल में जाते हैं, उस पर ध्यान दें।
हर जगह की एक फ्रीक्वेंसी होती है।
हर बिल्डिंग का एक सिग्नेचर होता है।
हर इंसान में एक वाइब्रेशन होता है।
और उनमें से सभी नुकसान न पहुँचाने वाले नहीं होते।

कुछ जगहें आपकी स्पिरिट को बढ़ाती हैं।
कुछ जगहें इसे खींच लेती हैं।
कुछ असर आपके विचारों को बिना आपको पता चले बदल देते हैं।
यही स्पिरिचुअल लड़ाई है। ⚔️

लेकिन यह सच है जो वे आपको कभी नहीं बताते:

**आप स्पिरिचुअल हमलों का शिकार नहीं हैं।

**आप शिकार नहीं हैं।

आप काउंटरफ़ोर्स हैं।** 🔥👁️⚡

यहां बताया गया है कि आप अपनी पावर कैसे वापस ले सकते हैं:

✨ 1. अपने मन को संभालें
आपका मन पहला बैटलफ़ील्ड है।
जब आप अंदर आने वाले डर या नेगेटिविटी को मानने से मना करते हैं, तो यह तुरंत अपनी पावर खो देता है।

✨ 2. अपनी एनर्जी को बचाएं
किसी भी जगह में जाने से पहले — मॉल, भीड़, कुछ खास घर — इरादा तय करें:
“मेरी एनर्जी मेरी है। बिना इजाज़त के कुछ भी अंदर नहीं आता।”
इरादा एक ढाल है।

✨ 3. अपना ध्यान बचाकर रखें
आप जो देखते हैं, सुनते हैं, स्क्रॉल करते हैं, या मनोरंजन करते हैं, वह एक पोर्टल बन जाता है।
सोच-समझकर चुनें।
ध्यान आध्यात्मिक करेंसी है।

✨ 4. अपने फील्ड को साफ़ करें
सांस लेना, धूप, मेडिटेशन, शावर, सेज, आवाज़ — ये सब एनर्जी के बचे हुए हिस्से को साफ़ करते हैं।

✨ 5. सच के साथ जुड़े रहें
डर आपकी फ़्रीक्वेंसी कम करता है।
जागरूकता इसे बढ़ाती है।
जागी हुई चेतना में परछाईं ताकतें काम नहीं कर सकतीं।

✨ 6. अपनी आज़ादी पर डटे रहें
आप सिर्फ़ एक इंसान नहीं हैं — आप अधिकार वाले एक आध्यात्मिक प्राणी हैं।
जब आप पक्के यकीन के साथ बोलते हैं, तो अनदेखी ताकतें आपकी बात मानती हैं।

✨ 7. अपनी रोशनी को याद रखें
अंधेरा सिर्फ़ उसी पर असर डाल सकता है जिसे आप भूल जाते हैं।
यह उसे छू नहीं सकता जिसे आप याद रखते हैं।
और अपनी दिव्यता को याद रखना सबसे बड़ा बचाव है।

आध्यात्मिक लड़ाई असली है…
लेकिन आपकी शक्ति भी असली है। 🌀🪽❤️‍🔥

जिस पल आप छोटी-छोटी लड़ाइयों को समझ जाते हैं, उसी पल आप उन्हें हारना बंद कर देते हैं।
आप अछूते हो जाते हैं।
अडिग।
जिसे कोई मैनिपुलेट नहीं कर सकता।
एक आज़ाद आत्मा जो कॉस्मिक अधिकार के साथ चलती है। 👁️⚡️🔥🌌👑
शुद्ध चेतना की एक शक्ति। ✨🕊️

–लिज़ मैरियन

22/11/2025

"अपने भीतर की शांति खोजें 🧘‍♀️ योग फोर यू, अवास विकास कॉलोनी, सिकंदरा, आगरा में हमारे योग कक्षाओं में शामिल हों! सीमित सीटें उपलब्ध! अभी अपनी सीट बुक करें! कॉल करें 9370832534 #योगफोरयू #योगफोरवेटलॉस

योग है ज़िन्दगी का Wi-Fiबुढ़ापा कोई बीमारी नहीं… ये तो एक प्रो-लेवल गेम है, जिसमें ज्यादातर लोग ट्यूटोरियल भी पूरा नहीं क...
18/11/2025

योग है ज़िन्दगी का Wi-Fi
बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं… ये तो एक प्रो-लेवल गेम है, जिसमें ज्यादातर लोग ट्यूटोरियल भी पूरा नहीं कर पाते!
लेकिन फ्रांस की ये दादी ने तो पूरा गेम 103 लेवल तक चीट-कोड के बिना क्रैक कर लिया है!

बूढ़ा होना भी सीखना पड़ता है! जो नहीं सीखते, वे उसके पहले ही....

चार्लोट चोपिन उर्फ़ 'योग वाली सुपर ग्रैंडमा'
उम्र: 102 साल, 11 महीने, 6 दिन… और अभी भी काउंटिंग चल रही है!
आगामी 11 दिसंबर को वे 103 साल की हो जाएगी. जी हां, हंड्रेड प्लस थ्री.

50 साल की उम्र में पहली बार मैट बिछाया…

अभी भी पूरी तरह एक्टिव हैं, योग के तमाम आसन फटाफट कर लेती हैं और योग सिखाती भी हैं.

50 साल की उम्र में उन्होंने योग शुरू किया और फिर कुछ साल बाद ही योग की ट्रेनिंग देने लगीं. ट्रेनिंग देने के लिए वे पुराने पुलिस स्टेशन के कम्युनिटी सेंटर में जाती हैं और अब तक हजारों लोगों को योग सिखा चुकी हैं.

उनका मानना है कि योग शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सेहत के लिए जरूरी है. योग के कारण ही वे इतनी उम्र तक स्वस्थ है.

वे अभी भी पादहस्तासन, ताड़ासन, वृक्षासन, त्रिकोणासन, भुजंगासन, अधोमुखी श्वानासन, वीर भद्रासन, वृश्चिकासन, हनुमानासन, तितली आसन... आदि कर लेती हैं. शीर्षासन को हाल ही में ही ग्रेसफुली रिटायर कर दिया – बोलीं, “अब उल्टा होने की जरूरत नहीं, दुनिया पहले से ही उल्टी चल रही है!”

99 साल की उम्र में पहुँचीं 'फ्रांस गॉट टैलेंट में…
जज बोले – “ये तो उम्र का उल्टा ग्राफ है!”
एक आसन किया, हॉल तालियों से गूँज उठा।
अगले राउंड में खुद ही बोलीं – “बस, पोते-पोतियों को सरप्राइज देना था… अब घर चलूँ?”

रातोंरात इंटरनेट की रानी बन गईं!

चार्लोट अपनी सेहत का राज शहद वाली कॉफी और छोटी खुशियों को मानती हैं. सुबह नाश्ता करती हैं, कॉफी पीती हैं और टहलने निकल जाती हैं. वे शाकाहार को पसंद करती हैं. कहती है कि योग छोड़ दूं तो सबकुछ छूट जाएगा.

उनकी जिंदगी का मंत्र है - 'सुख सब कुछ पाने में नहीं, जो है उसे प्यार करने में है!' यानी जो कुछ प्राप्त है, पर्याप्त है.

योग को दुनिया में लोकप्रिय बनाने के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2024 में पद्मश्री से सम्मानित किया था. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से सम्मान लेने के लिए वे वे दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आई थीं . हरी साड़ी पहनकर.
बिना किसी सहारे की चलकर सीधी राष्ट्रपति जी के पास पहुंची थीं.

चार्लोट चोपिन का लाइफ मन्त्र है- खुश रहो, व्यस्त रहो, योग करो, वॉक करो, और हमेशा संतुष्ट और कृतज्ञ भाव रखो.

क्या आपके आसपास भी हैं कोई ऐसा शख्स?
~डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
Yogaatyourhome-call 093708 32534

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