23/11/2025
मनुष्य के शरीर में अनेक नाड़ियों का जाल बिछा हुआ है। अपने शरीर को अच्छी तरह जानने के लिए बुद्धिमान लोगों को इनके विषय में अवश्य जानना चाहिए
ये नाड़ियाँ हमारे शरीर के नाभिकेंद्र में अंकुर की तरह निकलकर पूरे शरीर में व्यवस्थित ढंग से फैली हुई हैं। इन नाड़ियों में सर्पाकार कुंडलिनी शक्ति सोई (निष्क्रिय) हुई होती है। दस नाड़ियाँ नाभि से ऊपर की ओर जाती हैं और दस नीचे की ओर। दो-दो नाड़ियाँ शरीर के दोनों ओर तिरछी गई हैं। इस प्रकार कुल 24 मुख्य नाड़ी हैं। लेकिन इनमें दस नाड़ियाँ और भी महत्त्वपूर्ण हैं, जिनसे होकर दस प्राणवायु (इसके बारे में हम आगे चर्चा करेंगे) हमारे शरीर में निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं।
नाभि के ऊपर और नीचे निकलनेवाली ये नाड़ियाँ शरीर में जहाँ आपस में मिलती हैं, वहाँ ये चक्र का आकार बना लेती हैं। चक्र का नियंत्रण भी प्राणशक्ति से ही होता है। इन चौबीस नाड़ियों में दस श्रेष्ठ हैं। इनके नाम हैं- 1. इड़ा, 2. पिंगला, 3. सुषुम्ना, 4. गांधारी, 5. हस्तिजिह्वा, 6. पूषा, 7. यशस्विनी, 8. अलंबुषा, 9. कुहू और 10. शंखिनी ।
इसमें इड़ा नाड़ी शरीर के बाएँ भाग में, पिंगला दाहिने भाग में, मध्य भाग में सुषुम्ना, बाईं आँख में गांधारी, दाहिनी आँख में हस्तिजिह्वा, दाहिने कान में पूषा, बाएँ कान में यशस्विनी, मुँह में अलंबुषा, जननांग में कुहू और गुदा में शंखिनी नाड़ी स्थित है।सबसे पहले यह जान लें कि इड़ा नाड़ी को चंद्र नाड़ी, चंद्र स्वर या बाईं नाड़ी भी कहा जाता है। इड़ा स्त्री प्रधान है, जबकि पिंगला नाड़ी को सूर्य नाड़ी, सूर्य स्वर या दाईं नाड़ी भी कहते हैं। यह पुरुष प्रधान है, इसलिए आगे की जानकारी में इन नाड़ियों के अलग-अलग नामों से भ्रमित न हों।
इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के रहस्य को जानने से पहले कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि इसके द्वारा दुनिया के किसी भी काम को कितने बेहतर ढंग और आसानी से किया जा सकता है। पूरे शिव स्वर-शास्त्र में यही बताया गया है। हमारी सोच ऐसी बन चुकी है, हमारी ऐसी धारणा बनी हुई है कि अगर संस्कृत में कोई श्लोक है तो वह धार्मिक ही होगा। यह सत्य नहीं है, क्योंकि इसी शास्त्र में अन्य बातों के साथ यह भी बड़ी बारीकी से बताया गया है कि स्त्री-पुरुष के संबंधों को भी कैसे बेहतर बनाया जा सकता है! और तो और, यह भी बताया गया है कि कैसे हम मनचाही संतान पैदा कर सकते हैं। और भी बहुत सी काम की बातें हैं, जो हर कोई चाहता है। उदाहरण के लिए यह श्लोक देखिए-
शत्रून्हन्यात् स्वबले तथा मित्र समागमः ।
लक्ष्मीप्राप्तिः स्वरबले कीर्तिः स्वरबले सुखम् ॥
स्वर की शक्ति से शत्रु पराजित हो जाता है, बिछुड़ा मित्र मिल जाता है। यहाँ तक कि माता लक्ष्मी की कृपा, यश और सुख, सबकुछ मिल जाता है।
कन्याप्राप्ति स्वरबले स्वरतो राजदर्शनम् ।
स्वरेण देवतासिद्धिः स्वरेण क्षितिपो वशः ॥
स्वरज्ञान द्वारा पत्नी की प्राप्ति, शासक से मुलाकात, देवताओं की सिद्धि मिल जाती है और राजा भी वश में हो जाता है।
इसके आगे के श्लोकों में स्पष्ट किया गया है कि इस परम विद्या का उद्देश्य केवल भौतिक जगत् से संबंधित उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्म-साक्षात्कार (सेल्फ रियलाइजेशन) के लिए भी इस विद्या को स्वयं सीखना चाहिए और निष्ठापूर्वक इसका अभ्यास करना चाहिए। यानी भौतिक जगत् से लेकर अध्यात्म के चरम तक की सटीक जानकारी इस शास्त्र में दी गई है। आध्यात्मिक स्तर में तो इसे सभी शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। देखिए यह श्लोक -
सर्वशास्त्रपुराणादि स्मृतिवेदांगपूर्वकम् ।
स्वरज्ञानात्परं तत्त्वं नास्ति किंचिद्वरानने ।
भगवान् शिव पार्वती से कहते हैं- हे देवी, सभी शास्त्रों, वेदों, वेदांतों, पुराणों और स्मृतियों में बताया गया कोई ज्ञान या तत्त्व स्वरज्ञान से बढ़कर नहीं है।
इदं स्वरोदयं शास्त्रं सर्वशास्त्रोत्तमोत्तमम् ।
आत्मघट प्रकाशार्थ प्रदीपकलिकोपमम् ॥
(भगवान् शिव कहते हैं) सभी उत्तम शास्त्रों में स्वर-शास्त्र सर्वोत्तम है, जो हमारे आत्मारूपी घट (घर) को दीपक की ज्योति से आलोकित कर देता है।
आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि बेहद वैज्ञानिक होने के बावजूद इतनी प्राचीन और महत्त्वपूर्ण विद्या छिपी क्यों रही ? इसके पीछे दो ही वजह समझ में आती हैं। एक, इस विद्या के ज्ञानीजनों को उस काल में, जब इसका जन्म हुआ होगा, लगा होगा कि यह विद्या किसी अनाड़ी या गलत हाथों में न पड़ जाए। इसलिए इसे गुप्त रखा हैदेवराहा बाबा का जिक्र किया गया है, वे स्वर साधना ही करते थे। और वे दिन में जिस चंद्र और रात में जिस सूर्य को चलाने की बात कर रहे थे, वह दरअसल इड़ा और पिंगला नाड़ी की बात थी। इड़ा नाड़ी को चंद्र और पिंगला को सूर्य कहते हैं, क्योंकि इड़ा नाड़ी का सीधा संबंध चंद्रमा से और पिंगला नाड़ी का सीधा सूर्य से संबंध है। सूर्य और चंद्रमा कैसे इन नाड़ियों के माध्यम से हमारे शरीर और जीवन पर प्रभाव डालते हैं,
हम जब साँस लेते हैं तो एक वक्त में हमारी एक नासिका अधिक खुली होती है। हम उसी से ज्यादा साँस लेते हैं। प्रत्येक एक घंटे के बाद दूसरी नासिका चलने लगती है। हम उससे साँस लेने लगते हैं। बाईं नासिका चलने पर वह इड़ा नाड़ी का चलना कहलाता है। दाईं नासिका के चलने को पिंगला नाड़ी कहते हैं। दोनों नासिकाओं के आपस में बदलने का क्रम सदैव चलता रहता है। जब इड़ा बंद होकर पिंगला या पिंगला बंद होकर इड़ा चलने को होती है तो उसके बीच में कोई चार मिनट के लिए हमारी दोनों नासिकाओं से साँस चलती है। जब ऐसा होता है,
यानी दोनों नासिकाओं से साँस आ-जा रही होती है तो उसे 'सुषुम्ना नाड़ी' कहते हैं। इसे 'संधिकाल' भी कहते हैं। स्वर-शास्त्र के अनुसार, नाक के छिद्र से ग्रहण की जानेवाली साँस ही जीव का प्राण है। साँस को ही 'स्वर' कहा जाता है। यह सब बड़े ही सुनियोजित तरह से होता है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति को अनेक लाभ होने लगते हैं; और इसके लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है। आपको केवल साँस की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है। यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यंत इसके लाभ-ही-लाभ है
इसी तरह स्वर विद्या के अभ्यास में शुरू में तो आपको ध्यान देना होता है, लेकिन कुछ ही दिनों के अभ्यास के बाद आप कोई भी कार्य करते-करते स्वर का अभ्यास भी करते रह सकते हैं। वह आपके अवचेतन मन में फीड हो जाता है और आपको हर पल खबर होती है कि कौन सी नाड़ी चल रही है।
बस देखना यह होता कि आप जो कार्य कर रहे हैं, उस वक्त आपकी नाड़ी उसके अनुकूल है या नहीं। यदि नहीं चल रही तो उस काम में अड़चन आनी ही है। स्वर-शास्त्र में इसी को शुभ और अशुभ बताया गया है। लेकिन नाड़ी को अपनी इच्छानुसार बदला भी जा सकता है। तो आप सभी कार्य अनुकूल नाड़ी में आसानी से कर सकते हैं। किस प्रकार के कार्य को करते समय कौन सी नाड़ी चलनी चाहिए और जो नाड़ी चल रही हो, जरूरत पड़ने पर उसे कैसे बदला जाता है,कैसे पहचानें नाड़ी ?
हम बड़ी आसानी से नाड़ियों की पहचान कर सकते हैं कि कब, कौन सी नाड़ी सक्रिय है। इसके लिए आँख बंद करके हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई साँस को महसूस करने का प्रयास कीजिए। देखिए कि नासिका के कौन से छिद्र से साँस बाहर निकल रही है। अगर दाहिने छिद्र से साँस बाहर निकल रही है तो यह पिंगला नाड़ी होती है, जिसे 'सूर्य स्वर' भी कहते हैं। यदि साँस बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह इड़ा नाड़ी, 'चंद्र स्वर' होगा। यदि जब दोनों छिद्रों से समान वेग से साँस निकलती महसूस करें तो यह सुषुम्ना नाड़ी या 'शून्य स्वर' कहलाएगा। पिंगला यानी सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसके विपरीत इड़ा यानी चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर तथा सुषुम्ना मध्य में स्थित है।
1. शांत भाव से मन साँस पर केंद्रित करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक के छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी उँगली नासिका छिद्रों के नीचे रखकर साँस बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से साँस का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से साँस निकले, बस वही स्वर चल रहा है।
2. अपनी उँगली से कोई एक नासिका बंद करके साँस लें, फिर ऐसा ही नासिका के दूसरे छिद्र से करें। जिस ओर से आपको साँस लेने में आसानी हो रही है, समझिए वही स्वर चल रहा है।
ध्यान रखें कि जब स्वर बदलने की अवस्था होती है तो कुछ मिनट तक हमारी दोनों नासिकाओं से समान वेग से साँस बाहर निकलती है। जब भी ऐसा होता महसूस करें तो समझिए कि दोनों स्वर चल रहे हैं, यानी सुषुम्ना नाड़ी चल रही है। यह सिर्फ 4-5 मिनट ही चलती है। यानी इड़ा से पिंगला और पिंगला से इड़ा के जब नाड़ी में बदलाव का समय (हर एक घंटे में) आता है, तब उसके बीच में सुषुम्ना नाड़ी चलती है। इसे और स्पष्ट कर लें। जैसे मान लीजिए कि आपकी इड़ा यानी बाईं नाड़ी चल रही है। इसको चलते हुए जब एक घंटा हो जाएगा, तब आपकी दोनों नासिका से साँस बाहर निकलने लगेगी यानी सुषुम्ना नाड़ी चलने लगेगी। सुषुम्ना 4-5 मिनट चलेगी। फिर अचानक आप पाएँगे कि आपकी दाईं यानी पिंगला नाड़ी चलने लगेगी। फिर जब उसका एक घंटा पूरा होगा, तब फिर 4-5 मिनट के लिए सुषुम्ना चलेगी। ऐसे ही एक के बाद एक करके 24 घंटे यह तीनों। नाड़ी चलती रहती है
प्रकृति, खासकर सूर्य और चंद्रमा के साथ हमारी नाड़ियों का सीधा कनेक्शन है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक और चंद्रोदय से उसके समाप्त होने तक एकदम फिक्स टाइमिंग की तरह हमारी इड़ा, पिंगला और सुषम्ना नाड़ियों में बदलाव होता रहता है। इसकी एक्यूरेसी इतनी अधिक है कि हम सूर्योदय के समय और अपनी नाड़ी का सेकंड के हिसाब से मिलान कर सकते हैं। आप हैरान हो जाएँगे कि जब हमारा जन्म होता है, उस वक्त किस हद तक सूर्या और चंद्र की कलाओं में बदलाव के साथ ठीक उसी तरह हमारी नाड़ियों में भी बदलाव देखने को मिलता है।
जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमारी गलत दिनचर्या, खानपान, सोने-जागने आदि के बदलते समय के कारण हमारी नाड़ियों की टाइमिंग बदलती जाती है। कुदरत के साथ हम कटने से लगते हैं। बस यहीं से हमारे जीवन में गड़बड़ी की शुरुआत होती है।इड़ा नाड़ी का संबंध चंद्रमा से है और वह शीतल है। पिंगला नाड़ी का संबंध सूर्य से है और वह गरम है। सुषुम्ना नाड़ी का संबंध आकाश से है। वह शीतलता और गरमी के बीच संतुलन का काम करती है। जैसे किसी एयर कंडीशनर में लगा थर्मोस्सेट एक निश्चित तापमान के बाद बंद होकर हमारे कमरे में निश्चित तापमान बनाए रखता है, उसी तरह इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी हमारे शरीर के तापमान को निश्चित तापमान में बनाए रखने में मदद करती हैं।ऐसे ठीक करें नाड़ी
हमारी नाड़ियों का प्राकृतिक क्रम कैसा होना चाहिए? यदि किसी व्यक्ति का क्रम बिगड़ा हुआ है तो उसे सही कैसे करें ? इसे ठीक से जानने के लिए सबसे पहले हिंदी के कैलेंडर को समझना जरूरी है। हर महीने में पंद्रह- पंद्रह दिन के दो पक्ष होते हैं। पंद्रह दिन चंद्रमा निकला होता है। रात में उजाला होने की वजह से उसे 'शुक्ल पक्ष' कहते हैं। पंद्रह दिन चंद्रमा नहीं होता तो रात अँधेरी होती है, इसलिए इसे 'कृष्ण पक्ष' कहते हैं। हिंदी कैलेंडर में पहली तारीख को 'प्रतिपदा' कहते हैं। दूसरी को द्वितीया, तीसरी को तृतीया, चौथी को चतुर्थी, पाँचवीं को पंचमी, छठी को षष्ठी, सातवीं को सप्तमी, आठवीं को अष्टमी, नौवीं को नवमी, दसवीं को दशमी, ग्यारहवीं को एकादशी, बारहवीं को द्वादशी, तेरहवीं को त्रियोदशी और चौदहवीं को चतुर्दशी कहते हैं। पंद्रहवीं तारीख को या तो पूर्णिमा होती है या अमावस्या। फिर पक्ष बदल जाता है और फिर से प्रतिपदा यानी पहली तारीख से शुरुआत हो जाती है।
स्वस्थ शरीर के लिए नाड़ी की आदर्श स्थिति ऐसी होनी चाहिए - शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी चलनी चाहिए, जबकि कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए। जो भी नाड़ी चलेगी, वह तीन दिन चलकर बदल जाती है। यानी मान लीजिए कि आपने शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय इड़ा नाड़ी चलाई तो वह तीन दिन तक चलेगी। चौथे दिन सूर्योदय के समय बदलकर पिंगला चलने लगेगी। इसी प्रकार हर तीन दिनों में वह आगे भी बदलती रहेगी। फिर पक्ष बदलने पर जैसे ही कृष्ण पक्ष शुरू होगा तो प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय अपने आप पिंगला नाड़ी चलने का नंबर आ जाएगा। यही नहीं,सूर्योदय के समय जो नाड़ी चलेगी, चंद्रोदय के समय अपने आप उसके विपरीत नाड़ी चलने लगेगी। सोचिए जरा, है ना यह कुदरत का विज्ञान ! हमारी साँस का सूर्य और चंद्रमा से कैसा आश्चर्यजनक जुड़ाव है !
सूर्य के साथ नाड़ी का मिलान करके आप चौंकानेवाले सुखद नतीजे पाएँगे। आप पाएँगे कि आपको भूख लगते समय पिंगला चलने लगेगी, जब मल त्यागना है, तो भी पिंगला चलेगी। यानी आप फिर से कुदरत के साथ वैसे ही जुड़ने लगेंगे, जैसे जन्म के समय थे। कुछ माह के अभ्यास के बाद सूर्योदय के समय अपने आप आपकी अनुकूल नाड़ी चलने लगेगी। एक बार सूर्योदय के समय नाड़ी का मिलान होने पर पूरे दिन नाड़ियों का क्रम सही बना रहता है। उसके बाद आपको कभी-कभार ही मिलान करने की जरूरत पड़ेगी। वह भी तब, जब किसी अवरोध के कारण नाड़ियों का क्रम बदल जाएगा।
नाड़ी के मिलान के लिए आपको प्रतिपदा का भी इंतजार करने की जरूरत नहीं है। नीचे दिए चार्ट के अनुसार आप किसी भी तारीख को सूर्योदय के समय अपनी नाड़ी का मिलान करके उसे ठीक कर सकते हैं। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को सूर्योदय के समय पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए। जो हर तीन दिन के बाद बदल जाती है। तो इसे ऐसे समझ सकते हैं-
कृष्ण पक्ष की 1, 2, 3 तारीख को पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए,
4, 5, 6 तारीख को इड़ा,
7, 8, 9 तारीख को पिंगला,
10, 11, 12 तारीख को इड़ा,
13, 14, 15 तारीख को पिंगला।
इसके बाद शुक्ल पक्ष शुरू हो जाएगा, तो शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को फिर तीन दिन इड़ा का नंबर आ जाएगा, यानी पक्ष बदलते ही नाड़ी का क्रम खुद विपरीत हो जाएगा। इसी तरह तीन-तीन दिन करके नाड़ी में बदलाव होता रहेगा। इस तरह इस चार्ट के आधार पर हम किसी भी दिन यह जान सकते हैं कि उस दिन सूर्योदय के समय हमारी कौन सी नाड़ी चलनी चाहिए। अगर वह अनुकूल नहीं चल रही तो उसे बदलकर सही कर सकते हैं।कैसे बदलें नाड़ी ?
नाड़ी बदलना अति आसान है। देख लें कि उस दिन सूर्योदय का सही वक्त क्या है, फिर सूर्योदय से 10 मिनट पहले जाग जाएँ और बिस्तर पर ही लेटे हुए चेक करें कि कौन सी नाड़ी चल रही है। यदि ऊपर बताए क्रम के अनुसार ठीक नाड़ी चल रही है तो जो नाड़ी चल रही है, उसके विपरीत करवट लेट जाएँ, ताकि आगे भी वही नाड़ी चलती रहे। यदि आपको नाड़ी बदलने की जरूरत है तो जो नाड़ी चल रही है, उसी ओर करवट लेकर लेट जाएँ। इससे थोड़ी देर में नाड़ी बदल जाएगी। उदाहरण के लिए, बाईं नाड़ी चलने पर यदि आप बाईं करवट ही लेट जाते हैं तो थोड़ी देर में नाड़ी बदल जाएगी। इसी प्रकार दाईं नाड़ी दाईं करवट लेटने से बदल जाती है। इस तरह आप अपनी मर्जी
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