21/01/2026
इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं जहाँ कोई इंसान अपनी गलती सुधारने के लिए जान की बाजी लगा दे। जम्मू-कश्मीर के कुलगाम के रहने वाले लांस नायक नज़ीर अहमद वानी ऐसे ही एक विरले योद्धा थे।
एक वक्त था जब वे आतंकवाद के अंधेरे रास्तों पर थे, लेकिन जब उन्हें सच्चाई का अहसास हुआ, तो उन्होंने न केवल हथियार डाले, बल्कि 2004 में भारतीय सेना की वर्दी पहनकर देश के दुश्मनों का काल बन गए। उनकी बहादुरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें दो बार 'सेना मेडल' से नवाजा गया था।
नवंबर 2018 में शोपियां में हुए एक भीषण एनकाउंटर में, नज़ीर वानी ने अपने घायल साथियों को बचाते हुए दो खूंखार आतंकवादियों को ढेर कर दिया और वीरगति को प्राप्त हुए।
उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च शांतिकालीन सम्मान 'अशोक चक्र' से सम्मानित किया गया—यह सम्मान पाने वाले वे पहले कश्मीरी बने। उनका जीवन सिखाता है कि वापसी के रास्ते हमेशा खुले होते हैं, बस नीयत साफ होनी चाहिए।