31/12/2025
साल का आख़िरी मोड़
कुछ बातें ज़ोर से कहना बहुत भारी पड़ता है। इसलिए ज़्यादातर लोग उन्हें अपने भीतर ही दबाकर रखते हैं। बाहर से सब कुछ चलता हुआ दिखता है, हँसी भी है, बातचीत भी है, रोज़मर्रा की ज़िंदगी भी. लेकिन भीतर कहीं एक लगातार थकान रहती है, एक ऐसी थकान जो नींद से नहीं जाती। जब कोई यह कहता है कि अब थेरेपी के बारे में सोच रहा हूँ, या कुछ समय के लिए पीछे हटना चाहता हूँ, तो असल में वह हार नहीं मान रहा होता, वह पहली बार ईमानदार हो रहा होता है। ईमानदार इस बात को लेकर कि अब खुद को यूँ ही घसीटते रहना संभव नहीं है।
खुद को ठीक करने का पहला क़दम सच में यही होता है कि हमें यह पहचान आ जाए कि हमें मदद चाहिए। लेकिन यह पहचान अपने साथ शर्म भी लाती है। अजनबियों के सामने खुलना डरावना लगता है, और अपनों के सामने तो शायद उससे भी ज़्यादा। क्योंकि वहाँ एक डर होता है कि वे जज करेंगे, हँसेंगे, या हमारे दर्द को हल्का समझेंगे। और जब दिमाग़ पहले से ही बिखरा हो, तब ऐसे फैसले सीधे नसों पर चोट करते हैं। इसलिए बहुत से लोग बोलते नहीं हैं। वे हँसते रहते हैं, मज़ाक करते रहते हैं, और भीतर टूटते रहते हैं। अक्सर हम उन लोगों से भी नहीं कहते जो रोज़ हमारे साथ होते हैं। यह सोचकर कि वे कितना ही समझ पाएँगे। शायद उन्हें कुछ अंदाज़ा हो कि सब ठीक नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि हर कोई किसी को बचा नहीं सकता। यह उनकी गलती नहीं होती। और यह भी सच है कि बाहर से छोटे दिखने वाले दर्द भीतर बहुत गहरे हो सकते हैं। दर्द का कोई पैमाना नहीं होता। जो चीज़ किसी और के लिए मामूली है, वही किसी के लिए साँस लेना मुश्किल कर सकती है।
ज़िंदगी का सबसे कठोर सबक शायद यही है कि कुछ लोग आपके मन को तोड़कर बिना कोई जवाब दिए चले जाते हैं। वे यह नहीं बताते कि क्यों गए, क्या बदला, या गलती कहाँ हुई। बस एक खालीपन छोड़ जाते हैं। ऐसे में वापस जाकर प्यार माँगना, जवाब माँगना, खुद को छोटा करना आसान लगता है। लेकिन वहाँ रुक जाना, और यह तय करना कि अब मैं उस जगह नहीं लौटूँगा जिसने मुझे तोड़ा, यह आसान नहीं होता। यह गुस्सा नहीं है, यह आत्म-सम्मान है। यह वह बिंदु है जहाँ इंसान पहली बार खुद के साथ खड़ा होता है।
इस दौर में कुछ भी रचनात्मक न लिख पाना, कुछ भी देने का मन न होना, यह सब असफलता नहीं है। यह शरीर और मन का संकेत है कि अब रुकने की ज़रूरत है।