20/08/2022
ॐ नमो भगवते गोरक्षनाथाय सिद्धसिद्धान्तपद्धति
पहला उपदेश -
आदिनाथं नमस्कृत्य शक्तियुक्तं जगद्गुरुम् । वक्ष्ये गोरक्षनाथोऽहं सिद्धसिद्धान्तपद्धतिम् ॥ १ ॥
( अलख निरञ्जन ) आदिनाथ ( परमेश्वर ) शक्तियुक्त ( शिव ); जगद्गुरु ( जगत् के प्रकाशक ) को नमस्कार कर मैं गोरक्षनाथ ( गोरखनाथ ) सिद्धसिद्धान्तपद्धति ( सिद्धों द्वारा उपदिष्ट तथा आचार में प्रयुक्त योगमहाज्ञान पद्धति) का विवेचन ( प्रक्रियात्मक वर्णन अथवा प्रवचन ) करता हूँ ॥ १ ॥
विशेष- इस मांगलिक श्लोक के द्वारा श्रीगोरक्षनाथजी ने आदिनाथ द्वारा शिवस्वरूप में अभिव्यक्त होकर अपनी अभिन्न आत्मविहारिणी परमेश्वरी पार्वती के प्रति सप्तशृङ्ग पर उपदिष्ट योगमहाज्ञान का संदर्भ प्रस्तुत कर महामति मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा उसका श्रवण निरूपित किया है तथा मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा अपने ( गोरखनाथ के ) प्रति उपदिष्ट का स्मरण दिलाया है । मत्स्येन्द्रनाथ ने इस शैव योग का प्रकाशन कर जगत् के प्राणियों का अज्ञान अन्धकार नाश कर स्वसंवेद्य सिद्धामृत का सिद्धसिद्धान्त के रूप में अवतरण किया, इस सिद्धसिद्धान्त की पद्धति ( साधन प्रक्रिया ) के रूप में गोरखनाथजी ने रचना की । शिव को शक्तियुक्त और जगद्गुरु के रूप में नमस्कार करने का यही स्वारस्य है ।
नास्ति सत्यवचारेऽस्मिन्नुत्पत्तिश्चाण्ड पिण्डयोः । तथापि लोकवृत्त्यर्थं वक्ष्ये सत्सम्प्रदायतः ॥ २ ॥
यद्यपि इस ( स्वसंवेद्य) सत्यविचार ( अलख निरञ्जनपरमेश्वरपरमात्म परक सिद्धान्त ) मे ब्रह्माण्ड ( अण्ड ) और व्यष्टि शरीर ( पिण्ड ) की उत्पत्ति का निरूपण नहीं हो सकता, तथापि लोकव्यवहार को ध्यान में रख कर असत्वाद के रूप में अण्डपिण्ड की उत्पत्ति का विवेचन करता हूँ ।। २ ।।
विशेष - नाथयोग — सिद्धामृत मार्ग अथवा सिद्धमत में ही नहीं, वेदान्त आदि दर्शनों से भी समस्त जगत् परमात्मस्वरूप स्वीकृत है, अतएव अण्ड ( ब्रह्माण्ड ) और पिण्ड ( शरीर आदि ) की उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं होती, क्यों कि कूटस्थ, असंग, अलख निरञ्जन आदिनाथ की सत्ता से अलग जगत् की सत्ता ही नहीं है, यह अजातवाद है तथापि लोक में व्यवहार के लिये सत्कार्यवाद - परिणामवाद का विवेचन किया गया है। प्रकृति का परिणाम ही संसार है, इसी मायिक - मिथ्याभासित संसार का सृजन और संहार ( विनाश ) होता रहता है, आत्मा अपरिणामी है, सम्पूर्ण परमात्म स्वरूप, सच्चिदानन्दस्वरूप है, एकरस, अखण्ड, नित्य और अमृतस्वरूप है । उसमें परिणामवाद अथवा रूपान्तर या सत्कार्यवाद सिद्ध नहीं होता है । अलख निरञ्जन के साक्षात्कार के प्रकाश में अजातवाद की ही महती प्रतिष्ठा है ।
सा पिण्डोत्पत्त्यादिः सिद्धमते सम्यक् प्रसिद्धा पिण्डोत्पत्तिः पिण्डविचारः पिण्डसंवित्तिः पिण्डाधारः पिण्डपदसमरसभावः
श्रीनित्यावधूतः ॥ ३ ॥
सिद्धमत में अत्यन्त प्रसिद्ध सिद्धों के अनुभव में प्रकाशित पिण्डोत्पत्त्यादि पद्धति में पिण्ड की उत्पत्ति, पिण्डविचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार ( शरीरस्थ चक्र, आधार आदि ) पिण्डपदसमरसभाव और श्रीनित्यावधूत ( के स्वरूप ) का छः उपदेशों में ( इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति में ) वर्णन किया गया है || ३ || )
अव्यक्त अनाम परब्रह्म
यदा नास्ति स्वयं कर्ता कारणं न कुलाकुलम् श्रव्यक्तञ्च परं ब्रह्मं श्रनामा विद्यते तदा ।। ४ ।।
जब ( सृष्टि की उत्पत्ति होने के पहले ) कोई कर्ता नहीं है, न ( कार्य के अभाव में ) कारण है और न कुल ( शक्ति क्रम - उपास्य उपासक-भाव ) तथा अकुल (योगक्रम -- योज्य-योजक भाव का व्यवहार है, तब ब्रह्म अव्यक्त ( द्वैताद्वैत विवर्जित- स्वसंवेद्य ) नाम से परे होता है । ( उस महाप्रलय काल में कार्य कारणरहित, शक्तियुक्त निष्काम सृष्टि संचालनकर्मरत और शक्ति से अतीत अपने स्वरूप में लय को प्राप्त ब्रह्म अव्यक्त और नामरहित होता है, वह नाम रूप से अतीत अभिव्यक्त रहता है ) ।। ४ ।।
विशेष अतएव कर्तृत्व कार्य-कारण से रहित, कुल-अकुल के व्यवहार से परे महाप्रलयकाल में ब्रह्म सम्पूर्ण अव्यक्त-स्वरूप में स्वस्थ होकर नाम से अतीत रहित होता है द्वैताद्वैतविवर्जित ब्रह्म ( शून्यातीत ) अव्यक्त स्वरूप में कार्यकारण से परे होकर विद्यमान रहता है ।
परब्रह्म को निजा आदि पाँच शक्ति और उनके गुरण
अनामेति स्वयमनादिसिद्ध एकमेवानादिनिधनं सिद्ध सिद्धान्तप्रसिद्धं तस्येच्छामात्रधर्माधर्मिणी निजा शक्ति:
प्रसिद्धा ॥ ५ ॥
परब्रह्म परमेश्वर नाम से रहित है, वह स्वयं ( स्वाभिव्यक्त ) है, अनादिसिद्ध ( सजातीय-विजातीय भेद से रहित ) है, वह एक मात्र सत्स्वरूप है, वह जन्म-मरण से रहित है, सिद्धों का यह सिद्धान्त ( निश्चयात्मक मत ) है कि ब्रह्म स्वसंवेद्य ( अलख निरञ्जन ) है, उस ब्रह्म की निजा शक्ति ( सकल लोककल्याण की ) इच्छामात्र धर्मवाली तथा जीवमात्र के सुख-दुःख आदि भोगों के निमित्त सृष्टि और प्रलय में संकोच विकास-धर्म वाली ( निग्रहानुग्रहमयी ) प्रसिद्ध है ।। ५ ।।
तस्योन्मुखत्वमात्रेण पराशक्तिरुत्थिता ।। ६ ॥
( निजाशक्ति - सहित ) परब्रह्म (शिव) के मानसोल्लास - सृष्टि की इच्छा के उत्साह मात्र से (शिव में ही शयन करने वाली अथवा लय को प्राप्त होने वाली ) पराशक्ति (जगदीश्वरी गौरी पार्वती) जाग्रत होती है -अभिव्यक्त होती है ॥ ६ ॥
तस्य स्पन्दनमात्रेण अपराशक्तिरुत्थिता ॥ ७ ॥ ( आदिनाथ परमशिव में पराशक्ति अधिष्ठित है ।) इस पराशक्ति के स्वाभिव्यक्त परब्रह्म परमेश्वर (शिव) में स्पन्दन मात्र से अपरा शक्ति ( क्रिया
प्रधान शक्ति ) समुत्वित ( जाग्रत ) होती है ( इस अपरा शक्ति से समलंकृत हिरण्यगर्भ, ब्रह्म आदि नामों की प्रतिष्ठा है। यह शक्ति सृष्टिकर्म में परमेश्वर की सहायता करती है) इससे परमेश्वर जगत् की रचना करने में समर्थ होते हैं ॥ ७ ॥
ततोऽहंतार्थमात्रेण सूक्ष्मशक्तिरुत्पन्ना ॥ ८ ॥
उस अपरा ( सिसृक्षामयी ) शक्ति से परम शिव में अहंकार मात्र से ( कि मैं सृष्टि की रचना में समर्थ हूँ ) सूक्ष्म शक्ति ( विमर्शशक्ति ) उत्पन्न होती है ( यही भगवती उमास्वरूपिणी औपनिषद ब्रह्मविद्या है।) सृष्टि के आरम्भ में अन्य की अभिव्यक्ति न रहने से एकमात्र परमेश्वर का ही अहंकार ( जिसमें समस्त जगत् सूक्ष्म रूप से विलीन रहता है ) अभिव्यक्त हो उठता है ।। ८॥
ततो वेदनशीला कुण्डलिनी शक्तिरुद्गता ॥ ६ ॥
उसके बाद वेदनशील (तत्वज्ञानस्वपिरूणी जगदीश्वरी ) कुण्डलिनी ( आत्म विमूढ़ के लिये बन्धनकारिणी और योगाभ्यास द्वारा प्रबुद्ध होने पर मोक्षदायिनी ) उदित होती है। यह शक्ति चिद्रूपिणी, चैतन्यस्वरूपिणी तथा अनिर्वचनीय महिमामयी परमेश्वरी माया है
इस महाकुण्डलिनी शक्ति के उदय से परमशिव का साक्षात्कार सहज
सम्भव हो जाता है ॥ ६ ॥
नित्यता निरञ्जनता निष्पन्दतानिराभासता निरुत्थानता इति पञ्चगुणा निजाशक्तिः ॥ १० ॥
(आदिनाथ की ) निजाशक्ति के पाँच गुण ( धर्म-अवस्था) हैं, पहली नित्यता है, भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल में भी इसका नाश कभी नहीं होता है । दूसरी अवस्था निरञ्जनता है, इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, रागद्वेषादि ( अञ्जन ) का सर्वथा अभाव है, यह निर्दोष है। तीसरी अवस्था निष्पन्दता है, यह स्थिर अथवा सर्वत्र व्याप्त है, इसका किसी भी समय, किसी भी स्थिति में अभाव अथवा लोप नहीं है, यह नित्य होने से स्थिर है, स्पन्दनशून्य है । चौथी अवस्था निराभासता है, यह भेदरहित — प्रतिबिम्बरहित है । आभास प्रतिबिम्ब है। यह एकमात्र आदिनाथ का स्वरूप है, द्वैत-अद्वैत के भेदभाव से
अतीत अथवा विवर्जित अबवा विलक्षण है, यह शिव में उपाधिगत नहीं, स्वगत है। पांचवीं अवस्था निरुत्यानता है, परिणामरहित है, इसमें सृष्टि का ज्ञान नहीं रहता है। शिव में यह उसी तरह अभिन्न अथवा स्वरूपस्य है, जिस तरह चन्द्रमा में चाँदनी अभिव्यक्त है ये पांचों गुण अथवा धर्म आदिनाथ परमेश्वर में सदा नित्य विद्यमान हैं ।। १० ।।
अस्तिता, अप्रमेयता, अभिन्नता, अनन्तता, अव्यक्तता इति पञ्चगुणा पणशक्तिः ॥ ११ ॥
परमेश्वर शिव की पराशक्ति सृष्टि के पहले उनमें अन्तर्लीन रहती है । इसके पांचगुण ( धर्म अथवा अवस्था ) हैं । पहली अवस्था अस्तिता है, यह शक्ति सनातनी अथवा अव्यय है । दूसरी अवस्था अप्रमेयता है वह परिच्छेद रहित होने से स्वरूपसिद्ध है । इसकी तीसरी अवस्था अभिन्नता है । वह परम शिव से नितान्त अभेद हैं। इसमें जगत् का भेद नहीं है, जगत् की सृष्टि के पहले से ही यह परमेश्वर मे अभिन्न रहती है। चौथी अवस्था अनन्तता है। यह ध्वंस और प्रागभाव से सर्वथा अतीत होने से अविनाशी और नित्य है यह शक्ति नित्य और व्यापक है पाँचवीं अवस्था अव्यक्तता है। यह सूक्ष्मता की प्रतिपादिका है, जिस तरह दूध में घी सूक्ष्म रूप से है ही, इसी तरह जगत्-कार्य के लिये पराशक्ति इस अवस्था में परम शिव में अव्यक्त रहती है-सूक्ष्म रूप से अन्तलींन रहती है, अतएव अव्यक्तता गुण या धर्म से विद्यमान है ।। ११ ।।
स्फुरता, स्फुटता, स्फारता, स्फोटता स्फूर्तिलेति पञ्च गुणाऽपरा शक्तिः ।। १२ ॥
आदिनाथ परमेश्वर की अपरा शक्ति के पांच गुण हैं। पहलागुण स्फुरता है क्रियारूपमयी होने से इसमें संचलन है। दूसरा गुण स्फुटता है, शिव के अभिव्यक्त अथवा प्रकाशित – ज्योतित होने की यह माध्यम शक्ति है तीसरा गुण स्फारता है, शिव की क्रिया-शक्ति--संचालन अथवा सयमन प्रक्रिया में वह सहायता करती है। चौथा गुण स्फोटता है, यह रूपाभिव्यक्ति, शिव के कर्तृत्व-धर्म को प्रकाशित अथवा प्रकट करती है। पांचवां गुण स्फूर्तिता है, यह सृष्टि कार्य में परमेश्वर को उत्साहित करती है ।। १२ ।।
निरंशता, निरन्तरता, निश्चलता, निश्चयता, निर्विकल्प तेति पञ्चगुरणा सूक्ष्माशक्तिः ।। १३ ।।
परमेश्वर शिव की सूक्ष्मा शक्ति के पाँच गुण-अवस्था अथवा धर्मं हैं । ( यह सूक्ष्म शक्ति विद्यारूप विमर्शशक्ति है।) इसका पहला गुण निरंशता है । इसमें अयं (यह) और त्वम् (तुम) के व्यवहार का अभाव है, सृष्टि के पहले निरंशता शक्ति सूक्ष्म रूप से 'अहम्' के रूप में अन्तलींन रहती है, सृष्टि के बाद 'एकोऽहं बहुस्याम' के रूप में यह व्यवहार में अभिव्यक्त होती है। दूसरा गुण निरन्तरता है। यह देश - कालकृत व्यवधान से शून्य होने के कारण परमेश्वर में निरन्तर नित्य अभिव्यक्त है तीसरा गुण निश्चलता है, यह अच्युत है, आदिनाथ शिव में सम्पूर्ण अभिव्यक्त होकर व्याप्त है। चोथा गुण निश्चयता है, सत्स्वरूप की अभिव्यक्ति है, संशय, भ्रम, द्वन्द्व आदि दोष से रहित सच्चिदानन्दस्वरूप बोघ की योगज्ञानमयी शक्ति है, निरञ्जनता है। पाँचवां गुण निर्विकल्पता है, सृष्टि के पहले सिसृक्षा की संकल्प-शक्ति के रूप में परमेश्वर शिव में विशेष्य-विशेषण (उपाधि) रहित स्वाभिव्यक्त है ।। १३ ।।
पूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्चलता प्रत्यङ्मुखतेति कुण्डलिनी शक्तिः ॥ १४ ॥
( कुण्डलिनी महाशक्ति सहस्रार से भी परे आकाश चक्र में स्वस्थ आदिनाथ, अलख निरंजन, परमेश्वर की ज्योतिस्वरूपिणी, नित्य विहारिणी, शांश्वत लीलाधारिणी परमेश्वरी है ।) यह परमेश्वर में नित्य सच्चिदानन्द स्वरूपिणी होने से पूर्ण है, अखण्ड, अनन्त, शाश्वत एकरस है । इसका पहला गुण पूर्णता है। यह सर्वव्यापक, अपरिच्छिन्न और नित्य है । शब्द- अर्थरूपगत इसका परिणाम होना ही इसकी प्रतिविम्बता है । प्रतिविम्बता इसका दूसरा गुण है। योगी द्वारा नवचक्रादिभेदनपूर्वक इसका प्रबोधन —— जागरण होने पर ज्योतिरूप में उसके शरीर में यह महाशक्ति प्रतिविम्बित हो उठती है । योगी के शरीर का तेजोमय रूप में ज्योतित होना ही कुण्डलिनी की प्रतिविम्वता है । कुण्डलिनी शक्ति का तीसरा गुण प्रबलता है । यह गुण उसके महाशक्तिसम्पन्न होने का प्रतिपादक है चौथा गुण प्रोच्चलता है । यह नित्य वर्धमान है, सुप्ताकार से जागृति – प्रबोधनरूप में नित्य निरन्तर ज्योतित अथवा अभिव्यक्त होती रहती है । यह सदाशिव में सायुज्यलाभमयी होकर ऊर्ध्वमुखी रहती है ।