Nav Nath Chaurasi Siddh

Nav Nath Chaurasi Siddh Nath lineage is not simply a concept or an idea; it is rather a society to understand and analyse the mystery of universal cycle of creation.

28/08/2022

Alakh Niranjan Om Shiva Gorakh-'Adesh
ALAKH AGHOR ADESH -

Aghor Matra -
ॐ ह्रीं क्रीं हूं फट् स्वाहा । "
ॐ आं क्रीं हुं मार हस्त ह्रां ह्रीं करे समस्त दोषान् हर हर विसर विसर हुं फट् स्वाहा । "
ॐ अघोरे अघोरेश्वरी घोरमुखे चामुंडे ऊर्द्ध व केशी ह्रीं स्फीं फट् हुं स्वाहा । "
ॐ भगवते रुद्राय चण्डेश्वराय हुं हुं हुं फट् फट् स्वाहा ।

शिव के पांच मुख — सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान हुए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बन गए तभी से वे ‘पंचानन’ या पंचवक्त्र’ कहलाने लगे। भगवान शिव के पांच मुख चारों दिशाओं में और पांचवा मध्य में है -
दक्षिण मुख अघोर है ।

20/08/2022

ॐ नमो भगवते गोरक्षनाथाय सिद्धसिद्धान्तपद्धति
पहला उपदेश -
आदिनाथं नमस्कृत्य शक्तियुक्तं जगद्गुरुम् । वक्ष्ये गोरक्षनाथोऽहं सिद्धसिद्धान्तपद्धतिम् ॥ १ ॥

( अलख निरञ्जन ) आदिनाथ ( परमेश्वर ) शक्तियुक्त ( शिव ); जगद्गुरु ( जगत् के प्रकाशक ) को नमस्कार कर मैं गोरक्षनाथ ( गोरखनाथ ) सिद्धसिद्धान्तपद्धति ( सिद्धों द्वारा उपदिष्ट तथा आचार में प्रयुक्त योगमहाज्ञान पद्धति) का विवेचन ( प्रक्रियात्मक वर्णन अथवा प्रवचन ) करता हूँ ॥ १ ॥

विशेष- इस मांगलिक श्लोक के द्वारा श्रीगोरक्षनाथजी ने आदिनाथ द्वारा शिवस्वरूप में अभिव्यक्त होकर अपनी अभिन्न आत्मविहारिणी परमेश्वरी पार्वती के प्रति सप्तशृङ्ग पर उपदिष्ट योगमहाज्ञान का संदर्भ प्रस्तुत कर महामति मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा उसका श्रवण निरूपित किया है तथा मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा अपने ( गोरखनाथ के ) प्रति उपदिष्ट का स्मरण दिलाया है । मत्स्येन्द्रनाथ ने इस शैव योग का प्रकाशन कर जगत् के प्राणियों का अज्ञान अन्धकार नाश कर स्वसंवेद्य सिद्धामृत का सिद्धसिद्धान्त के रूप में अवतरण किया, इस सिद्धसिद्धान्त की पद्धति ( साधन प्रक्रिया ) के रूप में गोरखनाथजी ने रचना की । शिव को शक्तियुक्त और जगद्गुरु के रूप में नमस्कार करने का यही स्वारस्य है ।
नास्ति सत्यवचारेऽस्मिन्नुत्पत्तिश्चाण्ड पिण्डयोः । तथापि लोकवृत्त्यर्थं वक्ष्ये सत्सम्प्रदायतः ॥ २ ॥

यद्यपि इस ( स्वसंवेद्य) सत्यविचार ( अलख निरञ्जनपरमेश्वरपरमात्म परक सिद्धान्त ) मे ब्रह्माण्ड ( अण्ड ) और व्यष्टि शरीर ( पिण्ड ) की उत्पत्ति का निरूपण नहीं हो सकता, तथापि लोकव्यवहार को ध्यान में रख कर असत्वाद के रूप में अण्डपिण्ड की उत्पत्ति का विवेचन करता हूँ ।। २ ।।

विशेष - नाथयोग — सिद्धामृत मार्ग अथवा सिद्धमत में ही नहीं, वेदान्त आदि दर्शनों से भी समस्त जगत् परमात्मस्वरूप स्वीकृत है, अतएव अण्ड ( ब्रह्माण्ड ) और पिण्ड ( शरीर आदि ) की उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं होती, क्यों कि कूटस्थ, असंग, अलख निरञ्जन आदिनाथ की सत्ता से अलग जगत् की सत्ता ही नहीं है, यह अजातवाद है तथापि लोक में व्यवहार के लिये सत्कार्यवाद - परिणामवाद का विवेचन किया गया है। प्रकृति का परिणाम ही संसार है, इसी मायिक - मिथ्याभासित संसार का सृजन और संहार ( विनाश ) होता रहता है, आत्मा अपरिणामी है, सम्पूर्ण परमात्म स्वरूप, सच्चिदानन्दस्वरूप है, एकरस, अखण्ड, नित्य और अमृतस्वरूप है । उसमें परिणामवाद अथवा रूपान्तर या सत्कार्यवाद सिद्ध नहीं होता है । अलख निरञ्जन के साक्षात्कार के प्रकाश में अजातवाद की ही महती प्रतिष्ठा है ।

सा पिण्डोत्पत्त्यादिः सिद्धमते सम्यक् प्रसिद्धा पिण्डोत्पत्तिः पिण्डविचारः पिण्डसंवित्तिः पिण्डाधारः पिण्डपदसमरसभावः

श्रीनित्यावधूतः ॥ ३ ॥

सिद्धमत में अत्यन्त प्रसिद्ध सिद्धों के अनुभव में प्रकाशित पिण्डोत्पत्त्यादि पद्धति में पिण्ड की उत्पत्ति, पिण्डविचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार ( शरीरस्थ चक्र, आधार आदि ) पिण्डपदसमरसभाव और श्रीनित्यावधूत ( के स्वरूप ) का छः उपदेशों में ( इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति में ) वर्णन किया गया है || ३ || )

अव्यक्त अनाम परब्रह्म

यदा नास्ति स्वयं कर्ता कारणं न कुलाकुलम् श्रव्यक्तञ्च परं ब्रह्मं श्रनामा विद्यते तदा ।। ४ ।।

जब ( सृष्टि की उत्पत्ति होने के पहले ) कोई कर्ता नहीं है, न ( कार्य के अभाव में ) कारण है और न कुल ( शक्ति क्रम - उपास्य उपासक-भाव ) तथा अकुल (योगक्रम -- योज्य-योजक भाव का व्यवहार है, तब ब्रह्म अव्यक्त ( द्वैताद्वैत विवर्जित- स्वसंवेद्य ) नाम से परे होता है । ( उस महाप्रलय काल में कार्य कारणरहित, शक्तियुक्त निष्काम सृष्टि संचालनकर्मरत और शक्ति से अतीत अपने स्वरूप में लय को प्राप्त ब्रह्म अव्यक्त और नामरहित होता है, वह नाम रूप से अतीत अभिव्यक्त रहता है ) ।। ४ ।।

विशेष अतएव कर्तृत्व कार्य-कारण से रहित, कुल-अकुल के व्यवहार से परे महाप्रलयकाल में ब्रह्म सम्पूर्ण अव्यक्त-स्वरूप में स्वस्थ होकर नाम से अतीत रहित होता है द्वैताद्वैतविवर्जित ब्रह्म ( शून्यातीत ) अव्यक्त स्वरूप में कार्यकारण से परे होकर विद्यमान रहता है ।

परब्रह्म को निजा आदि पाँच शक्ति और उनके गुरण

अनामेति स्वयमनादिसिद्ध एकमेवानादिनिधनं सिद्ध सिद्धान्तप्रसिद्धं तस्येच्छामात्रधर्माधर्मिणी निजा शक्ति:

प्रसिद्धा ॥ ५ ॥

परब्रह्म परमेश्वर नाम से रहित है, वह स्वयं ( स्वाभिव्यक्त ) है, अनादिसिद्ध ( सजातीय-विजातीय भेद से रहित ) है, वह एक मात्र सत्स्वरूप है, वह जन्म-मरण से रहित है, सिद्धों का यह सिद्धान्त ( निश्चयात्मक मत ) है कि ब्रह्म स्वसंवेद्य ( अलख निरञ्जन ) है, उस ब्रह्म की निजा शक्ति ( सकल लोककल्याण की ) इच्छामात्र धर्मवाली तथा जीवमात्र के सुख-दुःख आदि भोगों के निमित्त सृष्टि और प्रलय में संकोच विकास-धर्म वाली ( निग्रहानुग्रहमयी ) प्रसिद्ध है ।। ५ ।।

तस्योन्मुखत्वमात्रेण पराशक्तिरुत्थिता ।। ६ ॥

( निजाशक्ति - सहित ) परब्रह्म (शिव) के मानसोल्लास - सृष्टि की इच्छा के उत्साह मात्र से (शिव में ही शयन करने वाली अथवा लय को प्राप्त होने वाली ) पराशक्ति (जगदीश्वरी गौरी पार्वती) जाग्रत होती है -अभिव्यक्त होती है ॥ ६ ॥

तस्य स्पन्दनमात्रेण अपराशक्तिरुत्थिता ॥ ७ ॥ ( आदिनाथ परमशिव में पराशक्ति अधिष्ठित है ।) इस पराशक्ति के स्वाभिव्यक्त परब्रह्म परमेश्वर (शिव) में स्पन्दन मात्र से अपरा शक्ति ( क्रिया
प्रधान शक्ति ) समुत्वित ( जाग्रत ) होती है ( इस अपरा शक्ति से समलंकृत हिरण्यगर्भ, ब्रह्म आदि नामों की प्रतिष्ठा है। यह शक्ति सृष्टिकर्म में परमेश्वर की सहायता करती है) इससे परमेश्वर जगत् की रचना करने में समर्थ होते हैं ॥ ७ ॥

ततोऽहंतार्थमात्रेण सूक्ष्मशक्तिरुत्पन्ना ॥ ८ ॥

उस अपरा ( सिसृक्षामयी ) शक्ति से परम शिव में अहंकार मात्र से ( कि मैं सृष्टि की रचना में समर्थ हूँ ) सूक्ष्म शक्ति ( विमर्शशक्ति ) उत्पन्न होती है ( यही भगवती उमास्वरूपिणी औपनिषद ब्रह्मविद्या है।) सृष्टि के आरम्भ में अन्य की अभिव्यक्ति न रहने से एकमात्र परमेश्वर का ही अहंकार ( जिसमें समस्त जगत् सूक्ष्म रूप से विलीन रहता है ) अभिव्यक्त हो उठता है ।। ८॥

ततो वेदनशीला कुण्डलिनी शक्तिरुद्गता ॥ ६ ॥

उसके बाद वेदनशील (तत्वज्ञानस्वपिरूणी जगदीश्वरी ) कुण्डलिनी ( आत्म विमूढ़ के लिये बन्धनकारिणी और योगाभ्यास द्वारा प्रबुद्ध होने पर मोक्षदायिनी ) उदित होती है। यह शक्ति चिद्रूपिणी, चैतन्यस्वरूपिणी तथा अनिर्वचनीय महिमामयी परमेश्वरी माया है

इस महाकुण्डलिनी शक्ति के उदय से परमशिव का साक्षात्कार सहज

सम्भव हो जाता है ॥ ६ ॥

नित्यता निरञ्जनता निष्पन्दतानिराभासता निरुत्थानता इति पञ्चगुणा निजाशक्तिः ॥ १० ॥

(आदिनाथ की ) निजाशक्ति के पाँच गुण ( धर्म-अवस्था) हैं, पहली नित्यता है, भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल में भी इसका नाश कभी नहीं होता है । दूसरी अवस्था निरञ्जनता है, इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, रागद्वेषादि ( अञ्जन ) का सर्वथा अभाव है, यह निर्दोष है। तीसरी अवस्था निष्पन्दता है, यह स्थिर अथवा सर्वत्र व्याप्त है, इसका किसी भी समय, किसी भी स्थिति में अभाव अथवा लोप नहीं है, यह नित्य होने से स्थिर है, स्पन्दनशून्य है । चौथी अवस्था निराभासता है, यह भेदरहित — प्रतिबिम्बरहित है । आभास प्रतिबिम्ब है। यह एकमात्र आदिनाथ का स्वरूप है, द्वैत-अद्वैत के भेदभाव से
अतीत अथवा विवर्जित अबवा विलक्षण है, यह शिव में उपाधिगत नहीं, स्वगत है। पांचवीं अवस्था निरुत्यानता है, परिणामरहित है, इसमें सृष्टि का ज्ञान नहीं रहता है। शिव में यह उसी तरह अभिन्न अथवा स्वरूपस्य है, जिस तरह चन्द्रमा में चाँदनी अभिव्यक्त है ये पांचों गुण अथवा धर्म आदिनाथ परमेश्वर में सदा नित्य विद्यमान हैं ।। १० ।।

अस्तिता, अप्रमेयता, अभिन्नता, अनन्तता, अव्यक्तता इति पञ्चगुणा पणशक्तिः ॥ ११ ॥

परमेश्वर शिव की पराशक्ति सृष्टि के पहले उनमें अन्तर्लीन रहती है । इसके पांचगुण ( धर्म अथवा अवस्था ) हैं । पहली अवस्था अस्तिता है, यह शक्ति सनातनी अथवा अव्यय है । दूसरी अवस्था अप्रमेयता है वह परिच्छेद रहित होने से स्वरूपसिद्ध है । इसकी तीसरी अवस्था अभिन्नता है । वह परम शिव से नितान्त अभेद हैं। इसमें जगत् का भेद नहीं है, जगत् की सृष्टि के पहले से ही यह परमेश्वर मे अभिन्न रहती है। चौथी अवस्था अनन्तता है। यह ध्वंस और प्रागभाव से सर्वथा अतीत होने से अविनाशी और नित्य है यह शक्ति नित्य और व्यापक है पाँचवीं अवस्था अव्यक्तता है। यह सूक्ष्मता की प्रतिपादिका है, जिस तरह दूध में घी सूक्ष्म रूप से है ही, इसी तरह जगत्-कार्य के लिये पराशक्ति इस अवस्था में परम शिव में अव्यक्त रहती है-सूक्ष्म रूप से अन्तलींन रहती है, अतएव अव्यक्तता गुण या धर्म से विद्यमान है ।। ११ ।।

स्फुरता, स्फुटता, स्फारता, स्फोटता स्फूर्तिलेति पञ्च गुणाऽपरा शक्तिः ।। १२ ॥

आदिनाथ परमेश्वर की अपरा शक्ति के पांच गुण हैं। पहलागुण स्फुरता है क्रियारूपमयी होने से इसमें संचलन है। दूसरा गुण स्फुटता है, शिव के अभिव्यक्त अथवा प्रकाशित – ज्योतित होने की यह माध्यम शक्ति है तीसरा गुण स्फारता है, शिव की क्रिया-शक्ति--संचालन अथवा सयमन प्रक्रिया में वह सहायता करती है। चौथा गुण स्फोटता है, यह रूपाभिव्यक्ति, शिव के कर्तृत्व-धर्म को प्रकाशित अथवा प्रकट करती है। पांचवां गुण स्फूर्तिता है, यह सृष्टि कार्य में परमेश्वर को उत्साहित करती है ।। १२ ।।
निरंशता, निरन्तरता, निश्चलता, निश्चयता, निर्विकल्प तेति पञ्चगुरणा सूक्ष्माशक्तिः ।। १३ ।।

परमेश्वर शिव की सूक्ष्मा शक्ति के पाँच गुण-अवस्था अथवा धर्मं हैं । ( यह सूक्ष्म शक्ति विद्यारूप विमर्शशक्ति है।) इसका पहला गुण निरंशता है । इसमें अयं (यह) और त्वम् (तुम) के व्यवहार का अभाव है, सृष्टि के पहले निरंशता शक्ति सूक्ष्म रूप से 'अहम्' के रूप में अन्तलींन रहती है, सृष्टि के बाद 'एकोऽहं बहुस्याम' के रूप में यह व्यवहार में अभिव्यक्त होती है। दूसरा गुण निरन्तरता है। यह देश - कालकृत व्यवधान से शून्य होने के कारण परमेश्वर में निरन्तर नित्य अभिव्यक्त है तीसरा गुण निश्चलता है, यह अच्युत है, आदिनाथ शिव में सम्पूर्ण अभिव्यक्त होकर व्याप्त है। चोथा गुण निश्चयता है, सत्स्वरूप की अभिव्यक्ति है, संशय, भ्रम, द्वन्द्व आदि दोष से रहित सच्चिदानन्दस्वरूप बोघ की योगज्ञानमयी शक्ति है, निरञ्जनता है। पाँचवां गुण निर्विकल्पता है, सृष्टि के पहले सिसृक्षा की संकल्प-शक्ति के रूप में परमेश्वर शिव में विशेष्य-विशेषण (उपाधि) रहित स्वाभिव्यक्त है ।। १३ ।।

पूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्चलता प्रत्यङ्मुखतेति कुण्डलिनी शक्तिः ॥ १४ ॥

( कुण्डलिनी महाशक्ति सहस्रार से भी परे आकाश चक्र में स्वस्थ आदिनाथ, अलख निरंजन, परमेश्वर की ज्योतिस्वरूपिणी, नित्य विहारिणी, शांश्वत लीलाधारिणी परमेश्वरी है ।) यह परमेश्वर में नित्य सच्चिदानन्द स्वरूपिणी होने से पूर्ण है, अखण्ड, अनन्त, शाश्वत एकरस है । इसका पहला गुण पूर्णता है। यह सर्वव्यापक, अपरिच्छिन्न और नित्य है । शब्द- अर्थरूपगत इसका परिणाम होना ही इसकी प्रतिविम्बता है । प्रतिविम्बता इसका दूसरा गुण है। योगी द्वारा नवचक्रादिभेदनपूर्वक इसका प्रबोधन —— जागरण होने पर ज्योतिरूप में उसके शरीर में यह महाशक्ति प्रतिविम्बित हो उठती है । योगी के शरीर का तेजोमय रूप में ज्योतित होना ही कुण्डलिनी की प्रतिविम्वता है । कुण्डलिनी शक्ति का तीसरा गुण प्रबलता है । यह गुण उसके महाशक्तिसम्पन्न होने का प्रतिपादक है चौथा गुण प्रोच्चलता है । यह नित्य वर्धमान है, सुप्ताकार से जागृति – प्रबोधनरूप में नित्य निरन्तर ज्योतित अथवा अभिव्यक्त होती रहती है । यह सदाशिव में सायुज्यलाभमयी होकर ऊर्ध्वमुखी रहती है ।

21/07/2022

श्री #गुरु_गोरक्षनाथ_जी_महाराज_के_अवदान
~
1. श्री महाविष्णु के अवतार श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी की प्रार्थना पर श्री महाशिव ने सतयुग में योग मार्ग के प्रचार के लिए शिव गोरक्ष का रूप धारण किया और भोगवाद में लिप्त देवों को योग मार्ग का अनुसरण कराया |
2. श्री भगवान् शिव तो गुरुओं के गुरु हैं, उन्होने ही गुरु परम्परा को प्रारम्भ किया | श्री ‘गुरु गीता’ नामक ग्रन्थ उन्होंने ही लिखा है | जो श्री शिव महा पुराण में दिया गया है | शिवस्वरूप होने के कारण श्री गोरक्ष नाथ जी महाराज तो स्वभावतः गुरुओं क्र गुरु हैं | तो भी गुरु परम्परा के निर्वहन के लिए ही उन्होंने श्री महाविष्णु के अवतार श्री मत्स्येन्द्र नाथ जी महाराज को अपना गुरु बनाया | इस प्रकार उन्होंने त्रिदेवों के भेद को भी मिटाया और छोटे बड़े के भाव को भी समाप्त किया |
3. स्वयं को गुरु की आवश्यकता नहीं थी तो भी गुरु बना कर जैसा कहो वैसा स्वयं करो भी की परम्परा का श्री गणेश श्री गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज ने किया | यही सच्चे गुरु का चिह्न है | श्री गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज ने खालसा पन्थ का निर्माण किया तो उन्होंने ही उन पञ्च प्यारों से सब से पहले अमृत छका और खालसा बने जिन्हें स्वयं गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज ने अमृत छकाया था |
4. श्री विष्णु अवतार को गुरु बना कर उन्होंने श्री विष्णु एवं श्री शिव के भेद को समाप्त किया और हरिहर की मान्यता की पुष्टि की |
5. ब्रह्मावातार श्री सत्यनाथ जी महाराज को नवनाथों में सम्मिलित कर उन्होंने त्रिदेवों के एकत्व और अभेद को सिद्ध किया |
6. श्री गणेश जी के अवतार श्री गजकर्णस्थल नाथ जी को नवनाथों में सम्मिलित कर श्री गणेश जी की प्रथम पूज्यता को यथावत् रखा |
7. त्रेता में श्री रामजी, श्री लक्ष्मणजी एवं श्री हनुमान जी को योगमार्ग में दीक्षा देकर उन तीनों के ब्रह्म ह्त्या के दोष से मुक्त किया और दोषी के दोष का निवारण हो सकता है, इस सनातन मान्यता को परिपुष्ट किया |
8. श्री रामजी, श्री लक्ष्मणजी एवं श्री हनुमानजी के द्वारा प्रवर्तित पन्थ क्रमशः राम पन्थ, लक्ष्मण पन्थ अर्थात् नाटेश्वरी पन्थ, और ध्वज पन्थ नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख बारह पन्थों में स्थान देकर राम कथा के प्रमुख पात्रों का मान बढाया |
9. द्वापर युग में श्री रुकमनी जी के विवाह में अड़चन आ गयी थी | श्री रुक्मिणी जी के भाई के रूप में कार्य करने योग्य कोई भी मण्डप में नहीं था | समस्त देवता श्री रुक्मिणी जी के तेज के सामने बौने पद रहे थे | तब गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज वहां प्रकट हुए और उन्होंने भाई के दायित्व का निर्वाह किया | तब से समस्त नाथ लक्ष्मी माता के भाई माने जाते हैं | सारी खुदाई एक तरफ, जोरू का भाई एक तरफ |
10. कलियुग में दिए अवदान तो सब को ज्ञात ही हैं, फिर भी कुछ प्रमुख अवदानों का आगे उल्लेख किया जा रहा है –
11. मध्यकाल में विविध पन्थों के योगमार्ग में आयी यौनाचार विकृति से नाथ पन्थ को बचाए रखने के लिए अवधूत गण बिना स्त्री के रहेंगे, इस सतयुगीन अवधारणा को दृढ़ता पूर्वक लागू रखा |
12. कथनी, करनी और रहनी में सच्चे होने पर बल देकर आपने श्री गीता जी के इस उद्घोष को समर्थित किया –
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः |
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ||3.21||
13. किस से क्या काम लेना है ? इस योजकता को श्री गुरु महाराज ने अतिविचित्र प्रकार से प्रयुक्त किया | उदाहरणार्थ भर्तृहरि जी को राजा से रंक बना दिया तो बप्पा रावल को रंक से राजा बनाया |
14. श्री भर्तृहरि जी की कथा से प्रमाणित होता है कि गुरु महाराज ने समाज को भोगवाद से दूर कर त्याग की ओर प्रवृत्त किया |
15. इसी कथा से सिद्ध होता है कि उन्होंने जीव हत्या को अपराध बताया, उन्होंने एक अनुत्तर प्रश्न जनता के सामने उपस्थित किया कि जो प्राण दे नहीं सकता, उसे प्राण लेने का क्या अधिकार है ?
16. ज्वाला माता के मन्दिर की उनकी कथा कहती है कि मन्दिरों में अभक्ष्य पदार्थ चढ़ाना वर्जित होना चाहिए |
17. गोरखपुर की खिचडी की कथा कहती है कि सात्विक भोजन ही योगियों और जनसाधारण के लिए भी फलदायी है |
18. मृगस्थाली नेपाल की घटना कहती है कि काल तो योगियों के वश में रहता है |
19. यह कथा यह भी कहती है कि साधुओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिए |
20. संस्कृत के साथ साथ लोकभाषा में भी उन्होंने जनता को शिक्षा दी ताकि आम जनता को भी ज्ञान पर अधिकार रहे |
21. उन्होंने संस्कृत में रचना कर अपना पाण्डित्य सिद्ध किया तो लोक भाषा में रचना कर जन सामान्य को भी उन्होंने ज्ञान उपलब्ध कराया |
22. श्री गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज हिन्दी भाषा के प्रथम कवि हैं | लोग भूल से पद्मावत के कवि मालिक मोहम्मद जायसी को हिन्दी का प्रथम कवि बताते हैं, जो कि अशुद्ध है, क्यों कि जायसी से तो सैकड़ों वर्ष पूर्व गुरु महाराज ने हिन्दी में उपदेश दिया |
23. बलपूर्वक मुसलमान बनाए गए हिन्दुओं को बप्पारावल द्वारा फिर से हिन्दू बनवाया |
24. घर वापसी के इस कार्य को हम लोग आगे बढाते रहते तो देश का विभाजन नहीं होता |
25. गुरु महाराज के इस कार्य से सिद्ध होता है कि हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयत्व है |
26. अन्याय का प्रतिकार जिस प्रकार श्री गीता जी सिखाती है, उसी प्रकार पाबू जी महाराज पर किये गए अपकार का प्रतिकार रूपनाथ जी द्वारा कराने की घटना भी जैसे को तैसा व्यवहार की ओर उन्मुख कराती है |
27. पन्थ और समाज में व्याप्त बुराइयों पर लिखी उनकी वाणियां उनको समाझ सुधारक बनाती हैं |
28. बप्पारावल, गोगाजी, अजयपालदेवजी, महाराणा प्रताप के द्वारा आपने हिन्दुत्व की रक्षा करवायी | इससे एक बात तो यह सिद्ध हुई कि यह देश हिन्दू राष्ट्र है | इस राष्ट्र की रक्षा करने का अर्थ है हिन्दुत्व की रक्षा करना |
29. हिन्दुत्व भारत राष्ट्र की आत्मा है |
30. दूसरी बात इस संघर्ष प्रेरणा से यह सिद्ध हुई कि क्षत्रियत्व किसी भी राष्ट्र की रक्षा के लिए आवश्यक है |
31. भाषा, जाति, सम्प्रदाय, प्रान्त, रूप, रंग, आदि के भेद और त्रास से भयभीत सभी जनों को नाथ पन्थ में समाविष्ट कर आपने हिन्दू एकता की रक्षा भी की और हिन्दुत्व को सर्वमान्य भी बनाया |
32. योगमार्ग में फ़ैल रहे वामाचार से आपने योग को बचाया |
33. योग और समाज में फ़ैल रहे पाखण्ड से आपने देश और समाज कि रक्षा की |
34. शारीरिक व्यायाम को ही योग समझने वालों को भी श्री गुरु महाराज की प्रेरणा है कि परमात्मा से जीवित ही मिलने को योग कहते हैं |
35. समस्त जीव मात्र में परमात्मा को देखने की प्रेरणा आपने अपनी वाणी, योग और अपने कार्यों से दी |
36. अरब से लेकर सारे भारत में आप घूमे और अभी भी इसी क्षेत्र में आप घूमते रहते हैं, इससे निम्न बातें सिद्ध होती हैं –
क. इतनी सम्पूर्ण भारत भूमि है
ख. यह इतनी पुण्यभूमि है
ग. सत्कर्म यहीं पर फलदायी होते हैं
घ. संसार की अन्य भूमियाँ भोगभूमियाँ हैं
ङ. स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि यदि किसी को मोक्ष प्राप्त करना है तो उसे एक बार भारत भूमि में जन्म लेना होगा, तभी उसे मोक्ष मिलेगा, अन्यथा नहीं | यही बात श्री गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज के कार्य व्यवहार से सिद्ध होती है कि यह भारत भूमि ही पुण्यभूमि और कर्मभूमि है अन्य सब भोगभूमियाँ हैं |
च. और इसीलिए गुरु महाराज इस भूमि के बाहर नहीं गए तो इससे सिद्ध होता है कि गुरु महाराज स्वदेशी विचार धारा के समर्थक थे
छ. और यह भी ज्ञान होता है कि गुरु महाराज इस स्वदेशी धारा को क्यों अनुप्राणित करना चाहते हैं क्यों कि यही भूमि कर्म, पुण्य और अध्यात्म की भूमि है |
ज. इस भारत भूमि को अखण्ड बनाने की प्रेरणा भी गुरु महाराज के कार्यों से मिलती है कि पुण्य क्षेत्र पापकर्माओं के अधिकार में न जाना चाहिए, न रहना चाहिए |
झ. उनका मानना था कि यदि भारत सुधर जाएगा तो सारा संसार सुधर जाएगा | अर्थात्
ञ. ‘भारत माता मानवता की प्रयोग शाला है’ |
- बाबा निरंजन नाथ अवधूत

28/06/2022

#गुरां_से_चेला_यूं_बढ़े वह करे गुरां की सेव !
मायापति मनरूपी मछंदर का शिष्य निजमन रूपी गोरक्ष हे वह अपने गुरू को कहते हे जाग मछंदर गोरक्ष आया अगम पीछम का देवे हेला ऐसी निंद कई सोवो गुरू जी आप गुरू हम चेला !
वेसे गुरू को टोकने का साहस किसी मे नही हे किन्तु वह शिष्य ही क्या जो अपने गुरू को माया से मुक्त नही करा सके !
अब थोड़ा ध्यान देवे
यहां हमारे इस भीतरी जगत मे जो निरंतर सद्धविचार बहता हे वहीं ( शिष्य ) गोरक्ष हे !
यदि हमनें उचित समय पर सद्धविचार पर अमल कर लिया तो मानो गोरक्ष को भीतर प्राप्त करने का मार्ग प्राप्त कर लिया !
यह सद्धविचार रूपी सत्य भाव ही तो गोरक्षनाथ हे यही तोह हे समस्त इंद्रियों का रक्षक हे !
जो पल पल मन रूपी गुरू मछंदर को चेतन(जागृत) करता रहता हे!
माया स्वरूप गुरु (मन) और माया रहित शिष्य (निजमन) निरंतर रमता जाग्रत जोगी सद्दभाव ही तोह गोरक्ष हे !
नाथ जी के घर की उल्टी रीत निचे छत ऊपर भीत !
हमारे सिद्धों ने घट मे अलख जगाया और भीतर पल पल जीव को चेताया हे !
इसी योग मार्ग को कहते हे जाग मछंदर गोरक्ष आया !
यह सद्ध विचार ज्ञान रूपी गोरक्ष हमारे मनरूपी मत्स्येंद्र का चेला हे !
✍🏻योगी सागर नाथ रावल
उपरोक्त घटना जो हे वह घट पिंड मे हे इसे बाहरी जगत मे देखे तो कोई लाभ यह गुढ़ रहस्य हे जाग मत्स्येंद्र गोरक्ष आया !
घट घट गोरक्ष योग पुकारे अमर धन कोई बिरला जाने !
🚩 आदेष आदेष 🚩
योगी सागर नाथ जी

27/06/2022

🌀~नाथ-योगियों की साधना~ 🌀
शिष्य जब नाथ परंपरा में आता है तो उसकी योग-साधना आमतौर पर जीवन शैली के सुधार से शुरू होती है। इसमें सामान्य क्रियाओं के लिए दैनिक मंत्र शामिल हैं जैसे जागना, स्नान करना, भोजन लेना, सोना आदि। इन मंत्रों का गुरु और परंपरा से गहरा संबंध है। भले ही आपके पास अभी तक गुरु नहीं है लेकिन परंपरा का पालन करने का इरादा है, दैनिक मंत्र आपको नाथ सम्प्रदाय के क्षेत्र में रखते हैं, आपका ध्यान दिनचर्या से परम वास्तविकता की ओर बढ़ाते हैं। इसके साथ ही शिष्य को जीवन में यम-नियामा का पालन करने का निर्देश दिया जाता है।
शुरुआत करने वालों के लिए योग-साधना में निश्चित रूप से, आसन और मूल प्राणायाम होते हैं, जो साधक के शरीर, ऊर्जा (प्राण) और मन को ध्यान के लिए तैयार करते हैं। प्रगति व्यक्ति पर निर्भर करती है - उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति, उसकी शुद्धता, समझने की क्षमता आदि।
शिष्य भाग्यशाली हो तो वह गुरु का शिष्य बन जाता है जिस पर उसे पूर्ण विश्वास करना चाहिए। गुरु शिष्य की स्थिति के अनुसार योग-साधना में अन्य तत्व जोड़ता है। यह मंत्र-योग हो सकता है, कुछ अनुष्ठान (पूजा, आरती), प्राणायाम की उन्नत तकनीक, मुद्राएं, धारणा और ध्यान की विभिन्न विधियां हो सकती हैं। गुरु-सेवा साधना का महत्वपूर्ण अंग है: यह शिष्य में पवित्रता और अस्वार्थता का विकास करता है, और गुरु के साथ संबंधों को मजबूत बनाने में मदद करता है।
गुरु के विवेक के लिए पहल रहती है। नाथ संप्रदाय में दीक्षा (दीक्षा) परंपरा में विसर्जन के स्तर को दर्शाता है। कई लोगों के लिए मूल दीक्षा (मंत्र-दीक्षा) पर्याप्त है, मुख्य रूप से क्योंकि वे एक धर्मनिरपेक्ष जीवन शैली का नेतृत्व करते हैं, एक पारिवारिक, सामाजिक कर्तव्य और क्रियाकलाप हैं। अन्य दीक्षाएं उनके लिए हैं जो गुरु और परंपरा के प्रति पूर्ण समर्पित हैं।

25/06/2022

प्रथम गुरु जी को वन्दना,
द्वितिय आदि गणेश
तृतीय सुमरूं शारदा,
जो मेरे कारज करत हमेश
चोथे सबरे देवता,
जो इन्द्र से बलवान
चौबीस नर अवतारयां,
तो भैरव और हनुमान
पञ्चम भूत प्रेत को,
शष्ठम पैगम्बर पीर
सब सिद्धों को प्रणाम है,
जो मेरे आन बंधावें धीर
सप्तम गोरखनाथ को,
तो चरण नवांउ शीष
दुध पुत और लक्ष्मी,
होवे विश्वे बीच
अष्टभुजी दुर्गा भजुं,
साथ शाकुंभर नाम
चण्डी ज्वाला वैष्णवी,
तो महा काली को प्रणाम
ध्याये देवी देवता,
ध्याये कृष्ण मुरार
ध्याये जो पांचो पाण्डवा,
फिर ध्यायो संसार
ऊंचा गढ़ तेरा कागंड़ा,
तो निचे गंगा नीर
संत भक्त स्नान कर,
तो निर्मल करें शरीर
माँ के भवन के बीच में,
तो सन्त करें जयकार
सन्तों की विपदा हरो,
माँ रूप पवन का धार
हाथ जोड़ विनती करूँ,
मेरे पांच ठगों को मार
सुरत विरत स्थिर करो,
मैया तेरी हो रही जै जै कार
मैया जी तेरी हो रही जय जय कार
🙏रचनाकार को कोटि कोटि वन्दन 🙏
🌹 संग्रहकर्ता : प्रदीप कश्यप जी,
ज्वाला माॅ के परम भक्त 🌹

24/06/2022

Jai Guru Dev

23/06/2022

#अन्तराष्ट्रीय__योग_दिवस पर विशेष
करें चक्र अनुसंधान ध्यान ( आपके चक्र कहाँ स्थित है उसका सही स्थान पता करें एक ध्यान प्रयोग के द्वारा )
अपने भीतर खूब गहरे उतरिये । मैं जानता हूँ इससे आपको ऊब पैदा होगी । जब भीतर उतरने का प्रयास करेंगे मन मे विचारों का बाढ़ उतर आएगा और आप उसी का आनन्द लेने लगेंगे । लेकिन इन सब के वावजूद भी भीतर उतरने का प्रयास जारी रखें । एक कहावत है " काग चेष्टा " कौवे की तरह का प्रयास अगर कहीं रोटी का टुकड़ा या खाने की वस्तु पड़ा रहता है तो कौवे को कितना भी भगाइये वह हर क्षण उसे पाने का प्रयास जारी रखेगा । आप भी अपना प्रयास जारी रखें इसी तरह बहाने न बनाएं । प्रयास करें प्रयास करें । प्रयास करने से तो लोग कितने से भी कठिन से कठिन कार्य कर लेते हैं और आप ध्यान में नहीं उतर सकते ? एक व्यक्ति थे गया जिले के " दसरथ मांझी " नाम था उनका , उन्होंने पहाड़ काट कर रास्ता बना लिया अकेले के दम खम पर न गांव के लोगों ने साथ दिया और न किसी सरकार ने ।
जब दसरथ मांझी पहाड़ काट कर रास्ता बना सकता है तो आप ध्यान में नहीं उतर सकते क्या ? ये इतना भी कठिन नहीं है और याद रखें परमात्मा हर क्षण आपके मदद को तैयार हीं बैठा है । बस आप अपने तरफ से कोशिश जारी रखें ।
अब ये बहाना मत बनाइयेग की मुझे ध्यान करना नहीं आता प्रयास करेंगे तो ये भी सिख लीजियेगा । एक ध्यान प्रयोग चक्र अनुसंधान ध्यान तो मैं निचे हीं दे दे रहा हूँ इसके अलावा भी अपने अगल बगल के क्रिया कलापों के प्रति थोड़ा सजग हो जाइए कहीं न कहीं आपके अगल बगल लोग होंगे हीं जिन्हें ध्यान में रुचि होगा उनसे संपर्क करें और जानने का प्रयास करें की उन्होंने कहाँ से सीखा है । आप भी वहीं से ध्यान योग सिख सकते हैं । प्रयास कीजियेगा तो रास्ता बन आएगा निश्चित रहें । बस ईमानदारी पूर्वक प्रयास करें ।
जीवन मे चाहे जितना भी हाथ पांव मार लीजिये तिनका से करोड़ बना लीजिये किन्तु याद रखिये सच्चा आनन्द परमात्मा के शरण मे हीं है । देखते हैं अंतिम समय मे चार लोग कंधे पर उठा कर श्मशान ले जाते हैं और परिजन अग्नि के हवाले कर देते हैं । उस समय परमात्मा हीं आपको अपना शरण देता है और आप हैं कि जीते जी इधर उधर भटकते रहते हैं कमाल है ! जीते जी हीं परमात्मा के शरण मे जाने का प्रयास करें वही परमात्म जो आपके भीतर है और आप भीतर उतर सकते हैं ध्यान के द्वारा ।
चक्र अनुसंधान ध्यान करें और अपने व्यक्तित्व का विकास करें |
आराम से बैठ जाएँ , निचे कोई आसन आदि बिछा लें | रीढ़ की हड्डी सीधी रखें | आँखें बंद कर लें | दो चार लम्बी गहरी साँस लें और छोड़ दें | आराम से आहिस्ते आहिस्ते | प्रत्येक छोड़ते हुए सांस के साथ अपने शरीर को ढीला छोड़ते जाएँ |
अब ध्यान को , अपने Attention को आज्ञा चक्र ( दोनों भौं के बीच में ) पर ले आयें | पांच मिनट तक अपने ध्यान को आज्ञा चक्र पर फोकस रखें | पूरी तन्मयता से |
अब ध्यान को मूलाधार चक्र ( रीढ़ के हड्डी के निचले हिस्से पर ) लायें यहाँ भी पांच मिनट अपने ध्यान को पूरी तन्मयता से रखें |
अब ध्यान को जननेंद्रिय से थोडा उपर दो अंगुल उपर स्वाधिष्ठान चक्र पर ले आयें यहाँ भी पांच मिनट अपने Attention को बढायें |
इसी तरह नाभि से दो अंगुल निचे मणिपुर चक्र पर अपने ध्यान को पांच मिनट टिकाये रखें |
इसके बाद अनाहत चक्र ( छाती के दोनों पसलियों के मध्य ) पर अपने ध्यान को रखें पांच मिनट फिर कंठ पर अपना ध्यान लाये | विशुद्धि चक्र कंठ पर अपना ध्यान भी पांच मिनट रखें Full Attention के साथ |
और अंत में फिर ध्यान को आज्ञा चक्र पर ले आयें पांच मिनट यहाँ ध्यान रखें फिर ध्यान से बाहर आ सकते हैं |
यह ध्यान विधि आपको कहीं लिखी या वर्णित की गयी नहीं मिलेगी क्योंकि यह अनुभवगत प्रयोग है |
इस ध्यान में जितना अधिक आप अपना Attention बढ़ाएंगे प्रत्येक चक्रों पर उतना हीं चक्रों पर Sensation आप मह्शूश करेंगे | Attention बढ़ने पर चक्रों पर sensation मह्शूश होने लगेगा प्रत्येक चक्रों पर | इस ध्यान में या किसी भी ध्यान में अटेंशन ( सजगता ) हीं महत्वपूर्ण है परिणाम पाने को |
आज्ञा चक्र सबसे Sensitive चक्र है इसलिए सबसे ज्यादा sensation आप आज्ञा चक्र पर हीं मह्शूश करेंगे |
एक सप्ताह यह प्रयोग करें आपके निजी जीवन में बदलाव आने शुरू हो जायेंगे , जीवन बदलने लगेगा | जितना अधिक अभ्यास करेंगे परिणाम उतना हीं अधिक मिलेगा इसमें कोई शक नहीं |
इस ध्यान प्रयोग को चक्र अनुसंधान योग इसलिए कहा है क्योंकि इसमें चक्रों का अनुसंधान यानी खोज हीं करते है अपना Attention सजगता बढ़ा कर इसलिए अटेंशन यानी सजगता पर ज्यादा जोर है | याद रखें आपके सिर्फ किसी चक्र के ऊपर ध्यान केन्द्रित करने मात्र से चक्र सक्रीय होने लगते हैं । यह कुण्डलिनी साधना का आरम्भिक चरण है |
* इस ध्यान प्रयोग में सहस्त्रार का कोई रोल नहीं है
ॐ ॐ ॐ

23/06/2022

आप सभी को #अंतरराष्ट्रीय_योग_दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
#योग_विद्या के विकास में #गुरु_गोरखनाथ का #योगदान,
कैसे जन-जन में लोकप्रिय हुआ हठयोग
श्री श्री महायोगी गुरु गोरखनाथ जी के जो भी प्रचलित योगासन-प्राणायाम कर रहे हैं। यह सब हठयोग की श्रेणी में आता है। इस हठयोग के प्रवर्तक महायोगी गुरु गोरखनाथ जी ही हैं। भगवान गुरु गोरखनाथ जी के अनुसार यह पूरा ब्रह्मांड पिण्ड में समाहित है। यह बात सिद्ध सिद्धांत पद्धति में उपनिबद्ध हैं। गुरु गोरखनाथ ने इस सिद्धांत को सर्वग्राही बनाया।
International Yoga Day 2022
हमारे जीवन को संपूर्ण रूप से संचालित करने वाली धारा सनातनी है। वह चिन्मय धर्म व संस्कृति विश्व के लिए पाथेय रही है। भारतीय दर्शन में संचलित शाखाएं प्रशाखाएं न केवल प्रकृति पुरुष का विवेचन करती हैं अपितु सृष्टि सृजन का धर्म व संस्कृति से परिपूर्ण यह लोक जगत ही किसी-किसी को महायोगी की संज्ञा देता है।
उसी महायोगी को लोग महापुरुष की संज्ञा देते है। लोक मान्यता के अनुसार भगवान गोरखनाथ हर युग में थे। महायोगी गुरु गोरखनाथ द्वारा विरचित ग्रंथ और उनके द्वारा प्रवर्तित हठयोग कि लोग स्वीकृति महायोगी गुरु गोरखनाथ को अलौकिक असाधारण अद्वितीय लोकोन्मुखी महायोगी बनाती है। नाथ पंथ में उर्ध्व रेता, अखंड ब्रह्मचारी होना बहुत बड़ी बात है जिसमें पवित्रता अत्यंत आवश्यक होती है। नाथ पंथ के अनुसार जीव का परमात्मा से मिलन ही कैवल्य है। नाथ पंथ का यही परम लक्ष्य है। वर्तमान जीवन में इसकी अनुभूति की जा सकती है। दिन सुबह एवं शाम 6 बजे से 7 बजे तक योग एवं ध्यान करें यौगिक षट्कर्म दण्ड धोती, योगासन, सूर्य नमस्कार, सूक्ष्म व्यायाम, चंद्रासन, कटि चक्रासन, मुक्तासन, गुप्तासन, हनुमानासन, मकरासन, मत्स्येंद्रासन, भुजंगासन, सुप्त वज्रासन, वृक्षासन, वृषासन, वद्धपद्मासन, गर्भाशय, पश्चिमोत्तानासन, सिंहासन आदि आसनों का अभ्यास करें। शाम के सत्र में प्राणायाम, कपालभाती, चंद्रभेदी, सूर्यभेदी, शीतली, शीतकारी, प्राणायाम, मुद्रा आदि आसनों का अभ्यास करेंl

23/06/2022
17/06/2022

Alakh Niranjan Om Shiva Gorakh-Adesh
गोरखनाथ के अनुसार आत्मा की खोज में कही बहार जाने की आवश्यकता नहीं है , वह अपने - काठ के भीतर अग्नि ,बीज के भीतर वृक्ष ,पुष्प के भीतर गंध की भाँती - व्याप्त और अंतनिहित है
गोरख बानी :- सबदी
बस्ती न सुन्यं सुन्यं न बस्ती अगम अगोचर ऐसा।
गगन सिषर मंहि बालक बोलै ताका नांव धरहुगे कैसा |१|
परम तत्व तक किसी की पहुँच नहीं है (अगम)| वह इन्द्रियों का विषय नहीं है ( अगोचर ) | वह ऐसा है न हम यह कह सकते है वह कुछ है (बस्ती) और न यह की वह कुछ नहीं है (शुन्य ) वह भाव (बस्ती) और अभाव (शुन्य ), सत और असत दोनों से परे है |शून्य यानी आकाश में ही ब्रम्ह का निवास माना जाता है वाही आत्मा को खोजना चाहिए जैसे बालक पाप और पुण्य से अछुता है उसी प्रकार परमात्मा भी है |ज़रा मरण से दूर काल से अस्पृष्ट सतत बाल स्वरुप ही योगियों का साध्य है|

अदेषी देषिबा देषि बिचारिबा अदिसीटी राषिबा चिया
पातळ की गंगा ब्रम्हांड चढ़ाइबा, तहां बिमल बिमल जल पीया |२|

न देखे हुए (परब्रम्ह)को देखना चाहिए, उसपर सोचना चाहिए |जो आँखों से देखा नहीं जाता उसे चित्त में रखना चाहिए पातळ की गंगा (योगिनिशक्ति ,कुंडलिनी )को ब्रम्हांड में प्रेरित करना चाहिए| वही पहुँच कर योगी साक्षात्कार रूप पा सकता है |

वेद न कतेब न षांणी न बांणी, सब ढंकी तली आणि
गगनी सिषर माहि सबद प्रकास्या, तहं बुझै अलाश बिनाणी |४|

परब्रम्ह का सही निर्वाचन न वेद कर पाए है न किताबी धर्मों की पुस्तके और न चारों खानी की वाणी | ये सब तो उसे ढकने में लगे है, उन्होंने सत्य को प्रकट करने के बजाय उसके ऊपर आवरण दाल दिया है | यदि सच ब्रम्ह स्वरुप का यथार्थ ज्ञान चाहिय्र तो समाधि द्वारा जो शब्द प्रकाश में आता है उसमें विज्ञान रो अलचय परब्रम्ह का ज्ञान प्राप्त करो |

हसिबा षेलिवा रहिबा रंग। कांम क्रोध न करिबा संग।
हसिबा षेलिबा गा‍इबा गीत। दिढ़ करि राषि आपनं चीत।७|

हँसना चाहिए ,खेलना चाहिए ,मस्त रहना चाहिए लेकिन कभी काम- क्रोध का साथ न करना चाहिए | हँसना, खेलना और गीत भी गाना चाहिए किन्तु अपने चित को दृढ़ करके रखना चाहिए |

हसिबा षेलिवा धरिबा ध्यान। अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियांन।
हसै षेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग।८|

हँसना,खेलना और ध्यान धरना चाहिए |रात दिन ब्रम्ह ज्ञान का कथन करना चाहिए |इस प्रकार संयम पूर्वक हँसते खेलते हुए जो अपने मनका भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रम्ह के साथ रमण करते है |

अहनिसि मन लै उनमन रहै गम कि छांड़ि अगम की कहै।
छाड़ै आसा रहै निरास कहै ब्रह्मा हूँ ताका दास।१६|

जो रात दिन बहिर्मुख मन को उन्मनावस्था में लीन किये रहते है ,गम्य जगत की बातें छोड़ कर अगम्य आध्यात्मिक क्षेत्र की बाते करता है सब आशों को छोड़ देता है कोई आशा नहीं रखता वह ब्रम्हा से भी बढकर है ,ब्रम्हा उसका दासत्व स्वीकार करता है |

अजपा जपै सुंनि मन धरै पाँचों इंद्री निग्रह करै
ब्रह्म अगनि मै होमै काया तास महादेव बंदै पाया ।१८|

जो अजपा का जाप करता है, शून्य में मन को लीं किये रहता है , पाँचों इन्द्रियों को अपने वश में रखता है ,ब्रम्हानुभुती रूप अग्नि में अपने भौतिक अस्तित्व यानी काया की आहुति कर डालता है, योगीश्वर महादेव भी उसके चरणों की वन्दना करता है |

बालै जोबनि जे नर जती, काल दुकालां ते नर सती ।
फुरतैं भोजन अलप अहारी ,नाथ कहै सो काया हमारी।२०।

बाल्यावस्था और यौवन में जो व्यक्ति संयम के द्वारा इन्द्रिय निग्रह करते है ,वे समय-असमय में सर्वदा अपने सत पर स्थिर रह सकते है | वे फुर्ती से भोजन करते है, कम खाते है, नाथ कहते है की वे हमारे शरीर है (शरीर उसके ताबे में रहता है ),उनमें और मुझ में कोई अंतर नहीं |

मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा।
तिस मरणीं मरौ, जिस मरणीं गोरष मरि दीठा॥२६॥

हे जोगी मरो , मरना मीठा होता है | किन्तु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किए |
यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं इसे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए ,योग मार्ग में तो विश्वास चला आता है की योगी कभी मरता नहीं,मरने का अर्थ है जीवन्मुक्ति| भौतिक अर्थ में तो व्यक्ति के जीवन का अंत ही सा हो जाता है, अब वह परमार्थ के लिए जीता है |

हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा, धीरैं धारिबा पावं।
गरब न करिबा सहजैं रहिबा भणत गोरष रावं॥२७॥

सब व्यवहार युक्त होने चाहिए सोच समझकर करने चाहिए | अचानक फट से बोलना उचित नहीं चलते समय पाँव पटकते चलना उचित नहीं , धीर धीरे पांव रखना चाहिए | कभी गर्व नहीं करना सहज स्वाभाविक स्थिति में रहना चाहिए, ये गोरखनाथ का उपदेश है |

भरया ते थिरं छलछालती आधा ।
सीधे सिद्ध मिल्य रे अवधू बोल्या अरु लाधा ॥२८॥

जो भरे है ज्ञान पूर्ण है , वे स्थिर गंभीर होते है ,अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते नहीं फिरते | जो अधकचरे हैं वे छलछ्लाते रहते है , चंचलतावश जगह बेजगह ज्ञान छाँटाकरते है जिससे लाभ किसी का नहीं होता |सिद्ध ऐसा व्यवहार नहीं करते ना ऐसे लोगों से मिलते है जब सिद्ध सिद्ध मिलते है तभी उनमे वार्तालाप संभव है | भरा पात्र नहीं छलकता आधा ही छलकता है |

धाये न षाइबा भूषे न मरिबा अहनिसि लेबा ब्रम्ह अगनी का भेवं ।
हठ न करीबा पडया न रहीबा यूँ बोल्या गोरष देव ॥३१॥

थोड़ा बोलै थोड़ा षाइ तिस घटी पवनां रहै समाई ।
गगन मंडल में अनहद बाजै प्यंड पडै तो सतगुरु लाजै॥३२॥

भोजन पर टूट नहीं पड़ना चाहिए न ही भूखे मरना योग्य है | रात दिन ब्रम्हाग्नि को ग्रहण करना चाहिए शरीर के साथ हठ नहीं करना नाही दिन भर कुछ काम किये बिना पड़े रहना ठीक है |

जो थोड़ा बोलता है और थोड़ा खाता है वह सही है इस तरह से उसे आकाश मंडल (ब्रम्ह रंध्र ) में अनाहत नाद सुनाई देता है | इसलिए अमरत्व प्राप्त करने का साधन हमारे पास होता है उसके बावजूद यदि यह शरीर पात हो जाय तो सद्गुरु के लिए लज्जा की बात है |

अवधू आहार तोडै निद्रा मोडै कबहूँ न होइगा रोगी ।
छठे च मासै कया पल्तिबा ज्यूँ को को बिरला बिजोगी ॥३३॥

हे अवधूत आहार तोड़ो मिताहार करो ,नींद को अपने पास न फटकने दो छठे छमासे कायाकल्प किया करो | इससे तुम कभी बीमार नहीं होगे कोई बिरला योगी ऐसा करते है |

देव कला ते संजम रहिबा भूत कला अहारं।
मन पवना लै उनमनि धरिबां ते जोगी तत सारं॥३४॥

आहार उतना ही करना चाहिए जितने से (पांच भौतिक) शरीर की रक्षा हो सके और अपने देवत्व की रक्षा के लिए संयम से रहना चाहिए | जो जोगी मन पवन को संयुक्त कर उन्मनावस्था में लीन कर देते है वे ही तत्व का सार प्राप्त करते है |

घटि घटि गोरख बाही क्यारी। जो निपजै सो हो‍ई हमारी।
घटि घटि गोरष कहै कहांणीं। काचै भांडै रहे न पांणी॥३७॥

गोरख ने (ब्रम्हने ) प्रत्येक व्यक्ति की शरीर रूप क्यारी को जोता बोया है अर्थात प्रत्येक ह्रदय में बीज रूप से परमात्मा विद्यमान है , किन्तु हमारी (ब्रम्ह ) वाही क्यारी है जिस में कुछ उपज हो जाए ,यानी वाही ब्रम्हलीन हो सकता है जो अन्तस्थ ब्रम्ह का अनुभव कर ले |गोरख कहते है अनाहत नाद हो रहा है किन्तु इसका लाभ वाही उठा सकते है जिहोने अपनी काया इसके लिए सिद्ध की हो बाकी कोई नहीं | कही कच्ची हांडी में पानी ठहर सकता है?

घरबारी सो घर की जानै बाहरी जाता भीतरी आनै।
सरब निरंतरी काटै माया सो घरबारी कहिये निरंजन की काया ॥४४॥

योगी धूर्त नहीं होता न वो पूर्ण ज्ञानी होता है अपने गजर की जो वस्तु बाहर जा रही है ,नष्ट हो रही है(श्वास और शुक्र ) उसको भीतर ले जाता है, उसकी रक्षा करता है वह सबसे अभेद भाव रखते हुए निर्लिप्त रहता है और माया का खंडन कर देता है | ऐसे घरबारी को ब्रम्ह तुल्य समझना चाहिए |

अमरा निर्मल पाप न पुनि सैट राज बिबरजित सुनी ।
सोहं हंसां सुमिरै सबद तिहीं परमारथ अनंत सिध ॥४६॥

जो मुनि सत -रज- तम इस त्रैगुन्य से दूर है पाप पुण्य से रहित है निर्मल है अमर है " सोहं हंस " इस आभ्यंतर शब्द का स्मरण करता है अर्थात जपजप करता है उसे अनंत परमार्थ सिद्ध हो जाता है |

मनवां जोगी काया मढ़ी पंच तत्त ले कथा गढ़ी ।
षिमा षडासन ग्यान अधारी सुमति पावड़ी डंड बिचारी ॥४८॥

शरीर रूपी मढ़ी में मन रूपी जोगी रहता है |वह क्षमा का खडासन, ज्ञान की अधारी ,सदबुद्धि की खडाऊं ,और विचार का डंडा उपयोग में लाता है |
शरीर का नहीं मन का योग वास्तविक योग है | बाह्य युक्तियों को छोड़कर सही रूप से मन पर नियंत्रण लाना चाहिए |

यहू मन सकती यहू मन सिव यहू मन पांच तत्त का जीव
यहू मन ले जै उन मन रहै तै तिनी लोकी की बातां कहै ॥५०॥

मन शिव है यही मन शक्ति है यही मन पञ्च तत्वों से निर्मित जीव है | माया के संयोग से ही ब्रम्ह मन के रूप में अभिव्यक्त होता है और मन से पंचभूतात्मक शरीर की सृष्टि होती है इस लिए मन का बड़ा महत्त्व है |
मन को लेकर उन्मनावस्था में लीन करने से साधक सर्वज्ञं हो जाता है तीनो लोगो की बाते कह सकता है |
गोरखनाथ- गोरखनाथ की रचनाएँ
1.सबदी2. पद3.शिष्यादर्शन4. प्राण सांकली5. नरवै बोध6.आत्मबोध7. अभय मात्रा जोग8. पंद्रह तिथि9. सप्तवार10. मंछिद्र गोरख बोध11. रोमावली12. ग्यान तिलक 13. ग्यान चौंतीसा14 पंचमात्रा15. गोरखगणेश गोष्ठी16 गोरखदत्त गोष्ठी (ग्यान दीपबोध)17 महादेव गोरखगुष्टि18. शिष्ट पुराण19. दया बोध20 जाति भौंरावली (छंद गोरख)21. नवग्रह22. नवरात्र23 अष्टपारछ्या24 रह रास25 ग्यान माला26 आत्मबोध (2)27. व्रत28. निरंजन पुराण29. गोरख वचन30. इंद्री देवता31 मूलगर्भावली32. खाणीवाणी33. गोरखसत34. अष्टमुद्रा35. चौबीस सिध36 षडक्षरी37. पंच अग्नि38 अष्ट चक्र39 अवलि सिलूक40.

Address

Sector 17
Chandigarh
160017

Telephone

+917901761651

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Nav Nath Chaurasi Siddh posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Practice

Send a message to Nav Nath Chaurasi Siddh:

Share