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🌺 माँ कामाख्या अंबुबाची मेला विशेष समूह पूजा 🌺पावन अंबुबाची मेला के शुभ अवसर पर कामाख्या मंदिर गुवाहाटी असम में 22 जून स...
07/05/2026

🌺 माँ कामाख्या अंबुबाची मेला विशेष समूह पूजा 🌺

पावन अंबुबाची मेला के शुभ अवसर पर कामाख्या मंदिर गुवाहाटी असम में 22 जून से 26 जून तक माँ कामाख्या की विशेष पूजा की जाती है हम लोग इस अवसर पर एक समूह पूजा आयोजित कर रहे हैं जिसमें आप सब भाग ले सकते हैं।

✨ इस पूजा का संकल्प होगा:
🔸 धन-समृद्धि एवं सफलता
🔸 नकारात्मक शक्तियों का निवारण
🔸 उत्तम स्वास्थ्य एवं रक्षा

💰 योगदान राशि: ₹5,100 मात्र

🎁 प्रत्येक साधक को प्राप्त होगा:
🔺 सिद्ध एवं ऊर्जित कामाख्या यंत्र
🔺 कामाख्या प्रसाद (मिक्स ड्राई फ्रूट्स)
🔺 पवित्र लाल वस्त्र (कामाख्या वस्त्रम)

📅 भुगतान की अंतिम तिथि: 31 मई

📞 अधिक जानकारी एवं सहभागिता हेतु संपर्क करें:
9380179145

🙏 जय माँ कामाख्या 🙏

3 मार्च 2026 – पूर्ण चन्द्र ग्रहण (Poorn Chandra Grahan)3 मार्च 2026 को पड़ने वाला यह ग्रहण पूर्ण चन्द्र ग्रहण है।ग्रहण ...
28/02/2026

3 मार्च 2026 – पूर्ण चन्द्र ग्रहण (Poorn Chandra Grahan)

3 मार्च 2026 को पड़ने वाला यह ग्रहण पूर्ण चन्द्र ग्रहण है।
ग्रहण का समय इस प्रकार है:

🕔 ग्रहण प्रारंभ (चंद्र उदय के साथ) – 05:43 PM
🕕 ग्रहण समाप्त – 06:46 PM

यह पूरा समय साधना के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। पूर्ण चन्द्र ग्रहण में की गई साधना का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक होता है। मंत्र सिद्धि, ऊर्जा जागरण और इच्छित कार्य सिद्धि के लिए यह समय विशेष है।

इस ग्रहण में आप वराही मातृका साधना कर सकते हैं। माँ वराही सप्तमातृकाओं में से एक हैं और रक्षा, शत्रु नाश, शक्ति और तंत्र सिद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं।

वराही मातृका साधना विधि (ग्रहण काल में)

1. तैयारी (ग्रहण से पहले)
दोपहर में स्नान कर लें।
साधना स्थान को शुद्ध करें।
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन बिछाएँ।
लाल या पीले वस्त्र पहनें।
सामने माँ वराही का चित्र या यंत्र स्थापित करें।
दीपक (घी का), धूप और लाल पुष्प रखें।

2. संकल्प
दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें:
“मैं (अपना नाम) पूर्ण चन्द्र ग्रहण के इस पावन काल में माँ वराही की कृपा प्राप्ति एवं (अपनी इच्छा या सिद्धि) हेतु यह साधना कर रहा/रही हूँ।”

3. प्रारंभिक पूजन
दीप प्रज्वलित करें
धूप अर्पित करें
लाल पुष्प अर्पित करें
अक्षत और रोली अर्पित करें

4. ध्यान
आंखें बंद करके माँ वराही का ध्यान करें। उन्हें रक्तवर्ण, शक्ति से परिपूर्ण, शत्रुनाशिनी और रक्षक रूप में अनुभव करें।

5. मंत्र जप
मंत्र:
👉 ॐ बं वराही नमः
ग्रहण प्रारंभ 05:43 PM से जप शुरू करें।
कम से कम 1 माला (108 बार) अवश्य करें।
यदि संभव हो तो पूरे ग्रहण काल तक निरंतर जप करें।
जप मानसिक या माला से कर सकते हैं।

6. ग्रहण समाप्ति के बाद
06:46 PM पर ग्रहण समाप्त होते ही जप पूर्ण करें।
माँ को प्रणाम करें। प्रार्थना कर साधना समर्पित करें।

विशेष लाभ
तंत्र साधना में तीव्र प्रगति
नकारात्मक शक्तियों से रक्षा
मानसिक दृढ़ता
बाधा निवारण
साधना में शीघ्र परिणाम
पूर्ण चन्द्र ग्रहण का यह दुर्लभ समय यूँ ही न जाने दें। श्रद्धा, शुद्ध मन और संयम के साथ की गई वराही मातृका साधना जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकती है।

जय माँ वराही

आप सबको प्रजातंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
26/01/2026

आप सबको प्रजातंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

23/01/2026
✨🌸 शक्ति ज्ञान परिवार की ओर से दीपावली 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं 🌸✨प्रिय साधकगण,दीयों का यह पर्व आपके जीवन से अंधकार मि...
20/10/2025

✨🌸 शक्ति ज्ञान परिवार की ओर से दीपावली 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं 🌸✨

प्रिय साधकगण,
दीयों का यह पर्व आपके जीवन से अंधकार मिटाकर ज्ञान, समृद्धि और शक्ति का प्रकाश फैलाए।
माँ लक्ष्मी आपके घर वैभव बरसाएं,
भगवान गणेश सभी विघ्नों को दूर करें,
और माँ जगदंबा अपनी कृपा से आपका जीवन मंगलमय बनाएं।

दीप केवल बाहर ही नहीं, भीतर भी जलाएं —
क्योंकि सच्ची दीपावली वही है, जहाँ आत्मा का प्रकाश प्रकट हो।

शुभ दीपावली 🙏
✨ जय माँ शक्ति ✨
— शक्ति ज्ञान

दीपावली: इतिहास, पौराणिक कथाएँ, लाभ और महत्वदीपावली या दिवाली भारत का सबसे प्रमुख और पवित्र त्यौहार है। यह न केवल हिंदू ...
20/10/2025

दीपावली: इतिहास, पौराणिक कथाएँ, लाभ और महत्व

दीपावली या दिवाली भारत का सबसे प्रमुख और पवित्र त्यौहार है। यह न केवल हिंदू धर्म का बल्कि जैन, सिख और कुछ बौद्ध परंपराओं में भी अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है। “दीपावली” शब्द दो शब्दों से बना है — दीप अर्थात् “प्रकाश” और आवली अर्थात् “पंक्ति”। इस प्रकार दीपावली का अर्थ हुआ “दीपों की पंक्ति”। यह अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, अन्याय पर न्याय और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।

दीपावली का इतिहास और उत्पत्ति

दीपावली का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वैदिक काल से ही यह प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। कई पुराणों और शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है। समय के साथ इसकी परंपराएँ भले ही भिन्न रूपों में विकसित हुई हों, पर इसका मूल भाव “प्रकाश से अंधकार का नाश” ही रहा है।

सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के बाद रावण का वध कर अयोध्या लौटे, तब अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में पूरे नगर को दीपों से प्रकाशित किया। उसी दिन से यह पर्व “दीपावली” कहलाया।

पौराणिक कथाएँ और धार्मिक मान्यताएँ

1. भगवान राम का आगमन:
श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण जब लंका विजय के बाद लौटे, तब अयोध्या में असंख्य दीप प्रज्ज्वलित किए गए। यह प्रसंग सत्य, धर्म और मर्यादा की जीत का प्रतीक है।

2. माता लक्ष्मी का अवतरण:
समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी जी का प्रकट होना भी इसी दिन हुआ था। इसलिए दीपावली को लक्ष्मी पूजन का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी घर-घर भ्रमण करती हैं और जिन घरों में स्वच्छता, शुद्धता और श्रद्धा होती है, वहाँ स्थायी रूप से निवास करती हैं।

3. नरकासुर वध:
द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था, जिसने 16,000 देवकन्याओं को बंदी बना रखा था। उसके वध के बाद सभी कन्याओं को मुक्त कराया गया और दूसरे दिन दीपावली मनाई गई। इसीलिए दक्षिण भारत में “नरक चतुर्दशी” विशेष रूप से मनाई जाती है।

4. महावीर निर्वाण दिवस:
जैन धर्म में दीपावली का विशेष महत्व है क्योंकि इस दिन भगवान महावीर स्वामी को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हुआ था। इसलिए यह जैन धर्मावलंबियों के लिए आत्मज्ञान और अहिंसा का प्रतीक पर्व है।

5. सिख परंपरा में अर्थ:
सिख धर्म में भी दीपावली को “बंदी छोड़ दिवस” कहा जाता है, क्योंकि इस दिन गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने मुग़ल बादशाह जहाँगीर की कैद से 52 राजाओं को मुक्त कराया था। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में इस दिन दीपों की भव्य सजावट की जाती है।

दीपावली के लाभ और आध्यात्मिक महत्व

1. आध्यात्मिक शुद्धि:
दीपावली केवल बाहरी रोशनी का पर्व नहीं है, बल्कि यह अंतरात्मा को प्रकाशित करने का अवसर है। यह हमें अहंकार, क्रोध, लोभ, और अज्ञान के अंधकार से मुक्त होने की प्रेरणा देती है।

2. ऊर्जा और सकारात्मकता:
जब घरों में दीप जलाए जाते हैं, तो वातावरण में एक विशेष सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से दीपक का प्रकाश वातावरण में सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट करता है और मन को शांति देता है।

3. समृद्धि और धनलाभ:
लक्ष्मी पूजन के कारण यह पर्व व्यापारियों और गृहस्थों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन नया लेखा-जोखा प्रारंभ करना, नया सामान या स्वर्ण क्रय करना और नए कार्य की शुरुआत करना शुभ फल देता है।

4. सामाजिक एकता:
दीपावली सभी वर्गों, जातियों और परिवारों को एक सूत्र में बांधती है। यह मिलन, दया, दान और सद्भावना का उत्सव है।

दीपावली पर क्या करना चाहिए

1. घर की स्वच्छता:
दीपावली से पहले घर की पूरी सफाई करनी चाहिए। यह केवल बाहरी सफाई नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक नकारात्मकता को भी दूर करने का प्रतीक है।

2. लक्ष्मी पूजन:
अमावस्या की रात्रि को लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र पर स्थापित कर विधिवत पूजा करनी चाहिए। चांदी का सिक्का, नया लेखा-जोखा, धूप, दीप, पुष्प और मिठाई से आराधना करनी चाहिए।

3. दीप जलाना:
सूर्यास्त के बाद पूरे घर, आंगन, दरवाजे, मंदिर और जलस्रोतों के पास दीपक जलाना चाहिए। माना जाता है कि इससे नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट होती हैं और लक्ष्मी का आगमन होता है।

4. दान और सेवा:
दीपावली के दिन गरीबों, मजदूरों और जरूरतमंदों को वस्त्र, भोजन या धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।

5. ध्यान और प्रार्थना:
रात्रि में शांत मन से ध्यान करने से आध्यात्मिक शक्ति और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

दीप जलाने का कारण

दीपक जलाना केवल परंपरा नहीं बल्कि गहरे प्रतीकात्मक अर्थ रखता है।

दीपक का प्रकाश हमारे भीतर के अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है।

यह ज्ञान, सत्य और चेतना का प्रतीक है।

आयुर्वेद के अनुसार तिल या घी के दीपक से निकलने वाला धुआं वातावरण को शुद्ध करता है और मन में स्थिरता लाता है।

घर के द्वार पर दीप जलाने से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

पटाखे जलाने की परंपरा

पुराने समय में पटाखों का उपयोग ध्वनि और प्रकाश के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों और दुष्ट आत्माओं को दूर करने के लिए किया जाता था। यह रात्रि अमावस्या की होती है, जब अंधकार और स्थिरता अधिक होती है, इसलिए प्राचीन ऋषियों ने इस दिन शोर और प्रकाश के माध्यम से नकारात्मक ऊर्जा को संतुलित करने की परंपरा बनाई।
हालाँकि आज पर्यावरण प्रदूषण के कारण ज़रूरी है कि हम पर्यावरण-अनुकूल पटाखों का ही प्रयोग करें या दीप और संगीत से उत्सव मनाएँ।

दीपावली का सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व

दीपावली भारत की संस्कृति की आत्मा है। यह पर्व परिवार, समाज और राष्ट्र को एकता, प्रेम और कर्तव्य की भावना से जोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि

> “जब तक भीतर का दीप नहीं जलता, बाहर की रोशनी व्यर्थ है।”

दीपावली केवल एक त्योहार नहीं बल्कि जीवन की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसमें मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मकताओं को जला कर नया आरंभ करता है। यही कारण है कि इस दिन नए वस्त्र, नई शुरुआत, नई सोच और नई उम्मीदें जीवन में लाई जाती हैं।

संक्षेप में, दीपावली का अर्थ केवल दीप जलाना नहीं है, बल्कि अपने भीतर ज्ञान का प्रकाश फैलाना है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जैसे दीपक छोटा होकर भी चारों ओर रोशनी फैलाता है, वैसे ही हमें भी अपनी क्षमता के अनुसार समाज और जीवन में प्रकाश फैलाना चाहिए।

“दीपावली का यह पावन पर्व आपके जीवन में ज्ञान, स्वास्थ्य, समृद्धि और दिव्यता का प्रकाश भर दे।”

नरक चतुर्दशी : इतिहास, पौराणिक कथा, महत्त्व, लाभ और करने योग्य कर्मपरिचय :नरक चतुर्दशी हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मा...
19/10/2025

नरक चतुर्दशी : इतिहास, पौराणिक कथा, महत्त्व, लाभ और करने योग्य कर्म

परिचय :
नरक चतुर्दशी हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। यह दीपावली के एक दिन पहले आती है और इसे ‘छोटी दिवाली’ भी कहा जाता है। इस दिन को यमद्वितीया या रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। नरक चतुर्दशी का मुख्य उद्देश्य नरक से मुक्ति, पापों का प्रायश्चित और आत्मशुद्धि है।

पौराणिक कथा : नरकासुर वध

नरक चतुर्दशी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा नरकासुर दैत्य की है। पुराणों के अनुसार, नरकासुर भूदेवी (पृथ्वी माता) और भगवान वराह (विष्णु के अवतार) का पुत्र था। प्रारंभ में वह एक धर्मनिष्ठ और ज्ञानी राजा था, लेकिन बाद में अहंकार और शक्ति के नशे में उसने अत्याचार करना शुरू कर दिया।
उसने स्वर्ग लोक और पृथ्वी लोक में आतंक फैला दिया, 16,000 से अधिक देवकन्याओं को बंदी बना लिया और इंद्र का छत्र तथा कुबेर का आभूषण छीन लिया।

जब उसके अत्याचार असहनीय हो गए, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। विष्णु ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लेकर युद्ध किया। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर का वध किया। कहा जाता है कि सत्यभामा स्वयं भूदेवी का अवतार थीं, इसलिए पुत्र नरकासुर का अंत उनके हाथों ही हुआ।
वध के समय नरकासुर ने भगवान से वर माँगा कि जो भी इस दिन स्नान-पूजन करेगा, उसे नरक के भय से मुक्ति मिले। तभी से यह दिन नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाने लगा।

अन्य पौराणिक प्रसंग

1. यमराज और चतुर्दशी का संबंध:
एक अन्य कथा के अनुसार, इस दिन यमराज की पूजा करने से अकाल मृत्यु नहीं होती और व्यक्ति यमलोक के कष्टों से मुक्त होता है। इसीलिए इस दिन दीपदान को “यमदीपदान” कहा गया है।

2. भगवान कृष्ण और तुलसी विवाह की कथा से जुड़ाव:
कुछ परंपराओं में माना जाता है कि नरकासुर वध के बाद जब कृष्ण ने 16,000 कन्याओं को मुक्त कराया, तो अगले दिन उन सबका विवाह करवाया गया। इसलिए यह दिन “रूप चतुर्दशी” या “सौंदर्य पूजा” के रूप में भी प्रसिद्ध हुआ।

नरक चतुर्दशी का धार्मिक महत्त्व

1. यह दिन आत्मा की शुद्धि और पापों के निवारण का प्रतीक है।

2. यह दिवाली की शुद्धता का आरंभिक दिन माना जाता है।

3. इस दिन शरीर, मन और घर की पवित्रता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

4. पितृ और यमराज की कृपा प्राप्त करने के लिए यह अत्यंत शुभ दिन है।

5. सौंदर्य, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से भी इसका विशेष महत्त्व है।

नरक चतुर्दशी के लाभ

पापमोचन: इस दिन विधिवत स्नान और दीपदान करने से जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।

आरोग्य और सौंदर्य: प्रातःकाल तेल स्नान, उबटन और सुगंधित जल से स्नान करने से त्वचा, रक्त और स्वास्थ्य लाभ होता है।

कष्टों से मुक्ति: यमदीपदान से मृत्यु और यमलोक के भय से रक्षा होती है।

सौभाग्य की प्राप्ति: इस दिन लक्ष्मी और यमराज दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश: दीपों का प्रकाश घर से नकारात्मकता दूर करता है और दिवाली की पवित्र ऊर्जा को आमंत्रित करता है।

नरक चतुर्दशी पर क्या करें (विधि-विधान)

1. प्रातःकालिक स्नान (अभ्यंग स्नान):
सूर्योदय से पहले तेल मालिश कर उबटन (चने का आटा, हल्दी, तिल और चंदन) लगाएं। इसे ‘अभ्यंग स्नान’ कहते हैं। इससे शरीर की सारी नकारात्मकता और रोग दूर होते हैं।

2. यम तर्पण और दीपदान:
सायंकाल घर के दक्षिण दिशा में 14 दीपक जलाकर यमराज को समर्पित करें। इसे यमदीपदान कहा जाता है। यह मृत्यु भय से मुक्ति देता है।

3. दीप प्रज्वलन:
इस दिन घर, आँगन, तुलसी, रसोई, स्नानागार, दरवाजे और खिड़कियों पर दीपक रखना शुभ होता है।

4. पूजा-पाठ:
भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, देवी लक्ष्मी और यमराज की पूजा की जाती है।

5. दान-पुण्य:
तिल, दीप, वस्त्र और भोजन का दान इस दिन विशेष फल देता है।

6. रात्रि जागरण:
दीपावली की तरह इस दिन भी कुछ लोग जागरण करते हैं और घर में दीपक जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक मानते हैं।

14 दीपक जलाने का कारण

नरक चतुर्दशी को 14 दीपक जलाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इसके पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों कारण हैं।

1. 14 यमदूतों से रक्षा:
पुराणों के अनुसार, मृत्यु के पश्चात आत्मा को ले जाने वाले 14 यमदूत होते हैं। इन दीपों को जलाने से वे आत्मा को कष्ट नहीं देते।

2. 14 लोकों की शुद्धि का प्रतीक:
हिंदू धर्म में 14 लोकों का वर्णन है – सात ऊर्ध्व लोक और सात अधोलोक। इन दीपों से इन सभी लोकों में शुभ ऊर्जा और प्रकाश फैलाने की मान्यता है।

3. 14 मनोविकारों का नाश:
क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, भय आदि 14 विकारों को दूर करने का यह प्रतीकात्मक उपाय है।

4. शारीरिक और मानसिक पवित्रता का प्रतीक:
दीपक आत्मा का प्रतीक है। जब 14 दीप जलाए जाते हैं, तो यह शरीर के 7 चक्रों और 7 सूक्ष्म शरीरों में दिव्यता का संचार करता है।

5. लोक परंपरा:
भारत के कई क्षेत्रों में 14 दीप घर के कोनों, दरवाजों, कुएं या तालाब के पास रखे जाते हैं ताकि यमराज को प्रकाश मिले और घर में सुख-शांति बनी रहे।

नरक चतुर्दशी और दीपावली का संबंध

नरक चतुर्दशी को दीपावली की शुरुआत माना जाता है। यह दिन शरीर, मन और आत्मा को तैयार करने का प्रतीक है, ताकि अगले दिन लक्ष्मीपूजन के समय व्यक्ति पूर्ण पवित्रता के साथ देवी का स्वागत कर सके।

जहाँ नरक चतुर्दशी आत्मा की अंधकारमय परतों को हटाने का प्रतीक है, वहीं दीपावली उस पवित्र आत्मा में दिव्यता के प्रकाश का आगमन है। इसीलिए कहा जाता है –
“नरक चतुर्दशी पापों का अंत है और दीपावली पुण्यों की शुरुआत।”

निष्कर्ष

नरक चतुर्दशी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक जागृति का दिन है। इस दिन व्यक्ति बाहरी और आंतरिक दोनों तरह के अंधकार को दूर कर प्रकाश का स्वागत करता है।
श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध केवल एक दैत्य के अंत का प्रतीक नहीं, बल्कि हमारे भीतर बसे अहंकार, लोभ और पाप के नाश का भी संकेत है।

इसलिए इस दिन तेल स्नान, यमदीपदान, पूजा और दान करके व्यक्ति न केवल पापों से मुक्त होता है, बल्कि अपने जीवन में प्रकाश, शांति और सौभाग्य को आमंत्रित करता है।
नरक चतुर्दशी का वास्तविक संदेश है — “अंधकार से प्रकाश की ओर, पाप से पुण्य की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर।”

धनतेरस : इतिहास, पौराणिक कथा, महत्व, लाभ और क्या करें इस दिनपरिचयधनतेरस हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष...
18/10/2025

धनतेरस : इतिहास, पौराणिक कथा, महत्व, लाभ और क्या करें इस दिन

परिचय
धनतेरस हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। यह दिवाली पर्व की शुरुआत का प्रतीक होता है और इसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। इस दिन का संबंध समृद्धि, स्वास्थ्य और शुभता से है। "धन" का अर्थ है संपत्ति या स्वास्थ्य और "तेरस" का अर्थ है त्रयोदशी तिथि। इस दिन धन की देवी माता लक्ष्मी और आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि की पूजा की जाती है।

धनतेरस का इतिहास

धनतेरस का आरंभ वैदिक काल से माना जाता है जब मनुष्य ने स्वास्थ्य और समृद्धि दोनों को जीवन के दो प्रमुख स्तंभ के रूप में स्वीकार किया। इस दिन की पौराणिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बहुत समृद्ध है। इसका उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है, जैसे कि स्कंद पुराण, पद्म पुराण और भाविष्य पुराण।

कहा जाता है कि इस दिन समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इसे धन्वंतरि जयंती भी कहा जाता है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है, जिन्होंने मनुष्यों को निरोग रहने का ज्ञान दिया।

धनतेरस से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

1. धन्वंतरि प्रकट होने की कथा

समुद्र मंथन के समय देवता और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए संघर्ष हुआ। इसी मंथन से चौदह रत्न निकले, जिनमें से एक थे भगवान धन्वंतरि, जो अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। इस दिन को ही धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा, ताकि मनुष्य अपने जीवन में स्वास्थ्य और अमृत तुल्य आयु प्राप्त कर सके।

2. राजा हेम का पुत्र और यमराज की कथा

एक प्राचीन कथा के अनुसार, राजा हेम का पुत्र अपने विवाह के चौथे दिन मरने के लिए अभिशप्त था। जब वह दिन आया, उसकी पत्नी ने उसे मरने नहीं दिया। उसने घर में दीपक जलाए, दरवाजे पर सोने-चाँदी के आभूषणों का ढेर लगाया और रातभर भजन करती रही। जब यमराज उसके प्राण लेने आए, तो सोने की चमक और भक्ति से प्रभावित होकर चले गए। तभी से धनतेरस की रात दीपदान और धन क्रय का महत्व माना गया ताकि यम के प्रभाव से रक्षा हो सके।

3. माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कथा

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार लक्ष्मीजी ने विष्णु भगवान से पृथ्वी पर जाने की इच्छा व्यक्त की। विष्णुजी ने मना किया कि वहाँ जाकर उन्हें मोह हो जाएगा। लेकिन देवी ने आग्रह किया। जब वे पृथ्वी पर आईं तो एक किसान के खेत में धन वर्षा कर दी। विष्णुजी ने उन्हें वापस ले जाते हुए कहा कि यही कारण है कि इस दिन उनकी पूजा धन प्राप्ति के लिए की जाती है, परंतु संयम के साथ।

धनतेरस का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

धनतेरस का दिन स्वास्थ्य, धन और समृद्धि की साधना का प्रतीक है।

यह दिन आयुर्वेद और आरोग्य का उत्सव है, इसलिए लोग इस दिन सेहत की रक्षा के उपाय आरंभ करते हैं।

इस दिन नया धन, बर्तन, आभूषण या कोई मूल्यवान वस्तु खरीदना शुभ माना जाता है।

माना जाता है कि इस दिन खरीदी गई चीजें लक्ष्मी को आकर्षित करती हैं और घर में स्थायी समृद्धि लाती हैं।

यह दिन दीपदान का भी प्रतीक है, जिससे यमदेव प्रसन्न होते हैं और अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं।

धनतेरस के लाभ

1. आर्थिक उन्नति: इस दिन किया गया लक्ष्मी पूजन घर में धन-संपदा बढ़ाता है।

2. आरोग्य लाभ: धन्वंतरि पूजन से शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है और स्वास्थ्य लाभ होता है।

3. कर्म सिद्धि: धनतेरस पर किए गए दान-पुण्य से पाप कर्मों का क्षय होता है।

4. दीर्घायु का वरदान: यमदीपदान से अकाल मृत्यु का निवारण होता है।

5. आध्यात्मिक उन्नति: यह दिन आत्मिक शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के संचय का प्रतीक है।

धनतेरस पर क्या करें

1. घर की सफाई करें: लक्ष्मीजी को स्वच्छता प्रिय है, इसलिए घर और कार्यस्थल को पूरी तरह साफ करें।

2. लक्ष्मी और धन्वंतरि पूजन करें: संध्या के समय देवी लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि का पूजन करें।

3. दीपदान करें: यमराज की प्रसन्नता के लिए घर के द्वार पर दक्षिण दिशा में दीपक जलाएं।

4. स्वास्थ्य के लिए संकल्प लें: इस दिन आयुर्वेदिक औषधियाँ या हर्बल उत्पाद खरीदना भी शुभ माना जाता है।

5. धन प्राप्ति के उपाय करें: लक्ष्मी मंत्र “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” का जाप 108 बार करें।

6. भोजन में सात्विकता रखें: ताजा और शुद्ध भोजन ग्रहण करें, मांस-मदिरा से परहेज करें।

7. जरूरतमंदों को दान दें: यह दिन दान और सेवा से पुण्य अर्जित करने का अवसर है।

धनतेरस पर क्या खरीदें

1. सोना और चांदी: यह सबसे शुभ खरीद मानी जाती है, क्योंकि यह धन वृद्धि और स्थायित्व का प्रतीक है।

2. नए बर्तन: खासकर पीतल, तांबा या स्टील के बर्तन खरीदना शुभ होता है। इन्हें लक्ष्मी पूजन में उपयोग करें।

3. झाड़ू: माना जाता है कि झाड़ू क्रोध, ऋण और नकारात्मकता को हटाता है।

4. दीपक और गोमती चक्र: दीपक से अंधकार नष्ट होता है और गोमती चक्र से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

5. धन्वंतरि संबंधित औषधियाँ: आयुर्वेदिक औषधियाँ या जड़ी-बूटियाँ खरीदना स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।

6. कुबेर की मूर्ति या यंत्र: धन स्थायित्व और व्यापार में वृद्धि के लिए।

7. लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति: दिवाली पूजन के लिए इस दिन खरीदना अत्यंत शुभ माना गया है।

धनतेरस का आधुनिक महत्व

आज के युग में धनतेरस केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है। यह व्यापारियों के लिए नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत का संकेत होता है। लोग नए व्यवसाय शुरू करते हैं, गाड़ियाँ, संपत्ति या इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ खरीदते हैं। यह दिन सकारात्मक शुरुआत और नए अवसरों के स्वागत का प्रतीक बन गया है।

निष्कर्ष

धनतेरस का असली अर्थ केवल धन-संपत्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि धन, स्वास्थ्य और धर्म का संतुलन बनाए रखना है। यह दिन हमें सिखाता है कि सच्चा “धन” केवल पैसा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ज्ञान, और सदाचार है।
भगवान धन्वंतरि के आशीर्वाद से निरोग जीवन और माता लक्ष्मी की कृपा से समृद्ध जीवन यही धनतेरस का वास्तविक वरदान है।

शुभकामना:
आपके जीवन में इस धनतेरस पर धन, आरोग्य, और सुख की वर्षा हो।
“शुभ धनतेरस!”

01/10/2025

Durga Puja Kolkata 2025

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