Naye bharat ke khoj

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~ OSHO

संत का अर्थ है, सत्य को उंडेल दे तुममें। संत का अर्थ है, जो उसे हुआ है उसमें रंग दे तुम्हें। संत का अर्थ है, रंगरेज। संत...
20/01/2026

संत का अर्थ है, सत्य को उंडेल दे तुममें। संत का अर्थ है, जो उसे हुआ है उसमें रंग दे तुम्हें।

संत का अर्थ है, रंगरेज। संत का अर्थ है, तुम्हें एक डुबकी लगवा दे उसमें, जो अभी तुम्हारे सामर्थ्य के बाहर है। संत का अर्थ है, जो उसने देखा है, अपनी आंखों के पीछे तुम्हें खड़ा करके थोड़ा अपनी आखें उधार दे दे, कहे कि जरा मेरी आंखों से देख लो। जो मुझे दिखता है, वह देख लो।

संत का अर्थ है कि थोड़ी देर को अपना हृदय तुम्हें दे दे। और अगर तुम राजी हो तो यह घट जाता है, इसमें देर नहीं लगती।

यहां घट रहा है। तुम अगर राजी हो तो कभी भी, किसी भी क्षण, जहां राजीपन पूरा होता है, अचानक तुम्हारे हृदय की जगह मेरा हृदय धड़केगा, तुम मेरी आख से देखने लगोगे। और तब सब चीजें और ही हो जाती हैं। तब सब कुछ और ही ढंग से दिखायी पड़ने लगता है।

संत को तुमने जानना सीखा, देखना सीखा, जब तुम्हें हिंदू का संत हो, कि मुसलमान का, कि ईसाई का, कि बौद्ध का, सभी का संत पहचान में आने लगे, तब तुम समझे कि संत क्या है। और तब जो संतोष मिलेगा, वह संक्रांति है, वह तुम्हें रूपांतरित कर जाएगी, वह तुम्हें नया कर जाएगी, वह तुम्हें द्विज बना देगी, एक नया जन्म देगी।

निश्चित ही यह बात असंतों की वाणी में कैसे हो सकती है! वाणी खाली, कोरी, वहां कुछ प्राण कहा। पिंजड़ा है, पक्षी तो नहीं। तो पिंजड़ों को लिए तुम चलते रहो। लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि लोग पिंजड़ों को लिए ही चलते रहते हैं और मानकर चलते हैं कि पक्षी है। होना चाहिए, क्योंकि बाप ने कहा, क्योंकि बाप के बाप ने कहा। होना चाहिए क्योंकि भीड़ कहती है, समाज कहता है, मौलवी कहता है, पंडित कहता है, होना चाहिए। अपनी तरफ से नहीं देखते कि है या नहीं। डरते भी हो कि कहीं ऐसा न हो कि न हो, इसलिए देखते ही नहीं। अपने पिंजड़े को खूब ढांककर रखते हो कि कहीं दिखायी न पड़ जाए।

तुम्हें भी कभी—कभी शक तो आता होगा कि है या नहीं, लेकिन यह शक तुम टिकने नहीं देते। तुम कहते हो, शक तो अच्छी बात नहीं। होना चाहिए ही। कोई माता—पिता झूठ तो न बोलेंगे। पंडित—पुरोहित झूठ तो न बोलेंगे। समाज—परिवार झूठ तो न बोलेगा। ये सब लोगों को झूठ बोलने में क्या रखा है! ये क्यों झूठ बोलेंगे सब! होना ही चाहिए।

तो तुम कभी उठाकर देखते भी नहीं पर्दा कि पीछे कोई है कि तुम खाली मंदिर की पूजा कर रहे हो.

तुम्हारे सौ संतों में से निन्यानबे खाली मंदिर हैं, जिनके भीतर कुछ भी नहीं है। लेकिन उनकी पूजा चल रही है।

अक्सर तो ऐसा होता है कि जिनके भीतर कुछ है, उनकी पूजा बहुत मुश्किल हो जाती है। क्योंकि जिनके भीतर कुछ है, वे तुम्हारी धारणाएं तोड देते हैं। जिनके भीतर कुछ है, वे तुम्हारे गुलाम थोड़े ही हैं। वे तुम्हारी लीक पर थोड़े ही चलते हैं। जिनमें कुछ नहीं है, वे ही लीक पर चलते हैं। उधार वही होता है जिसके पास अपनी नगद संपदा नहीं। उधारी ऊपर—ऊपर से ठीक लगती हो, भीतर—भीतर अर्थहीन होती है।
ओशो
एस धम्मो सनंतनो 74

14/01/2026
09/01/2026
अगर आशीर्वादों से सुख आता होता, तो एक आदमी सभी को सुखी कर देता, क्योंकि आशीर्वाद देने में क्या कंजूसी, इतना आसान नहीं है...
05/01/2026

अगर आशीर्वादों से सुख आता होता, तो एक आदमी सभी को सुखी कर देता, क्योंकि आशीर्वाद देने में क्या कंजूसी, इतना आसान नहीं है, तुमने दुःख बोया है, मेरे आशीर्वाद से कैसे कटेगा, तुम मुझसे समझ लो, आशीर्वाद मत मांगो, क्योंकि आशीर्वाद तो बेईमानी का ढंग है, दुःख तुमने दिया है न मालूम कितने लोगों को, तुमने दुःख बोया है, सब तरफ, अब तुम उसकी फसल काटने के वक़्त आशीर्वाद मांगने आ गए, और तुम्हारे ढंग से ऐसा लगता है की जैसे अगर तुम्हे दुःख मिल रहा है, तो मै आशीर्वाद नहीं दे रहा हु इसलिये दुःख मिल रहा है, किसी के आशीर्वाद से तुम्हारा दुःख न कटेगा, किसी के आशीर्वाद से तुम्हारी समझ बढ़ जाये तो काफी, किसी के आशीर्वाद से तुम में प्रेम का बीज आ जाये तो काफी, पाप तो प्रेम से कटेगा, और दुःख तो तुम जब दूसरों के लिए सुख बोने लगोगे तब कटेगा। 0$H0

मुझ से तुम्हारा जो संबंध बना है, वह अंतिम नहीं है। वह अंतिम नहीं होना चाहिए। मुझसे तुम्हारा जो संबंध बना है, उसका उपयोग ...
04/01/2026

मुझ से तुम्हारा जो संबंध बना है, वह अंतिम नहीं है। वह अंतिम नहीं होना चाहिए।

मुझसे तुम्हारा जो संबंध बना है, उसका उपयोग कर लो। उस संबंध को परमात्मा की याद में रूपांतरित कर लो।

याद आने लगी मेरी, तो एक बात तो पक्की हो गयी कि याद की कला आ गयी। अब जरा याद का विषय बदलना है।

आधा काम तो पूरा हो गया। तैरना तो आ गया; अब पूरब तैरें कि पश्चिम तैरें, यह उतनी कठिन बात नहीं। इसमें क्या कठिनाई है? असली बात कठिनाई की है... याद।

तुम कहते हो : ‘ऐसा कौन सा जादू है जो मुझे यहां खीच लाया?’

जादू चल गया ! असली बात तो हो गयी ! ‘घर पर या बाजार में जहां भी रहता हूं आपकी याद आती रहती है। ध्यान में भी याद आती है और आंसू बहने लगते हैं...

अब धीरे - धीरे मेरी इस याद को परमात्मा की याद में रूपांतरित करो। इसलिए गुरु को परमात्मा कहा है; क्योंकि गुरु को धीरे - धीरे रूपांतरित कर लेना है परमात्मा में।

गुरु सिर्फ शिष्य के लिए परमात्मा है, सभी के लिए नहीं। और उसको परमात्मा मानने के पीछे बड़ा राज है। राज यही है कि अगर वह परमात्मा है, तो ही हम उससे परमात्मा पर छलांग लगा सकेंगे, नहीं तो छलांग नहीं लग पायेगी।

गुरुर्ब्रह्मा…।

गुरु से तो शुरुआत है। वह तो बीज है। गुरु ने हाथ पकड़ लिया। अब जल्दी ही गुरु का हाथ परमात्मा के हाथ में रूपांतरित होना चाहिए।

- ओशो

🌹🌹❤ आनंद ❤🌹🌹छेड़ मधु-संगीत के स्वरशब्दत्तंत्र संवार लो!ग्रंथि उर के फिर खुलेंशब्द-गति-लयत्ताल झर-झरनिमिष में बन सुधि ढलें...
03/01/2026

🌹🌹❤ आनंद ❤🌹🌹

छेड़ मधु-संगीत के स्वर
शब्दत्तंत्र संवार लो!
ग्रंथि उर के फिर खुलें
शब्द-गति-लयत्ताल झर-झर
निमिष में बन सुधि ढलें!
सरल हास-विलास
दीपक बार लो!
छेड़ मधु-संगीत के स्वर
शब्दत्तंत्र संवार लो!
क्षितिज के उस पार तरणी खोल
कल्पना की थकी पलकें मूंद
गीत-परिमल-सुरभि पल-पल घोल
मधुर-रव में अधर
पुनः पखार लो!
छेड़ मधु-संगीत के स्वर
शब्दत्तंत्र संवार लो!

मैं गीत सिखाता हूं। मैं संगीत सिखाता हूं। मेरा संदेश एक ही है, आनंद: उत्सव, महोत्सव। और उत्सव-महोत्सव को सिद्धांत नहीं बनाया जा सकता, केवल जीवनचर्या हो सकती है यह। तुम्हारा जीवन ही कह सकेगा। ओंठों से कहोगे, बात थोथी और झूठी हो जाएगी। प्राणों से कहनी होगी। श्वासों से कहनी होगी। और जहां आनंद है वहां प्रेम है; और जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।

मैं एक प्रेम का मंदिर बना रहा हूं। तुम धन्यभागी हो, उस मंदिर के बनाने में तुम्हारे हाथों का सहारा है। तुम ईंटें चुन रहे हो उस मंदिर की। तुम द्वार-दरवाजे बन रहे हो उस मंदिर के।

पृथ्वी से आनंद का मंदिर बहुत समय पहले विदा हो गया। हां, कभी कृष्ण ने बांसुरी बजाई थी, तब रहा होगा।

फिर न मालूम किस दुर्भाग्य की घड़ी में, न मालूम किस हताशा में, न मालूम किन नपुंसक लोगों के हाथों में हमने अपना जीवन दे दिया। थोथे पंडितों के हाथों में हमारा जीवन पड़ गया। उन्होंने हमारी गर्दन बुरी तरह फांस दी, लटका दिए शास्त्र बड़े-बड़े गर्दन से, कि चलना भी मुश्किल है नाचना तो दूर। और बड़े सिद्धांत हमारे कंठों में भर दिए कि कंठ अवरुद्ध हो गए हैं, गीत गाना संभव कैसे हो?

मैं तुम्हारे सारे शास्त्र, तुम्हारे सिद्धांत, तुम्हारे संप्रदाय, सब छीन लेना चाहता हूं।

मैं चाहता हूं तुम्हें निर्भार करना--ऐसे निर्भार कि तुम पंख खोल कर आकाश में उड़ सको। मैं तुम्हें आकाश देना चाहता हूं। मैं तुम्हें हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध नहीं बनाना चाहता--मैं तुम्हें सारा आकाश देना चाहता हूं! और उड़ोगे तुम सूरज की तरफ तो ही तुम जान सकोगे वेदों का रहस्य, उपनिषदों की गरिमा, कुरान की महिमा, बाइबिल के रहस्य। तो ही तुम जान सकोगे कबीर, नानक, फरीद और इनका अदभुत लोक।

लेकिन यह जानना है अस्तित्वगत रूप से।

मेरी बात मान नहीं लेनी है।

मैं तुम में विश्वास नहीं जगाना चाहता। मैं तुम्हें अनुभव देना चाहता हूं।

मैं तो अपनी सुराही से तुम्हारी प्याली में शराब ढालना चाहता हूं। अपनी प्याली साफ करो। अपनी प्याली मेरे सामने करो। डरो मत, मस्त होने से घबड़ाओ मत।

निश्चित ही तुम मस्त होओगे तो लोग तुम्हें पागल कहेंगे। क्योंकि लोगों ने केवल पागलों को ही भर मस्त रहने की सुविधा छोड़ी है, और किसी को मस्त रहने की सुविधा ही नहीं छोड़ी। फिक्र न करना। लोग पागल भी समझें तो क्या बिगड़ता है?

असली सवाल तो परमात्मा का है कि परमात्मा क्या समझता है। असली जवाब तो वहां देना है, लोगों से क्या लेना-देना है? लोगों ने पागल भी समझा तो ठीक है, अच्छा ही है।
.. 🌹❤ Osho ❤🌹

🌹🌹 Zorba The Buddha 🌹🌹

🌹🌹🌹🙏🌹🌹🌹

"तुम बस तुम जैसे हो , और तुम्हें अपना रास्ता खुद ही खोजना होगा" *सहारे मिल सकते हैं , सुझाव मिल सकते हैं , आदेश नहीं ।* ...
03/01/2026

"तुम बस तुम जैसे हो , और तुम्हें अपना रास्ता खुद ही खोजना होगा"

*सहारे मिल सकते हैं , सुझाव मिल सकते हैं , आदेश नहीं ।* *दूसरे की समझ के प्रकाश से तुम* *अपनी समझ को जगा सकते हो लेकिन दूसरे के जीवन* *को ढांचा मान कर* *अपने को ढाला कि मुक्ति तो दूर* * *जीवित भी तुम न रह जाओगे । तब तुम एक मुर्दे की भांति होओगे ; एक अनुकृति* *जिसकी आत्मा खो गई है ।*
*और तुम्हें अगर कुछ होना है तो बस अपने ही जैसा होना है ।*
*कोई दूसरा न तो आदर्श है , न कोई दूसरा तुम्हारे लिए नियम है , न तो कोई दूसरा तुम्हारा अनुशासन है । तुम्हारा बोध , तुम्हारी समझ , तुम्हारे अपने जीवन की भीतर की ज्योति को ही बढ़ाना है । सहारा लो , साथ लो ; जो पहुंच गए हैं उनसे स्वाद लो ; जो पहुंच गए हैं उनको गौर से देखो , पहचानो ; पर नकल मत करो , *अनुसरण मत करो*।

*तुम समझना , देखना , सीखना , स्वाद लेना । उसी स्वाद , समझ और सीखने से तुम्हारी अपनी अंतर्ज्योति जगने लगेगी । उस अंतर्ज्योति के प्रकाश में ही तुम पहुंच सकोगे ।*

*दूसरे का प्रकाश न कभी किसी को ले गया है , न ले जा सकता है । वह दूसरे का है । वह कितना ही प्रकाशित मालूम पड़े , उससे अंधकार नहीं मिटेगा...!!*

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