06/01/2026
आजकल एक नया चलन सा बन गया है। लोग किसी एक सिंगल हर्ब पर दो चार रिसर्च पेपर पढ़ लेते हैं और फिर जानना कम, बताना ज़्यादा शुरू कर देते हैं। फलां औषधि का एंटी इंफ्लेमेटरी इफेक्ट है, फलानी का पेन किलिंग एक्शन है, जैसे गुणों की सूची पढ़ते समय लगता है कि अब रोग नाम की चीज़ बची ही नहीं है।
हाल ही में ऐसे ही एक सज्जन से मुलाकात हुई। हल्दी के इतने गुण गिना रहे थे कि सुनकर लगा हल्दी नहीं, कोई सर्वगुणसंपन्न अमृत हो। रिसर्च पेपर भी मोबाइल में तैयार थे। उनके हिसाब से ऐसा कोई रोग नहीं जिसमें हल्दी एक्सीलेंट काम न करती हो। थोड़ी बातचीत में कारण भी स्पष्ट हो गया। उनकी कंपनी हल्दी का एक्सट्रैक्ट बाज़ार में लाने वाली थी।
मैं व्यक्तिगत रूप से केवल रिसर्च पेपर देखकर कभी कन्विंस नहीं होता। इस देश में रिसर्च कैसे होती है, किस उद्देश्य से होती है, और पेपर कैसे छपते हैं, यह कोई बहुत छुपी हुई बात भी नहीं है। खैर, उस बहस में जाने से ज़्यादा ज़रूरी एक बुनियादी बात समझना है।
किसी चीज़ का इफेक्ट होना और उस इफेक्ट का इलाज के लिए पर्याप्त होना, ये दोनों अलग बातें हैं। सिद्धांत और व्यवहार के बीच का यही फर्क अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
बीस टमाटर को जोड़ दीजिए, यह वैज्ञानिक रूप से सच है कि उनसे एक छोटा सा बल्ब जल सकता है। रिसर्च सही है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि बल्ब जला या नहीं, असली सवाल यह है कि कितनी देर तक जला। क्या उस रोशनी में आप अपना घर चला सकते हैं। क्या उस पर निर्भर होकर आप पूरी व्यवस्था खड़ी कर सकते हैं।
ठीक उसी तरह जितनी भी औषधियाँ तिक्त, कषाय या मधुर रस वाली होती हैं, उनमें किसी न किसी स्तर पर एंटी इंफ्लेमेटरी गुण मिल ही जाएगा। यह कोई बड़ी खोज नहीं है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वह गुण उस बीमारी में इलाज भर के लिए पर्याप्त है। क्या वह मात्रा, वह स्वरूप, वह योग, उस रोग की तीव्रता और अवस्था के सामने खड़ा हो सकता है।
सामान उठाने का काम उँगली से भी होता है और जेसीबी से भी। रिसर्च यह तो साबित कर ही देगी कि उँगली से सामान उठाया जा सकता है। यह तथ्य गलत नहीं है। लेकिन जब बात बिल्डिंग बनाने की आती है, तब उँगली का यह इफेक्ट काम का नहीं रह जाता। वहीं दूसरी तरफ वही उँगली जब जेसीबी का गियर बदलती है, तब कुंतलों का भार उठाया जा सकता है।
यही अंतर औषधि विज्ञान में भी है। किसी द्रव्य का गुण क्या है, यह जानना ज़रूरी है। लेकिन उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी यह समझना है कि उस गुण का प्रयोग कैसे, कब, कितनी मात्रा में, किस रोगी में और किस अवस्था में किया जाए। गुण अपने आप में इलाज नहीं होता। गुण का सही प्रयोग ही चिकित्सा बनता है।
आयुर्वेद की गहराई यहीं से शुरू होती है और यहीं पर सिंगल हर्ब की सतही रिसर्च आकर रुक जाती है।
#शतभिषा