Ananda Marga Pracaraka Samgha Jaipur Bhukti

Ananda Marga Pracaraka Samgha Jaipur Bhukti "Self realisation and Service to all"

आनंद पूर्णिमा 2026 एवं श्री श्री आनंदमूर्ति जी की 105वीं जयंती समारोह संपन्नजयपुर। आनंद मार्ग प्रचारक संघ द्वारा आनंद पू...
02/05/2026

आनंद पूर्णिमा 2026 एवं श्री श्री आनंदमूर्ति जी की 105वीं जयंती समारोह संपन्न

जयपुर। आनंद मार्ग प्रचारक संघ द्वारा आनंद पूर्णिमा 2026 के पावन अवसर पर श्री श्री आनंदमूर्ति जी की 105वीं जयंती श्रद्धा, भक्ति एवं सेवा भाव के साथ 1 मई 2026 को जयपुर में हर्षोल्लासपूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर सामाजिक, आध्यात्मिक एवं मानव सेवा से जुड़े अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए।

कार्यक्रम के अंतर्गत विश्व शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए अष्टाक्षरी सिद्ध महामंत्र “बाबा नाम केवलम्” का 12 घंटे का अखंड कीर्तन आयोजित किया गया, जो कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहा। इसके अतिरिक्त शोभायात्रा, सामूहिक ध्यान, योग एवं ध्यान प्रशिक्षण, रक्तदान शिविर, फल एवं शरबत वितरण, प्रसाद वितरण तथा युवाओं के लिए नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा कार्यक्रम भी संपन्न हुए।

समारोह में तांडव एवं कौशिकी नृत्य प्रतियोगिता, प्रश्नोत्तरी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां एवं आध्यात्मिक प्रवचन आयोजित किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

श्री श्री आनंदमूर्ति जी एक महान आध्यात्मिक गुरु, दार्शनिक, समाज सुधारक एवं मानवतावादी चिंतक थे। उन्होंने वर्ष 1955 में आनंद मार्ग की स्थापना कर मानव समाज को आध्यात्मिक साधना, सेवा एवं नैतिक जीवन का समन्वित मार्ग प्रदान किया।

उनके प्रमुख योगदानों में राजाधिराज योग का प्रचार-प्रसार, यम-नियम आधारित नैतिक जीवनशैली, मानवता के सर्वांगीण विकास हेतु सामाजिक सेवा की प्रेरणा, तथा शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में सेवा कार्यों का विस्तार शामिल रहा।

उन्होंने PROUT (Progressive Utilization Theory) के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक न्याय, विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था एवं संसाधनों के समुचित उपयोग पर आधारित एक वैकल्पिक आर्थिक मॉडल प्रस्तुत किया।

नवमानवतावाद (Neo-Humanism) के माध्यम से उन्होंने केवल मानव मात्र ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों, वनस्पतियों एवं संपूर्ण सृष्टि के प्रति प्रेम, सम्मान और संरक्षण का संदेश दिया।

श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने 5000 से अधिक प्रभात संगीत की रचना कर भक्ति, प्रकृति, मानवता एवं आध्यात्मिकता को संगीत के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया। साथ ही उन्होंने तांडव एवं कौशिकी नृत्य जैसे विशिष्ट नृत्यों का परिचय देकर शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक संतुलन पर बल दिया।

उनका संदेश —
“कर्म ही मनुष्य को महान बनाता है। अपनी साधना, सेवा एवं त्याग से महान बनो।”
आज भी लाखों लोगों को सेवा, साधना एवं मानव कल्याण के मार्ग पर प्रेरित कर रहा है।

कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं सहयोगकर्ताओं का आभार व्यक्त किया।

नमस्कारहमें अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हम आपको आनंद पूर्णिमा 2026 के शुभ अवसर पर आयोजित श्री श्री आनंदमूर्ति जी की 105वीं ...
30/04/2026

नमस्कार

हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हम आपको आनंद पूर्णिमा 2026 के शुभ अवसर पर आयोजित श्री श्री आनंदमूर्ति जी की 105वीं जयंती समारोह में सम्मिलित होने हेतु सादर आमंत्रित कर रहे हैं।

इस अवसर पर जयपुर सहित विश्वभर में लाखों भक्तों एवं समाजसेवियों द्वारा अनेक सामाजिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

जयपुर में भी हम इस पावन दिवस को बड़े हर्ष, उल्लास एवं उत्साह के साथ मना रहे हैं।

विश्व शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए अष्टाक्षरी सिद्ध महामंत्र "बाबा नाम केवलम्" का 12 घंटे का अखंड कीर्तन, शोभायात्रा, विभिन्न प्रतियोगिताएं जिनमें तांडव एवं कौशिकी नृत्य, रक्तदान शिविर, सामूहिक ध्यान एवं प्रसाद वितरण, युवाओं के सर्वांगीण विकास हेतु नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा, योग एवं ध्यान प्रशिक्षण, तथा फल एवं शरबत वितरण आदि कार्यक्रम इस आयोजन के प्रमुख आकर्षण हैं।

आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि इस आयोजन में सम्मिलित होकर इसे सफल बनाने में अपना सहयोग प्रदान करें।

सादर आमंत्रण

संपर्क सूत्र -

ध्यान सीखने के लिए :
9414052684, 8789900800, 9910898310

समाज सेवा में स्वयंसेवा करने के लिए:
098124 54454 , 9414049926, 9214435685,

Namaskar 🙏It gives us immense pleasure to share that Ananda Marga Primary School, Rajni Vihar, Jaipur has been serving u...
25/04/2026

Namaskar 🙏

It gives us immense pleasure to share that Ananda Marga Primary School, Rajni Vihar, Jaipur has been serving underprivileged children for the last 20 years by providing quality education at free of cost. 🙏

Today, we were honored to welcome Smt. Jyoti Agarwal Ma’am as the Chief Guest after the renovation of the school building, supported by Sanjay & Jyoti Agarwal Foundation. 🌿

She interacted with the students and distributed notebooks to all the children. We were also glad to have Mr. Saurabh Tambi (Head CSR, AU Small Finance Bank), who motivated and inspired the students. ✨

The event was graced by the presence of Anand Nishtha Acharya (RSL), Anand Jaipriya Acharya, Acharya Ramphool Ji, Virendra (BP-G), Mangilal Ji, and our dedicated school staff. RSL Didi felicitated Jyoti Ma’am with books, Anand Vani and a planter. 🌱 Sweets were also distributed among the children.

Heartfelt thanks to Sanjay & Jyoti Agarwal Foundation for supporting the school and children’s home in serving the underserved community of Jaipur. 💙

Namaskar,Happy Vasantotsav ! *होली, फगुआ, श्रीकृष्ण की दोलयात्रा और बसंतोत्सव का क्या महत्व है और क्यों ?* — श्री प्रभात...
03/03/2026

Namaskar,

Happy Vasantotsav !

*होली, फगुआ, श्रीकृष्ण की दोलयात्रा और बसंतोत्सव का क्या महत्व है और क्यों ?*
— श्री प्रभात रंजन सरकार

*बसन्तोत्सव मूलतः आर्यों का उत्सव*

आज बसन्तोत्सव है। सारे भारतवर्ष में आज इस उत्सव के उद्यापन की धूम मची हई है। पर बसन्तोत्सव मूलतः आर्यों का उत्सव है। तुमलोग अवश्य जानते हो कि इन आर्यों का आदि निवास था मध्य एशिया, वर्तमान रूस का मध्य और दक्षिणाञ्चल। यह अञ्चल ठण्डा बहुत है, कनकना ठण्डा। सारा शीतकाल केवल बर्फ पड़ता है। इतना ठण्डा कि सारे शीतऋतु में मनुष्य घर के बाहर कोई भी कार्य नहीं कर सकता काल था।

उस प्रचण्ड शीत में वहाँ के अधिवासी घर के भीतर बैठे दिन काटते थे। और जैसे ही शीत चला जाता, तब उन्हें कितना आनन्द होता था। शीत से विदा लेते ही बसन्त के बिल्कुल शुरू में ही वे आनन्द से मस्त हो जाते थे, हल्ला, बहुत उत्साह और कर्मचंचलता से लोग बिलकुल पागल हो जाते थे।

*बच्चे के लिए बसन्त है आनन्द का समय, उत्सव का ऋतु।*

बसन्त आया, इसका माने ही है कि शीत ने विदा ली, शीत की जड़ता कट गई। जड़ता का माने है जाड्य (dullness)। शीत के कारण मनुष्य हाथ-पैर हिला नहीं सकते हैं, बंगला में कहते हैं, जबुधबु (जड़) हो जाते हैं। हिन्दी में शीत को कहते हैं जाड़ा, भोजपूरी एवं अंगिका में कहते हैं जाड़, संस्कृत में कहते हैं, जाड्य या जड़ता। इस जड़ता को सबसे अधिक नापसन्द करते हैं शिशु, बच्चे। जो बूढ़े हैं, वे तो सब समय जड़ होकर बैठे रहते हैं। बूढ़े धीरे-धीरे चलते हैं। किन्तु जो छोटे हैं, वे तो तेज चलते हैं, दौड़ना पसन्द करते हैं। किन्तु ठण्ढ के कारण वे वैसे नही कर पाते हैं। और बूढ़े ठण्ढा हो या गरम हो, सारा वर्ष धीरे-धीरे चलेंगे। शिशु के लिए, बच्चे के लिए बसन्त है आनन्द का समय, उत्सव का ऋतु। लोगों में प्रचलित है।

बच्चा के हाम लागिना।
युवक के हाम भाई।
बूड़ा के हाम छाड़िना।
जतेक ओड़स रेजाइ।

शीत कहता है, छोटों के पास हम जाते नहीं, युवक के हम भाई हैं, और बूढ़ों को हम कभी भी नहीं छोड़ते, वे जितनी भी रजाई क्यों न ओढ़ लें।

*आर्ययो की भाषा में इस उत्सव का नाम था बसन्तोत्सव*

उस प्राचीन काल में ठण्ढे देश से आर्य भारत आए थे। जब शीत चला जाता था, तब उन दिनों आर्य खूब धूमधाम से आनन्दोत्सव मनाते थे।
उस समय वे जो अनुष्ठान करते थे, उसमें शीत का प्रतिनिधित्व करता था एक भेड़। और भेड़ की पीठ पर बैठा रहता था एक बूढ़ा या बूढ़ी का पुतला। बूढ़ा या बूढ़ी थे शीत के प्रतिनिधि। यह जो कहा, वे बारह महीना जड़ होकर बैठे रहते थे। ये जो बूढ़ा-बूढ़ी थे, उनका वस्त्र था भेड़ के रोएँ से बना कम्बल। उस युग के आर्य इस पूर्णिमा की रात को उस बूढ़ा-बूढ़ी को जला देते थे। कहते थे शीत को जला दिया। दूसरे दिन से शुरू होगा बसन्त ऋतु। इसलिए आर्ययो की भाषा में इस उत्सव का नाम था बसन्तोत्सव। इरानी या फारसी भाषा में बसन्त को कहते हैं' बहार'। पंजाब के लोग अभी भी होली के दूसरे दिन होला का गाना गाते हैं। उनके गाने में भी यह बात है-

आई बसन्त दी बाहार
आसु मोले टेसु मोले
मोल रही कचनार ।

शीत चला गया है, गाछ-गाछ पर फूल आ गये हैं। आम में फूल आये हैं, पलाश में फूल आये हैं, काञ्चन (कचनार-चम्पा में) फूल आये हैं। यही है बसन्त ऋतु ।

*होलिका और फगुआ उत्सव की तात्पर्य क्या है ?*

आर्य भारतीय पुराण में हिरण्यकशिपु नामक एक राजा के नाम का उल्लेख है। उसकी बहन का नाम था होलिका। यह नरराक्षसी (cannibal) मनुष्य खाती थी। इसलिये पूर्णिमा की पिछली रात, अर्थात् चतुर्दशी को रात में, लोगों ने इस होलिका नरराक्षसी को मार डाला था। इस उपलक्ष्य में, लोगों ने आनन्द में जिस उत्सव का आयोजन किया था, उसका नाम है 'होलिका दाहन उत्सव'। इसलिये आज भी उत्तर भारत में, विशेषकर पंजाब और उत्तर प्रदेश में यह होली उत्सव उद्यापित होता है। क्योंकि इस उत्सव के समय चाँद उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में रहता है, इसलिये बिहार एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल में इस उत्सव को लोग 'फगुआ' कहते हैं। फाल्गुण नक्षत्र में अवस्थिति के कारण उत्सव का नाम हुआ फगुआ। किन्तु बंगाल में चूँकि शीत या बसन्त कोई भी ऋतु प्रकट नहीं है, इसलिये बंगाल में होली या फगुआ कोई भी धूम-धाम के साथ उद्यापित नहीं होता है।

*श्रीकृष्ण की दोलयात्रा की इतिहास*

इस दिन बंगाल में जिस उत्सव को मनाया जाता है, उसका नाम है श्रीकृष्ण की दोलयात्रा। हमलोग कहते हैं दोल की छुट्टी। कारण है प्रायः 500 वर्ष पहले महाप्रभु श्री चैतन्य एक बार वृन्दावन गये थे। वे कुल दो बार वृन्दावन गए थे। वहाँ वृन्दावन जाकर उन्होंने इस उत्सव को देखा। इसलिये वृन्दावन की होली देख लौटकर महाप्रभु ने सोचा-बंगाल में भी इस प्रकार का उत्सव चालू होने की आवश्यकता है। तब उन्होंने कहा- "इसी दिन तुमलोग सभी कृष्ण-मन्दिर जाकर कृष्ण को रंग-अबीर दोगे। उसके बाद उसी रंग-अबीर को लेकर आपस में खेलोगे। और जो जिसे रंग या अबीर देगा वह उसे मालपुआ खिलाने के लिये बाध्य होगा। इस प्रकार महाप्रभु ने उत्सव को वृन्दावन से देख आ बंगाल में प्रवर्तन कर दिया। इसलिये बंगाल में यह जन-उत्सव नहीं हो सका। बिहार एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल जिलाओं में जैसे फगुआ जनजातीय उत्सव (Peoples Festival) है, उसी प्रकार बंगाल में दोलयात्रा जनजातीय उत्सव नहीं है। यह एक प्रकार का धार्मिक उत्सव (religious festival) है। इसलिये बंगाल में उत्सव का नाम होली भी नहीं है, फगुआ भी नहीं है, इसका नाम रखा गया 'श्रीकृष्ण की दोलयात्रा'।

*दोलयात्रा' शब्द का तात्पर्य क्या है ?*

'दोलयात्रा' शब्द का तात्पर्य क्या है ? शीत चला गया है। मनुष्य फिर से कर्मचंचल हुआ है। मन में नाना चिन्तन आते हैं, नाना रंगीन कल्पना जगती हैं-यह करूँगा, इस तरह करूँगा, इस तरह सेवा करूँगा, इस तरह समाज को सुसम्बद्ध करूंगा-अनेक कुछ सोचता है। फिर कृष्ण की कथा सोचने से मन में कुछ आनन्द भी होता है। जिस भावना से मन झूमने लगता है, मन आन्दोलित होता है, मन दो-दुल्यमान होता है, मन झूलता है और केवल मेरा मन झूलता है सो नहीं, अपने मन के झूलने से मैं कृष्ण के मन को भी झुला देता हूँ, हे कृष्ण, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, यही यथेष्ट नहीं है, मैं यही समझता हूँ कि तुम भी मुझे प्यार करते हो। अर्थात् मेरे मन के झूमने से कृष्ण के मन को भी झुमा दिया है-यही हुई कृष्ण की दोलयात्रा। होली भी नहीं, फगुआ भी नहीं, बसन्तोत्सव भी नहीं, केवल श्रीकृष्ण की दोलयात्रा। हमलोगों के आनन्दमार्ग के चर्याचर्य में इसे बसन्तोत्सव की तरह ही पालन किया जाता है।

महाप्रभु के समय नियम था-किसी के शरीर पर रंग देने के पहले उससे पूछा जाता था कि क्या रंग दूं ? वह यदि अनुमति देता, तब उसके शरीर पर रंग दिया जाता और उसे मालपुआ खिलाया जाता। आजकल रीति खराब हो गयी है।

*राग-साधना क्या है ?*

वैष्णवीय-तन्त्र का वक्तव्य है-एक-एक मनुष्य एक-एक परिस्थिति में, एक-एक विशेष भावना में, एक-एक रागगत स्पन्दन के द्वारा रागित होता है। इसलिये मनुष्य लौकिक जगत् में, बाह्यिक जगत् में वही रंग परमपुरुष को दे देता है। कहता है, हे परमपुरुष, यह रंग तुम ले लो और अपने रंग में मेरे मन को रंग दो। अपने मन का रंग परमपुरुष को दे देना-यह हुई एक प्रकार की राग-साधना।

*महाप्रभु ने जब बंगाल में दोलयात्रा प्रचलन का उद्देश्य क्या था?*

महाप्रभु ने जब बंगाल में दोलयात्रा का प्रथम प्रचलन आरम्भ किया, उसके पीछे यही मनोविज्ञान था कि अपने मन के रंग को परमपुरुष को समर्पण करो-उसका ही नाम दिया गया था, श्रीकृष्ण की दोलयात्रा। अर्थात् कृष्ण का मन जिस झूले में झूलता है, मेरा मन भी उसी झूले में झूले। उत्तर भारत की होली या मध्यपूर्व भारत का फगुआ के साथ इस दोलयात्रा का कोई सम्पर्क नहीं है। यह सम्पूर्ण रूप से एक मानसिक चीज है। दोलयात्रा शब्द उड़ीसा, बंगाल, असम, मणिपुर एवं मिथिला की पञ्जिका में स्वीकृत नाम है। दोलयात्रा का मूल तात्पर्य है-जिस झूले में समग्र विश्व झूलता है, जिस झुले में परमपुरुष समग्र विश्व को झूला रहे हैं, आन्दोलित-हिन्दोलित कर रहे हैं, मैं भी अपने मन को उसी झूले में झूला देना चाहता हूँ ।

श्री प्रभातरंजन सरकार की पुस्तक "बांग्ला और बंगाली" से उद्धृत।

Namaskar Glimpse of First Diocese Seminar at Madhu Prasun Anand Marga Jagriti Jaipur. Hundreds of Devotees from Jaipur, ...
28/02/2026

Namaskar

Glimpse of First Diocese Seminar at Madhu Prasun Anand Marga Jagriti Jaipur.

Hundreds of Devotees from Jaipur, Bikaner, Jhunjhunu, Kota and Dausa districts participated in this 3 days residential socio spiritual seminar in February month.

A number of activities were carried out including Prabhat Feri in the morning, Yogasan, Meditation, Dharma Chakra, Class on various topics, Kaushiki and Tandav Dance, Cultural program, Akhand Kiirtan, Procession and Reporting.

All enjoyed the sentient delicious food served with love.

Many new sadhak shared their experiences.

A beautiful song composed by Trainer Dada regarding sixteen points were also presented by him.

A senior margiis Tara Chand ji also shared his experience.

Narayan Seva were also organised by volunteers.

Everything was quite blissful.

सभी को नमस्कार नीलकंठ दिवस के पावन अवसर पर आनंद मार्ग प्रचारक संघ के स्वयंसेवकों ने जयपुर आगरा रोड, मालवीय नगर, शास्त्री...
13/02/2026

सभी को नमस्कार

नीलकंठ दिवस के पावन अवसर पर आनंद मार्ग प्रचारक संघ के स्वयंसेवकों ने जयपुर आगरा रोड, मालवीय नगर, शास्त्री नगर, भम्बोरी इत्यादी में विभिन्न स्थानों पर नारायण सेवा का आयोजन किया गया।

इस पवित्र दिवस पर 2100 से अधिक लोगों को स्वादिष्ट भोजन, फल हलवा एवं तला हुआ चना प्रसाद रूप में वितरित किया गया। प्रसाद को सभी ने श्रद्धा एवं प्रसन्नता के साथ ग्रहण किया।

विद्यार्थी, राहगीर तथा विभिन्न वाहनों के चालक इस सेवा के प्रमुख लाभार्थियों में रहे।

सभी सदस्यों ने पूर्ण उत्साह, समर्पण और आनंद के साथ सेवा में भाग लिया।

इस दिन को नारायण सेवा एवं उसके पश्चात धर्मचक्र के माध्यम से आध्यात्मिक भाव से मनाया गया, जिससे सेवा, एकता और भक्ति का संदेश प्रसारित हुआ।

*आनंदमार्ग में “नीलकंठ दिवस”*

जब अर्थ और सत्ता के प्रलोभन काम नहीं आए, तब अपप्रचार, बदनामी, डराना-धमकाना, मिशन के कार्यकर्ताओं पर संगठित हमले और हत्या, झूठे मुकदमों में जेल में बंद रखना आदि अनेक प्रयासों के बावजूद जब यह देखा गया कि आनंदमार्ग की गति को रोका नहीं जा सकता, तब यह तय किया गया कि यदि आनंदमार्ग के संस्थापक को ही पृथ्वी से हटा दिया जाए तो ही आनंदमार्ग का विनाश संभव है। इस सोच से पापियों ने 12 फरवरी 1973 को जेल में बंद आनंदमूर्ति जी को दवा के नाम पर पटना बांकीपुर सेंट्रल जेल के डॉक्टर रहमतुल्लाह के माध्यम से विष देकर मारने का प्रयास किया। विष देने से आनंदमूर्ति जी के शरीर में तीव्र प्रतिक्रिया शुरू हुई, लेकिन पापियों का उद्देश्य फिर भी सफल नहीं हुआ।

इस जघन्य घटना के विरोध में और न्यायिक जांच आयोग की मांग को लेकर पूरे विश्व में व्यापक आंदोलन हुआ। आनंदमूर्ति जी ने स्वयं तत्कालीन बिहार के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और भारत के राष्ट्रपति को व्यक्तिगत रूप से जांच आयोग की नियुक्ति के लिए पत्र लिखा, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। जब कुछ भी नहीं हुआ, तब आनंदमूर्ति जी ने विषप्रयोग के विरोध में 1 अप्रैल 1973 से जेल के अंदर ही अनशन शुरू किया, जो लगातार पाँच वर्ष, चार माह और दो दिन तक चला, जब तक कि वे जेल से रिहा नहीं हुए। अंततः पटना उच्च न्यायालय के निर्णय में आनंदमूर्ति जी के विरुद्ध लगाए गए सभी आरोप झूठे सिद्ध हुए और वे तथा उनके चार शिष्य बिना शर्त जेल से मुक्त हुए। 2 अगस्त 1978 को जेल से बाहर आकर उन्होंने अपना लंबा अनशन समाप्त किया।

आनंदमार्ग के इतिहास में 12 फरवरी को “नीलकंठ दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

सभी को नमस्कार नीलकंठ दिवस के पावन अवसर पर आगरा रोड इकाई, जयपुर द्वारा 52 फीट हनुमान मंदिर परिसर में नारायण सेवा का आयोज...
12/02/2026

सभी को नमस्कार

नीलकंठ दिवस के पावन अवसर पर आगरा रोड इकाई, जयपुर द्वारा 52 फीट हनुमान मंदिर परिसर में नारायण सेवा का आयोजन किया गया।

इस पवित्र दिवस पर मुख्य आगरा रोड से गुजरने वाले 1100 से अधिक लोगों को स्वादिष्ट हलवा एवं चने की सब्जी प्रसाद रूप में वितरित किया गया। प्रसाद को सभी ने श्रद्धा एवं प्रसन्नता के साथ ग्रहण किया।

विद्यार्थी, राहगीर तथा विभिन्न वाहनों के चालक इस सेवा के प्रमुख लाभार्थियों में रहे। इस दौरान सभी ने "बाबा नाम केवलम" अष्टाक्षरी सिद्ध महामंत्र का लाभ लिया।

आगरा रोड इकाई के सभी सदस्यों ने पूर्ण उत्साह, समर्पण और आनंद के साथ सेवा में भाग लिया।
इस दिन को नारायण सेवा एवं उसके पश्चात धर्मचक्र के माध्यम से आध्यात्मिक भाव से मनाया गया, जिससे सेवा, एकता और भक्ति का संदेश प्रसारित हुआ।
🙏🏻

Narayan Seva: Fruit Distribution Organized on Nilkanth Diwas at TB Hospital, JaipurJaipur | 12 February 2026On the auspi...
12/02/2026

Narayan Seva: Fruit Distribution Organized on Nilkanth Diwas at TB Hospital, Jaipur
Jaipur | 12 February 2026
On the auspicious occasion of Nilkanth Diwas, Ananda Marga Pracaraka Samgha, Jaipur organized a Narayan Seva Activity in the form of fruit distribution at TB Hospital, Subhash Nagar, Jaipur. Under this humanitarian initiative, bananas and oranges were distributed to 350 TB patients, bringing comfort and nutritional support to those undergoing treatment.
The service activity aimed at promoting compassion, social responsibility, and the spirit of selfless service. Patients and hospital staff appreciated the noble initiative and expressed gratitude for the thoughtful gesture.
The program was graced by the presence of several revered spiritual leaders and senior volunteers, including Ácárya Nírbhayánanda Avdhúta (Regional Secretary, Jaipur), Ácárya Dhiirhjananda Avdhúta (SES, Delhi Sector), Ácárya Brahamabudhyananda Avdhúta (ESD), Ácárya Randevánanda Avdhúta (REI, Jaipur Region), PC Sharma Dada (OS, Jaipur Bhukti), Lallan Dada and Alok Dev. Their inspirational presence encouraged volunteers and enhanced the spiritual significance of the event.

25/01/2026

Namaskar,Relief work at Bhambori Village by Supriya Acharya. Sweater, Socs, caps were distributed among needy children, ...
24/01/2026

Namaskar,

Relief work at Bhambori Village by Supriya Acharya.

Sweater, Socs, caps were distributed among needy children, youth and elders living in the slum area nearby Anand Marga Ashram Bhambori, Jaipur.

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