03/03/2026
Namaskar,
Happy Vasantotsav !
*होली, फगुआ, श्रीकृष्ण की दोलयात्रा और बसंतोत्सव का क्या महत्व है और क्यों ?*
— श्री प्रभात रंजन सरकार
*बसन्तोत्सव मूलतः आर्यों का उत्सव*
आज बसन्तोत्सव है। सारे भारतवर्ष में आज इस उत्सव के उद्यापन की धूम मची हई है। पर बसन्तोत्सव मूलतः आर्यों का उत्सव है। तुमलोग अवश्य जानते हो कि इन आर्यों का आदि निवास था मध्य एशिया, वर्तमान रूस का मध्य और दक्षिणाञ्चल। यह अञ्चल ठण्डा बहुत है, कनकना ठण्डा। सारा शीतकाल केवल बर्फ पड़ता है। इतना ठण्डा कि सारे शीतऋतु में मनुष्य घर के बाहर कोई भी कार्य नहीं कर सकता काल था।
उस प्रचण्ड शीत में वहाँ के अधिवासी घर के भीतर बैठे दिन काटते थे। और जैसे ही शीत चला जाता, तब उन्हें कितना आनन्द होता था। शीत से विदा लेते ही बसन्त के बिल्कुल शुरू में ही वे आनन्द से मस्त हो जाते थे, हल्ला, बहुत उत्साह और कर्मचंचलता से लोग बिलकुल पागल हो जाते थे।
*बच्चे के लिए बसन्त है आनन्द का समय, उत्सव का ऋतु।*
बसन्त आया, इसका माने ही है कि शीत ने विदा ली, शीत की जड़ता कट गई। जड़ता का माने है जाड्य (dullness)। शीत के कारण मनुष्य हाथ-पैर हिला नहीं सकते हैं, बंगला में कहते हैं, जबुधबु (जड़) हो जाते हैं। हिन्दी में शीत को कहते हैं जाड़ा, भोजपूरी एवं अंगिका में कहते हैं जाड़, संस्कृत में कहते हैं, जाड्य या जड़ता। इस जड़ता को सबसे अधिक नापसन्द करते हैं शिशु, बच्चे। जो बूढ़े हैं, वे तो सब समय जड़ होकर बैठे रहते हैं। बूढ़े धीरे-धीरे चलते हैं। किन्तु जो छोटे हैं, वे तो तेज चलते हैं, दौड़ना पसन्द करते हैं। किन्तु ठण्ढ के कारण वे वैसे नही कर पाते हैं। और बूढ़े ठण्ढा हो या गरम हो, सारा वर्ष धीरे-धीरे चलेंगे। शिशु के लिए, बच्चे के लिए बसन्त है आनन्द का समय, उत्सव का ऋतु। लोगों में प्रचलित है।
बच्चा के हाम लागिना।
युवक के हाम भाई।
बूड़ा के हाम छाड़िना।
जतेक ओड़स रेजाइ।
शीत कहता है, छोटों के पास हम जाते नहीं, युवक के हम भाई हैं, और बूढ़ों को हम कभी भी नहीं छोड़ते, वे जितनी भी रजाई क्यों न ओढ़ लें।
*आर्ययो की भाषा में इस उत्सव का नाम था बसन्तोत्सव*
उस प्राचीन काल में ठण्ढे देश से आर्य भारत आए थे। जब शीत चला जाता था, तब उन दिनों आर्य खूब धूमधाम से आनन्दोत्सव मनाते थे।
उस समय वे जो अनुष्ठान करते थे, उसमें शीत का प्रतिनिधित्व करता था एक भेड़। और भेड़ की पीठ पर बैठा रहता था एक बूढ़ा या बूढ़ी का पुतला। बूढ़ा या बूढ़ी थे शीत के प्रतिनिधि। यह जो कहा, वे बारह महीना जड़ होकर बैठे रहते थे। ये जो बूढ़ा-बूढ़ी थे, उनका वस्त्र था भेड़ के रोएँ से बना कम्बल। उस युग के आर्य इस पूर्णिमा की रात को उस बूढ़ा-बूढ़ी को जला देते थे। कहते थे शीत को जला दिया। दूसरे दिन से शुरू होगा बसन्त ऋतु। इसलिए आर्ययो की भाषा में इस उत्सव का नाम था बसन्तोत्सव। इरानी या फारसी भाषा में बसन्त को कहते हैं' बहार'। पंजाब के लोग अभी भी होली के दूसरे दिन होला का गाना गाते हैं। उनके गाने में भी यह बात है-
आई बसन्त दी बाहार
आसु मोले टेसु मोले
मोल रही कचनार ।
शीत चला गया है, गाछ-गाछ पर फूल आ गये हैं। आम में फूल आये हैं, पलाश में फूल आये हैं, काञ्चन (कचनार-चम्पा में) फूल आये हैं। यही है बसन्त ऋतु ।
*होलिका और फगुआ उत्सव की तात्पर्य क्या है ?*
आर्य भारतीय पुराण में हिरण्यकशिपु नामक एक राजा के नाम का उल्लेख है। उसकी बहन का नाम था होलिका। यह नरराक्षसी (cannibal) मनुष्य खाती थी। इसलिये पूर्णिमा की पिछली रात, अर्थात् चतुर्दशी को रात में, लोगों ने इस होलिका नरराक्षसी को मार डाला था। इस उपलक्ष्य में, लोगों ने आनन्द में जिस उत्सव का आयोजन किया था, उसका नाम है 'होलिका दाहन उत्सव'। इसलिये आज भी उत्तर भारत में, विशेषकर पंजाब और उत्तर प्रदेश में यह होली उत्सव उद्यापित होता है। क्योंकि इस उत्सव के समय चाँद उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में रहता है, इसलिये बिहार एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल में इस उत्सव को लोग 'फगुआ' कहते हैं। फाल्गुण नक्षत्र में अवस्थिति के कारण उत्सव का नाम हुआ फगुआ। किन्तु बंगाल में चूँकि शीत या बसन्त कोई भी ऋतु प्रकट नहीं है, इसलिये बंगाल में होली या फगुआ कोई भी धूम-धाम के साथ उद्यापित नहीं होता है।
*श्रीकृष्ण की दोलयात्रा की इतिहास*
इस दिन बंगाल में जिस उत्सव को मनाया जाता है, उसका नाम है श्रीकृष्ण की दोलयात्रा। हमलोग कहते हैं दोल की छुट्टी। कारण है प्रायः 500 वर्ष पहले महाप्रभु श्री चैतन्य एक बार वृन्दावन गये थे। वे कुल दो बार वृन्दावन गए थे। वहाँ वृन्दावन जाकर उन्होंने इस उत्सव को देखा। इसलिये वृन्दावन की होली देख लौटकर महाप्रभु ने सोचा-बंगाल में भी इस प्रकार का उत्सव चालू होने की आवश्यकता है। तब उन्होंने कहा- "इसी दिन तुमलोग सभी कृष्ण-मन्दिर जाकर कृष्ण को रंग-अबीर दोगे। उसके बाद उसी रंग-अबीर को लेकर आपस में खेलोगे। और जो जिसे रंग या अबीर देगा वह उसे मालपुआ खिलाने के लिये बाध्य होगा। इस प्रकार महाप्रभु ने उत्सव को वृन्दावन से देख आ बंगाल में प्रवर्तन कर दिया। इसलिये बंगाल में यह जन-उत्सव नहीं हो सका। बिहार एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल जिलाओं में जैसे फगुआ जनजातीय उत्सव (Peoples Festival) है, उसी प्रकार बंगाल में दोलयात्रा जनजातीय उत्सव नहीं है। यह एक प्रकार का धार्मिक उत्सव (religious festival) है। इसलिये बंगाल में उत्सव का नाम होली भी नहीं है, फगुआ भी नहीं है, इसका नाम रखा गया 'श्रीकृष्ण की दोलयात्रा'।
*दोलयात्रा' शब्द का तात्पर्य क्या है ?*
'दोलयात्रा' शब्द का तात्पर्य क्या है ? शीत चला गया है। मनुष्य फिर से कर्मचंचल हुआ है। मन में नाना चिन्तन आते हैं, नाना रंगीन कल्पना जगती हैं-यह करूँगा, इस तरह करूँगा, इस तरह सेवा करूँगा, इस तरह समाज को सुसम्बद्ध करूंगा-अनेक कुछ सोचता है। फिर कृष्ण की कथा सोचने से मन में कुछ आनन्द भी होता है। जिस भावना से मन झूमने लगता है, मन आन्दोलित होता है, मन दो-दुल्यमान होता है, मन झूलता है और केवल मेरा मन झूलता है सो नहीं, अपने मन के झूलने से मैं कृष्ण के मन को भी झुला देता हूँ, हे कृष्ण, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, यही यथेष्ट नहीं है, मैं यही समझता हूँ कि तुम भी मुझे प्यार करते हो। अर्थात् मेरे मन के झूमने से कृष्ण के मन को भी झुमा दिया है-यही हुई कृष्ण की दोलयात्रा। होली भी नहीं, फगुआ भी नहीं, बसन्तोत्सव भी नहीं, केवल श्रीकृष्ण की दोलयात्रा। हमलोगों के आनन्दमार्ग के चर्याचर्य में इसे बसन्तोत्सव की तरह ही पालन किया जाता है।
महाप्रभु के समय नियम था-किसी के शरीर पर रंग देने के पहले उससे पूछा जाता था कि क्या रंग दूं ? वह यदि अनुमति देता, तब उसके शरीर पर रंग दिया जाता और उसे मालपुआ खिलाया जाता। आजकल रीति खराब हो गयी है।
*राग-साधना क्या है ?*
वैष्णवीय-तन्त्र का वक्तव्य है-एक-एक मनुष्य एक-एक परिस्थिति में, एक-एक विशेष भावना में, एक-एक रागगत स्पन्दन के द्वारा रागित होता है। इसलिये मनुष्य लौकिक जगत् में, बाह्यिक जगत् में वही रंग परमपुरुष को दे देता है। कहता है, हे परमपुरुष, यह रंग तुम ले लो और अपने रंग में मेरे मन को रंग दो। अपने मन का रंग परमपुरुष को दे देना-यह हुई एक प्रकार की राग-साधना।
*महाप्रभु ने जब बंगाल में दोलयात्रा प्रचलन का उद्देश्य क्या था?*
महाप्रभु ने जब बंगाल में दोलयात्रा का प्रथम प्रचलन आरम्भ किया, उसके पीछे यही मनोविज्ञान था कि अपने मन के रंग को परमपुरुष को समर्पण करो-उसका ही नाम दिया गया था, श्रीकृष्ण की दोलयात्रा। अर्थात् कृष्ण का मन जिस झूले में झूलता है, मेरा मन भी उसी झूले में झूले। उत्तर भारत की होली या मध्यपूर्व भारत का फगुआ के साथ इस दोलयात्रा का कोई सम्पर्क नहीं है। यह सम्पूर्ण रूप से एक मानसिक चीज है। दोलयात्रा शब्द उड़ीसा, बंगाल, असम, मणिपुर एवं मिथिला की पञ्जिका में स्वीकृत नाम है। दोलयात्रा का मूल तात्पर्य है-जिस झूले में समग्र विश्व झूलता है, जिस झुले में परमपुरुष समग्र विश्व को झूला रहे हैं, आन्दोलित-हिन्दोलित कर रहे हैं, मैं भी अपने मन को उसी झूले में झूला देना चाहता हूँ ।
श्री प्रभातरंजन सरकार की पुस्तक "बांग्ला और बंगाली" से उद्धृत।