अहोभाव Ahobhav

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मनोविज्ञान भाग 2सकारात्मक दृष्टिकोण प्रथम सूत्र ।एक अत्यधिक प्रभावी मनोवैज्ञानिक चाल: मानसिक रूप से उस परिणाम की कल्पना ...
20/07/2023

मनोविज्ञान भाग 2
सकारात्मक दृष्टिकोण प्रथम सूत्र ।

एक अत्यधिक प्रभावी मनोवैज्ञानिक चाल: मानसिक रूप से उस परिणाम की कल्पना करें जो आप प्राप्त करना चाहते हैं, कई मिनटों तक और कई विवरणों के साथ। बस अपनी आँखें बंद करें और कल्पना करें कि जो आपने प्रस्तावित किया है उसमें सफलता और संतुष्टि के क्षण को कैसे महसूस करें.

जब आप एक सपने का पीछा करते हैं, तो यह संभावना है कि अन्य लोग आपसे पहले ही इसे हासिल कर चुके हैं. लंबे अनुभव वाले व्यक्ति का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है इसलिए मैं कुछ ट्रिक्स और प्रतिबिंबों की व्याख्या कर सकता हूं ताकि आप प्राप्त कर सकें कि आप क्या करने के लिए तैयार हैं.

आप उन लोगों के पाठ्यक्रम या सेमिनार की तलाश कर सकते हैं जो आपकी रुचि के बारे में बात करते हैं। यह उस ज्ञान की अवहेलना करने के लिए उचित नहीं है जो अन्य लोग आपको दे सकते हैं। हमारे समाज में, लगभग हर चीज का आविष्कार किया जाता है। लेकिन फिर भी ऐसे बहुत कम लोग हैं जो समस्याओं को हल करने के लिए नए-नए तरीके खोजते और खोजते हैं. यदि आप विभिन्न स्रोतों से बहुत सारे ज्ञान का प्रसार करने में सक्षम हैं, तो संभावना है कि आप अपने आप को प्रेरित कर सकते हैं और सही मार्ग पर जारी रख सकते हैं.

बहुत से लोग मानते हैं कि लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आपको केवल मेहनती और अनुशासित होना होगा। यह एक आधा सच है: वास्तव में, जब हम वास्तव में प्रेरित होते हैं तब ही हम कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम होते हैं.

प्रेरणा यह समझने की कुंजी है कि इंसान कुछ उपलब्धियों के लिए कड़ी मेहनत क्यों करता है, जो अल्पावधि में कोई फल नहीं देता है। इस पाठ में हम आपको कुछ समझाएंगे चाबियाँ, चाल और युक्तियाँ ताकि आप समझ सकें कि मानव प्रेरणा कैसे काम करती है और आपके पास जीवन में प्रस्ताव रखने वाली हर चीज को प्राप्त करने के लिए थोड़ा गाइड हो सकता है.

ध्यान रहे कि आपके विचार निर्णायक रूप से प्रभावित करेंगे कि आपके द्वारा उठाए गए प्रत्येक कदम से कैसे निपटें. यदि आप चीजों की सकारात्मक दृष्टि के साथ दिन-प्रतिदिन सामना करते हैं, तो आप अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने में सक्षम होंगे। यदि, दूसरी ओर, आप एक नकारात्मक व्यक्ति हैं, जिसे सब कुछ असंभव लगता है, तो आप सुधार करने के लिए कुछ भी नहीं करेंगे.

आपका आंतरिक प्रवचन आपको प्रेरित करते समय महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। हम सभी के पास एक छोटी सी आंतरिक आवाज है जो हमारी मदद कर सकती है या हमारा बहिष्कार कर सकती है। हमें उनके प्रभाव को प्रबंधित करना सीखना चाहिए और जागरूक होना चाहिए कि हमारी मानसिक स्थिति महत्वपूर्ण है ताकि हम लक्ष्य निर्धारित कर सकें और उन्हें पूरा कर सकें। यदि आपके पास बहुत सारे हैं नकारात्मक विचार, समय आ गया है कि उन्हें खत्म किया जाए और उन्हें उन विचारों और विश्वासों से बदल दिया जाए जो आपके पक्ष में खेलते हैं.

यदि आप थोड़े व्यवस्थित व्यक्ति हैं, तो यह ट्रिक आपके बहुत काम आ सकती है। एक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हमें प्रेरित करने की कुंजी में से एक है अल्पावधि में हम जो प्रगति कर रहे हैं, उससे अवगत रहें. इस प्रकार, हम अनुभव करते हैं कि हमारे प्रयास फल फूल रहे हैं और इसलिए यह अधिक संभावना है कि हम आगे बढ़ेंगे। अपना काम अलग-अलग करना अच्छा है मिनी लक्ष्यों कि जूझना जारी रखने के लिए एक प्रोत्साहन मान लीजिए.

मनोविज्ञान संपूर्ण मानव व्यवहार का अध्ययन है। मनुष्य के भीतर होने वाली मानसिक घटनाओं का सूक्ष्म अध्ययन मनोविज्ञान के अध्...
19/07/2023

मनोविज्ञान संपूर्ण मानव व्यवहार का अध्ययन है। मनुष्य के भीतर होने वाली मानसिक घटनाओं का सूक्ष्म अध्ययन मनोविज्ञान के अध्ययन का आधार है। मानव व्यवहार प्राकृतिक और अर्जित दोनों है, इसलिए मनोविज्ञान के अंतर्गत इन दोनों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जाता है।

इस प्रकार, वह पशु व्यवहार का अध्ययन भी करता है ताकि मानव व्यवहार के साथ इसकी तुलना की जा सके और अपने निष्कर्षों को अधिक सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सके। इन सभी का अध्ययन करने के लिए, उन्होंने विभिन्न अध्ययन विषयों और विधियों का विकास किया है।

मनोविज्ञान’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘psychology’ है। यह दो ग्रीक शब्दों के मिलने से बना है-

‘साइकी’ ‘PSYCHE’ शब्द का अर्थ-आत्मा है, जबकि ‘लोगस’ ‘LOGOS’ शब्द का अर्थ अध्ययन से है।

इस शाब्दिक अर्थ के अनुसार मनोविज्ञान का अर्थ है आत्मा के संबंध में अध्ययन करने वाला विषय। प्राचीन दार्शनिक, जिनमें से अरस्तू और प्लेटो के नाम अधिक प्रसिद्ध हैं, मनोविज्ञान को आत्मा के अध्ययन का विषय माना था।

ग्रीक दार्शनिक जैसे प्लेटो, अरस्तू, डेसकार्टेस, आदि, मनोविज्ञान को आत्मा के विज्ञान के रूप में स्वीकार किया है । मनोविज्ञान की यह परिभाषा 16वीं शताब्दी तक प्रचलन में रही। लेकिन बाद में आत्मा की प्रकृति के संबंध में विभिन्न निष्कर्ष निकाले जाने लगे, और उस समय के मनोवैज्ञानिक आत्मा के अर्थ, प्रकृति और कार्य की सही व्याख्या करने में असमर्थ थे। परिणामस्वरूप 16वीं शताब्दी में मनोविज्ञान की इस परिभाषा को विद्वानों ने नकार दिया।

मनोविज्ञान मन का विज्ञान है –
विद्वानों द्वारा आत्मा के विज्ञान की अस्वीकृति के परिणामस्वरूप, १७वीं शताब्दी के विद्वानों ने मनोविज्ञान को मन के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया। मन की प्रकृति और कार्य के बारे में आत्मनिरीक्षण करने के बाद, विद्वानों ने आत्मा के समान मन के अस्तित्व को भी नकार दिया।

क्योंकि आत्मा के समान मन की भी प्रत्यक्षीकरण नहीं हो सकती। विद्वानों का मत था कि जिस तथ्य को सिद्ध किया जा सकता है, जिसे देखा जा सकता है, जिसका प्रयोग किया जा सकता है, उसी पाठक के तथ्य को मनोविज्ञान के अंतर्गत स्थान मिल सकता है। मन को प्रमाणित नहीं किया जा सकता है और न ही प्रयोग की परीक्षा में डाला जा सकता है, इसलिए इस परिभाषा को भी खारिज कर दिया गया था।

19वीं सदी के मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को चेतना के विज्ञान के रूप में समझाया। विलियम जेम्स, विलियम वुंड्ट, जेम्स सैली आदि विद्वानों ने मनोविज्ञान को चेतना के विज्ञान के रूप में स्वीकार किया और कहा कि मनोविज्ञान चेतन की क्रियाओं का अध्ययन करता है। चेतन शब्द के अर्थ रूप पर विद्वानों का एक मत नहीं हो सके। मन के तीन स्तर होते हैं-

चेतन
अर्द्ध चेतन
अचेतन
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार चेतना अनुभव का विषय है। इसे प्रत्यक्षीकरण नहीं किया जा सकता। इसके अध्ययन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव पाया गया। इस परिभाषा को भी विद्वानों ने प्रयोगों की कसौटी पर खरा न उतरने के कारण खारिज कर दिया था। परिणामस्वरूप, मनोविज्ञान को चेतना के विज्ञान के रूप में परिभाषित करने का यह प्रयास सफल नहीं हो सका क्योंकि चेतना शब्द एकतरफा (एकांगी) है।

मनोविज्ञान एक विज्ञान है।
मनोविज्ञान व्यवहार का वस्तुनिष्ठ अध्ययन है।
मानव की अनुभूति का अध्ययन मनोविज्ञान के अंतर्गत किया जाता है।
मनोविज्ञान के तहत मनुष्य का चेतन, अचेतन और उसके अनुभवों से संबंधित सभी गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है।
मनोविज्ञान भी प्रयोगात्मक अध्ययन सामग्री को अपनाता है।
इसमें इंसानों, जानवरों आदि पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग किए जाते हैं।
मनोविज्ञान पर्यावरण के साथ मानव और पशु व्यवहार के संबंध और उन पर इसके प्रभावों का विस्तार से अध्ययन करता है।
मनोविज्ञान पशु की प्रकृति के साथ समायोजन की प्रक्रियाओं का भी अध्ययन करता है।

भक्ति रस को पाने के लिए जिज्ञासु साधक के जीवन में भाव की तीव्रता अति आवश्यक है। भक्ति में विरह का भी विशेष महत्त्व रहा ह...
08/07/2023

भक्ति रस को पाने के लिए जिज्ञासु साधक के जीवन में भाव की तीव्रता अति आवश्यक है। भक्ति में विरह का भी विशेष महत्त्व रहा है। संयोग की अपेक्षा वियोग की दशा में भाव में अधिक तीव्रता का बोध होता है। विरह-व्यग्र भक्त का आकर्षण परमात्मा के लिए अति प्रबल हो जाता है। वह भाव ही उसे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करवाता है। विरह संयोग में भक्त को जो शांति की प्राप्ति होती है वह अपूर्व होती है। इसी कारण परमभक्त सायुज्य मुक्ति (इस प्रकार से मिलना कि दोनों में कोई अन्तर या भेद न रह जाए, सम्पूर्ण मिलन) की कामना छोड़कर भेद भक्ति को अपनाते हैं, क्योंकि उसमें आकर्षण का प्राधान्य होता है। गुरु को भगवान् के समतुल्य स्थान देने की परम्परा हमारे ही देश में नहीं, अपितु विश्व में एक विकसित परम्परा रही है। कात्यायन संहिता में कहा गया है कि -
“आचार्य मां विजानीयान्नवमन्येत कर्हिचित्। न मर्त्यवृद्धयार्त्स्यत सर्वदेवमयो गुदाः ।।"
अर्थात् परमपिता परमात्मा कहते हैं कि अपने गुरु को मेरा ही रूप समझो; कभी भी, भूलकर भी, अपमान न करो, न तो मानव की बुद्धि से ही गुरु को नापो, क्योंकि गुरु मानव नहीं है, उनके हृदय में तो भगवान् स्वयं निवास करते हैं। अतः गुरु सर्वदेवमय होते हैं। उपनिषदों में इस बात पर जोर दिया गया है कि जैसी भगवान् के प्रति भक्ति है, वैसी ही गुरु के प्रति
भक्ति भाव होना चाहिए, तभी ज्ञान में अनुभव की प्राप्ति होती है। कर्मयोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण महाराज भक्त अर्जुन से
कहते हैं कि गुरुजन मेरे ही स्वरूप होते हैं।
“तस्यैते तथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्तेमहात्मनः ।।”
अर्थात् जिन साधक की परमपिता परमात्मा में परम भक्ति है और जैसी भक्ति परमदेव में है वैसी भक्ति गुरु में है, उस साधक को कहे ये अर्थ- रहस्य प्रकाश पाते हैं। उन्हीं के द्वारा दिया गया अध्यात्म ज्ञान का उपदेश सफल होता है। इसलिए एक साधक को चाहिए कि निष्काम कर्म, निष्काम भक्ति एवं निष्काममय होकर पूर्ण सद्गुरु के पास जाकर परब्रह्म परमेश्वर के शब्दब्रह्म से दीक्षित होकर ध्यान व भजन-सुमिरण का अभ्यास करे जिससे कि यह मानव जीवन सफल व सार्थक हो सके।

 #कामवासना_में_स्त्री_पुरूष कभी हमने खयाल किया है किअगर एक कमरे में दस पुरुष बैठ कर बात कर रहे हों और एक स्त्री आ जाये, ...
28/04/2023

#कामवासना_में_स्त्री_पुरूष

कभी हमने खयाल किया है कि
अगर एक कमरे में दस पुरुष बैठ कर बात कर रहे हों
और एक स्त्री आ जाये, तो उनके बोलने का
बातचीत करने का तरीक़ा फौरन बदल जाता है ।

वही नहीं रह जाती…
बड़े मृदुभाषी, मधुर, शिष्ट, सज्जन हो जाते हैं !
क्या हो गया ?
हो क्या गया एक स्त्री के प्रवेश से ?
हमको भी खयाल नहीं आयेगा कि
यह अभ्यास चल रहा है ।
यह अभ्यास है,
बहुत अनकॉन्शियस हो गया,
अचेतन हो गया ।
इतना कर डाला है कि
अब हमें पता ही नहीं चलता ।

हमारी हालत करीब-करीब ऐसी हो गयी है,
जैसे साईकल पर हम चलते हैं तो
साईकल को घर की तरफ मोड़ना नहीं पड़ता ।
हैण्डल स्वतः मुड़ जाता है ।
चलता रहता है, साईकल चलती रहती है ।
जहाँ-जहाँ से मुड़ना है, हैण्डल मुड़ता रहता है ।

अपने घर के सामने आ कर गाड़ी खड़ी हो जाती है ।
हमें सोचना नहीं पड़ता कि अब बायें मुड़ें कि दायें ।
अभ्यास इतना गहरा है कि हो गया है ।
साईकल होश से नहीं चलानी पड़ती ।
बिलकुल मजे से वह गाना गाते,
पच्चीस बातें सोचते,
ऑफिस का हिसाब लगाते… चलता रहता है ।
पैर पैडल मारते रहते हैं,
हाथ साईकल मोड़ता रहता है ।
यह बिलकुल अचेतन हो गया है ।
इतना अभ्यास हो गया कि अचेतन हो गया ।

कामवासना का अभ्यास इतना अचेतन है कि
हमें पता ही नहीं होता कि जब हम कपड़ा पहनते हैं,
तब भी कामवासना का अभ्यास चल रहा है ।
जब हम आईने के सामने खड़े हो कर
कपड़े पहन कर देखते हैं,
तो सच में हम यह देखते हैं कि
अपने आप कैसे लग रहे हैं ?

या हम यह देखते हैं कि दूसरों को हम कैसे लगेंगे ?
और अगर दूसरों का थोड़ा ध्यान करेंगे तो
अगर पुरुष देख रहा है आईने में,
तो दूसरे हमेशा स्त्रियाँ होंगी ।
अगर स्त्रियाँ देख रही हैं, तो दोनों हो सकते हैं,
पुरुष और स्त्रियाँ भी ।
क्योंकि स्त्रियों की कामवासना ईष्या से
इतनी सँयुक्त हो गयी है, जिसका कोई हिसाब नहीं है ।

पुरुष होंगे कि कोई देख कर प्रसन्न हो जाये, इसलिए ;
और स्त्रियों की याद आयेगी कि
कोई स्त्री जल जाये, राख हो जाये, इसलिए ।
मगर दोनों कामवासना के ही रूप हैं ।
दोनों के भीतर गहरे में तो वासना ही चल रही है ।

यह अभ्यास चौबीस घण्टे चल रहा है ।
तो फिर वैराग्य का जो पक्षी आता है हमारे पास,
कोई जगह नहीं पाता जहाँ बैठ सके ;
व्यर्थ हो जाता है ।
हमने जो मकान बनवाया है,
वह वासना के पक्षी के लिए बनवाया है ।
इसलिए सब तरफ से उसको निमन्त्रण है,
निवास के लिए मौका है ।

शुभ प्रभात दोस्तो

15/04/2023
तंत्र सम्भोग साधना क्या है ?तंत्र कोई जादू टोना नहीं तंत्र वो ज्ञान है जो खोज लिया गया है गहरी साधना से जीवन को जीने का ...
15/04/2023

तंत्र सम्भोग साधना क्या है ?

तंत्र कोई जादू टोना नहीं
तंत्र वो ज्ञान है जो खोज
लिया गया है

गहरी साधना से जीवन को जीने का
बेहतर आध्यात्मिक तरीका जिस में
भागना नहीं है जीवन से
भोग में भोगी ही नहीं बने रह जाना है।

अपने तन की नग्न ऊर्जा को
साधना है सकारात्मक रूप में
अध्यात्म के रूप में

काम की शक्ति से बड़ी सकारात्मक कोई शक्ति नहीं हमारे तन में

मन को साधना में एकाग्र करना और
तन का उपयोग तन की काम ऊर्जा का प्रयोग
कुवारी कन्या का उपयोग तंत्र में करने का बेहद जरुरी उपयोग है

साधनारत आदमी तन की तंत्र साधना में इतनी तीव्र गति से ऊपर उठता है कि उसे इस धरती पर वापिस लाने .अपने तन में लाने के लिए एक गहरे आकर्षण गहरे गुरुत्व आकर्षण की जरुरत होती है।

धरती मां के गुरुत्व आकर्षण के कारण हम जैसे धरती पर ही बने रहते है।

तन की तंत्र साधना में नग्न कुवारी कन्या की तन की ऊर्जा हमे बांधे रखती है वापिस साधना से बाहर आने में ! तंत्र की नग्न कुवारी कन्या की ऊर्जा मां स्वरुप हमारे तन की ऊर्जा को संभालती है।

मगर तंत्र साधना को गैर अध्यातिक लोग जादू टोना कामुकता अश्लीलता की नज़र से अपने अज्ञान की नज़र से देखते है। इसी लिए यह विद्या गुप्त और वीरान जगह में बिना बाधा की जाने लगी। आज भी तंत्र सम्भोग सिखाने वाले दुर्लभ है।

ध्यान शोर से शांति की तरफ की यात्रा :कभी कभी समाजिक एवं व्यवहारिक जीवन मे हम पाते है कि हम कुछ परिस्थितियों में इस तरह स...
10/04/2023

ध्यान शोर से शांति की तरफ की यात्रा :

कभी कभी समाजिक एवं व्यवहारिक जीवन मे हम पाते है कि हम कुछ परिस्थितियों में इस तरह से उलझ जाते है कि हम अंदर से छोटी छोटी चीजो को लेकर भयभीत एवं चिंतित रहने लगते हैं।यह भय एवं चिंता हमारे जीवन मे एक अनसुना शोर को जन्म देते हैं जो कानो में सुनाई तो नही देते लेकिन हमारे दिमाग को हमेशा अपने प्रभाव में रखते हैं। हम हमेशा जीवन मे एक प्रतियोगिता से गुजर रहे होते है जिसे ज्यादा अच्छे से करने की तैयारी में हम अपने जीवन मे इस अनजाने शोर गुल को पैदा करते है ।सबसे आश्चर्य की बात तो ये रहती है कि जिस चीज को बेहतर बनाने में ये शोर हम अपने जीवन मे पैदा करते है यह उस चीज को और बदतर बना देता है।यह उलझन व्यक्ति को कुछ इस कदर अपने आगोश में लेती जाती है की उसे भान भी नही रहता और हमेशा के लिए एक अशांत दुनिया का हिस्सा बन जाता है।
ऐसी स्थिति में ध्यान रूपी अनमोल विद्या जो कि शुरुआती स्तर पर सुनने और समझने में तो एक सामान्य सी क्रिया लगती है लेकिन व्यक्ति के जीवन मे घट जाने के बाद इस शोर से शांति की तरफ ले जाने वाली औषधि बन जाती है।
भौतिक स्तर पर अगर देखा जाए तो आप पाएंगे कि ध्यान को जीवन मे उतारने के बाद व्यक्ति अपने कार्य क्षमता में उन्नति तो करता ही है और साथ ही साथ पूर्ण रूप से अंदर से शांत और उत्साह से भरा रहता है।व्यक्ति विशेष के द्वारा किये जा रहे किसी भी क्षेत्र के अभ्यास में उसे कुशल और धैर्यवान बनाता है।वर्तमान युग मे अधिकतर सफल लोगो ने किसी न किसी प्रकार से ध्यान को अपने जीवन मे उतार लिया है और अभी ओलंपिक में मेडल जीतने के बाद पी वी सिंधु ने ध्यान किस प्रकार से उपयोगी है इस तरफ इशारा किया।
ध्यान एक उत्तम मार्ग है खुद के अंदर झांकने एवं खुद के असीम स्तर को समझने की।यह साधारण सा किया जाने वाला कोर्स नही अपितु एक उत्तम क्रिया है जो कि सतत अभ्यास के बाद अक्रिया बन के व्यक्ति के मूल अस्तित्व के साथ घटित हो जाती है।यह आपकी चेतना स्तर को भौतिकता के साथ साथ आध्यात्मिक स्तर पर इतना उन्नत बनाता है कि आप भौतिक सम्पन्नता लिए अपने अंदर सहज और सुंदर व्यक्तित्व का विकास करते हैं।इस प्रकार के व्यक्ति की सम्पन्नता उसके खुद के साथ साथ समस्त जीवो को भी लाभ पहुचाती है।

ध्यान ही एक ऐसी प्रक्रिया है जिसपे कभी भी किसी को कोई आपत्ति नही हुई और हमेशा हर धर्म मे ध्यान के प्रकाश को अनुभव किया गया और इसके महत्व को जाना गया।अब समय है कि वर्तमान समय मे सभी इसके सतत अभ्यास से इसे आत्मसात करें और एक उच्च चेतन व्यक्तित्व के साथ खुद का और दूसरो का कल्याण करें।

सुकून इतना ही काफी है                  फासलों में रहकर भी तुम दिल के सबसे करीब                 रहते हो
09/04/2023

सुकून इतना ही काफी है
फासलों में रहकर भी

तुम दिल के सबसे करीब
रहते हो

 #हाफ सेंचुरी  #अहोभाव पचास का आंकड़ा बड़ा जादुई होता हैएक अलग ख़ूबसूरती होती है इसकीतजुर्बे की लकीरें माथे पे होती हैपर...
08/04/2023

#हाफ सेंचुरी #अहोभाव

पचास का आंकड़ा बड़ा जादुई होता है
एक अलग ख़ूबसूरती होती है इसकी
तजुर्बे की लकीरें माथे पे होती है
पर गाल अब भी गुलाबी होते है

बच्चों से बेफ़िक्री का आलम होता है
खुद के लिए जीने का मन करता है
रंग भरने लगते है हम अपने सपनों में
रंगने लगते बालों को जिंदगी की तरह

गुनगुनाने लगते,आईने में मुस्कुराने लगते
नीला,पीला,चटकीला सब पहनने लगते
जिम में पसीना बहाते,पसंद का खा आते
साड़ी, मिनी,गाऊन सब ट्राई कर पाते

ये उम्र बहुत कुछ कहती है
कभी कान लगा सुनना तुम
कहती है मरने से पहले जी लेना
मौका मिला है इसे ना खो देना

ये दीपक की वो लौ होती है
जो बुझने से पहले पूरा ज़ोर लगाती है
पूरी ताकत से कमज़ोर पर फैलाती है
और फ़िर ख़ुशी, ख़ुशी बुझ जाती है

:नित जीवन के संघर्षों सेजब टूट चुका हो अन्तर्मन,तब सुख के मिले समन्दर कारह जाता कोई अर्थ नहीं Iजब फसल सूख कर जल के बिनति...
08/04/2023

:

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं I

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं I

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं I

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं I

मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं I

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं I

स्त्री बहुत कोमल होती है भावों से ।जैसे एक फूल !पर कोमलता को कमजोरी समझने की भूल नही होनी चाहिए।ओर वहीं दूसरी तरफ पुरुष ...
07/04/2023

स्त्री बहुत कोमल होती है भावों से ।जैसे एक फूल !पर कोमलता को कमजोरी समझने की भूल नही होनी चाहिए।

ओर वहीं दूसरी तरफ पुरुष का स्वभाव आक्रामक होता है ।जल्दबाजी में रहता है ।हर काम जल्दी में निपटाने की जदोजहद में लगा रहता है ।पुरुष बहुत बेचैन रहता है ।उसे धरती पर नही ,हमेशा आसमान में उड़ने की चाह रहती है ।इज़लिये ही जहाज ओर न जाने कितनी चीजो का आविष्कार करता आया है ।पुरुष को हमेशा ऊंचा उठना होता है ,इसलिए प्रतीकात्मक रूप से बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स बनाता रहता है ।बहुत तेज गति में रहता है तो फ़ास्ट कार ,स्कूटर बनाता रहता है ।

वही दूसरी तरफ स्त्री धरातल पर रहती है ,इसलिए घर के अलावा उसे कुछ सूझता नहीं।स्त्री बहुत धीमी गति से चलती है ,इसलिए उसके चलने में इतना ग्रेस होता है ।स्त्री पैसिव होती है ,इज़लिये धरती पर ज्यादा चीजो के निर्माण में उसका योगदान बहुत कम रहा है ।

स्त्री को दूसरे ग्रह पर जाने की बजाय ,पड़ोस की खबर लेने में ही चैन मिल जाता है ।स्त्री अंतर्मुखी होती है ,इसलिए बस अपने को सजाने संवारने में ही जीवन व्यतीत कर देती है ।

इज़लिये जो भी बुद्ध पुरूष हुए ,जिन्होंने भी परमात्मा को पाया ,वो स्त्री की तरह हो गए ।उनमे स्त्रीत्व का भाव ज्यादा हो गया ।
कृष्ण हुए ,बुद्ध हुए ,राम कृष्ण हुए ।इनमें एक अद्भुत सौंदर्य था ,इनमें हिंसा नही थी ।

एक स्त्री को प्रेम का आग्रह करना भी हिंसा प्रतीत होती है ।और उसको जल्दबाजी में स्पर्श करना भी सूक्ष्म हिंसा का ही हिस्सा है ।
स्त्री प्रेम में आंखे बंद कर लेती है क्योंकि वो पुरूष से ज्यादा भावों में जीती है ।स्त्री -पुरुष जब प्रेम में हो तो पुरुष को आंखे खोलना पसन्द है क्योंकि वो बहिर्मुखी है ,वही स्त्री अंतर्मुखी होती है ।
स्त्री का शरीर ही इसी तरह निर्मित है कि उसका सारा शरीर एसकैटिक होता है।स्त्री के हर अंग में संवेदनाओं का बहाव होता है ।जबकि पुरुष स्वभाव से कठोर होता है।

आमतौर पर स्त्री पुरुष जब बिस्तर पर होते हैं तब भी वो जल्दबाजी में रहते हैं।ओर इसी कारण उन्हें संतुष्टि नही मिलती। भोजन जब जल्दबाजी में खाया जाए तो पेट भले भर जाए ,पर संतुष्टि नही देता।

इज़लिये स्त्री के पास जाओ तो अपनी सांसों की गति धीमी करके जाए ।भावों से भरके जाए।श्रद्धा समर्पण में जाए।

शुभ प्रभात

ज़िन्दगी का सफर हो या जीवन का सफर दोनों अच्छा होना चाहिए। तभी सफर का मजा आता है। #अहोभाव
06/04/2023

ज़िन्दगी का सफर हो या जीवन का सफर दोनों अच्छा होना चाहिए। तभी सफर का मजा आता है। #अहोभाव

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