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हमें वास्तव में यह प्रमाणित करने के लिए शोध की आवश्यकता नहीं है कि प्रकृति माता बच्चों को स्वास्थ्य बनाए रखने में सहयोग ...
28/06/2025

हमें वास्तव में यह प्रमाणित करने के लिए शोध की आवश्यकता नहीं है कि प्रकृति माता बच्चों को स्वास्थ्य बनाए रखने में सहयोग करती हैं तथा रचनात्मकता, सामाजिक कौशल और लचीलापन को प्रोत्साहित करती हैं।

विडम्बना यह है कि अधिकांश माता-पिता यह जानते हुए भी अपने बच्चों को टेलीविजन, मोबाइल, वीडियो गेम में व्यस्त रखते हैं।

बच्चों के विकास और शिक्षण हेतु प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है, उन्हें निर्भीक और निडर विश्व नागरिक के रूप में उभरने में सहयोग करने के लिए, टीवी\मोबाइल जैसे इडियट बॉक्स के पीछे अमूल्य काल का विनाशक्यों? टीवी देखने के लिए उनके पास पर्याप्त वयस्क जीवन है न।

एक शोधपत्र अनुसार:

खेल के मैदान जो प्राकृतिक तत्व जैसे पेड़ और पौधे, ऊंचाई में परिवर्तन और बच्चों को अपनी पसंद की गतिविधियों में संलग्न होने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं, इससे बच्चों के स्वास्थ्य, व्यवहार और सामाजिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ये स्थान बच्चों को जोखिम के बारे में जानने और अपनी सीमाओं के बारे में जानने का मौका देते हैं।
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02/02/2025

*कब तक अपमानित होंगे डॉक्टर ?*

_डॉ ओमप्रकाश प्रजापति_

राजस्थान के सेडवा (बाड़मेर) के सरकारी अस्पताल (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) में हाल ही की घटना बेहद चिंताजनक है। एक डॉक्टर, जो पूरे दिन में 250 मरीजों को देखने, उपचार करने में अपनी ड्यूटी निभा रहा था, थकान के बावजूद अपने कर्तव्य का पालन कर रहा था। तभी निरीक्षण के लिए आए एक उपखंड अधिकारी (SDM) ने डॉक्टर के काम की सराहना करने की बजाय उसके सम्मान को तार-तार कर दिया। मरीजों के सामने अधिकारी ने आदेश दिया — "इसे फिर से देखो!" डॉक्टर ने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाही, लेकिन उनकी कोई बात सुनी ही नहीं गई। SDM ने डॉक्टर को धमकी देते हुए कहा — "तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा!"

एक अन्य घटना जायल (नागौर) में घटी, जहां SDM साहब अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने गए चिकित्सक द्वारा पर्ची मांगने पर बिफर गए और बोले — "बकवास मत कर!" जब डॉक्टर ने उनसे विनम्रता से बात करने की गुजारिश की, तो साहब और भड़क गए। आखिर डॉक्टर का अपराध क्या था?

दिनभर मरीजों की सेवा कर रहे चिकित्सकों के कार्यस्थल (सरकारी अस्पतालों/ स्वास्थ्य केन्द्रों) पर अपमानित किए जाने वाले समाचार सुर्खियों में आ रहे हैं एवं वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहें हैं। सरकारें, राजनेता, समाज, सामाजिक संस्थाएँ, मानव अधिकार संगठन आदि मूकदर्शक बनकर चिकित्सकों के इस अपमान को देख रहें हैंI देश के दूरस्थ सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों, सरकारी अस्पतालों में दिन-रात रोगियों का उपचार सेवा करने वाले रेजिडेंट्स चिकित्सक आज प्रतिदिन अपमान के घूंट पीकर में कठिन परिस्थितियों में प्रतिदिन सैंकड़ों मरीज़ों के उपचार करते समय अपमानित होते हुए मूक बनकर मानसिक वेदना से कराह रहा है एवं चिकित्सक बनने के अपने फैसले पर पछता रहा है।

राजस्थान के मुखिया के सुपुत्र भी डॉक्टर हैं, अनेकों प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं, वकीलों, पत्रकारों, आदि के अपने बच्चे या रिश्तेदार भी डॉक्टर बन रहे हैं। यदि चिकित्सकों के अपमान के विरोध में आवाज नहीं उठाई गई, ठोस कार्यवाही नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं जब देश में अपमानित होने के लिए कोई भी नीट (NEET) जैसी कठिन परीक्षा में चयनित होकर दस से बारह वर्षों की अति कठिन मेडिकल ट्रेनिंग कर चिकित्सक नहीं बनना चाहेगा। यदि चिकित्सक बन भी गया तो चिकित्सा कार्य करने की बजाय वह दूसरे क्षेत्र में कार्य करना पसन्द करेंगेI शायद यही वज़ह है कि देश के परम विशेषज्ञ चिकित्सकों (MS/MD/DM/Mch) का सरकारी सेवाओं से धीरे-धीरे मोह भंग होने लगा है। साथ ही साथ हजारों युवा चिकित्सक आज चिकित्सा क्षेत्र को छोड़ कर अन्य क्षेत्रों की और रुख कर रहें हैंI देश के हज़ारों युवा चिकित्सक भारत छोड़कर विदेश जाकर चिकित्सा कार्य करना चाहते हैं ।

युवा चिकित्सकों का चिकित्सा कार्य एवं सरकारी सेवाओं में बढ़ती अरुचि एवं युवा चिकित्सकों का विदेश पलायन रोकने एवं देश की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने हेतु चिकित्सकों का अपमान रोकने हेतु सरकार, राजनेताओं मानव अधिकार संस्थाओं, न्यायपालिका एवं सभ्य समाज को ठोस कदम उठाने होगें। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब देश में योग्य चिकित्सकों का अभाव होने के कारण हमें उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित होना पड़े।

डॉ ओमप्रकाश प्रजापति

गांव_के_बियाहपहले गाँव मे न टेंट हाऊस थे और न कैटरिंगथी तो बस सामाजिकता ।।गांव में जब कोई शादी ब्याह होते तो घर घर से चा...
01/12/2024

गांव_के_बियाह
पहले गाँव मे न टेंट हाऊस थे और न कैटरिंग
थी तो बस सामाजिकता ।।
गांव में जब कोई शादी ब्याह होते तो घर घर से चारपाई आ
जाती थी,
हर घर से थरिया, लोटा, कलछुल, कराही इकट्ठा हो जाता था
और गाँव की ही महिलाएं एकत्र हो कर खाना बना देती थीं ।।
औरते ही मिलकर दुलहिन तैयार कर देती थीं और हर रसम का
गीत गारी वगैरह भी खुद ही गा डालती थी ।।
तब DJ अनिल-DJ सुनील जैसी चीज नही होती थी और न ही
कोई आरकेस्ट्रा वाले फूहड़ गाने ।।
गांव के सभी चौधरी टाइप के लोग पूरे दिन काम करने के लिए
इकट्ठे रहते थे ।।
हंसी ठिठोली चलती रहती और समारोह का कामकाज भी।
शादी ब्याह मे गांव के लोग बारातियों के खाने से पहले खाना
नहीं खाते थे क्योंकि यह घरातियों की इज्ज़त का सवाल होता
था ।।
गांव की महिलाएं गीत गाती जाती और अपना काम करती
रहती ।।
सच कहु तो उस समय गांव मे सामाजिकता के साथ समरसता होती थी ।।
खाना परसने के लिए गाँव के लौंडों का गैंग ontime इज्जत
सम्हाल लेते थे ।

✍️ डॉ. ओमप्रकाश प्रजापति

20/06/2023

अत्यंत विचारणीय ✍🏻

एक आदमी ने एक विज्ञापन दिया कि उसे उसकी चिन्ता करने वाला एक आदमी चाहिये। वेतन वो जो मांगेगा, मिलेगा।
विज्ञापन देखकर एक बेरोजगार तुरंत उसके पास गया और उसने उसके लिये चिन्ता करने वाली नौकरी के लिये 10000/ महीना सैलरी की मांग की। विज्ञापन देने वाले ने उसे 10000/ देना स्वीकार कर लिया और कहा कि तुम अभी से अपनी नौकरी शुरु कर सकते हो।

नौकरी शुरु हो गई। अब मालिक ने उसे अपनी सारी चिंताएं बता दी।
मेरी महिने की आमदनी 50000है।
बच्चों की फिस 10000 महीना है।
मकान का भाडा 15000 महीना है।
घर का खाने पीने पर खर्च 15000 है।
मेरे रोज ऑफ़िस जाने का खर्च महिने भर का 5000 है।
धोबी का खर्च महिने का 3000 है।
काम वाली बाई को 2000 महीना देना होता है।
महिने मे एक बार हमलोग कहीं घुमने जाते हैं उसमे कम से कम 5000/ लग जाता है।
अब चिन्ता करने वाला आदमी से बर्दाश्त नही हुआ, उसने कहा: मालिक आपका अभी तक का खर्च 55000 है और अभी आपने मेरा 10000सैलरी उसमे नही बताया है तो सब लेकर 65000हो गए, आमदनी आपकी 50000है, बाकी पैसा कहाँ से लाएंगे?
मालिक ने कहा उसी के लिये तो तुम्हे रखा है, अब तुम 10000ले रहे हो मेरी सारी चिन्ता करने के लिये तो मै क्यों चिन्ता करुँ, अब ये चिन्ता तुम करो कि बाकी पैसा कहाँ से आएगा।

नेताओं द्वारा खैरात बांटने की भी चिन्ता देशवासियों को ही करनी होगी क्योंकि नेता अपनी जेब से किसीको एक धेली नही देंगा।
सारा पैसा हम देशवासियों से ही लिया जाएगा। टैक्स बढ़ेगा, फिर महंगाई बढेगी और देश का गरीब और निम्न मध्यम वर्ग उस महंगाई और टैक्स की चक्की में पिसेगा।

देखियेगा कहीं 10000 महीना पाने के लालच में उस पैसे की व्यवस्था की चिन्ता में आप भी न पड़ जायें।
🙏🏼 🙏🏼

..... आखिरी लोग..... सदी के आखरी लोग जाने की तैयारी कर रहे हैं.. लगभग अपनी नस्ल के यह आखिरी लोग हैं.. उनकी सोच 'उनके डर'...
29/11/2022

..... आखिरी लोग.....

सदी के आखरी लोग जाने की तैयारी कर रहे हैं.. लगभग अपनी नस्ल के यह आखिरी लोग हैं.. उनकी सोच 'उनके डर' उनकी खुशी ' उनका विशेष पहनावा बहुत जल्द समाप्त बंद हो जायेगा.. जितना हो सके उनसे पिछली सदी के सारे राज़ जान लो.. खुशियां कैसे मनाई जाती है.. गमों में शरीक कैसे हुआ जाता है इन से सीखो. उन लोगों के दुख दर्द जिनको आप जानते भी न हों किस प्रकार शरीक हुआ जाये यह नस्ल बहुत अच्छे से जानती है.. नई नस्ल सिर्फ इस चीज को छोड़ने का नुकसान ही गिन ले तो बहुत है.. हम लाख दावे करें मगर सही मायनों में यह वह लोग हैं जिन्होंने दो पीढ़ियों का फासला मापा है.. सिर्फ यही वह लोग हैं जो आपको शुद्ध और मिलावट वाली किसी भी चीज का फर्क और अंतर बता सकते हैं. चाहे वह रिश्ते हों 'पुराना दौर हो' या नये दौर की फैली टैकनोलोजी का स्वाद, यह वह लोग हैं जिन्होंने ब्लैक एंड वाइट आंखों से रंगीन दुनिया देखी है.. हम आस पास देखें तो यह किसी कम होती नस्ल के पक्षियों की तरह हम मे से कम होते जा रहे हैं. विदा हुए जा रहे हैं.. यह जा रहे हैं.. यह आखिरी लोग हैं!

✍️ डॉ. ओमप्रकाश प्रजापति

14/09/2021

सावधान !!!

कोविड वैक्सीन लगवाने वाले कृपया ध्यान दे!!

गाँव में मेरे एक मित्र कोविड वैक्सीन लगवा कर जब घर आ रहे थे तो उनको धुँधला दिखाई देने लगा। घर पहुचते पहुचते वह अत्यधिक घबरा गए और तुरंत वैक्सीन सेंटर पर फोन करके अपनी परेशानी के बारे में बताया।

वैक्सीन सेंटर से कहा गया कि आप तुरंत वापस आइये। क्योंकि आपके जाते ही आपको वैक्सीन लगाने वाली नर्स को भी धुधला दिखना शुरू हो गया है। वह वापस वैक्सीन सेंटर पहुंचे तो डॉ ने उन्हें चश्मा देते हुए कहा कि यह अपना चश्मा लीजिये और नर्स का चश्मा जो आप पहन कर चले गए थे वापस कीजिये।

ज़्यादा दिमाग न लगाओ, वैक्सीन लगवाओ
🙏🏻🙏🏻

12/07/2021

पचपदरा विधायक श्री मदन जी प्रजापत को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
मैं ईश्वर से आपके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूँ।

02/04/2021

कोरोना की इस दूसरी लहर में आ रहे अधिकांश मरीज बिना लक्षणों वाले (असिंप्टोमैटिक) हैं। पहले मरीज में लक्षण दिखते थे जिससे उनकी पहचान कर क्वारंटीन करना आसान था। बिना लक्षणों वाले मरीजों की पहचान बिना टेस्ट के मुश्किल है। ऐसे मरीज को स्वयं के संक्रमित होने का भी अंदाजा नहीं होता।

असिंप्टोमैटिक मरीज जानकारी के अभाव में बिना प्रोटोकॉल का पालन किए घूमते रहते हैं जिससे दूसरे लोगों में तेजी से संक्रमण फैलता है। ऐसी परिस्थिति में सभी लोगों को कोविड प्रोटोकॉल का गंभीरता से पालन करना चाहिए लेकिन आमजन कोविड प्रोटोकॉल के पालन में लापरवाही कर रहे हैं।

प्रदेश में 16 फरवरी को एक दिन में कोरोना के सिर्फ 60 नए मामले आए थे लेकिन कल 1 अप्रेल को 1350 मामले आए हैं। 23 फरवरी को कुल एक्टिव केस 1195 रह गए थे लेकिन 1 अप्रेल को ये संख्या बढ़कर 9563 हो गई है। 24 फरवरी को केस डबलिंग टाइम 2521 दिन था जो अब 270 दिन हो गया है।

अभी कोरोना वायरस भी पहले से खतरनाक हो गया है। ऐसे में हम सभी को गंभीरता दिखानी होगी। मैं सभी से पुन: अपील करता हूं कि मास्क लगाने, हाथ धोने एवं सोशल डिस्टैंसिंग बनाए रखने के प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करें। थोड़ी सी लापरवाही भी किसी की जान जाने कारण बन सकती है।

22/12/2020

पांचवीं तक स्लेट की बत्ती को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें ।

पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था

"पुस्तक के बीच पौधे की पत्ती और मोरपंख रखने से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था"।

कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था ।

हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था

एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा हमने कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं ।

स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?

पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी ,
"पीटने वाला और पिटने
वाला दोनो खुश थे" ,
पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे , पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुआ।

हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना उन्हें स्नेह और उनका सम्मान करते हैं,क्योंकि हमें उनके सामने कुछ कहना नहीं आता था।

आज हम गिरते - सम्भलते , संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं , कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं ।

हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है , हमे हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनियां में थे ।

कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे ।

अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं ।

हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए ।
....."एक बार फिर अपने बचपन के पन्नो को पलटिये, सच में फिर से जी उठेंगे।

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