Ajay Sharma, Patanjali Social Media Meerut

Ajay Sharma, Patanjali Social Media Meerut This page is for the Social Awareness about yoga

20/04/2026
20/04/2026
18/04/2026

इतिहास के पन्नों से
तक्षक,,,,,,
सन 711ई. की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।
एक बालक तक्षक के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं।
तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया।
आठ वर्ष का बालक तक्षक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया।
25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे, पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।
इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे... तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला, "महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।"
महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले, "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।"
"महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"
महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले, "किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक।"
तक्षक ने कहा, "मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"
"पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर"
"राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।"
महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।
अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।
आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए। इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था...
उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।
विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था। सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा, लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा,
"आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।"
इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई। तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नहीं, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा।
यह पोस्ट किसी की मोहताज नही है। भारत के इतिहास की यह गौरवशाली उच्च कोटि की गाथा है।

18/04/2026
17/04/2026

स्वास्थवर्धक गुणकारी बेल का शर्बत...
गर्मियों की शुरुआत के साथ ही बेल भी बाजार में दिखने लगते हैं....बेल के पेड़ का धार्मिक महत्व के साथ साथ उपचारात्मक महत्व भी है. भारत में इस फल के पेड़ को बिल्व, श्री फल, सदाफल, शाण्डिल्रू आदि नामों से भी जाना जाता है.
रोगों को नष्ट करने की अदभुत क्षमता के कारण ही इसे बिल्व कहा जाता है. इसका सूखा गूदा बेलगिरी एवं इसका गूदा या मज्जा बल्वकर्कटी कहलाता है.
बेल का फल बाहर से कठोर और हल्के हरे रंग का होता है, जो पकने पर सुनहरा पीला हो जाता है। इसके अंदर मीठा, सुगंधित और रेशेदार गूदा होता है, जो स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है।
बेल के फल का खोल हल्का हरे रंग का एवं चिकना होता है. पक जाने पर यह सुनहरे पीले रंग में परिवर्तित हो जाता है जिसे तोड़ने पर बड़ा ही मीठा, रेशेदार एवं सुगंधित गूदा निकलता है.
बेल वृक्ष से धार्मिक मान्यताएँ भी जुड़ी हैं. हम सब हिंदू बेल वृक्ष में महादेव का रूप देखते हैं. हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि बेल के जड़ में भगवान शिव का वास होता है. इसके तीन पत्तों की डाली बिल्वपत्र को लोग साक्षात् त्रिदेव का स्वरुप मानते हैं. इसके पाँच पत्तों की डाली को लोग तीन पत्तों से भी ज्यादा शुभ मानते हैं और पूजा के लिए इसे इकट्ठा करना चाहते हैं. धर्मग्रंथों में भी पाँच पत्तों की डाली की महत्ता का वर्णन है.
बेल का सेवन स्वास्थ्य के लिए काफी गुणकारी होता है. इसके पेड़ के लगभग हर हिस्से का अपना एक अलग महत्व है. इस मौसम में इसका शरबत मुरब्बा सेहत के लिए बहुत गुणकारी माना जाता है. आयुर्वेद में तो इसे बहुत फायदेमंद माना गया है.
बेल में कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं. यह प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत है, साथ ही इसमें विटामिन सी की भी प्रचुर मात्रा पाई जाती है. इसका शरबत पीने से पेट को राहत और मन को ताजगी मिलती है. इससे कब्ज, अपच और गैस की समस्या से भी निजात मिलती है. आयुर्वेद में इसे डायरिया या अतिसार की स्थिति में भी बहुत फायदेमंद बताया गया है.
इसका एक गुण यह भी है कि यह जल्दी खराब नहीं होता और इसे कई दिन तक रखा जा सकता है. शरबत बनाने के लिए इसे तोड़कर गूदा निकाल लें और कुछ देर पानी में भिगो दें. इसके बाद रेशे और गूदे को अच्छी तरह छानकर अलग कर लें. इसमें जरूरत के हिसाब से पानी मिलाएं और फ्रिज में स्टोर कर लें. इसमें गुड़ या शहद व कालीमिर्च मिला सकते हैं.
बेल को हृदय रोगों में भी अच्छा माना जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, इससे शुगर स्तर भी संतुलित रहता है और यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखता है. हालांकि हार्ट और डायबिटीज के रोगी इसका सेवन किस रूप में और कितनी मात्रा में करें, इसके बारे में अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें.
बाजार में मिलने वाले बेल के शरबत के बजाय घर में ही इसे तैयार करें. इससे एसिडिटी जैसी समस्याओं में राहत मिलती है, साथ ही गर्मी से होने वाले मुंह के छालों में भी आराम मिलता है. कुछ शोधों में यह कैंसर रोगियों के लिए भी फायदेमंद साबित हुआ है. इसे रक्त शोधक भी कहा जाता है. इसके नियमित सेवन से रक्त संबंधी दोष दूर होते हैं.
डायबटीज के रोगियों के लिए बेल बहुत ही ज्यादा लाभप्रद होता है. इसकी पत्तियों को पीस कर दिन में दो बार इसका सेवन करने से ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है.
बेल का सेवन कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में काफी मददगार साबित होता है. इस प्रकार यह कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से होनेवाली बीमारियों को भी रोकता है.
महिलाएँ यदि नियमित रूप से बेल का रस पीयें तो उनमें भविष्य में ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना काफी कम होगी.
बेल के रस में गुनगुने पानी एवं शहद डाल कर नियमित सेवन करने से खून साफ हो जाता है.
लू लगने पर इसके पत्तों को मेहंदी की तरह पैर के तलवों, सिर, हाथ, छाती, आदि पर मालिश करने से इससे तुरंत राहत मिल जाती है.
बेल के रस में थोड़ी मात्रा में घी मिलाकर उसका नियमित सेवन करने पर दिल से जुड़ी बीमारियों से बचाव होता है.
आयुर्वेद में बेल के रस का डायरिया में होनेवाले फायदे का वर्णन है. इसे गुड़ के साथ पीने से डायरिया से बचाव हो जाता है.
स्वास्थवर्धक गुणकारी बेल का शर्बत इसलिए है फायदेमंद!

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