स्वदेशी अभियान

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केवल स्वदेशी नीतियों से ही देश फिर से सोने कि चिड़िया बन सकता हैं ।

स्वदेशी एक ऐसा गहरा दर्शन हैं जो किसी भी देश को अपने पैरो पर खड़ा कर सकता हैं - श्री राजीव दीक्षित जी मित्रो राजीव दीक्षित जी के परिचय मे जितनी बातें कही जाए वो कम है ! कुछ चंद शब्दो मे उनके परिचय को बयान कर पाना असंभव है ! ये बात वो लोग बहुत अच्छे से समझ सकते है जिन्होने राजीव दीक्षित जी को गहराई से सुना और समझा है !! फिर भी हमने कुछ प्रयास कर उनके परिचय को कुछ शब्दो का रूप देने का प्रयत्न किया है ! परिचय शुरू करने से पहले हम आपको ये बात स्पष्ट करना चाहते हैं कि जितना परिचय राजीव भाई का हम आपको बताने का प्रयत्न करेंगे वो उनके जीवन मे किये गये कार्यों का मात्र 1% से भी कम ही होगा ! उनको पूर्ण रूप से जानना है तो आपको उनके व्याख्यानों को सुनना पडेगा !!

राजीव दीक्षित जी का जन्म 30 नवम्बर 1967 को उत्तर प्रदेश राज्य के अलीगढ़ जनपद की अतरौली तहसील के नाह गाँव में पिता राधेश्याम दीक्षित एवं माता मिथिलेश कुमारी के यहाँ हुआ था। उन्होने प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा फिरोजाबाद जिले के एक स्कूल से प्राप्त की !! इसके उपरान्त उन्होने इलाहाबाद शहर के जे.के इंस्टीट्यूट से बी० टेक० और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (Indian Institute of Technology) से एम० टेक० की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद राजीव भाई ने कुछ समय भारत CSIR(Council of Scientific and Industrial Research) मे कार्य किया। तत्पश्चात् वे किसी Research Project मे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए पी जे अब्दुल कलाम के साथ भी कार्य किया !!

सप्त धातुआयुर्वेद में स्वास्थ्य को समझने कीसबसे सूक्ष्म और वैज्ञानिक व्यवस्था है।आधुनिक दृष्टिरोग को नाम देती है।आयुर्वे...
15/01/2026

सप्त धातु
आयुर्वेद में स्वास्थ्य को समझने की
सबसे सूक्ष्म और वैज्ञानिक व्यवस्था है।
आधुनिक दृष्टि
रोग को नाम देती है।
आयुर्वेद
शरीर की जड़ तक जाता है।
रस से लेकर
शुक्र तक
शरीर की हर धातु
पिछली धातु की शुद्धता पर निर्भर करती है।
यदि रस दूषित है,
तो रक्त अशुद्ध होगा।
यदि रक्त असंतुलित है,
तो मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र
स्वतः प्रभावित होंगे।
इसीलिए आयुर्वेद
लक्षण नहीं,
धातु संतुलन को
स्वास्थ्य का आधार मानता है।
थकान हो,
त्वचा विकार हों,
मोटापा हो या दुर्बलता
इन सबके पीछे
किसी न किसी धातु का असंतुलन छिपा होता है।
आयुर्वेद का मार्ग
दमन नहीं,
संस्कार है।
जब
आहार शुद्ध हो,
अग्नि संतुलित हो,
और दिनचर्या शरीर के अनुसार हो
तभी सप्त धातुएँ
अपने पूर्ण बल में कार्य करती हैं।
स्वास्थ्य
केवल बीमारी का न होना नहीं,
बल्कि
धातुओं का संतुलन है।

 #समिधाओं का यज्ञ-विज्ञान(शास्त्रीय, वैज्ञानिक एवं समकालीन विवेचन)भूमिकायज्ञ भारतीय वैदिक परंपरा की एक सुव्यवस्थित ऊर्जा...
15/01/2026

#समिधाओं का यज्ञ-विज्ञान
(शास्त्रीय, वैज्ञानिक एवं समकालीन विवेचन)
भूमिका
यज्ञ भारतीय वैदिक परंपरा की एक सुव्यवस्थित ऊर्जा-प्रक्रिया है, जिसमें अग्नि, समिधा, घृत, हवि और मंत्र—इन सभी का संतुलित समन्वय आवश्यक है। यज्ञ-विज्ञान में समिधा (इध्म) का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि समिधा के अभाव में न तो अग्नि का स्थायित्व संभव है और न ही यज्ञीय प्रभाव की सिद्धि।
ऋग्वेद में अग्नि को “इध्मजुष्टम्” कहा गया है—
अर्थात् वह अग्नि जो उचित समिधाओं से ही पूर्ण रूप से प्रकट होती है।
यह स्पष्ट करता है कि समिधा साधारण ईंधन नहीं, बल्कि यज्ञ का आधारभूत विज्ञान है।
1. समिधा का शास्त्रीय स्वरूप
समिधा / इध्म
→ वह यज्ञीय काष्ठ जिससे अग्नि प्रज्वलित, पोषित एवं स्थिर रहती है।
शास्त्रों में समिधा के लिए स्पष्ट निर्देश हैं—
छिलके सहित हो
बीच से फाड़ी न गई हो
स्वाभाविक रूप से सूखी हो
निश्चित आकार-प्रमाण की हो
आन्हिक सूत्रावली में कहा गया है—
“न विनिर्मुक्तत्वचा”
अर्थात् छिलके से रहित समिधा यज्ञ के लिए निषिद्ध है।
2. यज्ञीय वृक्ष : शास्त्र और विज्ञान का समन्वय
(क) शास्त्रीय स्वीकृति
पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आम, बेल, चंदन, देवदारु, खैर, बादाम आदि वृक्ष
परंपरागत रूप से यज्ञोपयोगी माने गए हैं।
इन वृक्षों को “प्राणीमित्र” कहा गया है,
क्योंकि ये दीर्घजीवी, सात्त्विक और जीवनदायी हैं।
(ख) वैज्ञानिक विश्लेषण (अतिरिक्त शोध)
आधुनिक दहन-विज्ञान और वनस्पति-विज्ञान के अनुसार इन वृक्षों में—
उच्च सेल्युलोज़ व लिग्नो-सेल्युलोज़
→ स्थिर ज्वाला, नियंत्रित दहन
प्राकृतिक रेज़िन व दुग्धीय अंश
→ ऊष्मा को लंबे समय तक बनाए रखते हैं
वाष्पशील औषधीय यौगिक
→ जलने पर वातावरण में फैलकर
कुछ हद तक जीवाणु-सक्रियता को कम कर सकते हैं
यह प्रभाव आधुनिक fumigation और thermal purification सिद्धांतों से मेल खाता है।
3. समिधा का आकार-विज्ञान
शास्त्रानुसार—
तीन समिधाएँ
आठ-आठ अंगुल लंबी
अंगूठे के समान मोटी
वैज्ञानिक तर्क
बहुत पतली → शीघ्र जलकर ताप अस्थिर
बहुत मोटी → अपूर्ण दहन, धुआँ अधिक
निश्चित आकार
→ ताप, समय और ऑक्सीकरण—तीनों में संतुलन उत्पन्न करता है।
4. सूखी बनाम हरी लकड़ी : मित्र-वरुण सिद्धान्त
शास्त्र कहता है—
स्वयं गिरी सूखी समिधा → मित्र देवतात्मक
हरे वृक्ष से शस्त्र द्वारा काटी गई → वरुण देवतात्मक
सूत्र—
“प्राणोदानौ वै मित्रावरुणौ”
वैज्ञानिक अर्थ
हरी लकड़ी में नमी अधिक → ऊर्जा पहले जल सुखाने में खर्च
धुआँ अधिक, ज्वाला अस्थिर
सूखी लकड़ी → सीधी ऊष्मा, स्थिर दहन
यहाँ मित्र और वरुण
ऊर्जा प्रवाह और ऊर्जा अवरोध के प्रतीक हैं।
5. समिधाओं का यज्ञीय निष्कर्ष
समिधा—
केवल अग्नि जलाने का साधन नहीं
बल्कि यज्ञीय ऊर्जा का नियंत्रक माध्यम है
इसलिए शास्त्रों ने समिधा के चयन, अवस्था और विधि पर
अत्यंत सूक्ष्म नियम बनाए।
विशेष परिशिष्ट
यज्ञ में गोबर की समिधा : शास्त्रीय और वैज्ञानिक विश्लेषण
(यह भाग विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो गाय के सूखे गोबर की समिधा प्रयोग करते हैं)
6. शास्त्रीय स्थिति
शास्त्रों में—
समिधा = काष्ठ
गोबर को
गोमय
शुद्धिकारक
हव्य सहायक
माना गया है
परंतु— 👉 गोबर को काष्ठ-समिधा का स्थानापन्न नहीं बताया गया।
7. वैज्ञानिक संरचना : लकड़ी बनाम गोबर
काष्ठ-समिधा
उच्च सेल्युलोज़ + लिग्निन
नमी कम
दहन ताप अधिक
ज्वाला स्थिर
गोबर-समिधा (उपले)
नमी अपेक्षाकृत अधिक
नाइट्रोजन यौगिक उपस्थित
दहन ताप कम
धुआँ और गंध अधिक
गोबर के दहन से
अमोनिया एवं NOx गैसों की संभावना रहती है,
जो लंबे समय तक श्वसन के लिए अनुकूल नहीं।
8. तो गोबर का उपयोग कहाँ उचित है?
✔ गोबर—
अग्नि प्रज्वलन में सहायक
खुले स्थान पर सीमित उपयोग योग्य
शुद्धिकरण में सहायक भूमिका निभा सकता है
❌ पर—
मुख्य यज्ञीय समिधा के रूप में
वह काष्ठ-समिधा जैसा गुणकारी नहीं
9. साधकों के लिए संतुलित मार्गदर्शन
यदि कोई गोबर की समिधा प्रयोग करता है, तो—
उसे मुख्य समिधा न बनाएं
काष्ठ-समिधाओं के साथ सहायक रूप में रखें
स्थान खुला और हवादार हो
धुएँ की तीव्रता पर ध्यान रखें
अंतिम निष्कर्ष
समिधा का मूल तत्त्व काष्ठ है
काष्ठ-समिधाएँ शास्त्रीय और वैज्ञानिक—दोनों दृष्टि से श्रेष्ठ हैं
गोबर उपयोगी है, पर विकल्प नहीं
यज्ञ-विज्ञान का उद्देश्य
आस्था के साथ-साथ
स्वास्थ्य, पर्यावरण और ऊर्जा-संतुलन भी है

01/01/2026
नाभी कुदरत की एक अद्भुत देन है,,,,,,एक 62 वर्ष के बुजुर्ग को अचानक बांई आँख से कम दिखना शुरू हो गया। खासकर रात को नजर न ...
31/12/2025

नाभी कुदरत की एक अद्भुत देन है,,,,,,
एक 62 वर्ष के बुजुर्ग को अचानक बांई आँख से कम दिखना शुरू हो गया। खासकर रात को नजर न के बराबर होने लगी।जाँच करने से यह निष्कर्ष निकला कि उनकी आँखे ठीक है परंतु बांई आँख की रक्त नलीयाँ सूख रही है। रिपोर्ट में यह सामने आया कि अब वो जीवन भर देख नहीं पायेंगे।.... मित्रो यह सम्भव नहीं है..
मित्रों हमारा शरीर परमात्मा की अद्भुत देन है...गर्भ की उत्पत्ति नाभी के पीछे होती है और उसको माता के साथ जुडी हुई नाडी से पोषण मिलता है और इसलिए मृत्यु के तीन घंटे तक नाभी गर्म रहती है।
गर्भधारण के नौ महीनों अर्थात 270 दिन बाद एक सम्पूर्ण बाल स्वरूप बनता है। नाभी के द्वारा सभी नसों का जुडाव गर्भ के साथ होता है। इसलिए नाभी एक अद्भुत भाग है।
नाभी के पीछे की ओर पेचूटी या navel button होता है।जिसमें 72000 से भी अधिक रक्त धमनियां स्थित होती है
नाभी में देशी गाय का शुध्द घी या तेल लगाने से बहुत सारी शारीरिक दुर्बलता का उपाय हो सकता है।
1. आँखों का शुष्क हो जाना, नजर कमजोर हो जाना, चमकदार त्वचा और बालों के लिये उपाय...
सोने से पहले 3 से 7 बूँदें शुध्द देशी गाय का घी और नारियल के तेल नाभी में डालें और नाभी के आसपास डेढ ईंच गोलाई में फैला देवें।
2. घुटने के दर्द में उपाय
सोने से पहले तीन से सात बूंद अरंडी का तेल नाभी में डालें और उसके आसपास डेढ ईंच में फैला देवें।
3. शरीर में कमपन्न तथा जोड़ोँ में दर्द और शुष्क त्वचा के लिए उपाय :-
रात को सोने से पहले तीन से सात बूंद राई या सरसों कि तेल नाभी में डालें और उसके चारों ओर डेढ ईंच में फैला देवें।
4. मुँह और गाल पर होने वाले पिम्पल के लिए उपाय:-
नीम का तेल तीन से सात बूंद नाभी में उपरोक्त तरीके से डालें।
नाभी में तेल डालने का कारण
हमारी नाभी को मालूम रहता है कि हमारी कौनसी रक्तवाहिनी सूख रही है,इसलिए वो उसी धमनी में तेल का प्रवाह कर देती है।
जब बालक छोटा होता है और उसका पेट दुखता है तब हम हिंग और पानी या तैल का मिश्रण उसके पेट और नाभी के आसपास लगाते थे और उसका दर्द तुरंत गायब हो जाता था।बस यही काम है तेल का।
अपने स्नेहीजनों, मित्रों और परिजनों में इस नाभी में तेल और घी डालने के उपयोग और फायदों को शेयर करिये।
करने से होता है , केवल पढ़ने से नहीं,,,,

आयुर्वेद में प्राकृतिक चिकित्सा का महत्व...आयुर्वेद के अनुसार किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं...1. वात:- शरीर...
25/12/2025

आयुर्वेद में प्राकृतिक चिकित्सा का महत्व...

आयुर्वेद के अनुसार किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं...

1. वात:- शरीर में गैस बनना।
2. पित्त:- शरीर की गर्मी बढ़ना।
3. कफ:- शरीर में बलगम बनना।

अब निवारण भी जान लें..!

नोट:-
किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।

(1). वात होने का कारण -
गलत भोजन, बेसन, मैदा, बारीक आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
आलसी जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
इन सभी कारणों से पेट में कब्ज (गंदी वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां दर्द होता है। यही दर्द वात दोष कहलाता है।

(2). पित्त होने का कारण -
पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से गलत आहार है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।
नशीली चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।
दूषित भोजन तथा केवल पके हुए भोजन का सेवन करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।
भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है।

(3). कफ होने का कारण -
तेल, मक्खन तथा घी आदि चिकनाई वाली चीजों को हजम करने के लिए बहुत अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में चिकनाई वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
रात के समय में दूध या दही का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।

वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-

वात के कारण होने वाले रोग -
अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।

पित्त के कारण होने वाले रोग -
पेट, छाती, शरीर आदि में जलन होना, खट्टी डकारें आना, पित्ती उछलना (एलर्जी), रक्ताल्पता (खून की कमी), चर्म रोग (खुजली, फोड़े तथा फुन्सियां आदि), कुष्ठरोग, जिगर के रोग, तिल्ली की वृद्धि हो जाना, शरीर में कमजोरी आना, गुर्दे तथा हृदय के रोग आदि।

कफ के कारण होने वाले रोग -
बार-बार बलगम निकलना, सर्दी लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (खांसी, दमा आदि), शरीर का फूलना, मोटापा बढ़ना, जुकाम होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।

वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

आहार चिकित्सा-
■ वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में रेशेदार भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।

■ मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

■ रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

उपवास -
वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।

पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

आहार चिकित्सा
■ पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।

■ पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

■ रोगी व्यक्ति को पूरी तरह स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।

■ पित्त रोग से पीड़ित रोगी को खट्टी, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।

■ पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना बहुत ही लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।

हमारे बुजर्ग वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे। अब हमें थक हार कर वापिस उनकी ही राह पर आना पड़ रहा है।1. मिट्टी के बर्तनों से ...
24/12/2025

हमारे बुजर्ग वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे। अब हमें थक हार कर वापिस उनकी ही राह पर आना पड़ रहा है।
1. मिट्टी के बर्तनों से स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों तक और फिर कैंसर के खौफ से दोबारा मिट्टी के बर्तनों तक आ जाना।
2. अंगूठा छाप से दस्तखतों (Signatures) पर और फिर अंगूठा छाप (Thumb Scanning) पर आ जाना।
3. फटे हुए सादा कपड़ों से साफ सुथरे और प्रेस किए कपड़ों पर और फिर फैशन के नाम पर अपनी पैंटें फाड़ लेना।
4. सूती से टैरीलीन, टैरीकॉट और फिर वापस सूती पर आ जाना।
5. ज्यादा मशक़्क़त वाली ज़िंदगी से घबरा कर पढ़ना लिखना और फिर IIM MBA करके आर्गेनिक खेती पर पसीने बहाना।
6. क़ुदरती से प्रोसेसफ़ूड (Canned Food & packed juices) पर और फिर बीमारियों से बचने के लिए दोबारा क़ुदरती खानों पर आ जाना।
7. पुरानी और सादा चीज़ें इस्तेमाल ना करके ब्रांडेड (Branded) पर और फिर आखिरकार जी भर जाने पर पुरानी (Antiques) पर उतरना।
8. बच्चों को इंफेक्शन से डराकर मिट्टी में खेलने से रोकना और फिर घर में बंद करके फिसड्डी बनाना और होश आने पर दोबारा Immunity बढ़ाने के नाम पर मिट्टी से खिलाना।
9. गाँव, जंगल से डिस्को पब और चकाचौंध की और भागती हुई दुनियाँ की और से फिर मन की शाँति एवं स्वास्थ के लिये शहर से जँगल गाँव की ओर आना।
इससे ये निष्कर्ष निकलता है कि टेक्नॉलॉजी ने जो दिया उससे बेहतर तो प्रकृति ने पहले से दे रखा था

झूठा इतिहास लिखा कि मुगल शाहजहां ने 1638 में लाल किला का निर्माण आरंभ किया, किंतु ऑक्सफोर्ड संग्रहालय, लंदन में 1628 की ...
24/12/2025

झूठा इतिहास लिखा कि मुगल शाहजहां ने 1638 में लाल किला का निर्माण आरंभ किया, किंतु ऑक्सफोर्ड संग्रहालय, लंदन में 1628 की एक पेटिंग है जिसमें वह लालकिले में विदेशी राजदूत से भेंट कर रहा है।
तब "1628" में वह उसके भीतर कैसे आया?
वास्तव में यह महाराजा अनंगपाल तोमर का 12वीं सदी का महल था।
क्या आपने सोचा है मुगल कैसे बनवा देंगे लाल किला, वे तो अपने आप को उज़्बेकिस्तान और सऊदी अरब के मानते हैं और उनके पूर्वज (सऊदी अरब) उज़्बेकिस्तान के थे, वे आज तक उनके देश सऊदी अरब और उज़्बेकिस्तान में ऐसा वास्तुकला का कोई किला और महल क्यों नहीं बना?
यह सच है कि लाल किला अर्जुन के वंशजों का बनवाया हुआ है।
वामपंथी अभी तक भारत के देश के लोगों को गुमराह कर रहे है, भारत के अंदर मुगल मुसलमान कुछ भी नहीं बनाए सब हिंदुओं के मंदिर महल तोड़ के बनाए गए है।
सच यही है, आप मानो या न मानो।

1️⃣ पहले समझिए पूरा मामला : अरावली केस क्या है?अरावली पर्वतमाला से जुड़ा मामला कई वर्षों से उच्चतम न्यायालय में विचाराधी...
22/12/2025

1️⃣ पहले समझिए पूरा मामला : अरावली केस क्या है?

अरावली पर्वतमाला से जुड़ा मामला कई वर्षों से उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, जिसका मूल प्रश्न यह रहा है कि “अरावली पहाड़ियाँ आखिर हैं क्या और उन्हें कैसे परिभाषित किया जाए?”

इस मुद्दे पर अलग-अलग राज्यों में अलग परिभाषाएँ लागू थीं, जिससे खनन, निर्माण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर भ्रम बना हुआ था।

हालिया सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया, जिसके अनुसार—

जिस भू-भाग की ऊँचाई आसपास के सामान्य धरातल से कम से कम 100 मीटर अधिक है, वही अरावली हिल मानी जाएगी।

यदि ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में हों, तो उन्हें अरावली रेंज कहा जाएगा।

सरकार का तर्क है कि इससे पूरे देश में एक समान और स्पष्ट परिभाषा लागू होगी।

हालाँकि, इसी बिंदु पर विवाद शुरू होता है, क्योंकि अरावली केवल ऊँचाई नहीं, बल्कि एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र है।

2️⃣ अब समझिए नुकसान : राजस्थान को क्या हानि होगी?

उपलब्ध सरकारी और तकनीकी अध्ययनों के अनुसार राजस्थान में मौजूद अरावली पहाड़ियों में से लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ 100 मीटर की ऊँचाई की शर्त पूरी नहीं करतीं।

इसका सीधा अर्थ यह है कि—

👉 राजस्थान की केवल 8–10% पहाड़ियाँ ही “अरावली” की कानूनी परिभाषा में आएँगी
👉 करीब 90% पहाड़ियाँ संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकती हैं

यह तथ्य इसलिए बेहद गंभीर है क्योंकि—

अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में ही स्थित है।

ये छोटी और मध्यम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ ही—

वर्षा जल को रोकती हैं
भूजल पुनर्भरण करती हैं
धूल भरी आँधियों को रोकती हैं
थार रेगिस्तान के फैलाव में बाधा बनती हैं

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ये पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हुईं, तो—

अलवर, जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनूं, उदयपुर, राजसमंद जैसे जिलों में—

🔸भूजल स्तर और गिरेगा
🔸सूखे की तीव्रता बढ़ेगी
🔸खनन और अनियंत्रित निर्माण को बढ़ावा मिलेगा

राजस्थान पहले ही जल-संकटग्रस्त राज्य है। ऐसे में अरावली का कमजोर होना केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संकट को जन्म देगा।

3️⃣ अब सवाल समाज से : जनता क्यों जागे?

अब यह समझना ज़रूरी है कि यह लड़ाई केवल अदालत या सरकार की नहीं है— यह लड़ाई समाज की है।

आज यदि अरावली कागज़ों से मिटाई जा रही है, तो कल—

🔹किसान के खेत सूखेंगे
🔹शहरों में पानी महँगा होगा
🔹बच्चों को प्रदूषित हवा विरासत में मिलेगी

सबसे खतरनाक बात यह है कि अरावली का नुकसान वापस सुधरने वाला नहीं है।

एक बार पहाड़ कटे, जलधाराएँ टूटीं और जंगल नष्ट हुए—तो उन्हें वापस लाने में सदियाँ लगती हैं।

इसलिए अब चुप रहना तटस्थता नहीं, भविष्य के खिलाफ खड़ा होना है।

जनता को सवाल पूछने होंगे—

क्या विकास का मतलब प्रकृति को खत्म करना है?
क्या हमारे बच्चों का हक आज के मुनाफे से कम है?

अरावली बचाओ, क्योंकि यह सिर्फ पहाड़ नहीं—जीवनरेखा है।
अगर अरावली बचेगी, तभी राजस्थान बचेगा।
अगर आज आवाज़ उठी, तभी कल सुरक्षित होगा।

जन-जागरूकता संदेश

"अरावली सिर्फ पत्थर के पहाड़ नहीं, यह वो कुदरती दीवार है जो थार रेगिस्तान को हमारे शहरों और खेतों तक पहुँचने से रोकती है...
19/12/2025

"अरावली सिर्फ पत्थर के पहाड़ नहीं, यह वो कुदरती दीवार है जो थार रेगिस्तान को हमारे शहरों और खेतों तक पहुँचने से रोकती है। जिस दिन यह दीवार गिर गई, हमारा हरा-भरा कल रेत में दफन हो जाएगा। जागिये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।"
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🔹सर्दियों के लिए बल व पुष्टि का खजाना🔹🔸रात को भिगोयी हुई १ चम्मच उड़द की डाल सुबह महीन पीसकर उसमें २ चम्मच शुद्ध शहद मिला...
17/12/2025

🔹सर्दियों के लिए बल व पुष्टि का खजाना🔹

🔸रात को भिगोयी हुई १ चम्मच उड़द की डाल सुबह महीन पीसकर उसमें २ चम्मच शुद्ध शहद मिला के चाटें । १ - १.३० घंटे बाद मिश्रीयुक्त दूध पियें । पूरी सर्दी यह प्रयोग करने से शरीर बलिष्ठ और सुडौल बनता है तथा वीर्य की वृद्धि होती है ।

🔸दूध के साथ शतावरी का २ – ३ ग्राम चूर्ण लेने से दुबले-पतले व्यक्ति, विशेषत: महिलाएँ कुछ ही दिनों में पुष्ट जो जाती हैं । यह चूर्ण स्नायु संस्थान को भी शक्ति देता हैं ।

🔸रात को भिगोयी हुई ५ – ७ खजूर सुबह खाकर दूध पीना या सिंघाड़े का देशी घी में बना हलवा खाना शरीर के लिए पुष्टिकारक है ।

🔸रोज रात को सोते समय भुनी हुई सौंफ खाकर पानी पीने से दिमाग तथा आँखों की कमजोरी में लाभ होता है ।

🔸आँवला चूर्ण, घी तथा शहद समान मात्रा में मिलाकर रख लें । रोज सुबह एक चम्मच खाने से शरीर के बल, नेत्रज्योति, वीर्य तथा कांति में वृद्धि होती है ।हड्डियाँ मजबूत बनती हैं ।

🔸१०० ग्राम अश्वगंधा चूर्ण को २० ग्राम घी में मिलाकर मिट्टी के पात्र में रख दें । सुबह ३ ग्राम चूर्ण दूध के साथ नियमित लेने से कुछ ही दिनों में बल-वीर्य की वृद्धि होकर शरीर हृष्ट-पुष्ट बनता है ।

🔸शक्तिवर्धक खीर : ३ चम्मच गेहूँ का दलिया व २ चम्मच खसखस रात को पानी में भिगो दें । प्रात: इसमें दूध और मिश्री डालकर पकायें । आवश्यकता अनुसार मात्रा घटा-बढ़ा सकते हैं । यह खीर शक्तिवर्धक है ।

🔸हड्डी जोडनेवाला हलवा : गेहूँ के आटे में गुड व ५ ग्राम बला चूर्ण डाल के बनाया गया हलवा (शीरा) खाने से टूटी हुई हड्डी शीघ्र जुड़ जाति है । दर्द में भी आराम होता है ।

🔸सर्दियों में हरी अथवा सुखी मेथी का सेवन करने से शरीर के ८० प्रकार के वायु-रोगों में लाभ होता है ।

🔸सब प्रकार के उदर-रोगों में मठ्ठे और देशी गाय के मूत्र का सेवन अति लाभदायक है । (गोमूत्र न मिल पाये तो गोझरण अर्क का उपयोग कर सकते हैं ।)

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श्री राजीव दीक्षित जी

पिछले ५०० सालो में राजीव दीक्षित जैसा कोई आदमी भारत में पैदा ही नहीं हुआ तो मै भी सोच में पड गया और मै उनकी इन बातों का कारन जानने के लिए हर पहलू पर विचार किया तो पाया की वास्तविकता यही है की राजीव भाई में इतनी शक्ति होते हुए भी उनकी नैतिकता का कोई शानी नहीं है.

स्वदेशी अपनाएं, स्वावलम्बी बनें।