05/04/2026
👉सत्त्व, रज और तम: भारतीय दर्शन में व्यक्तित्व का मनोवैज्ञानिक आधार👇
✍️ गुणों के संतुलन से व्यक्तित्व, व्यवहार और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा
लेखक: डॉ. शिवाजी कुमार
भारतीय दर्शन और साहित्य में मानव व्यक्तित्व को समझने के लिए एक अत्यंत गहन और वैज्ञानिक अवधारणा प्रस्तुत की गई है, जिसे सत्त्व, रज और तम तीन गुणों के रूप में जाना जाता है। ये गुण न केवल व्यक्ति के व्यवहार और मानसिक स्थिति को प्रभावित करते हैं, बल्कि उसके जीवन के उद्देश्य, निर्णय क्षमता और आध्यात्मिक विकास को भी दिशा प्रदान करते हैं। महाकाव्य महाभारत के अश्वमेध पर्व में विशेष रूप से इन गुणों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
तमोगुणी व्यक्ति के लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति में अज्ञान, मोह और विवेक का अभाव होता है। वह अपने कर्तव्यों का सही निर्णय नहीं कर पाता और जीवन में निराशा, भय, लोभ तथा शोक से ग्रसित रहता है। उसमें अच्छे और बुरे का भेद करने की क्षमता नहीं होती, जिसके कारण वह हिंसा, अनैतिकता और दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है। आलस्य और अज्ञान के कारण उसका शरीर और मन दोनों जड़ता की ओर अग्रसर होते हैं। वह कार्य और अकर्म में अंतर नहीं समझ पाता तथा अज्ञान को ही ज्ञान मान बैठता है।
संस्कृत में तमोगुण का स्वरूप इस प्रकार वर्णित है—
तमोगुणी पुरुषः मोहग्रस्तः, अज्ञानयुक्तः, निर्णयहीनः च भवति। सः भय, लोभ, शोकादिभिः पीडितः भवति। तस्य विवेकशक्तिः नास्ति, अतः सः अधर्मे प्रवर्तते। आलस्येन शरीरं गुरुत्वं गच्छति, मनश्च जडतां प्राप्नोति।
तमोगुण के अंतर्गत अविद्या, मोह, महामोह, क्रोध और अंधकारमय प्रवृत्तियाँ प्रमुख मानी गई हैं। ये सभी व्यक्ति को अधोगति की ओर ले जाती हैं और उसके विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं।
इसके विपरीत रजोगुणी व्यक्ति अत्यंत सक्रिय, ऊर्जावान और कर्मशील होता है, किंतु उसकी प्रवृत्ति अधिकतर भौतिक सुखों और इच्छाओं की पूर्ति की ओर होती है। उसमें अहंकार, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और असंतोष की भावना प्रबल होती है। वह निरंतर क्रियाशील रहता है, परंतु उसके कार्यों के पीछे स्वार्थ और तृष्णा का प्रभाव रहता है। वह दूसरों में दोष देखने, विवाद करने और अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में लगा रहता है।
रजोगुण का संस्कृत में स्वरूप इस प्रकार है—
रजोगुणी पुरुषः क्रियाशीलः, स्पर्धालुः, तृष्णायुक्तः च भवति। तस्य मनः नित्यम् अशान्तं भवति। सः अहंकारेण, ईर्ष्यया, लोभेन च प्रभावितः भवति। सः कर्मसु प्रवृत्तः भवति, किन्तु तेषां फलम् क्षणिकसुखदं, अन्ते दुःखप्रदं भवति।
रजोगुण के अंतर्गत रोष, माया, दंभ, दर्प, राग, विषय-प्रेम, वाद-विवाद तथा भोग-विलास की प्रवृत्तियाँ सम्मिलित हैं। ऐसे व्यक्ति वर्तमान, भूत और भविष्य की चिंताओं में उलझा रहता है और धर्म, अर्थ तथा काम के चक्र में निरंतर गतिशील रहता है।
सत्त्वगुण को इन दोनों से श्रेष्ठ माना गया है। सत्त्वगुणी व्यक्ति शांत, संतुलित, प्रसन्नचित्त और विवेकशील होता है। उसमें सत्य, अहिंसा, क्षमा, धैर्य, संतोष और करुणा जैसे गुण होते हैं। वह न केवल स्वयं के विकास पर ध्यान देता है, बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी कार्य करता है। उसकी दृष्टि निष्पक्ष होती है और वह किसी में दोष नहीं खोजता।
संस्कृत में सत्त्वगुण का वर्णन इस प्रकार किया गया है—
सत्त्वगुणी पुरुषः आनन्दितः, प्रसन्नचित्तः, धीरः, क्षमाशीलः च भवति। सः सत्यप्रियः, अहिंसकः, समदर्शी च भवति। तस्य कर्माणि निष्कामभावेन भवन्ति, ये भगवत्प्राप्तये सहायकाः भवन्ति।
सत्त्वगुण में निहित शुद्धता, प्रकाश और संतुलन व्यक्ति को उच्चतम स्तर की चेतना और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति के कार्यों में स्वार्थ या आसक्ति नहीं होती, बल्कि वे कर्तव्य और धर्म के आधार पर किए जाते हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि सत्त्व, रज और तम गुण किसी भी व्यक्ति में अलग-अलग रूप में नहीं पाए जाते, बल्कि ये तीनों गुण एक साथ मिश्रित रूप में उपस्थित होते हैं। जिस गुण की प्रधानता होती है, उसी के आधार पर व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारित होता है। इस प्रकार गुणों की न्यूनता और अधिकता ही व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार और चरित्र का निर्माण करती है।
इन तीनों गुणों से परे जो अवस्था होती है, उसे गुणातीत अवस्था कहा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में गुणातीत व्यक्ति के लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख, मान-अपमान, प्रिय-अप्रिय में समान रहता है और उसकी चेतना स्थिर एवं संतुलित होती है—
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।
अतः यह स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन में सत्त्व, रज और तम केवल दार्शनिक अवधारणाएँ नहीं हैं, बल्कि ये मानव व्यवहार, व्यक्तित्व विकास और आध्यात्मिक उन्नति के मूल आधार हैं। यदि व्यक्ति सत्त्वगुण की वृद्धि और रज-तम के संतुलन की दिशा में प्रयास करे, तो वह एक संतुलित, सफल और सार्थक जीवन प्राप्त कर सकता है।
लेखक
डॉ. शिवाजी कुमार
(मनोवैज्ञानिक एवं विशेष शिक्षा विशेषज्ञ)