Homoeopathic & Ayurvedic Lifecare Treatment

Homoeopathic & Ayurvedic Lifecare Treatment homeopathic medince

ab apko koi bhi problem nahi hogi..homoeopathic medicine se apki body ki sari taklif dur hogi vo bhi bina koi side effects ke.bataiye apko kya problem hai ?

14/09/2024

10 बेस्ट इनडोर प्लांट जिन्हें हम घर में बहुत आसानी से लगा सकते हैं।

1. मनीप्लांट (Pothos):- इस पौधे को वास्तुशास्त्र में धन एवं समृद्धि लाने वाला पौधा माना जाता हैं। यह मिट्टी और पानी दोनों में ही बहुत आसानी से ग्रो हो जाता हैं। मनीप्लांट को अगर घर के अंदर लगा रखा हैं तो खिड़की या दरवाजों के पास रखे। मनीप्लांट को पानी देने से पहले मिट्टी की जांच करें, मिट्टी सूखने पर ही पानी दें। ज्यादा पानी देने से जड़ें गल सकती हैं और पौधा सूख सकता हैं। मनी प्लांट को हरा-भरा रखने के लिए हर 2-3 महीने में एक-दो मुट्ठी वर्मीकम्पोस्ट या गोबर की खाद जरूर डालें। मनीप्लांट की पत्तियां अगर पीली पड़ रही हैं या गिर रही हैं, तो इसका मतलब हैं कि उसे नमी की जरूरत हैं। मनीप्लांट की पत्तियां अगर मुड़ रही हैं, तो यह कीट या फंगस या बीमारी की वजह से हो सकता हैं इससे बचाव के लिए नीम-ऑयल या फंगीसाइड का इस्तेमाल करें। मनीप्लांट को दक्षिण-पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता हैं।

2. एरिका पॉम (Areca palm):- यह घरों में सबसे ज्यादा लगाये जाने वाला पौधा हैं। इसे इनडोर-आउडडोर दोनों जगह लगा सकते हैं। इस प्लांट को ऐसे जगह लगाएं जहां 4-5 घंटे की इनडायरेक्ट सनलाइट मिले। अगर घर के अंदर लगा रखा हैं तो खिड़की-दरवाजों, बालकनी या सीढियों के पास रखें जहां हल्की-फुल्की सनलाइट मिलती रहें। एरिका पाॅम को कभी भी तेज धूप वाली जगह पर ना लगाएं, तेज धूप से इसकी पत्तियाँ जलकर पीली हो जाती हैं और पौधा खराब हो जाता हैं। एरिका पाम को अच्छी जल-निकासी वाली मिट्टी में लगाएं। 2-3 महीने में एक बार वर्मीकम्पोस्ट या गोबर की खाद जरूर डाले। इसके साथ 1 चम्मच एप्सम सॉल्ट को 2 लीटर पानी में मिलाकर पौधे पर स्प्रे करने से इस पत्तियाँ हमेशा हरी-भरी रहती हैं।

3. रबर प्लांट (Rubber plant):- यह एक बेस्ट इनडोर प्लांट हैं। यह हवा में मौजूद हानिकारक गैसों को सोख लेता हैं और बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ता हैं। इस प्लांट को बहुत कम पानी की आवश्यकता होती हैं। यह बिना पानी के कई दिनों तक बहुत आसानी से सर्वाइव कर लेता हैं। इसे इनडोर और सेमी-शेड वाली जगह पर रख सकते हैं, लेकिन सीधी धूप से पौधे को बचा के रखें। लो-मेंटेनेंस और बेस्ट एयर प्यूरीफायर प्लांट होने के कारण इसे ज्यादातर घर के अंदर लिविंग रूम, हाॅल आदि जगहों पर बहुत आसानी से रखा जा सकता हैं।

4. सिंगोनियम (Syngonium):- यह भी एक बेस्ट इनडोर प्लांट हैं। यह बहुत सारे कलर और वैरायटी में आते हैं। सिंगोनियम को सीधी धूप से बचाएं, इससे पत्तियां झुलस सकती हैं। सिंगोनियम प्लांट को हल्की नम मिट्टी पसंद हैं। पानी देने से पहले मिट्टी के ऊपरी भाग को सूखने दें। सर्दियों में इसे बहुत कम पानी दें। सिंगोनियम प्लांट को कटिंग से लगाने का सबसे अच्छा समय वसंत या बरसात का महीना हैं। हर 1-2 महीने पर पौधे में पत्तियों की खाद या गोबर की खाद जरूर दें।

5. लकी बम्बू (Lucky Bamboo):- वास्तुशास्त्र में इस पौधे का बहुत महत्व हैं। यह मिट्टी और पानी में बहुत आसानी से ग्रो हो जाता हैं। इस प्लांट को घर के अन्दर लगा रखा हैं तो खिड़की या दरवाजों के पास रखें, जहां इनडायरेक्ट सनलाइट और हवा मिल सके। अगर लकी बम्बू को पानी में लगा रखा हैं, तो पानी को हर 5 से 7 दिन पर बदलते रहे। लकी बम्बू को फिल्टर का पानी, बारिश का पानी या बोतलबंद पानी दें, इसमें क्लोरीन या फ्लोराइड जैसे रसायन नहीं होने चाहिए, जिससे पौधे हरा-भरा बना रहता हैं। अगर घर में एक्‍वेरियम प्‍लांट फूड मौजूद हैं तो इस प्लांट में जरूर डालें। पौधे को सपोर्ट के लिए चिकने पत्थरों को भी डाल सकते हैं। लकी बम्बू को हमेशा कांच के कंटेनर में रखें।

6. जी जी प्लांट ( ZZ plant):- अगर आपके घर में बहुत कम धूप आती हैं और आप पौधा लगाना चाहते हैं तो ZZ प्लांट को जरूर लगाये। यह प्लांट कम रोशनी में भी अच्छे से ग्रो करता हैं। इस प्लांट को बहुत कम पानी की जरूरत होती हैं। लो-मेंटेनेंस प्लांट होने के कारण इसे आप घर के अंदर बेडरूम में भी रख सकते हैं।

7. डाइफेनबैचिया (Dieffenbachia ):- इस प्लांट को ज्यादा धूप या प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती हैं। तेज धूप से इसकी पत्तियाँ जला सकती हैं। डाइफेनबैचिया को हल्की नमी पसंद होती हैं, लेकिन ज्यादा पानी देने से इसकी जड़े सड़ सकती हैं। डाइफेनबैचिया को अच्छी जल-निकासी वाली मिट्टी में लगाएं। इसकी पीली पत्तियों को समय-समय पर काटकर हटाते रहें। डाइफेनबैचिया की बड़ी पत्तियों पर धूल और कण आसानी से जमा हो जाते हैं, उन्हें हर महीने नम कपड़े से पोंछकर साफ करते रहें।

8. एलोवेरा/ घृतकुमारी (Aloe vera):- यह एक औषधीय गुणों वाला पौधा हैं, इसका उपयोग पेट की बीमारी और स्कीन केयर में किया जाता हैं। इस पौधे को ज्यादा धूप या पानी की आवश्यकता नहीं होती हैं। एलोवेरा के पौधे में पानी तभी डाले, जब इसके गमले की मिट्टी सूखी दिखे। इनता ही नहीं अगर आप एलोवेरा में ज्यादा पानी डालते हैं, तो पौधा खराब भी हो सकता हैं। इस प्लांट में नीचे से जो छोटे-छोटे पौधे निकलते रहते हैं, उनको अलग करके दूसरे गमलों में लगा दें। एक गमले में 2-3 पौधे से ज्यादा नहीं रखें। इससे एलोवेरा की ग्रोथ अच्छी होगी और पत्ते बड़े और लंबे बनते हैं।

9. एग्लोनिमा (Aglaonema):- यह नासा अप्रूव्ड बेस्ट एयर प्यूरीफायर प्लांट में से एक हैं। इसकी पत्तियां देखने में काफी खूबसूरत होती हैं, एग्लोनिमा प्लांट को समान रूप से हल्की नम मिट्टी पसंद हैं। इस पौधे को इनडायरेक्ट सनलाइट में रखें, सीधी तेज धूप में रहने से पत्तियां झुलस सकती हैं। एग्लोनिमा प्लांट को पानी देने से पहले मिट्टी की नमी की जांच करें, मिट्टी के सूख जाने पर ही पौधे को पानी दें। अधिक पानी देने से इसकी जड़े सड़ सकती हैं। एग्लोनिमा प्लांट को अच्छी जल-निकासी वाली मिट्टी में लगाए। मिट्टी में रेत(बालू) या परलाइट मिलाने से जल निकासी क्षमता बढ़ जाती हैं। एग्लोनिमा प्लांट को एसी वाले कमरे में बिल्कुल भी ना रखें। ठंडी हवा से पौधे को झटका लग सकता हैं और वह मर भी सकता हैं। अगर एग्लोनिमा प्लांट के पत्ते भूरे रंग के हो रहे हैं, तो इसकी वजह अधिक पानी, कम पानी, कीटों का संक्रमण, बीमारी या पर्यावरणीय तनाव हो सकता हैं।

10. स्नेक प्लांट (Sansevieria):- यह प्लांट देखने में सांप जैसा लगता हैं। इस पौधे को आप घर के बाहर या घर के अंदर कही भी लगा सकते हैं। इन्हें न ज्यादा धूप की जरूरत होती हैं और न ही ज्यादा पानी की। यह बिना पानी के कई हफ्तों तक सर्वाइव कर लेते हैं। बेहद कम मेंटेनेंस वाला यह पौधा आपके कमरे की हवा को भी शुद्ध करता हैं।

21/05/2024

*🌤लू लगने से मृत्यु क्यों होती है ? हम सभी धूप में घूमते हैं फिर कुछ लोगों की ही धूप में जाने के कारण अचानक मृत्यु क्यों हो जाती है?*
👉 हमारे शरीर का तापमान हमेशा 37° डिग्री सेल्सियस होता है, इस तापमान पर ही हमारे शरीर के सभी अंग सही तरीके से काम कर पाते है ।
👉 पसीने के रूप में पानी बाहर निकालकर शरीर 37° सेल्सियस टेम्प्रेचर मेंटेन रखता है, लगातार पसीना निकलते वक्त भी पानी पीते रहना अत्यंत जरुरी और आवश्यक है ।
👉 पानी शरीर में इसके अलावा भी बहुत कार्य करता है, जिससे शरीर में पानी की कमी होने पर शरीर पसीने के रूप में पानी बाहर निकालना टालता है (बंद कर देता है )।
👉 जब बाहर का टेम्प्रेचर 45° डिग्री के पार हो जाता है और शरीर की कूलिंग व्यवस्था ठप्प हो जाती है, तब शरीर का तापमान 37° डिग्री से ऊपर पहुँचने लगता है ।
👉 शरीर का तापमान जब 42° सेल्सियस तक पहुँच जाता है तब रक्त गरम होने लगता है और रक्त में उपस्थित प्रोटीन पकने लगता है।
👉 स्नायु कड़क होने लगते हैं इस दौरान सांस लेने के लिए जरुरी स्नायु भी काम करना बंद कर देते हैं।
👉 शरीर का पानी कम हो जाने से रक्त गाढ़ा होने लगता है, ब्लडप्रेशर low हो जाता है, महत्वपूर्ण अंग (विशेषतः ब्रेन) तक ब्लड सप्लाई रुक जाती है ।
👉 व्यक्ति कोमा में चला जाता है और उसके शरीर के एक-एक अंग कुछ ही क्षणों में काम करना बंद कर देते हैं, और उसकी मृत्यु हो जाती है ।
👉गर्मी के दिनों में ऐसे अनर्थ टालने के लिए लगातार थोड़ा-2 पानी पीते रहना चाहिए और हमारे शरीर का तापमान 37° मेन्टेन किस तरह रह पायेगा इस ओर ध्यान देना चाहिए ।

*Equinox Phenomenon: इक्विनॉक्स प्रभाव आने वाले दिनों में भारत को प्रभावित करेगा। ये प्रभाव भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर सूर्य चमकने के कारण पैदा होता है। हीट वेव कोई मजाक नही है । एक बिना प्रयोग की हुई मोमबत्ती को कमरे से बाहर या खुले मे रखें, यदि मोमबत्ती पिघल जाती है तो ये गंभीर स्थिति है। जनहित में इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित कर अपना और अपने जानकार लोगों का भला करें।*

👉12 से 3 बजे के बीच घर, कमरे या ऑफिस के अंदर रहने का प्रयास करें ।
👉 तापमान 40 डिग्री के आस पास विचलन की अवस्था मे रहेगा ।
👉 यह परिवर्तन शरीर मे निर्जलीकरण और सूर्यातप की स्थिति उत्पन्न कर देगा ।
👉 स्वयं को और अपने जानने वालों को पानी की कमी से ग्रसित न होने दें ।
👉 किसी भी अवस्था में कम से कम 3 लीटर पानी जरूर पियें । किडनी की बीमारी वाले प्रति दिन कम से कम2.5 से 3.5लीटर पानी जरूर लें ।
👉 जहां तक सम्भव हो ब्लड प्रेशर पर नजर रखें । किसी को भी हीट स्ट्रोक हो सकता है ।
👉 ठंडे पानी से नहाएं । इन दिनों मांस का प्रयोग छोड़ दें या कम से कम करें ।
👉 फल और सब्जियों को भोजन मे ज्यादा स्थान दें।
👉 शयन कक्ष और अन्य कमरों मे 2 आधे पानी से भरे ऊपर से खुले पात्रों को रख कर कमरे की नमी बरकरार रखी जा सकती है।
👉 अपने होठों और आँखों को नम रखने का प्रयत्न करें।

19/08/2019

*🌹🌻टाइफाइड बुखार🌻🌹*

इसे मियादी बुखार, मोतीझरा तथा आंत्रज्वर भी कहा जाता है, आंतों में सूजन आ जाती है लिवर काम करना बंद कर देता है।
इस रोग में छाती पर महीन मोतियों जैसे चमकदार दाने उभर आते हैं, जो लेंस से दिखाई देते हैं।
*इस रोग के लिए ऐलोपैथी में कोई नियमित उपचार नही होता केवल एंटीबायोटिक्स और पैरासिटामोल से बुखार उतारने का प्रयास किया जाता है।*
सबसे खतरनाक बात ये होती है कि टाइफाइड बुखार के बाद रोगी का शारीरिक विकास रुक जाता है।

गिलोय सत् 10 ग्राम
गोदन्ती भष्मे 10 ग्राम
अभ्रक भष्म 5 ग्राम
स्वर्ण माक्षिक भष्म 5 ग्राम
स्वर्ण बसंत मालती रस 1 ग्राम

मिला कर 40 पुड़िया बनाएं, एक एक पुड़िया सुबह शाम शहद से दें।

रोटी-चावल, बिस्कुट, ब्रेड आदि भोजन पूरी तरह बन्द रहेगा, केवल फल, दूध देना है।

*अचूक उपचार*

2 ग्राम बनारसी राई
7 पीस मुनक्का
2 पीस अंजीर

तीनो को पत्थर पर चटनी की तरह पीस कर मरीज को सुबह दोपहर शाम चटा दें।

*(बनारसी राई को ख़ूबकला के नाम से भी जानते हैं।)*

गिलोय घनवटी 2 गोली
ज्वर नाशक वटी 1 गोली

सुबह दोपहर शाम खिलाएं।

3 से 5 दिन में टाइफाइड पूर्णतया ठीक हो जाएगा।

*परहेज:*
मरीज को अन्न (रोटी, चावल) बिल्कुल नही देना है।
सेब, पपीता, मूंग दाल का पानी, दूध देना है।

*विशेष सावधानी*: आमतौर पर देखा गया है कि कम उम्र के बच्चों को टाइफाइड में एंटीबायोटिक्स देने से डाइबिटीज़ रोग हो जाता है, क्योंकि ये सीधे पेनक्रियाज पर दुष्प्रभाव डालती हैं। इसलिए इस बीमारी में एंटीबायोटिक्स का प्रयोग न् करें।

01/05/2018

उल्टी और दस्त के घरेलु उपचार

घर के किसी भी छोटे बड़े सदस्य को उल्टी एवँ दस्त किसी भी वजह से हो सकते हैं जिनमें से बदहजमी सबसे मुख्य है। कभी-कभी सर्दी या गर्मी लगने, दूषित खानपान से भी उल्टी और दस्त की समस्या हो जाती है ।

* उल्टी होने पर नीँबू का रस पानी में घोल कर लेने से शीघ्र ही फायदा होता है ।

* आप एक दो लौंग, दालचीनी या इलायची मुहँ में रखकर चूसिये यह मसाले उल्टियाँ विरोधक औषधियों होने के कारण उल्टियाँ रोकने में बहुत ही मददगार साबित होते है।

* तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस शहद के साथ लेने से उल्टी में लाभ मिलता है ।

* एक चम्मच प्याज का रस पीने से भी उल्टी में लाभ मिलता है ।

* गर्मियों में यदि बार बार उल्टियाँ आती है तो बर्फ चूसनी चाहिए ।

* पुदीने के रस को लेने से भी उल्टी में लाभ मिलता है ।

* धनिये के पत्तों और अनार के रस को थोड़ी थोड़ी देर के बाद बारी-बारी से पीने से भी उल्टी रुक जाती है ।

* 1/4 चम्मच सोंठ एक चम्मच शहद के साथ लेने से उल्टी में शीघ्र आराम मिलता है ।

* नींबू का टुकड़ा काले नमक के साथ अपने मुंह में रखने से आपको उल्टी महसूस नहीं होती है, रुक जाती है ।

* आधा चम्मच पिसे हुए जीरे का पानी के साथ सेवन करने से उल्टियों से शीघ्र छुटकारा मिलता है ।

* एक गिलास पानी में एक चम्मच एप्पल का सिरका डालकर पियें उल्टी में तुरंत आराम मिलेगा ।

* उल्टियाँ होने से 12 घंटो बाद तक ठोस आहार का सेवन न करें, लेकिन भरपूर मात्रा में पानी और फलों के रस का सेवन करते रहें।

* तैलीय, मसालेदार, भारी और मुश्किल से पचनेवाले खाद्द्य पदार्थों का सेवन न करें इससे भी उल्टियाँ आती है ।

* पित्त की उल्टी होने पर शहद और दालचीनी मिलाकर चाटें ।

* हरर को पीसकर शहद के साथ मिलाकर चाटने से उल्टी बंद होती है|

* खाना खाने के तुरंत बाद न सोयें। खाने के बाद टहलने की आदत डालें । जब भी सोयें तो अपनी दाहिनी बाज़ू पर सोयें। इससे आपके पेट के पदार्थ मुंह तक नहीं आयेंगे ।

* दही, भात, को मिश्री के साथ खाने से दस्त में आराम आता है।

* एक एक चम्मच अदरक , नीबूं का रस काली मिर्च के साथ लेने पर भी दस्त में आराम मिलता है ।

* सौंफ और जीरे को बराबर-बराबर मिला कर भून कर पीस लें । इसे आधा-आधा चम्मच पानी के साथ दिन में तीन बार लेने से दस्तों में फायदा मिलता है ।

* केले, सेब का मुरब्बा और पके केले का सेवन करें दस्त में तुरंत आराम मिलेगा ।

* दस्त आने पर अदरक के टुकड़े को चूसे या अदरक की चाय पियें पेट की मरोड़ भी शांत होती है और दस्त में भी आराम मिलता है ।

* दस्त रोकने के लिए चावल के माड़ में हल्का नमक और काली मिर्च डालकर उसका सेवन करें दस्त रुक जायेंगे ।

* जामुन के पेड़ की पत्तियाँ पीस कर उसमें सेंधा नमक मिला कर 1/4 चम्मच दिन में दो बार लेने से दस्त रुक जाते है ।

* दस्त आने पर दूध और उससे बनी हुई चीजों का सेवन कतई भी ना करें ।

* दस्त आने पर दस्त के साथ शरीर के खनिज वा तरल पदार्थ बाहर निकलते है इनकी कमी पूरी करने के लिए O.R.S का घोल पियें ।

16/11/2017

(ह्रदय को कैसे ठीक रखें )
(डॉ रविन्द्र राठी?)---9896290772
ग्रीन चाय का प्रयोग करें :

इसमें एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो आपके कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं , और ये ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मददगार होते हैं .
इसमें कुछ ऐसे तत्व भी पाए जाते हैं जो कैंसर कोशिकाओं से बढ़ मारते हैं को .
ये असमान्य रक्त के थक्के को भी रोकती है , जिस वजह से ये स्ट्रोक रोकने में भी सहायक है .

जैतून का तेल का प्रयोग करें :

खाना बनाने के लिए जैतून तेल का प्रयोग करें .
इसमें मौजूद वसा बुरा एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होता है .
जैतून का तेल में भी एंटीऑक्सीडेंट होते हैं , जो अन्य कई बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं .

पर्याप्त नीद लें :

खासतौर से 4o साल के ऊपर के व्यक्ति के लिए अच्छी नीद बहुत ज़रूरी है .
पर्याप्त नीद ना लेने पर शरीर से तनाव हार्मोन निकलते हैं , जो धमनियों को ब्लॉक कर देते हैं और जलन पैदा करते हैं .

फाइबर युक्त आहार लें :

रिसर्च के आधार पर ये साबित हो चुका है कि आप जितना अधिक फाइबर खायेंगे , आपके दिल का दौरा पड़ने के मौके उतने ही कम होंगे .
अधिक से अधिक सेम , सूप , और सलाद का प्रयोग करें .
मांस की जगह समुद्री भोजन खाना सहायक होगा .

नाश्ता में फलों का रस लें :

संतरे का रस में फोलिक एसिड होता है जो दिल का दौरा पड़ने के खतरे को कम करता है .
अंगूर का रस में flavonoids और resveratrol होता है जो धमनी ब्लॉक करने वाले के थक्के को कम करता है .
ज्यादातर रस आपके लिए अच्छे हैं बस ध्यान रखिये कि वो चीनी मुक्त हों .

रोज़ व्यायाम करें :

यदि आप प्रतिदिन 20 मिनट तक व्यायाम करते हैं तो आपका दिल का दौरा होने का खतरा एक - तिहाई तक घाट जाता है .
वॉक पर जाना , एरोबिक्स या नृत्य कक्षाएं करना फायदेमंद होगा .

खाने में लहसुन का प्रयोग करें :

रेह्र्ता है कम अध्यनो में पाया गया है कि लहसुन खाने से रक्तचाप .
ये कोलेस्ट्रॉल को भी कम करता है और साथ ही रक्त शर्करा के स्तर को भी रखता है में नियंत्रण .
इससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढती है.

16/11/2017

खांसी - COUGH OR DRY AND WET
(Homeopathic medicines for all age )
परिचय

खांसी को पहचानने के लिए यह जानना आवश्यक है कि मुंह से फेफड़ों तक जो श्वास-प्रणालिका है उसके भिन्न-भिन्न स्थानों में सूजन है या नहीं। प्रत्येक स्थान पर प्रभाव करने वाली अनेकों औषधियां होती हैं। मुंह से फेफड़ों तक जाने वाली नली को प्रणालिका कहते हैं।

• ऐमोनिया कार्ब

रोगी के छाती में और श्वास-प्रणालियों में कफ अटका हो, इस कफ के अटकने के कारण सांस लेने में परेशानी हो रही हो, छाती में इतना कफ भरा हो कि वह निकलने का नाम न ले रहा हो, सुबह 3 बजे कफ के कारण अधिक खांसी हो रही हो, घुटन हो रही हो, सांस लेने में परेशानी हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए इस औषधि की 6 शक्ति की मात्रा का उपयोग फायदेमंद है। यदि क्षय-रोग की अन्तिम अवस्था में जब फेफड़ें में कफ के भरे रहने पर भी उसे निकाल नहीं सकता, फेफड़ों में कफ का भर जाना इस प्रकार के लक्षणों में भी इस औषधि का उपयोग किया जा सकता है।

• ऐन्टिम टार्ट

फेफड़ों में कफ जमा होने के कारण- दमा या खांसी हो जाएं। घड़-घड़ सुनाई दे, कफ भरा हो लेकिन प्रयत्न करने पर भी निकलता न हो, निकले तो अत्यन्त थोड़ा। बच्चों या बूढ़ों की ऐसी अवस्था ऐन्टिम टार्ट औषधि की 6 शक्ति मात्रा का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। यह औषधि कभी-कभी रोगी को मृत्यु के मुख से खींच लाती है। फेफड़े के सभी प्रकार के रोग में जब फेफड़ों में कफ भरा हो, घड़-घड़ सी आवाजें हो रही हो, चाहे जुकाम हो, ब्रौंकाइटिस हो, क्रुप खांसी हो, ब्रौंको-न्युमोनिया हो, प्लूरो-न्युमोनिया हो, तब इस औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है। कफ इसलिए नहीं निकलता है क्योंकि फेफड़ें कमजोर हो जाते हैं। ऐन्टिम टार्ट औषधि के प्रभाव से फेफड़े की कमजोरी दूर हो जाती है।

• हिपर सल्फ

हिपर सल्फ औषधि का प्रभाव फेफड़े पर अधिक होता है। खांसी क्रुप हो तो इस औषधि की 30 शक्ति, 200 शक्ति की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। सूखी ठंडी हवा लगने के कारण होने वाले क्रुप खांसी को दूर करने के लिए ऐकोनाइट की तरह हिपर औषधि का भी प्रयोग कर सकते हैं। रोगी को कफ में क्रुप खांसी होती है, यदि रोगी के शरीर का कोई भी अंग ओढ़ने से बाहर आ जाए तो खांसी होने लगती है, रोग के लक्षण खुश्क, ठंडी हवा में बढ़ते हैं और गर्म, तर हवा में रोग के लक्षण कम होते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए इस औषधि का उपयोग करना चाहिए।

• ऐन्टिम टार्ट

छाती में कफ भरा रहता है, दमा जैसी खांसी हो जाती है, खांसी का दौरा पड़ता है, गला रुंघता हुआ लगता है, सांस लेने पर सांय-सांय सी आवाजें होती है, खांसी में दमा के लक्षण दिखाई देते हैं, बच्चे को ऐसी खांसी होती है कि शरीर में अकड़न होने लगती है, उसका रंग नीला पड़ जाता है, जी मिचलाता रहता है और उल्टी भी आती है, सारी परेशानियां दूर होने का नाम नहीं लेती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐन्टिम टार्ट औषधि 30 शक्ति, 200 शक्ति मात्रा का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। इस औषधि का चिकित्सा में उपयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि रोगी की जीभ साफ हो, यह औषधि कफ को निकालने में सहायक होती है।

• कैलि बाईकोम

जब रोगी खांसता है तो अधिक परेशानी से डोरे-जैसा गीला कफ निकलता है, सफेद कफ, कफ के साथ श्लैष्मिक-झिल्ली के टुकड़े भी निकल सकते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए इस औषधि की 30 शक्ति की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।

• स्टैनम

रोगी को शाम के समय में तपेदिक जैसा बुखार हो, रात को अधिक पसीना आ रहा हो, खांसी भी फेफड़े की गइराई से उठती है, शरीर को हिला देती है, फेफड़ा खोखला-सा लगता है, थूक बहुत अधिक आता है, उसका रंग अण्डे की सफेदी जैसा होता है लेकिन पीलिमा लिए हरा होता है, थूक का स्वाद मीठा या कभी-कभी नमकीन भी हो सकता है, बोलने से खांसी तेज हो जाती है, छाती में खालीपन महसूस होता है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को उपचार करने के लिए स्टैनम औषधि की 30 शक्ति की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।

• ड्रौसेरा

खांसते-खांसते उल्टी आ जाती है, कुत्ता खांसी (काली खांसी) हो जाती है, रात के समय में या सोने पर, हंसने, रोने, गाने, धूम्रपान करने या पानी पीने पर खांसी बढ़ने लगती है तथा उल्टी या जी मिचलाने लगता है, बलगम में कुछ खून की मात्रा भी आता है, नींद खुलने के बाद पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ड्रौसेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।

• नैट्रम म्यूर

खांसी से पीड़ित रोगी का कफ साफ पानी की तरह या झागदार हो, स्वर-यंत्र का एक केन्द्र सूखा रहता है जहां से खांसी होती है, गल-जिव्हा के बढ़ जाने से सूखी खांसी होती है। इस प्रकार के लक्षणों के होने पर उपचार करने के लिए इसकी 30 शक्ति, 200 शक्ति की मात्रा का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।

• पल्सेटिला

इस रोग से पीड़ित रोगी का कफ पीला या नीला आता है, शाम के समय में कफ बढ़ जाता है, बैठने से रोग के लक्षण कम होते हैं, खांसते समय पेशाब निकल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पल्सेटिला औषधि 30 शक्ति, 200 शक्ति की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। पीले रंग का कफ आने पर उपचार करने के लिए कैली सल्फ औषधि का भी उपयोग कर सकते हैं।

• सिना

सूखी खांसी कभी-कभी होती है, नाक में जलन होती है, खांसी के कारण रोगी सो भी नहीं पाता है, रोगी को उठकर बैठना पड़ता है एवं रात में खांसी तेज हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सिना औषधि की 3ग मात्रा का प्रयोग करना लाभकारी है।

27/05/2017

परिचय-
हैजा उस रोग को कहते हैं जब रोगी को दस्त होने के साथ ही उल्टी आती है। यह एक प्रकार का ऐसा संक्रामक रोग है जो छोटी आंत में एक बैक्टीरिया विब्रियो कालरा के कारण होता है। जब यह रोग अधिक गम्भीर हो जाता है तो रोगी के शरीर से लगभग एक लीटर जल करीब एक घंटे में खत्म हो जाता है। इस प्रकार की अधिक गम्भीर अवस्था उत्पन्न होने पर रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे इस रोग के अधिक पीड़ित होते हैं।

कारण :-

दूषित खाने-पीने की चीजों के द्वारा संक्रमण फैलकर यह रोग हो सकता है।
महामारी ग्रस्त क्षेत्रों में भ्रमण (यात्रा) करने से हैजा होता है।
रोगी ग्रस्त व्यक्ति के श्वास के द्वारा छोड़ी गई हवा दूसरे व्यक्ति के श्वास द्वारा लेने पर हैजा का संक्रमण उस व्यक्ति में हो सकता है।
हैजा से पीड़ित रोगी के दस्त और उल्टी में एक प्रकार के विषैले जीवाणु होते हैं और ये जीवाणु आस-पास के हवा मैं फैल जाते हैं या खाने पीने की चीजों में प्रवेश कर जाते हैं जिसके कारण इस रोग की महामारी फैलता है।
बैक्टीरिया विब्रियो कालरा नामक जीवाणु ग्रस्त भोजन या पानी का सेवन करने से भी यह रोग अधिकतर होता है।
हैजा होने के अन्य कारण :-

खट्टे, अधकचरे फलमूल या सड़े पदार्थों जैसे सड़ी मछलियां या मांस आदि का सेवन करना।
चिंगड़ी मछली, केंकड़ा, चर्बी मिला हुआ पदार्थ, चावल, पापड़, कचौरी, पकौड़े, नये चावल का भात तथा कई प्रकार के दूषित पदार्थों का सेवन करना आदि के कारण भी यह रोग हो सकता है।
उपवास करने, गंदी हवा का सेवन करना, रात में जागने, दूषित पानी पीने या बहुत अधिक नशीले पदार्थों का सेवन करने से यह रोग हो सकता है।
अधिक सर्दी या गर्मी के कारण भी यह रोग हो सकता है।
अधिक संभोग करने से भी हैजा हो सकता है।
हैजा का प्रकोप महामारी के रूप में हो तब उसके भय या डर लग जाने से भी यह होता है।
स्वास्थ्य के साधारण नियमों का पालन न करने तथा ऋतु परिवर्तन के समय में उसके अनुसार न रहने के कारण से यह हो सकता है।
लक्षण :-

हैजा रोग से पीड़ित रोगी में कई प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं जैसे- चावल के धोवन, सड़े कोहड़े का पानी की तरह या फेन की तरह दस्त होना और इसके साथ ही बिना बदबूदार उल्टी होना आदि। रोगी के शरीर में धीरे-धीरे सुस्ती आती है। चेहरा अंदर की ओर धंसा हुआ दिखाई पड़ना, तेज प्यास लगना, भूख कम हो जाना, आंखें अंदर की ओर धंस जाना, चेहरे की चमक खो जाना, शरीर में अधिक कमजोरी आ जाना, त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाना, मांसपेशियों में ऐंठन होना, शरीर का रक्तचाप कम हो जाना, नब्ज तेज चलना, झुर्रीदार अंगुलिया होना, ठंडा पसीना आना तथा सांस लेने में परेशानी होना आदि लक्षण भी रोगी में दिखाई पड़ते हैं।

हैजा रोग दो प्रकार का होता है-

सामान्य हैजा :- इस हैजे को विसूचिका (कालेरिन) या तेज अतिसार भी कहते हैं। यह हैजा कभी-कभी सांघातिक हैजा में भी बदल सकता है।

सामान्य हैजा के लक्षण :-

इस हैजा में सबसे पहले पित्त-मिला अर्थात हरे रंग का दस्त होता है और फिर पित्त नहीं आता है।
इस हैजा से पीड़ित रोगी को सबसे पहले पेट में ऐंठन होती है लेकिन ऊपर के अंगों में ऐंठन नहीं होती है।
पेट में अधिकतर नाभि के आस-पास के चारों तरफ खींचन की तरह दर्द होता है।
शरीर की गर्मी धीरे-धीरे कम होती है लेकिन रोगी एकदम सुन्न (सुस्त) नहीं होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी के शरीर का रंग बहुत कम ही बदलता है।
सामान्य हैजा (विसूचिका) हमेशा भोजन की गड़बड़ी के साथ होता है।
इस रोग में अक्सर पेशाब बंद नहीं होता है।
सांघातिक :- इस हैजे को प्रकृत हैजा या एशियाटिक कालेरा कहते हैं।

सांघातिक हैजा के लक्षण :-

सांघातिक हैजा से पीड़ित रोगी में सबसे पहले पित्तहीन दस्त होने के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
इस रोग में पहले पेट में दर्द नहीं होता लेकिन हृदय में दर्द होता है।
सांघातिक हैजा में रोगी के पैरों की अंगुलियों में ऐंठन होती है और इसके बाद हाथ-पैरों में भी ऐंठन होने लगती है।
शरीर में गर्मी अचानक ही बढ़ जाती है और रोगी जल्दी-जल्दी सुस्त होने लगता है।
पेशाब आना बंद हो जाता है।
सांघातिक हैजा होने का सबसे प्रमुख कारण एक प्रकार के कीटाणु का शरीर में प्रवेश कर जाना है।
इस रोग से पीड़ित रोगी के नाखून का जड़ नीला पड़ जाता है तथा इसके बाद शरीर के सभी अंग नीले पड़ जाते हैं।
हैजा की कई अवस्थाएं होती हैं-

पतनावस्था या हिमांग अवस्था :-

यह अवस्था हैजा रोगी की सबसे गम्भीर अवस्था होती है। इस अवस्था में अधिकतर रोगी की मृत्यु हो जाती है। इस अवस्था में दस्त तथा उल्टी आना एकदम कम हो जाता है, रोगी में कई प्रकार के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं- प्यास लगने के साथ ही उल्टी का बढ़ जाना, बेचैनी होना, पानी पीने के बाद अधिक कष्ट होकर पानी की उल्टी आना, बार-बार उल्टी आने के बाद रोगी में निस्तेज की अवस्था (बेहोश पड़ जाना) उत्पन्न होना तथा इसके साथ ही नाड़ी दिखाई न पड़ना आदि। इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने के बाद जीवनी-शक्ति घट जाती है, शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ जाता है, होंठ नीले पड़ जाते हैं तथा सारा शरीर मैला या पीला हो जाता है, आंखें अंदर की ओर धंस जाती है, चेहरे की रौनक खो जाती है, आंखें लाल हो जाती हैं, आंखों की पुतली फैल जाती है, गला बैठ जाता है, आवाज एक दम धीमी निकलती है, पेशाब होना बंद हो जाता है, हाथ-पैरों की अंगुलियों का अगला भाग सिकुड़ा हुआ रहता है, शरीर गर्म रहने के कारण से रोगी खाट-पर तड़पता रहता है और शरीर के कपड़े को उतार फैंक देता है, थोड़ी देर बाद चेहरे पर पसीने की बूंदे दिखाई पड़ती हैं। रोगी अनजाने में मलत्याग कर देता है या मलत्याग नहीं होता है और पेट फूल जाता है। इस रोग की तीसरी अवस्था में शरीर अधिक कमजोर हो जाता है तथा रोगी में करवट लेने की शक्ति नहीं रहती। रोगी की इस अवस्था में दस्त बंद हो जाने के बाद मृत्यु हो जाती है या दो से तीन घंटे तक चुप पड़े रहने के बाद मृत्यु हो जाती है। इस अवस्था में अधिकतर शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ जाता है, नाड़ी बिल्कुल भी नहीं चलती। इस रोगी की स्थितिकाल 12 से 36 घंटें की होती है। यदि दस्त बंद होने के बाद रोगी की मृत्यु लगभग पांच घंटे तक नहीं होती तो समझना चाहिए कि प्रतिक्रिया अवस्था शुरू हो गई है।

आक्रमणावस्था :-

इस रोग में हैजा का विष या जीवाणु शरीर में घुसने के समय से लेकर फेन की तरह दस्त होने तक की अवस्था को आक्रमणावस्था कहते हैं। रोगी में यह अवस्था एक-दो घंटे से लेकर चार दिनों तक बनी रहती है। इस अवस्था में रोगी के शरीर में गर्मी धीरे-धीरे कम होने लगती है और कमजोरी भी महसूस होने लगती है, सिर में चक्कर आने लगते हैं, स्फूर्ति कम हो जाती है, नींद नहीं आती तथा खाने की इच्छा भी नहीं होती है। मिचली आना, मुंह का स्वाद बिगड़ जाना, पेट में भार या दर्द महसूस होना आदि लक्षण भी प्रकट हो जाते हैं। रोगी को कभी ठंड लगती है तो कभी गर्मी महसूस होती है, कान में सों-सों या दम-दम शब्द सुनाई पड़ता है, पतले दस्त भी आते हैं, दस्त फेन या चावल के धोवन की तरह होता है। इस अवस्था की स्थितिकाल एक से लेकर साठ घंटें तक की हो सकती है।

प्रतिक्रियावस्था :-

हैजा रोगी की तीसरी अवस्था के अंत में दस्त होने के साथ ही उल्टी आना बंद हो जाए और नाड़ी दिखाई देना बंद हो जाए और तथा इसके बाद यदि रोगी की मृत्यु न हो और धीरे-धीरे नाड़ी दिखाई पड़ने लगे तो इस अवस्था को प्रतिक्रियावस्था कहते हैं। इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने के बाद रोगी में पूर्ण विकसित अवस्था के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसी अवस्था में जब रोगी में स्वाभाविक प्रतिक्रिया आरम्भ होती है तो शरीर धीरे-धीरे गर्म होने लगता है और पित्त मिला हुआ दस्त-उल्टी होने लगती है और जीवनी शक्ति घटने लगती है। इसके बाद रोगी के मूत्राशय में पेशाब इकट्ठा होने लगता है और शरीर का रंग और आंखों की रोशनी भी स्वाभाविक हो जाती है। इसके बाद रोगी में कभी-कभी अस्वाभाविक प्रतिक्रिया आरम्भ हो जाती है और परिणामावस्था भी शुरू हो जाती है। प्रतिक्रियावस्था की स्थितिकाल कुछ देर से लेकर बहुत देर तक भी रह सकती है।

परिणामावस्था :-

हैजे की इस अवस्था में शरीर के कई अंगों में खून का संचार होता है और जो अंग सबसे कमजोर होते हैं वे अंग रोग ग्रस्त अधिक होते हैं और कई प्रकार के लक्षण प्रकट हो जाते हैं- रोग का आक्रमण दुबारा से होना, बुखार रहना, पेशाब न होना, उल्टी आना या मिचली होना, हिचकी आना, तंद्रा होना, पेट फूलना, फोड़ा होना, पतले दस्त आना, कर्णमूल में जलन होना तथा फेफड़े में जलन होना आदि। इस अवस्था में रोगी को दस्त होने के साथ ही उल्टी भी आती है और बुखार रहता है तथा हिचकी आती रहती है।

पूर्ण विकसितावस्था :-

हैजा से पीड़ित रोगी को फेन या चावल के धोवन की तरह दस्त और उल्टी आती है। इस अवस्था में चावल की धोवन के पानी की तरह दस्त और उल्टी आने के साथ ही निम्न प्रकार के लक्षण प्रकट हो जाते हैं- मिचली आना, चेहरा मैला होना, तेज प्यास लगना, आंखों का बैठ जाना, शरीर का रंग बदल जाना, शरीर से ठंडा पसीना आना, धीरे-धीरे पेशाब बंद होकर नाड़ी कमजोर हो जाना, नीले रंग की एक लकीर आंखों के चारों तरफ दिखाई पड़ना, पेट में दर्द होना, गला बैठ जाना, पाकस्थल में जलन होना, पेट में गड़गड़ाहट होना, हाथ-पैरों की अंगुलियों में ऐंठन होना, शरीर में सुस्ती होना तथा बेचैनी होना, मुंह और होंठों का सूख जाना आदि। किसी-किसी रोगी को बहुत अधिक दस्त आते हैं लेकिन उल्टी कम होती है। किसी-किसी रोगी को दस्त कम लेकिन उल्टी अधिक आती है। पूर्ण विकसितावस्था लगभग चार घंटे से लेकर 24 घंटे तक रह सकती है। यदि रोगी में यह अवस्था 10 से 12 घंटे तक रहे और दस्त के साथ पित्त निकलता हो तो रोगी धीरे-धीरे अच्छा हो जाता है लेकिन यदि ऐसा न होकर पूरा शरीर ठंडा पड़ जाए और चेहरा सिकुड़ जाए और नाड़ी बिल्कुल भी न दिखाई दें तो समझना चाहिए कि रोगी की पतनावस्था शुरू हो गई है। इस अवस्था में रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। यदि रोगी लगभग 12 घंटे तक जीवित रहें तो समझना चाहिए कि वह बच जाएगा।

लक्षणों के आधार पर हैजा रोगी की चिकित्सा :-

1. सरल हैजा या विसूचिका :- इस हैजे की अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए इलाटेरियम की 3 शक्ति, चायना की 6 शक्ति, इपिकाक की 6 शक्ति, आइरिस की 3 शक्ति या क्रोटन औषधि की 6 शक्ति की मात्रा का उपयोग करना लाभकारी है।

2.प्रकृत हैजा (कालेरा) की अवस्था :- प्रकृत हैजा कई प्रकार के रूपों में होते हैं जैसे-

दस्त-प्रधान या आंत्रिक हैजा की अवस्था :- इस अवस्था में रोगी को बार-बार बहुत अधिक मात्रा में दस्त आते हैं। यदि रोगी में यह लक्षण दिखाई दें तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए विरेट्रम की 6 शक्ति या रिसिनस औषधि की 3 शक्ति की मात्रा का उपयोग किया जा सकता है।
उल्टी आने की अवस्था (पाकाशयिक हैजा) :- इस हैजे की अवस्था में रोगी को बार-बार परेशान कर देने वाली उल्टी आती है तथा जी मिचलाता रहता है। ऐसी अवस्था में उपचार करने के लिए आर्सेनिक-ऐल्ब औषधि की 6 शक्ति से उपचार करना उचित होता है।
आंत्रिक पाकाशयिक हैजा या दस्त-उल्टी एक साथ होना :- इस प्रकार की अवस्था उत्पन्न होने पर उपचार करने के लिए रिसिनस की 3 शक्ति, आर्सेनिक की 6 शक्ति, वेरेट्रम-ऐल्ब औषधि की 6 शक्ति से उपचार करना लाभकारी होता है।
हैजा होने पर खूनी दस्त होना तथा इसके साथ ही उल्टी होना :- इस अवस्था में रोगी को खूनी दस्त आते हैं या खूनी की उल्टी होती है। इस प्रकार की अवस्था उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए कार्बो-वेज की 6 शक्ति, मर्क-कोर की 6 शक्ति, फास्फोरस की 3 शक्ति, ऐकोन की 1x मात्रा आइरिस की 3x मात्रा या कैंथरिस औषधि की 3 शक्ति का सेवन करने से अत्यंत लाभ मिलता है।
बुखार होने के साथ ही हैजा होना :- इस अवस्था में रोगी के शरीर की गर्मी बढ़ने के साथ ही साथ दस्त आते हैं तथा उल्टी होती है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए रिसिनस की 3x मात्रा, रस-टक्स की 6 शक्ति, बैप्टीशिया की 1x मात्रा से 6 शक्ति, ब्रायोनिया की 3 शक्ति, एकोन की 1x मात्रा या बेलेडोना औषधि की 6 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
हैजा होने के साथ ही अकड़न होना :- इस अवस्था में रोगी के शरीर के अंगों में बड़ी तेज अकड़न या खींचन होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सिकेलि की 6 शक्ति, क्यूप्रम की 6 शक्ति या क्यूप्रम आर्सेनिकम की 3x मात्रा का उपयोग करना लाभदायक होता है।
हैजा होने के साथ ही शरीर शुष्क होना तथा दस्त और उल्टी होना :- इस अवस्था में दस्त तथा उल्टी होने से पहले ही रोगी में हिमांग की अवस्था प्रकट हो जाती है और रोग की स्थिति बहुत अधिक गम्भीर हो जाती है। ऐसे रोगी की इस अवस्था में उपचार करने के लिए एसिड-हाइड्रो की 6 शक्ति, टैबेकम की 60 शक्ति, कैम्फर के मदरटिंचर या आर्सेनिक की 3x मात्रा से 6 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
पाक्षाघातिक हैजा :-

इस हैजे की अवस्था शुरू होते ही शरीर नीला पड़ जाता है। हृप्तिण्ड सुन्न पड़ जाती है, छाती पर दबाव महसूस होता है, सांस लेने में परेशानी होती है, नाड़ी कमजोर पड़ जाती है और रोगी बेहोशी की अवस्था में पड़ा रहता है। रोगी की ऐसी अवस्था में उपचार करने के लिए निकोटिन की 3 शक्ति, विरेट्रम की 3x मात्रा विचूर्ण, आर्सेनिकम ऐल्बम की 6 शक्ति या विरेट्रम-ऐल्ब की 6 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है।

हैजा रोग की आक्रमण अवस्था उत्पन्न होने पर उपचार :-

1. कैम्फर :-

हैजा रोग शुरू होने पर एकाएक फेन की तरह दस्त आते है तथा उल्टी आने के साथ ही इस प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं जैसे- ठंड महसूस होना, शक्ति घट जाना आदि। इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने से पहले शरीर नीला और ठंडा पड़ जाए तो इस अवस्था में उपचार करने के लिए कैम्फर औषधि अधिक लाभकारी है।
यदि सर्दी लगने के कारण से हैजा हो जाए तो उसे ठीक करने के लिए कैम्फर बहुत अधिक उपयोगी है।
आक्षेप-प्रधान हैजा उत्पन्न होने पर दस्त होने के साथ उल्टी आने की अवस्था या पाक्षाघातिक हैजा की अवस्था उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए कैम्फर औषधि अधिक फायदेमंद होती है।
यदि दस्त की अपेक्षा उल्टी अधिक आए या उल्टी के कारण हिमांग की अवस्था में तेजी से आ जाए तो कैम्फर बंद करके लक्षण के अनुसार आर्सेनिक औषधि का उपयोग करना चाहिए।

2. आर्सेनिक-ऐल्ब :- यदि बहुत अधिक फल-फूल खाने या बर्फ का पानी पीने के कारण से हैजा हो जाए और बिना दर्द का पानी की तरह अधिक मात्रा में बदबूदार दस्त आएं तथा पेट के तल में गड़बड़ी हो, मृत्यु का भय लग रहा हो, पेट में जलन हो रही हो, तेज श्वास चल रही हो लेकिन थोड़ा सा पानी पीने पर ही प्यास शान्त हो जाए तथा इस प्रकार के लक्षण दिखाई दें जैसे- बहुत अधिक कमजोरी महसूस होना, बेचैनी होना, दस्त तथा उल्टी आना या सिर्फ उल्टी आना, आधी रात के बाद या ठंडे पदार्थों का सेवन करने के बाद रोग के लक्षण में वृद्धि होना आदि। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए आर्सेनिक-ऐल्ब औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

3. चायना :-

फल-फूल खाने के कारण से दस्त होना, बिना दर्द का पानी की तरह दस्त होना, अधिक मात्रा में बदबूदार दस्त होना, आधी रात के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होना, पीले पानी जैसा दस्त आना और खाई हुई चीज का अनपच होकर दस्त में आना आदि। इस प्रकार के लक्षणों के अतिरिक्त रोगी में इस प्रकार लक्षण हों जैसे- पेट फूलना, पेट गड़गड़ाना, अधिक शरीर का खून नष्ट होना या वीर्य का नष्ट होना, कान में भों-भों शब्द सुनाई पड़ना आदि तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए चायना औषधि की 3 या 6 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है।
यदि रोगी में हैजा शरीर में किसी भी प्रकार से खून के नष्ट होने या वीर्य नष्ट होने के कारण से हुआ हो तो उपचार करने के लिए चायना औषधि का उपयोग करना चाहिए।

4. एकोनाइट-नैप :- रोगी में इस प्रकार के हैजा से संबंधित लक्षण हों जैसे- गले हुए तरबूज के पानी की तरह दस्त होना, पेट में तेज दर्द होना, बेचैनी, ठंड महसूस होना, मृत्यु का डर, बुखार के साथ दस्त और उल्टी आना, खूनी दस्त और उल्टी होना आदि। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एकोनाइट-नैप औषधि का उपयोग करना चाहिए। गर्मी या सर्दी लगकर हैजा हुआ हो या बुखार मिले हैजा हुआ हो तो इस रोग का उपचार करने के लिए इस औषधि की 1x मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।

5. एसिड-फास :- बिना दर्द का भूरे रंग का दस्त हो रहा हो या पुराना अतिसार हैजा रोग में बदल जाए अथवा बहुत अधिक संभोग करने के कारण से हैजा हो जाए और भोजन के बाद दाहिनी करवट सोने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो तो रोग का उपचार करने के लिए एसिड-फास औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।

6. आइरिस :-

हैजा से पीड़ित रोगी में इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- दस्त या उल्टी आना, पतले पानी की तरह, पीले-ढीले दस्त आना, श्लेष्मा या रक्त मिले दस्त, काले, हल्के, हरे या अजीर्ण दस्त होना, पेट गड़गड़ाना तथा पेट में दर्द न होना, दस्त आने के बाद मलद्वार में तेज जलन होना, मलद्वार से हवा निकलने पर पेट का दर्द कम होना, आंखे बैठ जाना, जीभ बर्फ की तरह ठंडी रहना, डकारें आना, मिचली होना, पतली खट्टी उल्टी आना आदि। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आइरिस औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
कालेरिन या विसूचिका हैजा रोग की अवस्था में आइरिस औषधि से उपचार करना अधिक लाभदायक होता है।

7. कोटोन-टिग :-

गोली या पिचकारी की तरह जोर से अचानक दस्त होना, गहरा हरा या हल्का-पीले रंग का पतले दस्त होना, अजीर्ण दस्त होना, मिचली या उल्टी, नाभि के चारों ओर खींचन की तरह दर्द होना आदि लक्षण रोगी में दिखाई दें तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए कोटोन-टिग औषधि की 3 शक्ति से उपचार करें।
खाने-पीने के बाद ही दस्त या उल्टी आ रही हो तो ऐसे हैजा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए कोटोन-टिग औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।

8. इलाटेरियम :-

इलाटेरियम औषधि की 6 शक्ति से उपचार तब करते हैं जब रोगी में इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- फेनिला पानी की तरह दस्त होना या हरे रंग का दस्त होना तथा इसके साथ ही सफेद रंग की तरह का कुछ पदार्थ आना या खून मिले हुए दस्त होना, पेट में दर्द हो या न होना आदि।
हैजा रोग को ठीक करने के लिए किसी भी प्रकार की औषधि का प्रयोग करने के बाद भी दस्त हो या उल्टी आना बंद न हो तो इस औषधि का उपयोग करें इससे लाभ मिलेगा।

9. बेलेडोना :-

हैजा रोग होने के साथ इस प्रकार के लक्षण हों जैसे-पानी की तरह, सादे या पीले श्लेष्मा-मिले, आंव मिले, मिट्टी के रंग के, खट्टे या बदबूदार दस्त आना आदि तो उपचार करने के लिए बेलेडोना औषधि की 3 या 6 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है। यदि इस प्रकार के लक्षण हैजे से पीड़ित बच्चे में हों - अकड़न होना, हाथ-पैर ठंडे तथा माथा गर्म होना, सिर में टपक के साथ दर्द होना या सिर हिलते रहना, बुखार आना, बदन सूखा या गर्म पसीना से तर होना, अधिक आलस होना आदि। रोगी बच्चे का मुंह इस प्रकार से चला करता है कि मानो वह कुछ चबा रहा हो, उसके पेट से गों-गों शब्द की आवाजे सुनाई पड़ती है। ऐसे बच्चे के इस रोग को ठीक करने के लिए बेलेडोना औषधि की 3 या 6 शक्ति की मात्रा का उपयोग किया जा सकता है।
जो लोग धूप या आग के सामने काम करते हैं उन्हें हैंजा रोग हो जाए या ज्वर मिले हैजा हो जाए तो उनके इस रोग को ठीक करने के लिए बेलेडोना औषधि का उपयोग करना चाहिए।

10. ब्रायोनिया :- यदि हैजा रोग से पीड़ित किसी रोगी में इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- पतले खून-मिले दस्त अधिक मात्रा में आना, मांड की तरह गाढ़े, हरे रंग के या पतले खून-मिले दस्त आना, अजीर्ण के दस्त आना, सड़े या बदबूदार दस्त आना, बुखार रहना, मुंह तथा जीभ सूखा रहना, अधिक मात्रा में प्यास लगना, सिर में दर्द होना, मुंह का स्वाद तीता लगना, मिचली आना, पीली या हरे रंग की कड़वी उल्टी आना, पेट में दर्द होना, सिर हिलाना, ठंडी या खट्टी चीजें पीने की इच्छा होना, बुखार होना तथा बकते रहना आदि। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3 शक्ति का सेवन करने से अत्यंत लाभ मिलता है।

11. बैप्टीशिया :- पीले रंग की पानी की तरह बदबूदार दस्त आना, खून तथा श्लेष्मा मिले दस्त आना, उल्टी तथा मिचली आना, सांस लेने पर बदबू आना, पसीने से बदबू आना, नाड़ी कोमल और पूर्ण रहना, बुखार रहना, पूरे शरीर में दर्द रहना, अधिक सुस्ती आना, चेहरे का रंग गहरा लाल होना, अधिक मोह होना, बात करते-करते सो जाना, नींद न आना या फिर गहरी नींद आना, पेट अंदर की ओर धंसते हुए महसूस होना, जीभ का बीच का भाग पीला और भूरा तथा किनारे वाला भाग चमकीला और लाल रंग का होना, पेट में बिना दर्द के ऐंठन होना आदि प्रकार के लक्षण हैजा से पीड़ित रोगी में दिखाई दें तो उसके रोग का उपचार करने के लिए बैप्टीशिया औषधि की 1x मात्रा या 6 शक्ति का प्रयोग करें।

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