27/05/2017
परिचय-
हैजा उस रोग को कहते हैं जब रोगी को दस्त होने के साथ ही उल्टी आती है। यह एक प्रकार का ऐसा संक्रामक रोग है जो छोटी आंत में एक बैक्टीरिया विब्रियो कालरा के कारण होता है। जब यह रोग अधिक गम्भीर हो जाता है तो रोगी के शरीर से लगभग एक लीटर जल करीब एक घंटे में खत्म हो जाता है। इस प्रकार की अधिक गम्भीर अवस्था उत्पन्न होने पर रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे इस रोग के अधिक पीड़ित होते हैं।
कारण :-
दूषित खाने-पीने की चीजों के द्वारा संक्रमण फैलकर यह रोग हो सकता है।
महामारी ग्रस्त क्षेत्रों में भ्रमण (यात्रा) करने से हैजा होता है।
रोगी ग्रस्त व्यक्ति के श्वास के द्वारा छोड़ी गई हवा दूसरे व्यक्ति के श्वास द्वारा लेने पर हैजा का संक्रमण उस व्यक्ति में हो सकता है।
हैजा से पीड़ित रोगी के दस्त और उल्टी में एक प्रकार के विषैले जीवाणु होते हैं और ये जीवाणु आस-पास के हवा मैं फैल जाते हैं या खाने पीने की चीजों में प्रवेश कर जाते हैं जिसके कारण इस रोग की महामारी फैलता है।
बैक्टीरिया विब्रियो कालरा नामक जीवाणु ग्रस्त भोजन या पानी का सेवन करने से भी यह रोग अधिकतर होता है।
हैजा होने के अन्य कारण :-
खट्टे, अधकचरे फलमूल या सड़े पदार्थों जैसे सड़ी मछलियां या मांस आदि का सेवन करना।
चिंगड़ी मछली, केंकड़ा, चर्बी मिला हुआ पदार्थ, चावल, पापड़, कचौरी, पकौड़े, नये चावल का भात तथा कई प्रकार के दूषित पदार्थों का सेवन करना आदि के कारण भी यह रोग हो सकता है।
उपवास करने, गंदी हवा का सेवन करना, रात में जागने, दूषित पानी पीने या बहुत अधिक नशीले पदार्थों का सेवन करने से यह रोग हो सकता है।
अधिक सर्दी या गर्मी के कारण भी यह रोग हो सकता है।
अधिक संभोग करने से भी हैजा हो सकता है।
हैजा का प्रकोप महामारी के रूप में हो तब उसके भय या डर लग जाने से भी यह होता है।
स्वास्थ्य के साधारण नियमों का पालन न करने तथा ऋतु परिवर्तन के समय में उसके अनुसार न रहने के कारण से यह हो सकता है।
लक्षण :-
हैजा रोग से पीड़ित रोगी में कई प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं जैसे- चावल के धोवन, सड़े कोहड़े का पानी की तरह या फेन की तरह दस्त होना और इसके साथ ही बिना बदबूदार उल्टी होना आदि। रोगी के शरीर में धीरे-धीरे सुस्ती आती है। चेहरा अंदर की ओर धंसा हुआ दिखाई पड़ना, तेज प्यास लगना, भूख कम हो जाना, आंखें अंदर की ओर धंस जाना, चेहरे की चमक खो जाना, शरीर में अधिक कमजोरी आ जाना, त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाना, मांसपेशियों में ऐंठन होना, शरीर का रक्तचाप कम हो जाना, नब्ज तेज चलना, झुर्रीदार अंगुलिया होना, ठंडा पसीना आना तथा सांस लेने में परेशानी होना आदि लक्षण भी रोगी में दिखाई पड़ते हैं।
हैजा रोग दो प्रकार का होता है-
सामान्य हैजा :- इस हैजे को विसूचिका (कालेरिन) या तेज अतिसार भी कहते हैं। यह हैजा कभी-कभी सांघातिक हैजा में भी बदल सकता है।
सामान्य हैजा के लक्षण :-
इस हैजा में सबसे पहले पित्त-मिला अर्थात हरे रंग का दस्त होता है और फिर पित्त नहीं आता है।
इस हैजा से पीड़ित रोगी को सबसे पहले पेट में ऐंठन होती है लेकिन ऊपर के अंगों में ऐंठन नहीं होती है।
पेट में अधिकतर नाभि के आस-पास के चारों तरफ खींचन की तरह दर्द होता है।
शरीर की गर्मी धीरे-धीरे कम होती है लेकिन रोगी एकदम सुन्न (सुस्त) नहीं होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी के शरीर का रंग बहुत कम ही बदलता है।
सामान्य हैजा (विसूचिका) हमेशा भोजन की गड़बड़ी के साथ होता है।
इस रोग में अक्सर पेशाब बंद नहीं होता है।
सांघातिक :- इस हैजे को प्रकृत हैजा या एशियाटिक कालेरा कहते हैं।
सांघातिक हैजा के लक्षण :-
सांघातिक हैजा से पीड़ित रोगी में सबसे पहले पित्तहीन दस्त होने के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
इस रोग में पहले पेट में दर्द नहीं होता लेकिन हृदय में दर्द होता है।
सांघातिक हैजा में रोगी के पैरों की अंगुलियों में ऐंठन होती है और इसके बाद हाथ-पैरों में भी ऐंठन होने लगती है।
शरीर में गर्मी अचानक ही बढ़ जाती है और रोगी जल्दी-जल्दी सुस्त होने लगता है।
पेशाब आना बंद हो जाता है।
सांघातिक हैजा होने का सबसे प्रमुख कारण एक प्रकार के कीटाणु का शरीर में प्रवेश कर जाना है।
इस रोग से पीड़ित रोगी के नाखून का जड़ नीला पड़ जाता है तथा इसके बाद शरीर के सभी अंग नीले पड़ जाते हैं।
हैजा की कई अवस्थाएं होती हैं-
पतनावस्था या हिमांग अवस्था :-
यह अवस्था हैजा रोगी की सबसे गम्भीर अवस्था होती है। इस अवस्था में अधिकतर रोगी की मृत्यु हो जाती है। इस अवस्था में दस्त तथा उल्टी आना एकदम कम हो जाता है, रोगी में कई प्रकार के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं- प्यास लगने के साथ ही उल्टी का बढ़ जाना, बेचैनी होना, पानी पीने के बाद अधिक कष्ट होकर पानी की उल्टी आना, बार-बार उल्टी आने के बाद रोगी में निस्तेज की अवस्था (बेहोश पड़ जाना) उत्पन्न होना तथा इसके साथ ही नाड़ी दिखाई न पड़ना आदि। इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने के बाद जीवनी-शक्ति घट जाती है, शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ जाता है, होंठ नीले पड़ जाते हैं तथा सारा शरीर मैला या पीला हो जाता है, आंखें अंदर की ओर धंस जाती है, चेहरे की रौनक खो जाती है, आंखें लाल हो जाती हैं, आंखों की पुतली फैल जाती है, गला बैठ जाता है, आवाज एक दम धीमी निकलती है, पेशाब होना बंद हो जाता है, हाथ-पैरों की अंगुलियों का अगला भाग सिकुड़ा हुआ रहता है, शरीर गर्म रहने के कारण से रोगी खाट-पर तड़पता रहता है और शरीर के कपड़े को उतार फैंक देता है, थोड़ी देर बाद चेहरे पर पसीने की बूंदे दिखाई पड़ती हैं। रोगी अनजाने में मलत्याग कर देता है या मलत्याग नहीं होता है और पेट फूल जाता है। इस रोग की तीसरी अवस्था में शरीर अधिक कमजोर हो जाता है तथा रोगी में करवट लेने की शक्ति नहीं रहती। रोगी की इस अवस्था में दस्त बंद हो जाने के बाद मृत्यु हो जाती है या दो से तीन घंटे तक चुप पड़े रहने के बाद मृत्यु हो जाती है। इस अवस्था में अधिकतर शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ जाता है, नाड़ी बिल्कुल भी नहीं चलती। इस रोगी की स्थितिकाल 12 से 36 घंटें की होती है। यदि दस्त बंद होने के बाद रोगी की मृत्यु लगभग पांच घंटे तक नहीं होती तो समझना चाहिए कि प्रतिक्रिया अवस्था शुरू हो गई है।
आक्रमणावस्था :-
इस रोग में हैजा का विष या जीवाणु शरीर में घुसने के समय से लेकर फेन की तरह दस्त होने तक की अवस्था को आक्रमणावस्था कहते हैं। रोगी में यह अवस्था एक-दो घंटे से लेकर चार दिनों तक बनी रहती है। इस अवस्था में रोगी के शरीर में गर्मी धीरे-धीरे कम होने लगती है और कमजोरी भी महसूस होने लगती है, सिर में चक्कर आने लगते हैं, स्फूर्ति कम हो जाती है, नींद नहीं आती तथा खाने की इच्छा भी नहीं होती है। मिचली आना, मुंह का स्वाद बिगड़ जाना, पेट में भार या दर्द महसूस होना आदि लक्षण भी प्रकट हो जाते हैं। रोगी को कभी ठंड लगती है तो कभी गर्मी महसूस होती है, कान में सों-सों या दम-दम शब्द सुनाई पड़ता है, पतले दस्त भी आते हैं, दस्त फेन या चावल के धोवन की तरह होता है। इस अवस्था की स्थितिकाल एक से लेकर साठ घंटें तक की हो सकती है।
प्रतिक्रियावस्था :-
हैजा रोगी की तीसरी अवस्था के अंत में दस्त होने के साथ ही उल्टी आना बंद हो जाए और नाड़ी दिखाई देना बंद हो जाए और तथा इसके बाद यदि रोगी की मृत्यु न हो और धीरे-धीरे नाड़ी दिखाई पड़ने लगे तो इस अवस्था को प्रतिक्रियावस्था कहते हैं। इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने के बाद रोगी में पूर्ण विकसित अवस्था के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसी अवस्था में जब रोगी में स्वाभाविक प्रतिक्रिया आरम्भ होती है तो शरीर धीरे-धीरे गर्म होने लगता है और पित्त मिला हुआ दस्त-उल्टी होने लगती है और जीवनी शक्ति घटने लगती है। इसके बाद रोगी के मूत्राशय में पेशाब इकट्ठा होने लगता है और शरीर का रंग और आंखों की रोशनी भी स्वाभाविक हो जाती है। इसके बाद रोगी में कभी-कभी अस्वाभाविक प्रतिक्रिया आरम्भ हो जाती है और परिणामावस्था भी शुरू हो जाती है। प्रतिक्रियावस्था की स्थितिकाल कुछ देर से लेकर बहुत देर तक भी रह सकती है।
परिणामावस्था :-
हैजे की इस अवस्था में शरीर के कई अंगों में खून का संचार होता है और जो अंग सबसे कमजोर होते हैं वे अंग रोग ग्रस्त अधिक होते हैं और कई प्रकार के लक्षण प्रकट हो जाते हैं- रोग का आक्रमण दुबारा से होना, बुखार रहना, पेशाब न होना, उल्टी आना या मिचली होना, हिचकी आना, तंद्रा होना, पेट फूलना, फोड़ा होना, पतले दस्त आना, कर्णमूल में जलन होना तथा फेफड़े में जलन होना आदि। इस अवस्था में रोगी को दस्त होने के साथ ही उल्टी भी आती है और बुखार रहता है तथा हिचकी आती रहती है।
पूर्ण विकसितावस्था :-
हैजा से पीड़ित रोगी को फेन या चावल के धोवन की तरह दस्त और उल्टी आती है। इस अवस्था में चावल की धोवन के पानी की तरह दस्त और उल्टी आने के साथ ही निम्न प्रकार के लक्षण प्रकट हो जाते हैं- मिचली आना, चेहरा मैला होना, तेज प्यास लगना, आंखों का बैठ जाना, शरीर का रंग बदल जाना, शरीर से ठंडा पसीना आना, धीरे-धीरे पेशाब बंद होकर नाड़ी कमजोर हो जाना, नीले रंग की एक लकीर आंखों के चारों तरफ दिखाई पड़ना, पेट में दर्द होना, गला बैठ जाना, पाकस्थल में जलन होना, पेट में गड़गड़ाहट होना, हाथ-पैरों की अंगुलियों में ऐंठन होना, शरीर में सुस्ती होना तथा बेचैनी होना, मुंह और होंठों का सूख जाना आदि। किसी-किसी रोगी को बहुत अधिक दस्त आते हैं लेकिन उल्टी कम होती है। किसी-किसी रोगी को दस्त कम लेकिन उल्टी अधिक आती है। पूर्ण विकसितावस्था लगभग चार घंटे से लेकर 24 घंटे तक रह सकती है। यदि रोगी में यह अवस्था 10 से 12 घंटे तक रहे और दस्त के साथ पित्त निकलता हो तो रोगी धीरे-धीरे अच्छा हो जाता है लेकिन यदि ऐसा न होकर पूरा शरीर ठंडा पड़ जाए और चेहरा सिकुड़ जाए और नाड़ी बिल्कुल भी न दिखाई दें तो समझना चाहिए कि रोगी की पतनावस्था शुरू हो गई है। इस अवस्था में रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। यदि रोगी लगभग 12 घंटे तक जीवित रहें तो समझना चाहिए कि वह बच जाएगा।
लक्षणों के आधार पर हैजा रोगी की चिकित्सा :-
1. सरल हैजा या विसूचिका :- इस हैजे की अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए इलाटेरियम की 3 शक्ति, चायना की 6 शक्ति, इपिकाक की 6 शक्ति, आइरिस की 3 शक्ति या क्रोटन औषधि की 6 शक्ति की मात्रा का उपयोग करना लाभकारी है।
2.प्रकृत हैजा (कालेरा) की अवस्था :- प्रकृत हैजा कई प्रकार के रूपों में होते हैं जैसे-
दस्त-प्रधान या आंत्रिक हैजा की अवस्था :- इस अवस्था में रोगी को बार-बार बहुत अधिक मात्रा में दस्त आते हैं। यदि रोगी में यह लक्षण दिखाई दें तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए विरेट्रम की 6 शक्ति या रिसिनस औषधि की 3 शक्ति की मात्रा का उपयोग किया जा सकता है।
उल्टी आने की अवस्था (पाकाशयिक हैजा) :- इस हैजे की अवस्था में रोगी को बार-बार परेशान कर देने वाली उल्टी आती है तथा जी मिचलाता रहता है। ऐसी अवस्था में उपचार करने के लिए आर्सेनिक-ऐल्ब औषधि की 6 शक्ति से उपचार करना उचित होता है।
आंत्रिक पाकाशयिक हैजा या दस्त-उल्टी एक साथ होना :- इस प्रकार की अवस्था उत्पन्न होने पर उपचार करने के लिए रिसिनस की 3 शक्ति, आर्सेनिक की 6 शक्ति, वेरेट्रम-ऐल्ब औषधि की 6 शक्ति से उपचार करना लाभकारी होता है।
हैजा होने पर खूनी दस्त होना तथा इसके साथ ही उल्टी होना :- इस अवस्था में रोगी को खूनी दस्त आते हैं या खूनी की उल्टी होती है। इस प्रकार की अवस्था उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए कार्बो-वेज की 6 शक्ति, मर्क-कोर की 6 शक्ति, फास्फोरस की 3 शक्ति, ऐकोन की 1x मात्रा आइरिस की 3x मात्रा या कैंथरिस औषधि की 3 शक्ति का सेवन करने से अत्यंत लाभ मिलता है।
बुखार होने के साथ ही हैजा होना :- इस अवस्था में रोगी के शरीर की गर्मी बढ़ने के साथ ही साथ दस्त आते हैं तथा उल्टी होती है। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए रिसिनस की 3x मात्रा, रस-टक्स की 6 शक्ति, बैप्टीशिया की 1x मात्रा से 6 शक्ति, ब्रायोनिया की 3 शक्ति, एकोन की 1x मात्रा या बेलेडोना औषधि की 6 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
हैजा होने के साथ ही अकड़न होना :- इस अवस्था में रोगी के शरीर के अंगों में बड़ी तेज अकड़न या खींचन होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सिकेलि की 6 शक्ति, क्यूप्रम की 6 शक्ति या क्यूप्रम आर्सेनिकम की 3x मात्रा का उपयोग करना लाभदायक होता है।
हैजा होने के साथ ही शरीर शुष्क होना तथा दस्त और उल्टी होना :- इस अवस्था में दस्त तथा उल्टी होने से पहले ही रोगी में हिमांग की अवस्था प्रकट हो जाती है और रोग की स्थिति बहुत अधिक गम्भीर हो जाती है। ऐसे रोगी की इस अवस्था में उपचार करने के लिए एसिड-हाइड्रो की 6 शक्ति, टैबेकम की 60 शक्ति, कैम्फर के मदरटिंचर या आर्सेनिक की 3x मात्रा से 6 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
पाक्षाघातिक हैजा :-
इस हैजे की अवस्था शुरू होते ही शरीर नीला पड़ जाता है। हृप्तिण्ड सुन्न पड़ जाती है, छाती पर दबाव महसूस होता है, सांस लेने में परेशानी होती है, नाड़ी कमजोर पड़ जाती है और रोगी बेहोशी की अवस्था में पड़ा रहता है। रोगी की ऐसी अवस्था में उपचार करने के लिए निकोटिन की 3 शक्ति, विरेट्रम की 3x मात्रा विचूर्ण, आर्सेनिकम ऐल्बम की 6 शक्ति या विरेट्रम-ऐल्ब की 6 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है।
हैजा रोग की आक्रमण अवस्था उत्पन्न होने पर उपचार :-
1. कैम्फर :-
हैजा रोग शुरू होने पर एकाएक फेन की तरह दस्त आते है तथा उल्टी आने के साथ ही इस प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं जैसे- ठंड महसूस होना, शक्ति घट जाना आदि। इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने से पहले शरीर नीला और ठंडा पड़ जाए तो इस अवस्था में उपचार करने के लिए कैम्फर औषधि अधिक लाभकारी है।
यदि सर्दी लगने के कारण से हैजा हो जाए तो उसे ठीक करने के लिए कैम्फर बहुत अधिक उपयोगी है।
आक्षेप-प्रधान हैजा उत्पन्न होने पर दस्त होने के साथ उल्टी आने की अवस्था या पाक्षाघातिक हैजा की अवस्था उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए कैम्फर औषधि अधिक फायदेमंद होती है।
यदि दस्त की अपेक्षा उल्टी अधिक आए या उल्टी के कारण हिमांग की अवस्था में तेजी से आ जाए तो कैम्फर बंद करके लक्षण के अनुसार आर्सेनिक औषधि का उपयोग करना चाहिए।
2. आर्सेनिक-ऐल्ब :- यदि बहुत अधिक फल-फूल खाने या बर्फ का पानी पीने के कारण से हैजा हो जाए और बिना दर्द का पानी की तरह अधिक मात्रा में बदबूदार दस्त आएं तथा पेट के तल में गड़बड़ी हो, मृत्यु का भय लग रहा हो, पेट में जलन हो रही हो, तेज श्वास चल रही हो लेकिन थोड़ा सा पानी पीने पर ही प्यास शान्त हो जाए तथा इस प्रकार के लक्षण दिखाई दें जैसे- बहुत अधिक कमजोरी महसूस होना, बेचैनी होना, दस्त तथा उल्टी आना या सिर्फ उल्टी आना, आधी रात के बाद या ठंडे पदार्थों का सेवन करने के बाद रोग के लक्षण में वृद्धि होना आदि। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए आर्सेनिक-ऐल्ब औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
3. चायना :-
फल-फूल खाने के कारण से दस्त होना, बिना दर्द का पानी की तरह दस्त होना, अधिक मात्रा में बदबूदार दस्त होना, आधी रात के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होना, पीले पानी जैसा दस्त आना और खाई हुई चीज का अनपच होकर दस्त में आना आदि। इस प्रकार के लक्षणों के अतिरिक्त रोगी में इस प्रकार लक्षण हों जैसे- पेट फूलना, पेट गड़गड़ाना, अधिक शरीर का खून नष्ट होना या वीर्य का नष्ट होना, कान में भों-भों शब्द सुनाई पड़ना आदि तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए चायना औषधि की 3 या 6 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है।
यदि रोगी में हैजा शरीर में किसी भी प्रकार से खून के नष्ट होने या वीर्य नष्ट होने के कारण से हुआ हो तो उपचार करने के लिए चायना औषधि का उपयोग करना चाहिए।
4. एकोनाइट-नैप :- रोगी में इस प्रकार के हैजा से संबंधित लक्षण हों जैसे- गले हुए तरबूज के पानी की तरह दस्त होना, पेट में तेज दर्द होना, बेचैनी, ठंड महसूस होना, मृत्यु का डर, बुखार के साथ दस्त और उल्टी आना, खूनी दस्त और उल्टी होना आदि। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एकोनाइट-नैप औषधि का उपयोग करना चाहिए। गर्मी या सर्दी लगकर हैजा हुआ हो या बुखार मिले हैजा हुआ हो तो इस रोग का उपचार करने के लिए इस औषधि की 1x मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
5. एसिड-फास :- बिना दर्द का भूरे रंग का दस्त हो रहा हो या पुराना अतिसार हैजा रोग में बदल जाए अथवा बहुत अधिक संभोग करने के कारण से हैजा हो जाए और भोजन के बाद दाहिनी करवट सोने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो तो रोग का उपचार करने के लिए एसिड-फास औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
6. आइरिस :-
हैजा से पीड़ित रोगी में इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- दस्त या उल्टी आना, पतले पानी की तरह, पीले-ढीले दस्त आना, श्लेष्मा या रक्त मिले दस्त, काले, हल्के, हरे या अजीर्ण दस्त होना, पेट गड़गड़ाना तथा पेट में दर्द न होना, दस्त आने के बाद मलद्वार में तेज जलन होना, मलद्वार से हवा निकलने पर पेट का दर्द कम होना, आंखे बैठ जाना, जीभ बर्फ की तरह ठंडी रहना, डकारें आना, मिचली होना, पतली खट्टी उल्टी आना आदि। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आइरिस औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
कालेरिन या विसूचिका हैजा रोग की अवस्था में आइरिस औषधि से उपचार करना अधिक लाभदायक होता है।
7. कोटोन-टिग :-
गोली या पिचकारी की तरह जोर से अचानक दस्त होना, गहरा हरा या हल्का-पीले रंग का पतले दस्त होना, अजीर्ण दस्त होना, मिचली या उल्टी, नाभि के चारों ओर खींचन की तरह दर्द होना आदि लक्षण रोगी में दिखाई दें तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए कोटोन-टिग औषधि की 3 शक्ति से उपचार करें।
खाने-पीने के बाद ही दस्त या उल्टी आ रही हो तो ऐसे हैजा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए कोटोन-टिग औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
8. इलाटेरियम :-
इलाटेरियम औषधि की 6 शक्ति से उपचार तब करते हैं जब रोगी में इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- फेनिला पानी की तरह दस्त होना या हरे रंग का दस्त होना तथा इसके साथ ही सफेद रंग की तरह का कुछ पदार्थ आना या खून मिले हुए दस्त होना, पेट में दर्द हो या न होना आदि।
हैजा रोग को ठीक करने के लिए किसी भी प्रकार की औषधि का प्रयोग करने के बाद भी दस्त हो या उल्टी आना बंद न हो तो इस औषधि का उपयोग करें इससे लाभ मिलेगा।
9. बेलेडोना :-
हैजा रोग होने के साथ इस प्रकार के लक्षण हों जैसे-पानी की तरह, सादे या पीले श्लेष्मा-मिले, आंव मिले, मिट्टी के रंग के, खट्टे या बदबूदार दस्त आना आदि तो उपचार करने के लिए बेलेडोना औषधि की 3 या 6 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है। यदि इस प्रकार के लक्षण हैजे से पीड़ित बच्चे में हों - अकड़न होना, हाथ-पैर ठंडे तथा माथा गर्म होना, सिर में टपक के साथ दर्द होना या सिर हिलते रहना, बुखार आना, बदन सूखा या गर्म पसीना से तर होना, अधिक आलस होना आदि। रोगी बच्चे का मुंह इस प्रकार से चला करता है कि मानो वह कुछ चबा रहा हो, उसके पेट से गों-गों शब्द की आवाजे सुनाई पड़ती है। ऐसे बच्चे के इस रोग को ठीक करने के लिए बेलेडोना औषधि की 3 या 6 शक्ति की मात्रा का उपयोग किया जा सकता है।
जो लोग धूप या आग के सामने काम करते हैं उन्हें हैंजा रोग हो जाए या ज्वर मिले हैजा हो जाए तो उनके इस रोग को ठीक करने के लिए बेलेडोना औषधि का उपयोग करना चाहिए।
10. ब्रायोनिया :- यदि हैजा रोग से पीड़ित किसी रोगी में इस प्रकार के लक्षण हों जैसे- पतले खून-मिले दस्त अधिक मात्रा में आना, मांड की तरह गाढ़े, हरे रंग के या पतले खून-मिले दस्त आना, अजीर्ण के दस्त आना, सड़े या बदबूदार दस्त आना, बुखार रहना, मुंह तथा जीभ सूखा रहना, अधिक मात्रा में प्यास लगना, सिर में दर्द होना, मुंह का स्वाद तीता लगना, मिचली आना, पीली या हरे रंग की कड़वी उल्टी आना, पेट में दर्द होना, सिर हिलाना, ठंडी या खट्टी चीजें पीने की इच्छा होना, बुखार होना तथा बकते रहना आदि। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि की 3 शक्ति का सेवन करने से अत्यंत लाभ मिलता है।
11. बैप्टीशिया :- पीले रंग की पानी की तरह बदबूदार दस्त आना, खून तथा श्लेष्मा मिले दस्त आना, उल्टी तथा मिचली आना, सांस लेने पर बदबू आना, पसीने से बदबू आना, नाड़ी कोमल और पूर्ण रहना, बुखार रहना, पूरे शरीर में दर्द रहना, अधिक सुस्ती आना, चेहरे का रंग गहरा लाल होना, अधिक मोह होना, बात करते-करते सो जाना, नींद न आना या फिर गहरी नींद आना, पेट अंदर की ओर धंसते हुए महसूस होना, जीभ का बीच का भाग पीला और भूरा तथा किनारे वाला भाग चमकीला और लाल रंग का होना, पेट में बिना दर्द के ऐंठन होना आदि प्रकार के लक्षण हैजा से पीड़ित रोगी में दिखाई दें तो उसके रोग का उपचार करने के लिए बैप्टीशिया औषधि की 1x मात्रा या 6 शक्ति का प्रयोग करें।