Dr S K Sastri

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06/09/2022
26/06/2021

22/06/2021

अंधापन
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#औषधियां #दवाईयां
#अंधापन #दर्द

#अंधापन
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Homeopathic Treatment By Dr.S.K.Sastri

* जन्मांध होने के अलावा कुछ और ऐसी बातें भी हैं, जिनका ध्यान रखा जाए, तो अंधेपन के अभिशाप से बचा जा सकता है। मोतियाबिंद (कैटेरैक्ट), ग्लोकोमा (काला पानी)। अंधेपन का सबसे जिम्मेदार कारण है कुपोषण, जिससे होने वाले अंधेपन को जेरोफ्थेलमिया कहते हैं।

* कुपोषण से होने वाली यह बीमारी अधिकतर विकासशील देशों में ही पाई जाती है। भारत में हर साल लगभग चालीस हजार बच्चे पूरी तरह और इससे दो गुने से भी अधिक आंशिक रूप से अंधेपन के शिकार हो जाते हैं। इस रोग का सर्वाधिक प्रकोप 1-2 साल के बच्चों पर होता है। लैटिन भाषा में जेरो का मतलब है सूखना और अफ्थेलमिया यानी आंख अर्थात् जेरोफ्थेलमिया का अर्थ हुआ आंख का सूखना।

* दृष्टि के लिए सबसे जरूरी तत्त्व है विटामिन 'ए'। विटामिन 'ए' एक ऐसा कार्बनिक मिश्रण है जो शरीर के लिए जरूरी तो बहुत है पर शरीर में स्वत: बनता नहीं है। इसकी आपूर्ति के लिए बाहरी खाद्य पदार्थों की सहायता लेनी पड़ती है। इस विटामिन की कमी से शरीर में बहुत से विकार हो जाते हैं, जिनमें प्रमुख है, आंखों की ज्योति खो बैठना इसके अतिरिक्त विटामिन 'ए' की कमी से त्वचा खुरदुरी हो जाती है, शरीर का विकास रुक जाता है, प्रतिरोधक शक्ति दिन-प्रतिदिन कम होती चली जाती है। ऐसी हालत में किसी भी रोग की छूत लगने की संभावना पैदा हो जाती है।

* अतिसार जैसे साधारण रोग बार-बार होने पर शरीर से विटामिन निकल जाते हैं और एक कमी हमेशा बनी रहती है। इसी के साथ सही और समय पर उपचार न मिलने पर अंधापन भी हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि किसी रोग के हमला करने पर उसके उपचार के साथ-साथ विटामिन 'ए' उपयुक्त मात्रा में दिया जाता रहे, जिससे भविष्य में स्वास्थ्य ठीक ठाक बना रहे। विटामिन की अत्यधिक कमी होने पर मृत्यु भी संभव है।

* इस बीमारी में आंख देखने से ही खुरदुरी लगती है, जिसे जेरोसिस कहते हैं।

* विटामिन 'ए' की कमी के प्रारंभिक लक्षण स्वरूप रतौंधी होती है। इसमें शाम और रात में दिखना कम हो जाता है। छोटी उम्र में ही बच्चों को प्रभावित करने वाले इस रोग में पहले श्लेष्मा या कंजक्टाइवा में बिटांट स्पांट नामक स्लेटी, मटमैले से धब्बे दिखाई देते हैं। यदि इस समय विटामिन 'ए' की कमी की पर्याप्त आपूर्ति नहीं को जाए, तो कार्निया प्रभावित होना शुरू हो जाता है। वह सूखकर खुरदुरा होने लगता है और उसमें घाव हो जाते हैं उसकी चमक भी जाती रहती है। पहले धुंधला दिखाई देता है, फिर कार्निया सफेद हो जाता है और फिर अंधेपन की नौबत आ जाती है। इस स्थिति के बाद आंखों की ज्योति लौटना मुश्किल होता है। फेफड़ों और पेट के रोगों में विटामिन 'ए' की कमी शीघ्र हो जाती है।

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बचाव:
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- जेरोफ्थेलमिया का मुख्य कारण है कुपोषण।यदि बच्चे को जन्म के बाद ही नहीं, बल्कि जन्म से पहले ही (गर्भ में) अच्छी खुराक मिलने लगे, तो जेरोफ्थेलमिया होगा ही नहीं। अत: गर्भवती महिलाओं को भरपूर विटामिनयुक्त पोषक खुराक मिलनी चाहिए। इससे गर्भस्थ शिशु की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।

* जब बच्चा ठीक से खाने लगे, तो उसके खाने में हरी पतेदार सब्जियां, पीले रंग के फलं, दूध आदि का समावेश अवश्य करें।

नेत्र रोग होमियोपैथिक उपचार:
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- मुख्य रूप से उक्त प्रकार के अंधत्व की शुरुआत में ये औषधियां कारगर रहती हैं -'ओरममेट', 'सिनकोना', 'कोनियम', 'जेलसीमियम', 'मरक्यूरियस', 'फॉस्फोरस', 'प्लम्बममेट', 'साइलेशिया', 'टेबेकम', 'जिंकममेट', 'नेट्रमम्यूर'।

* वस्तुएं अपने आकार से अधिक बड़ी दिखाई पड़े – 'हायासाइमस', 'आक्जेलिक एसिड', 'बोविस्टा', 'हिपर सल्फ'।

* वस्तुएं अपने आकार से बहुत छोटी दिखाई पड़े – 'प्लेटिना', 'ग्लोलाइन', स्ट्रामोनियम' ।

#बीथ्रीपस_लेंसिचोलेट्स : अंधत्व, आंखों के अंदरूनी भाग, जहां चित्र बनता है (रेटिना) में रक्तस्राव होने के कारण अंधत्व, दिन में दिखाई नहीं देता, सूर्योदय के बाद रोगी को रास्ता तक दिखाई पड़ना बंद हो जाता है, कंजवटाइवा (आंखों की झिल्ली) में भी रक्तस्राव होता है। दाहिनी आंख ज्यादा प्रभावित होती है, तो पहले 6 × शक्ति में कुछ दिन औपधि सेवन करना चाहिए। लाभ होने पर कुछ दिन 30 शक्ति में भी औषधि लेनी चाहिए।

#फाइसोस्टिग्मा : रोगी को रात में दिखाई नहीं पड़ता, रोगी किसी भी प्रकार रोशनी बर्दाश्त नहीं कर पाता, पुतलियों में संकुचन रहता है, आंखों को घुमाने वाली मांसपेशियों में ऐंठन, काला.मोतिया (ग्लोकोमा), वस्तु की सही दूरी का ज्ञान नहीं हो पाता, आंखों के प्रयोग से चिड़चिड़ाहट होना, निकट दृष्टि रोग हो जाता है, कभी-कभी आंखों का पक्षाघात भी हो जाता है, तो 3 × शक्ति में औषधि प्रयोग करनी चाहिए।

#सैन्टोनियम : रोगी को रंगों का अंतर पता नहीं चलता। अचानक दृष्टि बोझिल हो जाती है. आंखों का तिरछापन (भेंगापन), प्राय: सभी वस्तुएं पीली-पीली दिखाई पड़ती हैं,पेट में कीड़े पाए जाते हैं, आंखों के नीचे काले गड्ढे होते हैं, तो यह दवा 3 × शक्ति में औषधि प्रयोग करनी चाहिए।

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मासिकधर्म का दर्द (ऋतु-शूल)----------------------------         #औषधियां  #दवाईयां      **es      #दर्द  #मासिकधर्म_का_द...
19/06/2021

मासिकधर्म का दर्द (ऋतु-शूल)
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#औषधियां #दवाईयां
**es #दर्द

#मासिकधर्म_का_दर्द (ऋतु-शूल)
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जब स्त्री को मासिकस्राव बहुत तेज दर्द के साथ आता है तो उसे ऋतु-शूल (मासिकधर्म का दर्द) कहा जाता है। ये रोग ज्यादातर उन स्त्रियों में होता है जो सारे दिन बैठी रहती है, ज्यादा मेहनत वाले काम नहीं करती है।

कारण-
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ये रोग सामान्य हो सकता है या किसी शारीरिक विकृति के कारण भी हो सकता है। इसके अलावा कभी-कभी ये रोग गर्भाशय में अर्बुद (फोड़ा) बनने तथा गर्भ को ठहरने से रोकने वाली औषधियों का सेवन करने से भी हो जाता है।

लक्षण-
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ऋतु-शूल (मासिकधर्म के दौरान होने वाला दर्द) के लक्षणों में रोगी स्त्री के पीठ में और पेट के नीचे वाले भाग में मासिकधर्म आने से 3-4 दिन पहले दर्द शुरू हो जाता है जो कभी-कभी मासिकधर्म के बाद समाप्त हो जाता है और कभी-कभी होता भी नहीं है। इसके साथ ही रोगी स्त्री को उल्टी, जी मिचलाना और बेहोशी जैसे लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं।

सावधानी-
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* रोगी स्त्री को मासिकधर्म के दिनों में ज्यादा मेहनत वाले काम नहीं करने चाहिए जैसे- भारी सामान उठाना, व्यायाम करना आदि।

* उसे अपने भोजन में पौष्टिक आहार जिनमें विटामिन-बी-काम्प्लेक्स, कैल्शियम और मैगनीज आदि लेने चाहिए। ज्यादा गरिष्ठ चीजों का सेवन रोगी स्त्री को नहीं करना चाहिए।

* रोगी स्त्री को एक ही बार में ज्यादा भोजन ना करके थोड़े-थोड़े समय के बाद कुछ ना कुछ खाते रहना चाहिए।

* जहां तक हो सके रोगी स्त्री को ताजे फल और सब्जियां आदि खाने चाहिए क्योंकि इनके सेवन से पेट में कब्ज नहीं बनती है।

विभिन्न औषधियों से उपचार:
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#कॉलोफाइलम- कॉलोफाइलम औषधि स्त्री को मासिकधर्म के समय होने वाले दर्द में बहुत ही आराम पहुंचाने वाली मानी जाती है। मासिकधर्म में दर्द के समय इस औषधि की 3 शक्ति का हर 1-1 घंटे के बाद सेवन करने से मासिकधर्म खुलकर आ जाता है और दर्द कम हो जाता है। इसके अलावा मासिकधर्म से पहले गर्भाशय में ऐंठन सी होना, कमर में दर्द होना, ठंड सी महसूस होना, जी का मिचलाना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, उल्टी के साथ पीले रंग का पित्त का आना जैसे लक्षणों में भी रोगी स्त्री को कॉलोफाइलम औषधि देना लाभकारी रहता है।

#हेलोनियास- रोगी स्त्री के गर्भाशय में बहुत तेज दर्द होना, जांघ और पीठ में हर समय दर्द का रहना, काले धागे की तरह का स्राव आना आदि लक्षणों के आधार पर उसे हेलोनियस औषधि की 3 शक्ति देने से लाभ मिलता है।

#जेलेसिमियम- गर्भाशय में खून जमा होने के कारण खिंचाव हो होना, योनिद्वार और उरु में अकड़न की तरह का दर्द होना जो पहले पेट से शुरू होता है और फिर धीरे-धीरे कमर और पीठ के ऊपरी भाग तक फैल जाता है, रोगी स्त्री के गर्दन के पीछे ऐंठन का सा दर्द होता है, कभी-कभी मासिकधर्म का दर्द बंद हो जाता है तो रोगी स्त्री को नींद और सुस्ती सी छाई रहती है। इन सारे लक्षणों के आधार पर जेलसिमियम औषधि की 3x मात्रा का सेवन करना फायदेमन्द होता है। अगर रोगी स्त्री के इन सारे लक्षणों के साथ बुखार भी होता है तो यह औषधि और भी अच्छा लाभ करती है।

#कैक्टस- रोगी स्त्री को मासिकधर्म के दौरान होने वाला दर्द इतना तेज होता है कि जिसके कारण वो बहुत तेज-तेज रोने लगती है, रोगी स्त्री को बहुत ज्यादा सुस्ती सी छाई रहती है। इन लक्षणों में रोगी स्त्री को कैक्टस औषधि देने से लाभ मिलता है।

#कौक्युलस- स्त्री का मासिकधर्म के समय में स्राव का ज्यादा या कम आना और उसके साथ इस तरह का दर्द होना जैसे कि पेट में तेज पत्थरों को आपस में रगड़ा जा रहा हो, पेट फूल जाए या पेट में हवा भर जाए, दर्द के मारे रोगी स्त्री को रात में नींद ना आए तथा डकारें आने से दर्द कम हो जाए जैसे लक्षणों में कौक्युलस औषधि की 3 या 30 शक्ति देने से लाभ मिलता है। इसके अलावा मासिकस्राव का काले रंग में आना, मासिकधर्म के दर्द के साथ कमर में भी बहुत तेजी से दर्द होना, चलते समय लड़खड़ा जाना आदि लक्षणों में भी कौक्युलस औषधि का प्रयोग किया जा सकता है।

#इग्नेशिया- रोगी स्त्री को मासिकधर्म के समय ज्यादा स्राव होने के कारण दर्द होने पर इग्नेशिया औषधि देना अच्छा रहता है। स्त्री का मासिकस्राव समय से पहले हो जाना, स्राव का काफी तेज होना, हर 10 से 15वें दिन स्राव का आ जाना, स्राव का काले और थक्कों के रूप में आना, रोगी स्त्री के गर्भाशय के पूरे भाग में बहुत तेज दर्द होना जिसमें दबाव से या पीठ के बल लेटने से आराम पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में रोगी स्त्री को इग्नेशिया औषधि की 200 शक्ति दी जा सकती है।

#कैमोमिला- कैमोमिला औषधि का भी रोगी स्त्री के ज्यादा मासिकस्राव आने के कारण दर्द होने पर प्रयोग किया जा सकता है। रोगी स्त्री बहुत ज्यादा चिड़चिड़ी हो जाती है, किसी से ढंग से बात नहीं करती, मासिकस्राव बहुत ज्यादा काले रंग का आता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी स्त्री को कैमोमिला औषधि की 30 शक्ति देने से लाभ मिलता है।

#पल्सेटिला- पल्सेटिला औषधि को स्त्रियों के गर्भाशय सम्बंधी रोगों में होमियोपैथिक चिकित्सा की सबसे अच्छी औषधि माना जाता है। स्त्री का मासिकस्राव अनियमित होना जैसे स्राव कभी आता है और कभी नहीं आता, कभी थोड़ी मात्रा में आता है और कभी काफी दिनों तक आता रहता है। मासिकस्राव में दर्द के साथ रोगी स्त्री को ठंड महसूस होना, रोगी स्त्री के दर्द के लक्षण बदलते रहते हैं जैसे कभी तो दर्द पेट में होता है, कभी जिगर में होता है, कभी जांघों में होता है तो कभी गुदा में होता है, कभी मूत्राशय में होता है और कभी अगल-बगल में होता है। इन सारे लक्षणों में रोगी स्त्री को पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति देने से आराम मिलता है।

#मैग_फॉस- मैग-फॉस औषधि को मासिकधर्म के दौरान होने वाले दर्द की बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है। अगर मासिकधर्म के दर्द में गर्म सिंकाई करने से आराम मिलता है तो रोगी स्त्री को इस औषधि की 3x मात्रा या 6x विचूर्ण गर्म पानी के साथ हर 10-10 मिनट के बाद देनी चाहिए।

#क्सैन्थौक्साइलम- मासिकधर्म में होने वाले दर्द में क्सैन्थौक्साइलम औषधि की 1x या 3x की मात्रा का सेवन करने से ज्यादातर रोगी स्त्रियां बिल्कुल ठीक हो जाती है।

वाइबरनम_औप्युलस- वाइबरनम-औप्युलस औषधि को मासिकधर्म में होने वाले दर्द की बहुत ही अच्छी औषधि कहा जाता है। रोगी स्त्री को अचानक दर्द चालू होकर लगातार 7 से 10 घंटे तक रहता है, गर्भाशय में से दर्द शुरू होकर रोगी स्त्री के पूरे शरीर में फैल जाता है। इस तरह के लक्षणों में वाइबरनम-औप्युलस औषधि की 3x मात्रा का उपयोग करना उचित रहता है।

#बेलेडोना- रोगी स्त्री को मासिकधर्म के समय खून चाहे कम आए या ज्यादा लेकिन उसे दर्द बहुत तेज होता है। मासिकधर्म आने से पहले थकावट सी होना, भूख न लगना, मासिकधर्म आने के दौरान सीने में पसीना आना, कभी-कभी ठंड सी लगना, खून का लाल तथा बहुत गर्म होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी स्त्री को बेलेडोना औषधि की 30 शक्ति देने से लाभ मिलता है।

#बोरैक्स- अगर रोगी स्त्री के गर्भाशय में झिल्ली द्वारा रुकावट होने के कारण मासिकधर्म का दर्द होता हो तो उसे रोजाना 3 बार बोरैक्स औषधि की 1x की मात्रा देना लाभकारी रहता है।

#सीपिया- अगर मासिकस्राव कम आने के कारण दर्द होता है तो रोगी स्त्री को सीपिया औषधि की 200 शक्ति दी जा सकती है।

#सिकेलि_कोर- रोगी स्त्री को मासिकस्राव आने के समय से पहले ही मैला, दाने के रूप में और बदबूदार स्राव का आ जाना, रोगी स्त्री को तलपेट में इस तरह का दर्द होना जैसे कि पेट की सारी चीजें योनिद्वार से बाहर निकल रही हो, उसे पूरे शरीर और हाथ-पैरों में तो बहुत ही ज्यादा ठंडा पसीना आना, नाड़ी का कमजोर हो जाना, रोगी स्त्री के मूत्राशय और मलद्वार में बहुत तेज काटने की तरह का दर्द उठना, स्राव न आना और कमजोरी आना जैसे लक्षणों में रोगी स्त्री को सिकेलि-कोर औषधि की 6 शक्ति देने से आराम मिलता है।

#नक्स_वोमिका- रोगी स्त्री को बिना मासिकधर्म के थोड़ा सा खून आना, ठंड सी महसूस होना, भूख ना लगना, सुबह के समय जी मिचलाना या उल्टी होना जैसे लक्षणों में नक्स-वोमिका औषधि की 6 या 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी रहता है।

#सिमिसिफ्यूगा- मासिकधर्म का दर्द वस्ति-गव्हर के एक तरफ से दूसरी तरफ आते रहना जैसे लक्षणों में रोगी स्त्री को सिमिसिफ्यूगा औषधि की 3 या 30 शक्ति दी जा सकती है।

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17/06/2021

पित्ती उछलना
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#चर्म_रोग #दर्द

#पित्ती_उछलना
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यह एक प्रकार का चर्म-रोग ही है । खान-पान के दोष से, शरीर को धूप न मिल पाने की वजह से, सदैव सीलन भरे स्थानों पर रहने की वजह से, सर्दी लगने की वजह से अथवा किसी अन्य कारण से शरीर की त्वचा पर लाल रंग के चकते जैसे उद्भेद उभर आते हैं जिसे पित्ती उछलना कहा जाता है । इनमें बार-बार खुजली मचती है जिससे रोगी परेशान हो जाता हैं । रोगी को ढंग से लेटा-बैठा भी नहीं जाता ।

#एकोनाइट - सर्द हवा लगने या वर्षा-पानी में भीगने के कारण पित्ती निकल आये, साथ ही, बुखार और बेचैनी भी हो तो इसका प्रयोग अत्यन्त लाभप्रद रहता है ।

#पल्सेटिला – बासी भोजन करने या दूषित घी-तैल आदि का प्रयोग करने से पित्ती उछले तो इसी दवा का प्रयोग करना चाहिये ।

#अर्टिका_यूरेन्स - पेशाब ज्यादा मात्रा में हो, चमड़े पर खुजली एवं चुभन महसूस हो और इसके साथ ही पित्ती उछल आवे तो इस दवा का प्रयोग करना लाभप्रद है ।

#नक्सवोमिका - शराबियों के रोग में अथवा पाचन-संस्थान की गड़बड़ी के कारण पित्ती उछलने में लाभ करती हैं ।

#आर्सेनिक - पित्ती उछलने के बाद बेचैनी का अनुभव हो तो यह दवा लाभ करती है ।

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14/06/2021

मांस-पेशियों में दर्द
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#कोल्ड #मांस_पेशिया #दर्द

#मांस_पेशियों_में_दर्द
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विभिन्न औषधी से रोग का उपचार
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#आर्निका- आर्निका औषधि को मांस-पेशियों में होने वाले दर्द को दूर करने के लिए सबसे अच्छी औषधि माना जाता है। दर्द शरीर के किसी भी भाग की किसी भी मांस-पेशी में उठ सकता है। इसका दर्द दो तरह का होता है- चोट लगने के कारण होने वाला दर्द या ज्यादा शारीरिक परिश्रम करने के कारण मांस-पेशियों के थक जाने से होने वाला दर्द। दोनों ही तरह के दर्द में आर्निका औषधि की 3 या 30 शक्ति लाभ करती है।

#सिमिस्फ्यूगा- सिमिस्फ्यूगा औषधि को अक्सर स्त्रियों के शरीर में होने वाले दर्द में इस्तेमाल किया जाता है। वात-व्याधि के कारण मांसपेशियों में दर्द (मस्क्युलर रेहयुमेटिज्म) होने में भी इस औषधि की 3 या 30 शक्ति लाभ करती है।

#ऐकोनाइट- अगर सर्दी के मौसम में ज्यादा ठण्डी हवा लगने के कारण शरीर सुन्न सा पड़ जाए या उसमें दर्द होने लगे तो रोगी को ऐकोनाइट औषधि की 30 शक्ति दी जानी चाहिए।

#ब्रायोनिया- सूखी ठण्ड लगने से अगर शरीर में दर्द होता है और जरा सी हरकत से ही बढ़ जाता है तो ब्रायोनिया औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।

#डलकेमारा- अगर बारिश आदि में ज्यादा भीग जाने के कारण शरीर में दर्द होता है तो डलकेमारा औषधि की 3 या 30 शक्ति लेने से लाभ मिलता है।

#जेल्सीमियम- अगर रोगी को बुखार आ जाता है और इसके साथ ही उसके शरीर के दूसरे अंग दर्द करने लगते हैं जैसे सिर, पीठ आदि, दर्द शरीर के अंगों में अन्दर तक बैठ जाता है, रोगी की टांगें बिल्कुल कमजोर पड़ जाती हैं, रोगी न सोते हुए भी नींद की ही अवस्था में रहता है तो ऐसे लक्षणों में उसे जेल्सीमियम औषधि की 30 शक्ति देना लाभकारी रहता है।

#कास्टिकम- रोगी के शरीर के अंगों का इतना ज्यादा कमजोर हो जाना जैसे कि उनमें लकवा मार गया हो। इस तरह का दर्द होने पर रोगी अपने आप को बिल्कुल असहाय और अकड़ा हुआ सा महसूस करता है। सुबह के समय उठने पर रोगी को दर्द के मारे बिस्तर में से निकलने का मन ही नहीं करता। इस तरह के लक्षणों में अगर उसे कास्टिकम औषधि की 6 शक्ति हर 2 घंटे के बाद दी जाए तो उसे आराम पड़ जाता है।

#कोलचिकम- रोगी के दाएं पैर तथा बांहों में बहुत तेजी से होने वाला दर्द इसके साथ ही उसके कंधों, नितंबों और टांगों में भी दर्द होने जैसे लक्षणों में रोगी को कोलचिकम औषधि की 3 या 30 शक्ति दी जा सकती है।

#वेरेट्रम_वीर- रोगी को अपने पूरे शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी सी महसूस होती है। इसके साथ ही शरीर के अंगों और जोड़ों में दर्द होना, पीठ, गर्दन, कंधें, जोड़ों तथा मांस-पेंशियों में दर्द होने में रोगी को वेरेट्रम-वीर औषधि की 3 शक्ति हर 2 घंटे के बाद देने से लाभ मिलता है। ये औषधि सिस्टौलिक और डायोस्टौलिक दोनों तरह के ब्लड-प्रेशर को काबू में ले आती है।

#ऐन्टिम_टार्ट- रोगी की रीढ़ के नीचे की हड्डी में बहुत तेजी से होने वाला दर्द जिसके कारण रोगी जरा सा भी हिलता है तो उसे ऐसा लगता है जैसे उल्टी आने वाली है। इसके साथ ही उसे ठण्डा और चिपचिपा सा पसीना आता है। रोगी को अपनी पिक-चंचु-अस्थि (कोक्सीएक्स) (रीढ़ की सबसे नीचे की हड्डी) के ऊपर किसी तरह का भार सा महसूस होता है।

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