08/02/2026
Nabhi Oil Therapy - नाभि में तेल या घी लगाना: सच क्या है, भ्रम क्या है? नाभि में तेल या घी डालने को लेकर यह दावा किया जाता है कि इससे कई तरह के स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि इससे कब्ज की समस्या में राहत मिलती है, तो कुछ इसे हार्मोन संतुलन से जोड़कर देखते हैं। वहीं, त्वचा और बालों के लिए भी इसके फायदों की बात कही जाती है।
अब सवाल यह है -
क्या ये सब सच है?
नाभि में तेल लगाना आयुर्वेद में सच में माना गया है या ये सिर्फ ट्रेंड है?
कब लगाना चाहिए, किसे लगाना चाहिए और किसे बिल्कुल नहीं लगाना चाहिए?
इस पोस्ट में इसी पर बात करेंगे, शुद्ध आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से।
सबसे पहले समझिए: नाभि होती क्या है?
नाभि को हम आम भाषा में पेट के बीच का गड्ढा समझते हैं,
लेकिन आयुर्वेद में इसे कहते हैं Umbilical region।
ये सिर्फ स्किन का एक पॉइंट नहीं है,
बल्कि पूरे शरीर की कई ऊर्जाओं का junction point है।
आयुर्वेद में नाभि इतनी important क्यों मानी गई?
1. नाभि और पाँच प्रकार की वायु का कनेक्शन
आयुर्वेद में शरीर को वात, पित्त, कफ में बाँटा गया है।
और वात के पाँच प्रकार होते हैं:
प्राण वायु – साँस, एनर्जी, दिमाग
उदान वायु – बोलना, आवाज़, ताकत
व्यान वायु – पूरी बॉडी में circulation
समान वायु – digestion
अपान वायु – नीचे की तरफ निकलने वाली चीजें
अब ध्यान से समझिए
समान वायु
खाना पचाना
पोषण को अलग करना
मल को सही समय पर बाहर भेजना
समान वायु नाभि के आसपास रहती है
अपान वायु
गैस निकलना
यूरिन
मल
मासिक धर्म
सका भी सीधा कनेक्शन नाभि से है
इसलिए आयुर्वेद कहता है -
नाभि वात का central hub है
2. गर्भ से लेकर जन्म तक नाभि का रोल
जब हम माँ के गर्भ में होते हैं,
तो हमारा पूरा पोषण नाभि (umbilical cord) के ज़रिए ही होता है।
गर्भधारण से लेकर डिलीवरी तक,
माँ और बच्चे का पूरा कनेक्शन नाभि से जुड़ा रहता है।
इसलिए नाभि को आयुर्वेद में सिर्फ स्किन नहीं,
life-support point माना गया है।
3. नाभि और मणिपुर चक्र
योग और शास्त्रों में जो energy centers (चक्र) बताए गए हैं:
मूलाधार
स्वाधिष्ठान
मणिपुर चक्र
मणिपुर चक्र का स्थान नाभि है
मणिपुर चक्र =
पाचन शक्ति
आत्मबल
अंदर की आग (digestive fire)
“नाभि हिल गई” जैसी बातें क्यों कही जाती हैं?
आपने सुना होगा -
नाभि हिल गई
पेट ढीला हो गया
लूज मोशन, गैस, कमजोरी
ये सारी बातें वात imbalance से जुड़ी होती हैं।
आयुर्वेद में वात को “भगवान” कहा गया है,
क्योंकि वही सब कुछ चलाती है -
और उसका बड़ा control center नाभि है।
आयुर्वेद में नाभि में तेल डालने को क्या कहते हैं?
आयुर्वेदिक टर्म है - नाभि पूरण
नाभि = Umbilical region
पूरण = भरना
जैसे:
कान में तेल डालना = कर्ण पूरण
वैसे ही नाभि में तेल/घी डालना = नाभि पूरण
मतलब नाभि के गड्ढे को हल्के से तेल या घी से भर देना।
नाभि में तेल या घी कब फायदेमंद होता है?
जब वात ज्यादा बढ़ी हुई हो
वात का नेचर होता है:
रूखा
सूखा
हल्का
चलायमान
इसलिए जहाँ भी dryness है, वहाँ तेल काम करता है।
ऐसे लक्षणों में नाभि पूरण फायदेमंद है:
कड़क कब्ज
बहुत ज्यादा गैस
पेट के आसपास खिंचाव
स्किन बहुत टाइट लगना
बार-बार पेट खराब होना
होंठ फटना
चिड़चिड़ापन
digestion कमजोर होना
पित्त की गर्मी में भी मददगार
अगर:
नाभि के आसपास जलन
बहुत गर्मी लगती है
acidity
पेशाब में जलन
गुदा मार्ग में जलन या fissure
तो नाभि में ठंडे स्वभाव का तेल या घी आराम दे सकता है।
महिलाओं से जुड़ी समस्याओं में
पीरियड्स में तेज दर्द
यूरिन करते समय जलन
motion के समय दर्द
pelvic discomfort
इनमें भी नाभि पूरण सहायक हो सकता है।
किन लोगों को नाभि में तेल नहीं लगाना चाहिए?
यह बहुत जरूरी है
जिनको:
बहुत ज्यादा कफ की समस्या
बहुत चिकना मल
बार-बार यूरिन
बहुत ज्यादा मोटापा
उनके लिए घी या भारी तेल नुकसान कर सकता है।
मोटे लोगों के लिए क्या ऑप्शन है?
अगर फिर भी लगाना ही है तो:
सरसों का तेल
थोड़ा गरम
कफ काटता है
लेकिन:
सरसों का तेल शुक्रधातु को कमजोर करता है
ज्यादा दिन नहीं लगाना चाहिए
7–14 दिन, max 21 दिन काफी है
अगर:
जलन
पेशाब में गर्मी
ज्यादा heat लगे
तो सरसों का तेल बंद कर दें।
किस को कौन सा तेल लगाना चाहिए?
Normal लोग - नारियल तेल
ज्यादा वात - तिल का तेल
ज्यादा गर्मी - घी या नारियल तेल
नाभि में तेल कब लगाएं?
खाली पेट लगाना सबसे अच्छा
रात को सोने से पहले भी ठीक
बॉडी मसाज के साथ भी कर सकते हैं
कोई बहुत hard rule नहीं है, consistency ज्यादा जरूरी है।
आख़िरी बात
नाभि में तेल लगाना कोई चमत्कार नहीं,
लेकिन सही व्यक्ति, सही तेल और सही स्थिति में
यह बहुत काम का आयुर्वेदिक उपाय है।