Vaidya Dr. Ajay Gupta

Vaidya Dr. Ajay Gupta Official Page of Dr Ajay Gupta. Best Ayurveda Doctor in Eastern UP
M.D. (AY) B.H.U. Varanasi
B.A.M.S. (Govt Ayu College, Varanasi) Gold Medalist
Dip. Former Asst.

Journalism(Online)
Ex.Consultant at Govt Ayu College, Varanasi. Prof. IMS, BHU

01/05/2026

TSH और Thyroid को समझिए आसान भाषा में
TSH (Thyroid Stimulating Hormone) एक हार्मोन है जो दिमाग की पिट्यूटरी ग्रंथि से बनता है और थायरॉइड ग्रंथि को नियंत्रित करता है। यदि TSH बढ़ा हुआ है तो अक्सर इसका मतलब होता है कि थायरॉइड कम काम कर रहा है (Hypothyroidism), और यदि TSH कम है तो कई बार थायरॉइड ज्यादा सक्रिय हो सकता है (Hyperthyroidism)। थायरॉइड की गड़बड़ी से थकान, वजन बढ़ना या घटना, बाल झड़ना, कब्ज, घबराहट, नींद की समस्या, दिल की धड़कन तेज होना जैसे लक्षण दिख सकते हैं। केवल TSH देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए, कई बार Free T3, Free T4 और Anti-TPO जैसी जांच भी जरूरी होती है। सही समय पर जांच, संतुलित आहार, तनाव नियंत्रण और डॉक्टर की सलाह से थायरॉइड अच्छी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

आजकल बहुत से लोगों की Ultrasound या FibroScan रिपोर्ट में Fatty Liver निकलता है, और सबसे पहला सवाल यही होता है कि क्या य...
01/05/2026

आजकल बहुत से लोगों की Ultrasound या FibroScan रिपोर्ट में Fatty Liver निकलता है, और सबसे पहला सवाल यही होता है कि क्या यह ठीक हो सकता है? अच्छी बात यह है कि फैटी लिवर के अधिकांश मामलों में सुधार संभव है, खासकर यदि समय रहते ध्यान दिया जाए। जितना शुरुआती ग्रेड होगा, उतनी जल्दी और बेहतर रिकवरी की संभावना रहती है।

1️⃣ Grade 1 Fatty Liver – सबसे आसानी से ठीक होने वाला
यह फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था होती है, जिसमें लीवर में हल्की मात्रा में चर्बी जमा होती है। अधिकतर लोगों को कोई लक्षण नहीं होते और रिपोर्ट में संयोग से पता चलता है। यदि इस समय वजन नियंत्रित कर लिया जाए, तला-भुना भोजन कम किया जाए, रोजाना वॉक की जाए और शुगर-कॉलेस्ट्रॉल कंट्रोल रखा जाए, तो यह पूरी तरह सामान्य हो सकता है। यह सबसे reversible stage मानी जाती है।

2️⃣ Grade 2 Fatty Liver – सावधानी जरूरी
इस अवस्था में लीवर में चर्बी अधिक मात्रा में जमा होने लगती है और कुछ लोगों में SGPT/SGOT भी बढ़ सकते हैं। यदि व्यक्ति इस समय भी लापरवाही करे तो बीमारी आगे बढ़ सकती है। लेकिन सही खानपान, नियमित व्यायाम, मोटापा कम करना और डॉक्टर की सलाह से यह भी काफी हद तक ठीक हो सकता है। कई मरीजों में 3 से 6 महीने में अच्छा सुधार देखा जाता है।

3️⃣ Grade 3 Fatty Liver – गंभीर लेकिन सुधार संभव
Grade 3 में लीवर में फैट काफी बढ़ जाता है और सूजन या fibrosis शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। इस समय मरीज को पेट भारी लगना, कमजोरी, गैस, थकान जैसे लक्षण हो सकते हैं। यह स्थिति गंभीर जरूर है, लेकिन यदि समय पर उपचार लिया जाए तो सुधार संभव है। इसमें अधिक अनुशासन, लंबा इलाज और नियमित जांच की जरूरत होती है।

4️⃣ Grade 4 Fatty Liver – रिपोर्ट को सही समझना जरूरी
कुछ रिपोर्टों में Grade 4 लिखा मिलता है, लेकिन अक्सर यह शब्द advanced fibrosis या cirrhosis जैसी स्थिति की ओर संकेत कर सकता है, खासकर FibroScan रिपोर्ट में। ऐसी अवस्था में केवल फैट नहीं बल्कि लीवर में कठोरता भी हो सकती है। यहाँ “पूरी तरह नया जैसा लीवर” होना कठिन हो सकता है, लेकिन बीमारी को रोकना, लीवर को स्थिर रखना, complications से बचाना और कार्यक्षमता सुधारना संभव होता है।

🍁 कौन सा ग्रेड कितने समय में सुधर सकता है?
Grade 1 वाले मरीजों में 2 से 4 महीने में सुधार दिख सकता है। Grade 2 में 3 से 6 महीने या उससे अधिक समय लग सकता है। Grade 3 में 6 महीने से 1 साल तक मेहनत करनी पड़ सकती है। यदि fibrosis या cirrhosis है, तो लक्ष्य लंबे समय तक नियंत्रण और progression रोकना होता है।

🤔 केवल ग्रेड देखकर फैसला न करें
सिर्फ Ultrasound grade देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। साथ में SGPT, SGOT, Lipid Profile, Sugar, Platelet Count, FibroScan, वजन, कमर का आकार और जीवनशैली भी देखना जरूरी है। कई बार Grade कम होता है लेकिन नुकसान ज्यादा होता है, और कई बार Grade ज्यादा दिखता है लेकिन सुधार तेजी से हो सकता है।

🍁सबसे जरूरी इलाज क्या है?
फैटी लिवर का सबसे बड़ा इलाज दवा नहीं, बल्कि जीवनशैली सुधार है। वजन कम करना, रोज 30–45 मिनट चलना, चीनी कम करना, तली चीजें छोड़ना, शराब से दूरी, नींद सुधारना और तनाव कम करना बहुत प्रभावी उपाय हैं। सही समय पर ध्यान देने से लीवर दोबारा स्वस्थ होने की अच्छी क्षमता रखता है।

यदि सरल शब्दों में कहें तो Grade 1 और Grade 2 फैटी लिवर सबसे आसानी से ठीक हो सकते हैं। Grade 3 में भी अच्छा सुधार संभव है। Grade 4 या cirrhosis जैसी अवस्था में स्थिति संभालना, आगे नुकसान रोकना और जीवन की गुणवत्ता सुधारना मुख्य लक्ष्य होता है। इसलिए रिपोर्ट आते ही घबराने की जगह सही कदम उठाना सबसे जरूरी है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
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क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही आयुर्वेदिक दवा किसी एक व्यक्ति को बहुत फायदा करती है, लेकिन वही दवा दूसरे व्यक्ति पर असर ...
30/04/2026

क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही आयुर्वेदिक दवा किसी एक व्यक्ति को बहुत फायदा करती है, लेकिन वही दवा दूसरे व्यक्ति पर असर नहीं करती — क्यों?
👉 यही प्रश्न आयुर्वेद को बाकी चिकित्सा पद्धतियों से अलग बनाता है।
आज का पोस्ट बहुत ही ज्ञानवर्धक है, इसको पहले शेयर कीजिये फिर पढ़िए जिससे अधिक से अधिक लोगो तक यह जानकारी पहुँच सके।

आयुर्वेद कहता है कि हर व्यक्ति अलग है। केवल रोग नहीं, बल्कि रोगी का शरीर, प्रकृति, पाचन, उम्र, मानसिक स्थिति, मौसम, जीवनशैली—सब अलग होते हैं। इसलिए एक ही दवा का असर भी अलग हो सकता है।

1. प्रकृति अलग होती है
किसी की वात प्रकृति, किसी की पित्त, किसी की कफ।
मान लीजिए कोई दवा कफ कम करने वाली है—तो कफ प्रकृति वाले को अच्छा लाभ मिलेगा, लेकिन वात व्यक्ति को वही दवा सूखापन या कमजोरी दे सकती है।
यही कारण है कि आयुर्वेद में “one medicine for all” नहीं चलता।

2. अग्नि (Digestion) अलग होती है
आयुर्वेद में कहा गया है कि दवा तभी काम करेगी जब अग्नि यानी पाचन शक्ति ठीक हो।
जिसकी पाचन शक्ति अच्छी है, उसे दवा जल्दी असर करेगी
जिसका पाचन कमजोर है, उसे दवा पचेगी ही नहीं या कम असर करेगी
इसलिए कुछ लोगों को पहले दीपन-पाचन दवाएं दी जाती हैं।

3. रोग की अवस्था अलग होती है
दो लोगों को एक ही नाम का रोग हो सकता है, लेकिन अवस्था अलग हो सकती है।
उदाहरण:
किसी को फैटी लिवर शुरुआती अवस्था में है
किसी को advanced stage में
दोनों को एक जैसी दवा देने पर परिणाम अलग होंगे।

4. आम (toxins/metabolic waste) की स्थिति
यदि शरीर में आम जमा है, तो दवा का असर रुक सकता है।
पहले आम हटाना पड़ता है, फिर मुख्य दवा दी जाती है।

5. आहार-विहार का फर्क
यदि एक व्यक्ति दवा के साथ परहेज रखता है, समय से सोता है, सही खाना खाता है—तो लाभ अधिक होगा।
दूसरा व्यक्ति दवा लेकर भी गलत खानपान करे, तनाव ले, नींद खराब रखे—तो असर कम होगा।

6. मात्रा और अनुपान का महत्व
आयुर्वेद में दवा केवल कौन सी है, इतना ही नहीं—कितनी मात्रा, किस समय, किसके साथ (शहद, घी, गुनगुना पानी, दूध आदि) यह भी महत्वपूर्ण है।
वही दवा गलत तरीके से लेने पर लाभ कम हो सकता है।

7. शरीर की प्रतिक्रिया अलग होती है
जैसे आधुनिक चिकित्सा में हर दवा सब पर एक जैसी नहीं चलती, वैसे ही आयुर्वेद में भी व्यक्ति-व्यक्ति में प्रतिक्रिया बदलती है।

आयुर्वेद में दवा से ज्यादा महत्वपूर्ण है किस व्यक्ति को, किस अवस्था में, किस मात्रा में, किस प्रकृति के अनुसार दवा दी जा रही है।
इसलिए जो दवा किसी एक को चमत्कारिक लाभ दे, जरूरी नहीं वही दूसरे पर वैसा ही असर करे।
आयुर्वेद रोग नहीं, रोगी का इलाज करता है।

🍁 प्रकृति की है महत्वपूर्ण भूमिका:-
आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्रकृति सबसे मूलभूत अवधारणाओं में से एक है, क्योंकि आयुर्वेद हर व्यक्ति को अलग मानता है। एक ही रोग, एक ही उम्र और एक ही रिपोर्ट होने पर भी दो लोगों का उपचार अलग हो सकता है—क्योंकि उनकी वात, पित्त, कफ प्रकृति अलग होती है। यही आयुर्वेद की व्यक्तिगत (personalized) चिकित्सा पद्धति है।

1. हर व्यक्ति की बॉडी अलग काम करती है
किसी की पाचन शक्ति तेज होती है, किसी की धीमी। कोई जल्दी तनाव में आ जाता है, कोई शांत रहता है। किसी का वजन जल्दी बढ़ता है, किसी का नहीं। यह सब प्रकृति से जुड़ा है।
वात प्रकृति – शरीर हल्का, जल्दी थकान, गैस, चिंता
पित्त प्रकृति – गर्मी, तेज भूख, गुस्सा, एसिडिटी
कफ प्रकृति – भारीपन, सुस्ती, वजन बढ़ना, कफ
इसलिए सभी को एक जैसा इलाज देना आयुर्वेद नहीं मानता।

2. दवा चयन में प्रकृति का महत्व
एक ही जड़ी-बूटी हर व्यक्ति पर समान प्रभाव नहीं देती।
उदाहरण:
• पित्त व्यक्ति को बहुत गरम तासीर की दवा देने से जलन बढ़ सकती है।
• वात व्यक्ति को अधिक रूखी दवा देने से गैस, कमजोरी बढ़ सकती है।
• कफ व्यक्ति को बहुत भारी, मीठी दवा देने से सुस्ती बढ़ सकती है।
इसलिए वैद्य दवा चुनते समय प्रकृति देखते हैं।

3. भोजन सलाह प्रकृति अनुसार बदलती है
आयुर्वेद में भोजन ही औषधि माना गया है।
• वात को गर्म, स्निग्ध, नियमित भोजन लाभकारी
• पित्त को शीतल, मधुर, कम मसालेदार भोजन
• कफ को हल्का, गरम, तीखा, कम तैलीय भोजन
यदि प्रकृति के विरुद्ध भोजन लिया जाए तो रोग बढ़ सकते हैं।

4. रोग होने की प्रवृत्ति पहले से समझी जा सकती है
प्रकृति बताती है कि व्यक्ति किस प्रकार के रोगों की ओर झुकाव रख सकता है।
• वात → जोड़ों का दर्द, कब्ज, अनिद्रा
• पित्त → एसिडिटी, त्वचा रोग
• कफ → मोटापा, मधुमेह प्रवृत्ति, एलर्जी
इससे रोकथाम (prevention) संभव होती है।

5. यही आयुर्वेद की Personalized Medicine है
आज आधुनिक चिकित्सा “personalized medicine” की बात करती है। आयुर्वेद हजारों वर्षों से यह सिद्धांत अपनाता है—रोग नहीं, रोगी को देखो।

आयुर्वेद में प्रकृति केवल थ्योरी नहीं, बल्कि निदान, उपचार, आहार, विहार और रोग-निवारण का आधार है। इसलिए अच्छे वैद्य पहले व्यक्ति को समझते हैं, फिर रोग को।

हर व्यक्ति की बॉडी एक जैसी नहीं होती। आयुर्वेद के अनुसार शरीर की मूल बनावट और कार्यप्रणाली को प्रकृति कहा जाता है, जो मुख्यतः वात, पित्त और कफ तीन दोषों पर आधारित होती है। वैसे प्रकृति का निर्धारण एक बहुत ही गूढ़ विषय है लेकिन यहां आसान भाषा मे कुछ चीजो के आधार पर आप अपनी प्रकृति का अनुमान लगा सकते है।

आम आदमी भी कुछ संकेत देखकर अपनी प्रकृति का अंदाज़ा लगा सकता है। ध्यान रहे—अधिकांश लोग मिश्रित प्रकृति के होते हैं, जैसे वात-पित्त, पित्त-कफ आदि।

1. वात प्रकृति कैसे पहचानें?
जिन लोगों में वायु और आकाश तत्व अधिक होता है, उनमें ये लक्षण दिखते हैं:
• शरीर दुबला-पतला, वजन बढ़ाने में कठिनाई
• त्वचा सूखी, रूखी, होंठ फटने की प्रवृत्ति
• हाथ-पैर ठंडे रहना
• भूख कभी ज्यादा, कभी कम
• नींद हल्की और जल्दी टूटने वाली
• जल्दी बोलना, जल्दी सोचना, पर जल्दी भूलना
• चिंता, घबराहट, बेचैनी की प्रवृत्ति
• कब्ज या गैस की समस्या
• ऐसे लोग अक्सर तेज चलते हैं, जल्दी थकते हैं और अनियमित दिनचर्या से जल्दी बिगड़ते हैं।

2. पित्त प्रकृति कैसे पहचानें?
• जिनमें अग्नि तत्व ज्यादा होता है:
• मध्यम शरीर, मांसपेशियाँ ठीक-ठाक
• शरीर में गर्मी अधिक लगना
• पसीना ज्यादा आना
• भूख तेज लगना, समय पर खाना जरूरी
• गुस्सा जल्दी आना, चिड़चिड़ापन
• बुद्धि तेज, निर्णय क्षमता अच्छी
• बाल जल्दी सफेद होना या झड़ना
• एसिडिटी, जलन, मुंह के छाले की प्रवृत्ति

3. कफ प्रकृति कैसे पहचानें?
• जिनमें जल और पृथ्वी तत्व ज्यादा होता है:
• शरीर मजबूत, भारी या आसानी से वजन बढ़ना
• त्वचा मुलायम, चिकनी, चमकदार
• स्वभाव शांत, धैर्यवान, स्थिर
• नींद गहरी और लंबी
• भूख धीमी, पाचन धीमा
• याददाश्त अच्छी, सीखने में समय लेकिन याद लंबे समय तक
• आलस्य या सुस्ती की प्रवृत्ति
• सर्दी, कफ, एलर्जी की संभावना

4. खुद कैसे समझें अपनी प्रकृति?
अपने बचपन से लेकर अब तक के प्राकृतिक गुण देखें:
• आपका शरीर कैसा है? दुबला, मध्यम, भारी?
• भूख कैसी लगती है?
• नींद कैसी आती है?
• स्वभाव कैसा है?
• मौसम किससे ज्यादा परेशानी होती है?
• तनाव में आपकी प्रतिक्रिया कैसी होती है?
• जो गुण सबसे ज्यादा मिलें, वही आपकी प्रमुख प्रकृति है।

5. मिश्रित प्रकृति भी होती है
बहुत लोग केवल वात, पित्त या कफ नहीं होते, बल्कि:
वात-पित्त → दुबले पर तेज दिमाग और जल्दी गुस्सा
पित्त-कफ → मजबूत शरीर, तेज भूख, नेतृत्व क्षमता
वात-कफ → पतले पर सुस्ती/कफ प्रवृत्ति

6. क्यों जरूरी है प्रकृति जानना?
यदि प्रकृति पता हो तो:
• सही आहार चुना जा सकता है
• कौन सा व्यायाम अच्छा रहेगा
• कौन सी बीमारी की प्रवृत्ति है
• कौन सा मौसम सावधानी मांगता है
• कौन सी जीवनशैली आपको सूट करेगी

7. सबसे आसान तरीका
• यदि आप अक्सर गैस, चिंता, सूखापन से परेशान हैं → वात बढ़ा हो सकता है।
• यदि गर्मी, गुस्सा, एसिडिटी ज्यादा है → पित्त।
• यदि सुस्ती, वजन, कफ ज्यादा है → कफ।

प्रकृति जन्मजात होती है, लेकिन वर्तमान दोष असंतुलन बदलता रहता है। इसलिए सही पहचान के लिए अनुभवी आयुर्वेद चिकित्सक से नाड़ी परीक्षा/प्रकृति परीक्षण करवाना सबसे बेहतर रहता है।

Dr Ajay Gupta
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क्या अंडे से ज्यादा प्रोटीन वेजिटेरियन डाइट में मिल सकता है? सच जानिएआज भी बहुत से लोगों के मन में यह धारणा बैठी हुई है ...
30/04/2026

क्या अंडे से ज्यादा प्रोटीन वेजिटेरियन डाइट में मिल सकता है? सच जानिए
आज भी बहुत से लोगों के मन में यह धारणा बैठी हुई है कि अगर अंडा नहीं खाया, तो शरीर को पर्याप्त प्रोटीन मिल ही नहीं सकता। कई लोग यह भी मानते हैं कि ताकत, मसल्स और अच्छी हेल्थ के लिए अंडा या नॉनवेज जरूरी है। लेकिन सच इससे थोड़ा अलग है। सही जानकारी और संतुलित भोजन के साथ वेजिटेरियन डाइट से भी शरीर की प्रोटीन जरूरत पूरी की जा सकती है, और कुछ शाकाहारी खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जिनमें वजन के हिसाब से अंडे से भी ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि अंडे को इतना अच्छा प्रोटीन स्रोत क्यों माना जाता है। अंडे में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन होता है, जिसमें शरीर के लिए जरूरी सभी essential amino acids पाए जाते हैं। यह आसानी से पचता है और शरीर द्वारा अच्छी तरह उपयोग किया जाता है। एक सामान्य अंडे में लगभग 6 ग्राम प्रोटीन होता है, जबकि 100 ग्राम अंडे में लगभग 12 से 13 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है।
अब सवाल यह है कि क्या शाकाहारी भोजन इससे मुकाबला कर सकता है? जवाब है—हाँ, कई हद तक कर सकता है। उदाहरण के लिए सोया चंक्स वेजिटेरियन लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प हैं। 100 ग्राम सूखे सोया चंक्स में लगभग 50 ग्राम तक प्रोटीन पाया जाता है। यही कारण है कि इसे जिम जाने वाले लोग भी पसंद करते हैं। हालांकि इतनी मात्रा रोज खाना जरूरी नहीं है, लेकिन सीमित मात्रा में भी यह अच्छा प्रोटीन देता है।
इसी तरह दालें भारतीय भोजन का मजबूत हिस्सा हैं। मसूर दाल, मूंग दाल, उड़द दाल और चना दाल सभी अच्छे प्रोटीन स्रोत हैं। यदि इन्हें नियमित रूप से भोजन में शामिल किया जाए, तो शरीर को अच्छा पोषण मिलता है। राजमा और छोले भी प्रोटीन से भरपूर होते हैं और लंबे समय तक ऊर्जा देने में मदद करते हैं।
पनीर भी एक शानदार शाकाहारी विकल्प है। इसमें प्रोटीन के साथ कैल्शियम और अच्छे फैट्स भी होते हैं। जो लोग जिम जाते हैं या वजन नियंत्रित रखते हुए ताकत बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए पनीर उपयोगी भोजन हो सकता है। इसी प्रकार भुना चना, मूंगफली, दही, दूध, टोफू और बीज जैसे पंपकिन सीड्स भी अच्छे प्रोटीन स्रोत हैं।
लेकिन यहाँ एक जरूरी बात समझना बेहद आवश्यक है। केवल यह देखना काफी नहीं है कि किसी चीज में कितने ग्राम प्रोटीन है। यह भी मायने रखता है कि वह प्रोटीन कितना पचता है, शरीर उसे कितना उपयोग करता है, और आप उसे कितनी मात्रा में वास्तव में खा सकते हैं। उदाहरण के लिए 100 ग्राम सोया चंक्स और 100 ग्राम अंडे की तुलना कागज पर सही लग सकती है, लेकिन दोनों की serving practical रूप से अलग होती है।
कई लोग यह भी मानते हैं कि वेजिटेरियन प्रोटीन अधूरा होता है। यह बात पूरी तरह सही नहीं है। यदि भोजन में विविधता हो, जैसे दाल के साथ चावल, चने के साथ रोटी, पनीर के साथ अनाज, तो शरीर को जरूरी amino acids मिल जाते हैं। भारतीय पारंपरिक भोजन इसी कारण पोषण की दृष्टि से समझदारी भरा माना जाता है।
अगर आपका लक्ष्य मसल्स बनाना, ताकत बढ़ाना या स्वस्थ रहना है, तो केवल अंडे पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। पर्याप्त कुल प्रोटीन, नियमित व्यायाम, अच्छी नींद और संतुलित भोजन अधिक महत्वपूर्ण हैं। वेजिटेरियन व्यक्ति भी बेहतरीन फिटनेस प्राप्त कर सकते हैं।
अंत में इतना समझ लीजिए कि अंडा अच्छा प्रोटीन स्रोत है, लेकिन वही एकमात्र रास्ता नहीं है। यदि आप अंडा नहीं खाते, तो चिंता करने की जरूरत नहीं है। सोया, दालें, पनीर, चना, मूंगफली, दूध और अन्य शाकाहारी खाद्य पदार्थों की मदद से भी शरीर की प्रोटीन जरूरत आसानी से पूरी की जा सकती है। सही जानकारी और सही चुनाव ही असली ताकत है।

Dr Ajay Gupta
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दैनिक भास्कर में कुछ समय पूर्व ....
29/04/2026

दैनिक भास्कर में कुछ समय पूर्व ....

29/04/2026

फैटी लिवर .....

दही केवल स्वादिष्ट भोजन नहीं, बल्कि एक जीवित पोषण (Live Food) है। दूध को जमाकर बनने वाला दही शरीर को प्रोटीन, कैल्शियम, ...
29/04/2026

दही केवल स्वादिष्ट भोजन नहीं, बल्कि एक जीवित पोषण (Live Food) है। दूध को जमाकर बनने वाला दही शरीर को प्रोटीन, कैल्शियम, अच्छे बैक्टीरिया (Probiotics), विटामिन और मिनरल्स देता है। भारत में सदियों से दही भोजन का हिस्सा रहा है। आयुर्वेद में दही को बलवर्धक, तृप्तिकारक और पाचन में सहायक माना गया है, लेकिन इसे सही समय, सही मात्रा और सही तरीके से खाना जरूरी बताया गया है।

🤔 दही खाना चाहिए या नहीं?
हाँ, अधिकांश स्वस्थ लोगों को दही खाना चाहिए, लेकिन व्यक्ति की प्रकृति, मौसम, रोग और पाचन शक्ति के अनुसार। जिन लोगों को अच्छा पाचन, कमजोरी, दुबलापन, बार-बार पेट खराब होना, एंटीबायोटिक के बाद गट हेल्थ बिगड़ना जैसी समस्या हो, उनके लिए दही उपयोगी हो सकता है।
लेकिन जिनको कफ ज्यादा बनता हो, बार-बार सर्दी-जुकाम, गला खराब, एलर्जी, साइनस, बहुत भारीपन, पेट में गैस हो, उन्हें सावधानी रखनी चाहिए।

🍁 दही में कौन-कौन से पोषक तत्व होते हैं?
दही में कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं:
• Protein – मांसपेशियों और शरीर की मरम्मत के लिए
• Calcium – हड्डियों और दांतों के लिए
• Phosphorus – हड्डियों और ऊर्जा निर्माण में सहायक
• Potassium – BP संतुलन में मददगार
• Magnesium – नसों और मांसपेशियों के लिए
• Vitamin B12 – खून और नसों के लिए
• Vitamin B2 (Riboflavin) – ऊर्जा उत्पादन में सहायक
• Vitamin A – आंखों और इम्यूनिटी के लिए
• Probiotics – पेट के अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाने में सहायक
• Lactic acid compounds – पाचन में मदद करते हैं
कुछ मात्रा में Antioxidants भी मिलते हैं, खासकर घर के ताजे दही में।

🔥 दही किसके साथ नहीं खाना चाहिए?
आयुर्वेद अनुसार कुछ संयोजन ठीक नहीं माने गए:
• दही + मछली
• दही + बहुत गरम चीजें
• दही + रात में भारी भोजन
• दही + बहुत अधिक नमक रोज़ाना
• दही + फल का गलत मिश्रण (हर फल नहीं)

🍁 आयुर्वेद क्या कहता है?
आयुर्वेद में दही को गुरु (भारी), उष्ण प्रभाव वाला, बलदायक माना गया है। यह वात कम कर सकता है, लेकिन कफ और पित्त बढ़ा सकता है यदि गलत समय या अधिक मात्रा में लिया जाए। इसलिए आयुर्वेद कहता है:
• रात में दही न लें, या बहुत जरूरत हो तो मसाला मिलाकर कम मात्रा लें
• गर्मियों में दिन में लें
• ताजा दही बेहतर है, बहुत खट्टा दही कम लें
• रोज़ बहुत अधिक मात्रा में न लें
• किस समय दही खाना बेहतर है?
• सुबह या दोपहर – सबसे अच्छा समय
• दोपहर के भोजन में – उत्तम
• रात में – सामान्यतः टालें, खासकर सर्दी/कफ वालों को

👉 किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?
• बार-बार सर्दी-जुकाम
• एलर्जी, साइनस
• Asthma में कुछ लोगों को दिक्कत
• Lactose intolerance
• बहुत ज्यादा मोटापा और भारीपन
• IBS या chronic bloating वाले कुछ मरीज

दही एक शानदार प्राकृतिक भोजन है, लेकिन “हर किसी के लिए, हर समय, हर मात्रा में” सही नहीं है। सही व्यक्ति, सही समय, सही मात्रा और सही संयोजन में लिया जाए तो दही पेट, हड्डियों, इम्यूनिटी और ताकत के लिए लाभकारी है। अगर बार-बार दही खाने से सर्दी, गैस, भारीपन या एलर्जी होती है तो व्यक्तिगत सलाह लेना बेहतर है।
याद रखें
दही अच्छा है, पर समझदारी से खाया गया दही ही अमृत है।

Dr Ajay Gupta
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#दही_के_फायदे

क्या आप बार-बार होने वाली बीमारी, कमजोरी, थकान, बढ़ता वजन, शुगर, गैस, जोड़ों का दर्द, सांस की तकलीफ, किडनी या हार्ट की स...
29/04/2026

क्या आप बार-बार होने वाली बीमारी, कमजोरी, थकान, बढ़ता वजन, शुगर, गैस, जोड़ों का दर्द, सांस की तकलीफ, किडनी या हार्ट की समस्या से परेशान हैं? बहुत से लोग वर्षों तक दवा लेते रहते हैं, लेकिन जड़ कारण पर ध्यान नहीं दे पाते। जब तक शरीर के मूल असंतुलन को नहीं समझा जाता, तब तक समस्या बार-बार लौट सकती है।

आयुर्वेद केवल बीमारी दबाने का तरीका नहीं, बल्कि शरीर को संतुलित करने, पाचन सुधारने, जीवनशैली सुधारने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की प्राचीन एवं वैज्ञानिक पद्धति है। सही परामर्श, सही दिनचर्या, उचित आहार-विहार और व्यक्तिगत प्रकृति के अनुसार उपचार से लंबे समय से चल रही कई समस्याओं में अच्छा लाभ मिल सकता है।

डॉ. अजय कुमार (एम.डी., पी.एच.डी.) वर्षों के अनुभव के साथ Diabetes, Obesity, Joint Pain, गैस्ट्रो समस्या, Heart Problem, Breathing Problem, Kidney Problem जैसी जटिल समस्याओं पर आयुर्वेदिक परामर्श प्रदान करते हैं। हर मरीज की समस्या अलग होती है, इसलिए उपचार भी व्यक्तिगत रूप से किया जाता है।

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स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी पूंजी है, और सही जानकारी उसका सबसे मजबूत आधार। डॉ. अजय कुमार द्वारा लिखित ये उपयोगी पुस्तकें Diab...
29/04/2026

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28/04/2026

किडनी में पथरी ....

बहुत से लोग हैरान होकर पूछते हैं कि हमने तो कोई खाने पीने में गलती नहीं की, फिर किडनी में पथरी कैसे बन गई। वास्तव में पथ...
28/04/2026

बहुत से लोग हैरान होकर पूछते हैं कि हमने तो कोई खाने पीने में गलती नहीं की, फिर किडनी में पथरी कैसे बन गई।
वास्तव में पथरी अचानक एक दिन में नहीं बनती, बल्कि धीरे-धीरे महीनों या वर्षों में बनती है। जब पेशाब में कैल्शियम, ऑक्सलेट, यूरिक एसिड, फॉस्फेट जैसे खनिज तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है और शरीर में पानी की कमी होने लगती है, तब मूत्र गाढ़ा हो जाता है। इस गाढ़े मूत्र में छोटे-छोटे क्रिस्टल बनने लगते हैं। यही क्रिस्टल आपस में जुड़कर धीरे-धीरे पथरी का रूप ले लेते हैं। गर्मियों में कम पानी पीना, बार-बार पसीना आना, पेशाब रोकना, अधिक नमक खाना, जंक फूड, बार-बार संक्रमण, मोटापा, मधुमेह, परिवार में हिस्ट्री और कुछ हार्मोनल या मेटाबॉलिक समस्याएँ पथरी बनने का खतरा बढ़ा देती हैं।

🍁 पथरी कितने प्रकार की होती है?
किडनी स्टोन सभी लोगों में एक जैसे नहीं होते।
• सबसे सामान्य पथरी Calcium Oxalate Stone होती है, जो अधिकांश मरीजों में पाई जाती है।
• दूसरी प्रकार Uric Acid Stone है, जो यूरिक एसिड बढ़ने वाले लोगों में अधिक देखी जाती है।
• तीसरी Struvite Stone होती है, जो बार-बार पेशाब के संक्रमण से बनती है।
• चौथी Cystine Stone है, जो दुर्लभ होती है और अक्सर आनुवंशिक कारणों से बनती है।
कई मरीजों में मिश्रित प्रकार की पथरी भी पाई जाती है। पथरी का प्रकार जानना जरूरी है, क्योंकि आगे की रोकथाम उसी पर निर्भर करती है।

🔥 किडनी पथरी के लक्षण क्या होते हैं?
कुछ लोगों में पथरी लंबे समय तक बिना लक्षण के रहती है और जांच में पता चलती है। लेकिन जब पथरी हिलती है या मूत्रनली में फँसती है, तब कमर के एक तरफ अचानक तेज दर्द शुरू होता है, जो पेट के नीचे, जांघ या जननांग क्षेत्र तक जा सकता है। दर्द लहरों में आता है और मरीज बेचैन हो जाता है। पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब आना, खून आना, मतली, उल्टी, बुखार या पेशाब रुकना भी हो सकता है। यदि बुखार के साथ दर्द हो तो यह गंभीर स्थिति हो सकती है।

💐 कौन सी जांच जरूरी होती है?
पथरी की सही जानकारी के लिए जांच बहुत महत्वपूर्ण है। Ultrasound KUB सबसे सामान्य और आसानी से उपलब्ध जांच है, जिससे किडनी, यूरेटर और ब्लैडर की स्थिति देखी जाती है। यदि पथरी छोटी हो या स्पष्ट न दिखे तो NCCT KUB (CT Scan) सबसे सटीक जांच मानी जाती है। Urine Routine Test से संक्रमण, खून या क्रिस्टल की जानकारी मिलती है। Blood Tests जैसे Creatinine, Urea, Uric Acid, Calcium आदि से किडनी की कार्यक्षमता और कारणों का पता चलता है। यदि पथरी निकल जाए तो उसकी जांच (Stone Analysis) भविष्य में दोबारा पथरी रोकने में मदद करती है।

🍁 आयुर्वेद में किडनी पथरी का इलाज
आयुर्वेद में किडनी स्टोन को अश्मरी कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार जब मूत्रवह स्रोतस में विकृति होती है और दोषों के कारण मूत्र में कण जमने लगते हैं, तब अश्मरी बनती है।
👉 उपचार का उद्देश्य पथरी को छोटा करना, गलाना, मूत्रमार्ग से बाहर निकालना, दर्द कम करना और दोबारा बनने से रोकना होता है।
👉 आयुर्वेद में औषधि, आहार, जल सेवन और दिनचर्या को साथ लेकर इलाज किया जाता है।

🍁 आयुर्वेद की उपयोगी दवाएँ
किडनी पथरी में कुछ प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधियाँ उपयोग की जाती हैं, जैसे
• पाषाणभेद, जो पथरी में पारंपरिक रूप से प्रसिद्ध है।
• गोक्षुर मूत्रमार्ग और सूजन में लाभकारी माना जाता है।
• वरुण छाल मूत्राशय व पथरी रोगों में उपयोगी मानी जाती है।
• पुनर्नवा सूजन और जलधारण की समस्या में सहायक है।
• इसके अलावा चंद्रप्रभा वटी, गोक्षुरादि गुग्गुलु, हजरुल यहूद भस्म, नीरूरी (भुम्यामलकी) आदि चिकित्सक की सलाह से दिए जाते हैं।
दवा का चुनाव पथरी के आकार, स्थान, दर्द, संक्रमण और रोगी की प्रकृति देखकर किया जाता है। स्वयं दवा लेना उचित नहीं है।

🤔 कितना समय लगता है?
यह प्रश्न हर मरीज पूछता है कि कितने दिन में पथरी ठीक होगी। इसका उत्तर पथरी के आकार और स्थान पर निर्भर करता है। यदि पथरी 3 से 5 mm की है तो कई बार पर्याप्त पानी, दवा और समय से 2 से 6 सप्ताह में निकल सकती है। 5 से 8 mm की पथरी में अधिक समय लग सकता है। बड़ी पथरी, फँसी हुई पथरी या बार-बार दर्द देने वाली पथरी में लेजर या अन्य प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है। आयुर्वेदिक उपचार में छोटे स्टोन में सामान्यतः 1 से 3 महीने तक समय लग सकता है, लेकिन हर मरीज अलग होता है।

🔥 कब तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
यदि कमर दर्द बहुत तेज हो, पेशाब बंद हो जाए, बुखार आ जाए, पेशाब में खून अधिक आए, उल्टी लगातार हो, कमजोरी बढ़े, या Creatinine बढ़ा हो, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। यदि एक ही किडनी हो या पहले से किडनी की बीमारी हो, तब देर करना खतरनाक हो सकता है।

किडनी की पथरी एक सामान्य लेकिन दर्दनाक समस्या है। सही समय पर जांच, पथरी का आकार जानना, उचित इलाज चुनना और जीवनशैली सुधारना सबसे महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद छोटे और शुरुआती मामलों में सहायक हो सकता है, लेकिन बड़े स्टोन, संक्रमण या रुकावट में आधुनिक चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है। सही मार्गदर्शन से अधिकांश मरीज पूर्ण राहत पा सकते हैं।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
YouTube - "Arogya Street" & "Vaidya Ajay Gupta"
Whatsapp No 082993 02319
(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)

क्लिनिक में अक्सर मरीज पूछते हैं—“डॉक्टर साहब, फैटी लिवर में आयुर्वेद अच्छा है या ऐलोपैथिक?” सच यह है कि फैटी लिवर में स...
27/04/2026

क्लिनिक में अक्सर मरीज पूछते हैं—“डॉक्टर साहब, फैटी लिवर में आयुर्वेद अच्छा है या ऐलोपैथिक?”
सच यह है कि फैटी लिवर में सबसे बड़ी दवा न आयुर्वेद है, न ऐलोपैथिक, बल्कि सही खानपान, वजन कम करना, व्यायाम और कारण पकड़ना है। अगर यह नहीं किया, तो कोई भी पद्धति अकेले चमत्कार नहीं करेगी। लेकिन यह भी सच है कि कोई भी व्यक्ति लाइफस्टाइल में बदलाव नही करना चाहते है, इसलिए दवाये लेनी पड़ती हैं।
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जब फैटी लिवर शुरुआती अवस्था में होता है, रिपोर्ट में केवल Grade 1 या Grade 2 आता है, तब मरीज घबराते हैं। ऐसे समय पर डॉक्टर कहते हैं—“घबराइए नहीं, यह अक्सर reversible होता है।” रोज 30 से 45 मिनट चलना, मीठा कम करना, तला भोजन छोड़ना, शराब बंद करना, पेट की चर्बी घटाना—यही असली इलाज है।

इस अवस्था में आयुर्वेदिक चिकित्सा बहुत ही बढिया कारगर है। इन दवाओं से पाचन, भूख, दिनचर्या और metabolic balance में सहायता मिल सकती है, लिवर फंक्शन में सुधार होता है, लेकिन यह आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह से ही लेना चाहिए।

अगर लिवर एंजाइम (SGPT/SGOT) बढ़े हों, पेट भारी रहता हो, Fibroscan में fibrosis दिख रहा हो, diabetes या cholesterol भी हो, तब केवल घरेलू इलाज या बिना जांच दवा लेना ठीक नहीं। ऐसे समय ऐलोपैथिक जांच प्रणाली बहुत मजबूत है—Blood tests, Ultrasound, Fibroscan, Hepatitis screening, sugar profile, lipid profile आदि से बीमारी की जड़ समझी जाती है। यानी यहाँ diagnosis और monitoring बहुत महत्वपूर्ण है।

फैटी लिवर की कोई एक जादुई दवा नहीं होती। ऐलोपैथी में उपचार मुख्यतः कारण पर आधारित होता है—यानी मोटापा, diabetes, high triglycerides, insulin resistance, inflammation, या fibrosis कितना है। एलोपैथी दवाओं से लिपिड आदि चीजो पर कंट्रोल कर के फैटी लिवर पर नियंत्रण किया जाता है।

जबकि आयुर्वेद में बहुत सी दवाये है । आयुर्वेद lifestyle सुधारने, भोजन अनुशासन, मोटापा नियंत्रण, digestion support, stress management और long-term wellness में अच्छा सहयोग दे सकता है। आयुर्वेदिक चूर्ण, काढ़े और गोलियां बहुत जल्दी ही इस बीमारी को नियंत्रित कर लेती है, लेकिन दवाये लंबे समय तक लेनी होती है।

लेकिन बाजार की हर “लिवर साफ करने वाली” दवा सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं। कुछ अनियंत्रित हर्बल दवाएँ उल्टा liver injury भी कर सकती हैं। इसलिए qualified doctor की सलाह आवश्यक है। इसलिए किसी भी इंफ्लुएंसर के सुझाए गए या इनके द्वारा बेची जा रही दवाओं से सावधान रहें। वैद्य से मिलकर ही सलाह ले।

आखिर में अगर पूछा जाए कि सबसे अच्छा रास्ता क्या है, तो जवाब है—Integrated approach।
यानी जांच और monitoring आधुनिक चिकित्सा से, साथ में diet control, exercise, sleep correction, stress control, और जरूरत अनुसार योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह। यह संयोजन कई मरीजों में बेहतर परिणाम देता है।
अंत में मरीज से यही कहा जाता है—“फैटी लिवर की असली दवा आपकी थाली, आपकी चाल और आपकी आदतें हैं।” अगर वजन बढ़ता रहेगा, मीठा चलता रहेगा, शराब जारी रहेगी और बैठे-बैठे जीवन रहेगा, तो कोई दवा लंबे समय तक नहीं बचा पाएगी। लेकिन अगर lifestyle बदल लिया, तो लिवर खुद को काफी हद तक सुधार सकता है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
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Former Assistant Professor, IMS, BHU
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