07/12/2025
#योग_एक_सामाजिक_अनिवार्यता
योग आज मानव चेतना के वैश्विक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित और स्थापित हो चुका है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों द्वारा आत्मोपलब्धि अथवा भगवत्प्राप्ति के लिए आविष्कृत 'योग विद्या' को वर्तमान समय में चिकित्सा विज्ञान के श्रेष्ठ विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है। यूँ तो योग शब्द का सामान्य अर्थ जोड़ या मिलन होता है लेकिन योग दर्शन में चित्त की वृत्तियों के निरोध अर्थात समाधि को 'योग' कहा गया है। इस प्रकार यम-नियमादि योगांगो पर आरुढ़ होकर समाधि को प्राप्त करना, और समाधि की उच्च अवस्था में स्थित होकर आत्मदर्शनपूर्वक स्वरूपावस्था की उपलब्धि ही योग है। आत्मज्ञान या भगवत्प्राप्ति की साधना हेतु शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य, निश्चयात्मक बुद्धि, दृढ़ संकल्प शक्ति, और अक्षय प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके बिना कोई साधक साधना के मार्ग में एक कदम भी नहीं चल सकता। इन्ही आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सिद्ध संतो, योगियों व ऋषि-मुनियों ने विविध प्रकार के आसन-प्राणायाम, बन्ध-मुद्रा व यौगिक षट्कर्म आदि का आविष्कार किया था। आज कल इन्ही क्रियाओं का चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता पूर्वक प्रयोग और उपयोग किया जा रहा है। इसके आश्चर्यजनक और चमत्कारिक परिणाम भी देखे जा रहे हैं। #योग भारत सरकार (आयुष) द्वारा एक मान्य चिकित्सा पद्धति है।
स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है, और यदि मन स्वस्थ न हो तो शरीर भी स्वस्थ नहीं रह सकता। योग चिकित्सा की दृष्टि में अधिकांश शारीरिक बीमारियां भी मन से ही आती हैं। अधिकर रोग मनोकाइक (साइकोसेमेटिक) होते हैं और इन पर औषधियों का कोई विशेष या स्थाई प्रभाव नहीं पड़ता। अब यह बात भी लोगों की समझ में आने लगी है कि केवल औषधियों के बल पर ही अच्छा स्वास्थ्य नहीं प्राप्त किया जा सकता। समग्र स्वास्थ्य संवर्धन हेतु सभी आयुवर्ग के लिए योगाभ्यास आवश्यक है। आसन प्राणायाम आदि का नियमित अभ्यास हमें अनेक शारीरिक मानसिक बीमारियों मुक्ति दिलाता है, व्यक्ति की कार्यक्षमता व कार्यकुशलता में वृद्धि करता है। चाहे विद्यार्थी हों या शिक्षक, नौकरी करने वाले लोग हों या व्यवसायी, किसान हों या बेरोजगार, नेता हों या अभिनेता, स्वास्थ्य और प्रसन्नता सभी को चाहिए, सुख और शांति सभी को चाहिए। इसलिए वर्तमान समय में योगाभ्यास सभी के लिए आवश्यक है, अनिवार्य है। योग साधना केवल रोगों से मुक्ति ही नहीं दिलाती बल्कि व्यक्ति में सकारात्मकता, समरस्वता, तेजस्विता, ओजस्विता, बुद्धिमत्ता, सरलता, व विवेकशीलता की भी वृद्धि कराती है। संभवतः इन्ही सब कारणों से हमारे पूज्य गुरुदेव परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती कहते थे कि योग वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की संस्कृति है।
सामान्य धारणा के विपरीत योगाभ्यास के लिए किसी खास समय, स्थान व खान-पान आदि की कोई खास बाध्यता नहीं होती। इसका निर्धारण अभ्यास करने वाले व्यक्ति की क्षमता, सुविधा, रुचि और आवश्यकता के अनुसार करना होता है। कोई एक नियम या दिनचर्या सभी के लिए अनुकूल नहीं हो सकती। योगाभ्यास हेतु बहुत समय की भी आवश्यकता नहीं, सामान्यतया आधा से एक घण्टा पर्याप्त होता। यदि आप के पास समय का अभाव है तो मात्र १५ मिनट में भी योगाभ्यास कर सकते हैं। बिल्कुल न करने की तुलना में कम करना भी श्रेस्यकर व लाभदायक है। हाँ एक बात का अवश्य ध्यान रखें कि अधूरा ज्ञान कभी-कभी अज्ञान से अधिक घातक सिद्ध होता है। इसलिए केवल किताबें पढ़कर या टी.बी. देखकर अभ्यास न करें। इसके लिए किसी योग संस्थान में जाकर प्रशिक्षण प्राप्त करें, अथवा किसी प्रशिक्षित व अनुभवी योगाचार्य का सहयोग लें। उससे विधिवत सीखें और उसी के मार्गदर्शन में अभ्यास करें।
योगाभ्यास में की जाने वाली क्रियाओं का उद्देश्य होता है सभी प्रकार की मनोकाइक बीमारियों को दूर कर सुडौल और सुंदर शरीर का निर्माण करना। इसके लिये विभिन्न प्रकार के आसन, प्राणायाम, बंध, मुद्रा, यौगिक षट्कर्म, व ध्यान आदि का अभ्यास किया जाता है। दुनिया भर में अनेकों लोग योग साधना द्वारा विविध प्रकार से लाभान्वित हो रहे हैं। आप भी नियमित योगाभ्यास प्रारंभ करके स्वस्थ, प्रसन्न, प्रभावी, व तनाव मुक्त जीवन का आनन्द लें। हरि ॐ तत्सत्।
- आचार्य बी एस 'योगी' भाग्यनगर (हैदराबाद) तेलंगाना