02/01/2026
नए वर्ष की प्रभात वेला आ चुकी है; क्षणभंगुर आशा की एक नई कली फिर से खिल उठी है। आप नववर्ष की शीतल सुबह में जागे हैं, परंतु अपने भीतर वही राग-द्वेष, वही प्रवृत्तियाँ, वही संकोच और वही बंधन पाए जाते हैं। फिर ऐसा क्यों है कि नववर्ष का दिन एक विशेष अवसर माना जाए?
पृथ्वी पर जीवन समय की निरंतर श्रृंखला में कुछ पवित्र अवसरों की माँग करता है—ऐसे अवसर, जहाँ मनुष्य उन मूल्यों के प्रति पुनः समर्पित हो सके, जो जीवन को सार्थक बनाते हैं। नववर्ष का दिन ऐसा ही एक अवसर है।
कैसे-कैसे रूप बदले हैं! प्रारंभ में ईसाई पंचांग का वर्ष 1 जनवरी से आरंभ नहीं होता था। रोमनों में नववर्ष 25 मार्च को मनाया जाता था। इंग्लैंड में छठी शताब्दी से नववर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाने लगा, किंतु ग्यारहवीं शताब्दी में रोमन परंपरा अपनाई गई और उसके बाद 1751 तक ब्रिटेन में 25 मार्च ही नववर्ष माना गया। फ्रांस में विभिन्न कालों में 25 मार्च, 25 दिसंबर और ईस्टर—तीनों नववर्ष के रूप में मनाए गए। अंततः 1952 में 1 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईसाई पंचांग का प्रथम दिन स्वीकार किया गया। प्रत्येक देश में एक या एक से अधिक नववर्ष होते हैं, और भारत में तो आधा दर्जन से भी अधिक हैं। किंतु किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए वर्ष का प्रथम दिन आत्ममंथन और समर्पण का दिन होना चाहिए।
अतीत की ओर गहराई से देखिए—जो अब शिथिल पड़ा है और फिर कभी उठने वाला नहीं। जो पाठ आपने सीखे हैं, उनका परीक्षण कीजिए और प्राप्त अनुभवों के आधार पर भविष्य की एक विवेकपूर्ण योजना बनाइए। अतीत की मूर्खताओं को दोहराइए मत।
परिवर्तन और विरोधाभास, ईमानदारी और छल, संधि और शत्रुता, जीवन के उतार-चढ़ाव के मध्य—अपने हृदय की एकांत शांति में, अंतर्मुखी मन और संयमित इंद्रियों के साथ—शांति, प्रेम और आनंद को खोजिए।
दिखावे से परे प्रश्न कीजिए, अपनी पूर्व आकांक्षाओं के मूल्य पर विचार कीजिए और फिर अपने भविष्य के मार्ग का निर्णय कीजिए। एक स्पष्ट आदर्श रखें और उसकी पूर्ति के लिए सुविचारित योजना बनाइए।
तर्क को अपनी प्रवृत्तियों का मार्गदर्शक बनने दें; विवेक तर्क की रक्षा करे; समर्पण आपकी शक्ति बने। दृढ़ विश्वास, संकल्पित इच्छा, धैर्य और सत्य—ईश्वर की कृपा के साथ—आपके भाग्यचक्र को गतिमान करें।
आपके उद्देश्य महान हों, व्यवहार निष्कपट हो, प्रेरणाएँ पारदर्शी हों, हृदय क्षमाशील हो और दृष्टिकोण व्यापक हो।
अतीत के मोह-मल को धो डालिए। सब कुछ अंततः कल्याणकारी है। विश्वास रखिए—सफलता वास्तविक है, असफलता केवल एक सीढ़ी। सद्गुण सत्य है, दुर्गुण उसका अभाव। प्रेम वास्तविक है, घृणा भटका हुआ आवेग। आनंद वास्तविक है, दुःख एक भ्रम। जीवन सत्य है, मृत्यु एक श्रेष्ठ परिवर्तन। असत्य से दृष्टि हटाकर सत्य की ओर मोड़िए। अपने प्रयासों के बल पर, यथाशीघ्र, अपने मोक्ष की दिशा में आगे बढ़िए।
इतना कुछ सोचने, समझने, जाँचने, सुधारने और पुनः परखने के लिए शेष हो, तब हे भोले मनुष्य, किस बात का उन्माद, किस प्रकार का अति उत्साह या मनोरंजन आपको व्याप्त कर सकता है?
क्षणभंगुर समय को व्यर्थ न गँवाइए। सब कुछ अंततः शून्य में विलीन हो जाता है। श्रेष्ठ कला, सर्वाधिक वाक्पटु ग्रंथ और महानतम राजनीतिक प्रतिभाएँ भी समय की गाड़ी में लुप्त हो जाती हैं, और कुछ शताब्दियों बाद उनकी चमकदार स्मृतियाँ भी मुश्किल से पहचानी जाती हैं।
हे कोमल आत्मा! हृदय पर बोझ न रखिए। क्षणिकता के दुर्गंधयुक्त मोह में न डूबिए। जीवन में नया आनंद, नई योग्यता, नया प्रकाश और नया उद्देश्य खोजिए। मृगतृष्णा में मरुद्यान खोजने की भूल न करें; बल्कि जो सत्य, स्थिर और आत्मनिर्भर हैं, उनसे प्रेरणा, शक्ति और साहस ग्रहण करें। अपने स्वाभाविक स्वरूप में रहें—पवित्र, सरल और निष्कलुष। लोगों में रुचि रखें। जितना हो सके, सीखते रहें।
किसी न किसी प्रकार की गतिविधि के बिना प्रसन्न रहना असंभव है। इसलिए अपने कार्य में रुचि उत्पन्न करें। गतिविधि ऐसी होनी चाहिए जो सुखद और प्रेरणादायक हो, अत्यधिक बोझिल नहीं—तभी वह लाभकारी होगी।
केवल सामान्य परिस्थितियों में सहज रह पाना पर्याप्त नहीं है। आपके चरित्र की वास्तविक परीक्षा प्रतिकूल परिस्थितियों में होती है। इसलिए प्रतिदिन एक बेहतर व्यक्तित्व गढ़ने, सकारात्मक गुणों को सुदृढ़ करने के प्रति सजग रहें।
एक अभियंता की दूरदर्शिता को देखिए—पुल केवल सामान्य यातायात के लिए नहीं, बल्कि आकस्मिक और अत्यधिक भार को सहने के लिए भी बनाया जाता है। उसी प्रकार आपका चरित्र भी कठिन और असहज परिस्थितियों में शिष्ट आचरण, सही मर्यादा और अडिग गरिमा की गारंटी होना चाहिए।
यदि चरित्र नहीं है, तो कितनी ही श्रेष्ठ क्षमताएँ भी व्यर्थ हैं। यदि आप चाहते हैं कि लोग आप पर विश्वास करें और आपका सम्मान करें, तो आपको ईमानदार, स्थिर, विश्वसनीय, सरल और निःस्वार्थ होना होगा।
मूलभूत भलाई में, स्वयं में विश्वास रखें। आत्मविश्वास, दृढ़ता और पहल को विकसित करें। घृणा केवल घृणा से ही करें। भय केवल भय से ही रखें। किसी लक्ष्य को अधूरा न छोड़ें। परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालें। दूसरों में जो आपको दुःखी करता है, उसे स्वयं से दूर करें।
सर्वशक्तिमान की अनंत कृपा सब पर बनी रहे। प्रत्येक घर में समृद्धि और सुख हो। राष्ट्रों के बीच सद्भाव और सौहार्द बढ़े। संसार हर श्रेष्ठ दिशा में प्रगतिशील बने।