24/04/2025
मत छीनो मेरे खिलौने,
मेरी हँसी मेरा बचपन।
( "मत छीनो मेरे खिलौने…"
ये सिर्फ एक कविता नहीं,
एक चीख है उस बच्चे की
जिसने बारूद में रंग खोजे।)
मत छीनो मेरे खिलौने,
मेरी हँसी, मेरा बचपन।
मत करो तुम वीरान,
मेरी जगह मेरा आंगन।
पहलगाम की सड़कों पर
टूटे हैं रंगों के सपने,
काँच की तरह बिखरे हैं
काग़ज़ की नावों के वचन।
बारूद की महक में अब
चॉकलेट भी लगती है सज़ा सी,
हर मोड़ पे मौत बैठी है
कहती है — "अब खेलो मुझसे।"
मेरी किताबें भी सहमी हैं,
हर अक्षर काँपता है डर से।
“अ से अमन” पढ़ने वाला मैं
अब “अ से आतंक” लिखता हूँ।
स्कूल की घंटी भी ख़ामोश है,
रंग-बिरंगे बस्ते — अब
बस गवाह हैं गोली की गूंज के।
जो मासूम कलियाँ थे कल तक,
आज सवाल बन गए हैं — “मैं क्यों?”
मेरे आँगन की मिट्टी अब
गुलाब नहीं उगाती,
सिर्फ़ माँ की दुआओं में
बची है ज़िंदगी की लौ।
जहाँ हर शाम “आओ खेलें” की सदा थी,
अब हर रोज़ “भागो” की गूंज है।
मैं नहीं चाहता टैंक को खिलौना बनाना,
मैं चाहता हूँ गुड्डे-गुड़ियों का जहाँ।
ओ ज़माने! सुनो मेरी सिसकी,
ये कोई एक बच्चे की पुकार नहीं,
पूरे कश्मीर का बचपन चीख रहा है।
हम नहीं चाहते बंदूक की भाषा,
हम चाहते हैं — लोरी, कहानियाँ,
और शाम को लौटता सूरज
जो डर से नहीं, उम्मीद से भरा हो।
ये मेरी लड़ाई नहीं, ये मानवता की जंग है।
जो आया था अमन लाने,
वही छीन रहा है चैन,
जो कहता था "ज़िंदाबाद",
वो ही बन गया है दहशत का नाम।
मत करो ऐसा इल्म का सौदा,
जहाँ बंदूकें पढ़ाई से भारी हो जाएँ।
खिलौने लौटाओ, ख़ुशियाँ लौटाओ,
वरना ये मासूम आँसू
तुम्हारी नींदें भी लूट लेंगे।
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करीब 30 साल पहले किसी आतंकवादी घटना पर ही मैंने ये कविता लिखी थी अब वैसी ही एक बड़ी घटना हुई है।
इस कविता को इसलिए अब की घटना को समावेश करके मैंने दोबारा लिखा है।
.. ॐ शान्ति ...
🧘
~ गुरुश्री
(संकल्प सिद्धि योग)