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26/07/2023
08/03/2023

आज हम जानकारी लेते हैं कुंडली में धन योग के बारे में

कुंडली का दूसरा भाव धन स्थान कहलाता है और इससे धन, आभूषण, पैतृक धन, बचत, कुटुंब, वाणी इत्यादि का विचार किया जाता है। कुंडली का ग्यारहवां भाव लाभ स्थान कहलाता है।

इससे लाभ, आमदनी और उसका प्रकार, स्वर्ण आभूषण, वस्त्र और सवारी इत्यादि का विचार होता है।

इसके अतिरिक्त केंद्र स्थानों को विष्णु स्थान (सुख स्थान) और त्रिकोण स्थानों को लक्ष्मी स्थान (धन स्थान) कहते हैं। नवमेश और पंचमेश (नवम से नवम) दोनों धनकारक होते हैं। जो भी ग्रह इनके साथ होते हैं, वे अपनी दशा में धन प्रदान करते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

ग्रहों में बृहस्पति मूलत: धन का कारक है और शुक्र उसके बाद दूसरे स्थान पर है। यह लोक सुखकारक होता है। इनका धन और लाभ भाव में युति रखना, या परस्पर दृष्ट होना जातक को अतुल धन देता है। गुरु-मंगल और चंद्र-मंगल की आपस में युति और दृष्टि भी धन योग बनाती है।

बृहत पराशर होरा शास्त्र के अनुसार भी यदि धनेश लाभ स्थान में हो और लाभेश धन भाव में हो, या धनेश और लाभेश दोनों एक साथ केंद्र, या त्रिकोण स्थान में स्थित हों, तो जातक धनवान होता है।

यदि केवल धनेश और लाभेश का विनिमय हो, या दोनों ही केंद्र स्थान में हों, तो भी जातक बहुत धनी होता है। इसी प्रकार यदि धनेश पंचम भाव (त्रिकोण) में हो, तो जातक धनी होता है। अगर गुरु, शुक्र और बुध में से कोई एक ग्रह उच्च स्थान में हो और दूसरे शुभ ग्रह केंद्र में हों तो जातक राजा तुल्य होता है।

यदि कुंडली में एक भी ग्रह उच्च राशि में हो और उसको मित्र ग्रह देखते हों, तो ऐसा व्यक्ति राजा होता है। यदि ऐसा उच्च ग्रह मित्र ग्रह से युक्त हो, तो जातक धनी होता है।

उत्तराकालामृत के अनुसार द्वितीय, पंचम, एकादश तथा नवम भावों के स्वामी बलवान हों और इनमें से कुछ, अथवा सभी की परस्पर तीन प्रकार से युति, दृष्टि, अथवा स्थान परिवर्तन द्वारा संबंध हों, तो जातक लखपति बनते हैं। परंतु इनके साथ छठे, आठवें, अथवा बारहवें भाव के स्वामियों का भी संबंध हो जाए, तो हानि तथा ऋण योग बन जाता है।

ऐसी स्थिति में 2,5,9,11 भावों के स्वामियों की दशा में शत्रु से भय होता है। यदि धनेश सुख भाव चतुर्थ केंद्र में स्थित हो, तो धनदायक होता है। अगर वह गुरु से संयुक्त हो, या सुख भाव में धनेश उच्च राशि का हो, तो जातक राजा तुल्य ऐश्वर्यवान होता है।

जातक तत्त्व के अनुसार लग्नेश, एकादशेश और धनेश एक साथ केंद्र, या त्रिकोण में हों और शुभ ग्रहों से दृष्ट हों एवं धनेश काल बली हो, तो भी मनुष्य स्वार्जित धन का स्वामी होता है। धनेश, लाभेश और नवमेश यदि बलवान हो कर केंद्र स्थानों में हों, तो व्यक्ति तीन लाख स्वर्ण मुद्राओं का स्वामी होता है।

इन सब स्रोतों का सवार्थचिंतामणि ने इस प्रकार एकीकरण किया है: यदि तृतीयेश, चतुर्थेेश, पंचमेश, षष्ठेश, सप्तमेश बलवान हों और धनकारक भाव तथा उनके भावेशों से संबंध रखते हों, तो जातक को भाई, माता, पुत्र, शत्रु, पत्नी इत्यादि से धन प्राप्त होता है। इसके विपरीत यदि तृतीयेश इत्यादि कमजोर हों और दुष्ट ग्रह धन भावों को प्रभावित करते हों, तो उसे संबंधी द्वारा धन हानि होती है।

दूसरा भाव ‘धन’ स्थान, ग्यारहवा भाव ‘लाभ’ स्थान, केंद्र भाव विष्णु (सुख) स्थान तथा त्रिकोण भाव लक्ष्मी (धन) स्थान होते हैं। नवमेश और पंचमेश (नवम से नवम) दोनों धनकारक होते हैं। जो भी ग्रह इनके साथ होते हैं, वे अपनी दशा में धन प्रदान करते हैं।

त्रिकोण और केंद्र के भावेशों की युक्ति, विनिमय, या परस्पर दृष्टि, राजयोग का निर्माण कर के, शुभ फलदायक होती हैं। केंद्र और त्रिकोण के स्वामियों का धनेश तथा लाभेश से संबंध अतुल धनकारक बन जाता है। बृहस्पति, शुक्र और बुध की केंद्र में बलवान स्थिति विशेष धनकारक होती है तथा एकादश भाव में सूर्य विशेष धनकारक होता है। द्वितीय भाव में सब पाप ग्रह हों, तो जातक दरिद्र होता है एवं द्वितीय में सब शुभ ग्रह धन की वृद्धि कराते हैं। सप्तम भाव से आजीविका द्वारा धन की प्राप्ति और दूसरी तरफ विवाह द्वारा ससुराल पक्ष से धन का योग दर्शाता है।

विभिन्न प्रकार के योग- राजयोग, गजकेसरी योग, चक्रवर्ती योग आदि- धन की प्राप्ति का संकेत देते हैं।

ग्रहों में बृहस्पति मूलत: धन का कारक है और शुक्र उसके बाद दूसरे स्थान पर है। गुरु-मंगल और चंद्र-मंगल की आपस में युति और दृष्टि भी धन योग बनाती है।

कन्या राशि में राहु, शुक्र, मंगल, शनि चारों ग्रह हों, तो जातक कुबेर के समान धनी होता है। जन्म समय चंद्र मंगल के साथ हो, तो जातक के घर से लक्ष्मी कहीं नहीं जाती है।

● कुंडली में सब ग्रह उच्च के, या स्वग्रही बनते हों, तो यह भी एक राजयोग है। ऐसे जातक प्रचुर धन-संपत्ति प्राप्त करते हैं।

● लग्न में चंद्र-शनि, पंचम, या नवम स्थान में गुरु-सूर्य की युति, दशम स्थान में मंगल, यह भी एक राजयोग है। ऐसे जातक को धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं रहती है।

● केंद्र के बलवान और शुभ ग्रह यदि उच्च के, या स्वग्रही हों, तो यह एक राजयोग है। ऐसे जातक राजा के समान धनी होता है।

● पंच महाभूत योग, जैसे रूचक योग, भद्र योग, हंस योग, मालव्य योग, या शश योग वाले जातक विपुल धन-संपत्ति प्राप्त करते हैं।

सामान्य धन योग:

मूलत: बलवान लग्नेश, धनेश और लाभेश के आपसी संबंध जातक को धनी बनाते हैं। यदि लग्नेश धन भाव में हो, धनेश लाभ भाव में हो और लाभेश लग्न भाव में हो, तो जातक बहुत धनी होता है। धन का स्रोत: बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार अगर तृतीयेश लग्न में स्थित हो, तो जातक अपने आप धन कमाता है।

माता से धन प्राप्ति योग: यदि धन भाव का स्वामी चतुर्थेश से युक्त, या दृष्ट हो, तो जातक को अपनी माता की संपत्ति प्राप्त होती है।

पिता से धन प्राप्ति योग: दशमेश और दशम स्थान के कारक ग्रह यदि बलवान धनेश से युक्त, या दृष्टि संबंध रखते हों, तो पिता से धन मिलता है। शत्रु से धन प्राप्ति: यदि धनेश षष्ठ भाव में स्थित हो और वहां शुभ ग्रह से युक्त हो, तो जातक को बैरी से भी धन प्राप्त होगा।

धन की मात्रा: बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार यदि लाभेश धन भाव में हो और द्वितीयेश लग्न से केंद्र में स्थित हो एवं गुरु लाभ स्थान में स्थित हो, तो जातक अतुल धनवान होता है।

धन प्राप्ति का समय: यदि धनेश लाभ भाव में हो और लाभेश द्वितीय भाव में स्थित हो, तो जातक को विवाहोपरांत अतुल धन-संपत्ति मिलती है। यदि लाभेश लग्न में स्थित हो और लग्नेश लाभ स्थान में हो, तो जातक को 33वें वर्ष में धन का लाभ होता है। यह योग लाभेश पर भी लागू होता है, अर्थात् यदि लाभेश और धनेश एक साथ स्थित हों और उस राशि का अधिपति लग्न में बलवान हो कर स्थित हो, तो जातक जीवन के अंत में धनी होता है। पापी ग्रह भी लाभ भाव में धनकारक होते हैं। सर्वार्थ चिंतामणि के अनुसार यदि लाभेश केंद्र, या त्रिकोण स्थान में हो, या लाभ स्थान में पाप ग्रह स्थित हों, तो भी जातक बहुत धनी होता है।

स्वजनों से धन प्राप्ति:
● दशम स्थान में सूर्य-शुक्र, या सूर्य-राहु की युति हो, दशमेश चतुर्थ स्थान में हो, तो जातक को पिता के द्वारा धन की प्राप्ति होती है।

● चौथे स्थान में चंद्र-शुक्र की युति हो, चतुर्थ स्थान बलवान हो, तो जातक माता के द्वारा धन प्राप्त करता है।

● तृतीयेश और धनेश की युति नवम स्थान में हो, या भाग्येश और धनेश की युति तीसरे स्थान में हो, तो जातक को भाई के द्वारा धन लाभ होता है।

● चतुर्थेश तथा सप्तमेश का परिवर्तन योग हो, तो पत्नी, या ससुराल से धन लाभ होता है। भाग्येश का सप्तम स्थान में होना आवश्यक है।

● जातक का जन्म लग्न कन्या हो और अष्टम स्थान में बुध, चंद्र तथा शनि की युति हो एवं सप्तम स्थान में शुक्र हो, तो जातक वर्ग को ससुराल से धन लाभ होता है।

● पंचमेश और धनेश की युति पंचम स्थान में हो, या पंचमेश पर धनेश की दृष्टि हो, या दोनों उच्च के, स्वग्रही हों, तो पुत्र से धन लाभ होता है।

● षष्ठेश की शुभ ग्रह के साथ युति हो, धनेश और भाग्येश की छठे स्थान में युति हो, तो जातक को ननिहाल से धन लाभ होता है।

● जातक का जन्म लग्न मिथुन हो एवं द्वितीयेश उच्च स्थान में हो, तो जातक को पैतृक धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है।

● सप्तमेश और धनेश साथ-साथ हों तथा उन पर शुक्र की पूर्ण दृष्टि हो, तो जातक को ससुराल से धन लाभ होता है।

● सप्तमेश शुक्र राशि में हो, या सप्तमेश और शुक्र की युति हो तथा सप्तमेश एवं भाग्येश का किसी प्रकार का शुभ संबंध हो, तो जातक को ससुराल से प्रचुर धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है।

कुंडली में धन प्राप्ति हेतु निम्न भाव महत्त्व के हैं:

प्रथम स्थान (लग्न)- जातक की कुंडली में प्रथम स्थान महत्त्व का है। बलवान एवं शुभ लग्नेश का धन स्थान, या धनेश से संबंध व्यक्ति को धन संबंधी शुभ फल देता है।

द्वितीय स्थान (धन)- दूसरे स्थान से जातक की धन की मात्रा एवं धन के संचय के बारे में जानकारी मिलती है।

चतुर्थ स्थान- भूमि एवं वाहन से जातक को होने वाले धन लाभ एवं माता के द्वारा मिलने वाले धन के बारे में जानकारी इस स्थान से मिलती है।

पंचम स्थान- लॉटरी, शेयर, सट्टा, नौकरी, उन्नति एवं संतान के द्वारा होने वाले धन लाभ के बारे में जानकारी इस स्थान से मिलती है।

सप्तम स्थान- पत्नी, ससुराल, साझेदारी, व्यापार, यात्रा आदि से होने वाले धन लाभ के बारे में यहां से जानकारी मिलती है।

अष्टम स्थान- वारिस के रूप में, जमीन में गड़ा हुआ, या आकस्मिक प्राप्त होने वाला धन, गुप्त धन के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

नवम स्थान (भाग्य स्थान)- शुभ एवं बलवान भाग्येश का धन स्थान, लाभ स्थान से संबंध जातक को धन संबंधी शुभ फल देता है।

दशम स्थान (कर्म स्थान)- जातक को किस व्यवसाय से धन लाभ होगा, यह जानकारी मिलती है। पिता के द्वारा प्राप्त होने वाले धन की जानकारी भी यहां से मिलती है।

एकादश स्थान: इसे लाभ स्थान भी कहते हैं। जातक की इच्छा पूर्ति, धन का संग्रह एवं धन की प्राप्ति के बारे में इस स्थान से जानकारी मिलती है।

राजयोग
● केंद्र के बलवान और शुभ ग्रह यदि उच्च के, या स्वग्रही हों, तो यह एक राजयोग है। ऐसे जातक राजा के समान धनी होता है।

● जातक की कुंडली में सब ग्रह उच्च के, या स्वग्रही बनते हों, तो यह भी एक राजयोग है। ऐसे जातक प्रचुर धन-संपत्ति प्राप्त करते हैं।

● लग्न में चंद्र-शनि, पंचम, या नवम स्थान में गुरु-सूर्य की युति, दशम स्थान में मंगल, यह भी एक राजयोग है। ऐसे जातक को धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं रहती है।

● पंच महाभूत योग, जैसे रूचक योग, भद्र योग, हंस योग, मालव्य योग, या शश योग वाले जातक विपुल धन-संपत्ति प्राप्त करते हैं।

जातक को कौन सी दिशा से धन लाभ होगा, यह जानकारी भी जातक की कुंडली से मिलती है। दिशा जानने हेतु जातक की कुंडली में दूसरे स्थान में जो ग्रह है, उस ग्रह की दिशा जातक को फायदेमंद रहेगी, जैसे सूर्य पूर्व दिशा से, शनि पश्चिम दिशा से, बुध उत्तर दिशा से, मंगल दक्षिण दिशा से, चंद्र वायव्य कोण से, राहु-केतु नैऋर्त्य कोण से, गुरु ईशान कोण से, शुक्र अग्नि कोण से धन लाभ करवाते हैं। ग्रह की तरह जातक के दूसरे स्थान में स्थित राशि भी जातक के धन लाभ से संबंधि जानकारी देती है, जैसे:

● मेष, सिंह, धनु राशि: पूर्व दिशा

● वृषभ, कन्या, मकर: दक्षिण दिशा

● मिथुन, तुला, कुंभ: पश्चिम दिशा

● कर्क, वृश्चिक, मीन: उत्तर दिशा से धन लाभ देती हैं।

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26/02/2023

🚩🌼राशि अनुसार धन एवं सुख समृद्धि प्राप्ति
के अचूक उपाय--🌼🚩
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🌞मेष :- रात में लाल चंदन और केसर घिसकर उससे रंगा हुआ सफेद कपड़ा यदि आप अपने गल्ले अथवा तिजोरी में बिछाएंगे तो उससे आपकी समृद्धि में हमेशा वृद्धि होगी तथा आकस्मिक धनहानि का अवसर भी नहीं आएगा.स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ऐं क्लीं सौ:. शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर तेल का दीपक जलाएं तथा उस दीपक में दो काली गुंजा डाल दें तो वर्ष भर आपको आर्थिक रूप से परेशानी नहीं होगी. आपका रुका हुआ धन भी जल्दी ही मिल जाएगा.

🌞• वृषभ :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ऐं क्लीं श्रीं रात गाय के घी के दो दीपक जलाकर उन्हें किसी एकांत स्थान अपनी मनोकामना बताते हुए पर रख आएं. शीघ्र ही आपकी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी. यदि बहुत पैसा कमाने के बावजूद भी आप उसे सेविंग नहीं कर पा रहे हैं तो लक्ष्मी पूजन के साथ:-साथ कमल के फूल का भी पूजन करें तथा बाद में इस फूल को लाल कपड़े में बांधकर अपने धन स्थान यानी तिजोरी या लॉकर में रखें.

🌞• मिथुन :-यदि आप कर्ज से परेशान हैं तो लक्ष्मी पूजन के बाद गणेशजी की प्रतिमा को हल्दी की माला पहनाएं. इससे आपकी परेशान समाप्त हो जाएगी. स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ क्लीं ऐं स: यदि आप धन की कमी से जूझ रहे हैं तो लक्ष्मी:-गणेश पूजन करते समय दक्षिणावर्ती शंख की पूजा करके उसे अपने धन स्थान पर रखें.

🌞• कर्क :- यदि आप त्रिकोण आकृति का झंड़ा विष्णु भगवान के किसी मंदिर में ऊंचाई वाले स्थान पर इस प्रकार लगाएं कि वह लहराता रहे तो तक आपका भाग्य चमक उठेगा.कर्क राशि के लोग स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ क्ली ऐं श्रीं यदि आपको धन लाभ की अभिलाषा है तो शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे तेल का पंचमुखी दीपक जलाएं.

🌞 सिंह :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ह्रीं श्रीं सौं: रात घर के मुख्य दरवाजे पर गाय के घी का दीपक जला कर रखें. यदि वह दीपक सुबह तक जलता रहे तो समझें कि आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा साथ ही मान:-सम्मान भी बढ़ेगा.यदि शत्रु आपको परेशान कर रहे हैं तो दीपावली की शाम को पीपल के पत्ते पर अनार की कलम से गोरोचन के द्वारा शत्रु का नाम लिखकर भूमि में दबा दें.

🌞• कन्या :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ श्रीं ऐं सौं यदि आपको धन संबंधी कोई समस्या है तो आप लाल रुमाल में नारियल बांधकर अपने गल्ले अथवा तिजोरी में रखें. धन लाभ होने लगेगा. इसके दो कमलगट्टे की माला माता लक्ष्मी के मंदिर में दान अर्पित करें.यदि आपको नौकरी संबंधी कोई समस्या है तो आप तक रोज मीठे चावल कौओं को खिलाएं. इससे आपकी समस्या का निदान हो जाएगा.

🌞• तुला :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए तुला राशि के लोग सुबह स्नान आदि नित्य कर्म करने के बाद किसी लक्ष्मी मंदिर में जाकर 11 नारियल अर्पित करें.यदि आपको व्यवसाय में घाटा हो रहा है तो आप बड़ के पेड़ के पत्ते पर सिंदूर व घी से ॐ श्रीं श्रियै नम: मंत्र लिखें और इसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें.

🌞• वृश्चिक :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ऐं क्लीं सौ: इस राशि के लोगों को यदि धन की इच्छा है तो वे अपने घर के बगीचे या बरामदे में केले के दो पेड़ लगाएं तथा इनकी देखभाल करें. परंतु इनके फल का सेवन न करें.यदि परिवार में अशांति है तो नागकेसर का फूल लाकर घर में कहीं छिपा दें. जहां उसे कोई देख न सके.

🌞• धनु :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ह्रीं क्लीं सौ: इस राशि के लोग धन प्राप्ति के लिए पान के पत्ते पर रोली से श्रीं लिख कर अपने पूजा स्थान पर रखे तथा रोज इसकी पूजा करें.यदि तुला राशि के लोग किसी बीमारी से परेशान हैं तो चंद्रमा को अध्र्य दें और बीमारी के निवारण के लिए प्रार्थना करें. अमावस्या होने से चांद दिखाई नहीं देगा तो भी अध्र्य दें.

🌞• मकर :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ऐं क्लीं सौ: यदि विवाह में बाधा आ रही है तो भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें पीला वस्त्र, पीली मिठाई अर्पित करें.काफी समय से यदि धन रुका हुआ है तो आक की रुई का दीपक घर के ईशान कोण में जलाएं.

🌞 • कुंभ :- स्फटिक या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं जीवन साथी के साथ नहीं बनती है तो खीर बनाएं इसका भोग लक्ष्मी को लगाएं और फिर स्वयं भी खाएं. इससे दांपत्य जीवन में मधुरता आएगी.धन प्राप्ति के लिए नारियल के कठोर आवरण में घी डालकर लक्ष्मीजी के समक्ष दीपक जलाएं. यह दीपक रात भर जलने दें

🌞• मीन :- कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का जप करें:- ॐ ॐ ह्रीं क्लीं सौ: धन लाभ के लिए किसी लक्ष्मी मंदिर में जाकर कमल के फूल, नारियल अर्पित करें तथा सफेद मिठाई का भोग लगाएं. यदि आपको शत्रु पक्ष से परेशानी हैं तो कपूर के काजल से शत्रु का नाम लिखकर अपने पैर से मिटा दें.

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भगवान शिव, शंकर, महादेव, भोलेनाथ से जुड़े 18 रोचक तथ्य---1. भगवान शिव का कोई माता-पिता नही है. उन्हें अनादि माना गया है. ...
25/02/2023

भगवान शिव, शंकर, महादेव, भोलेनाथ से जुड़े 18 रोचक तथ्य---

1. भगवान शिव का कोई माता-पिता नही है. उन्हें अनादि माना गया है. मतलब, जो हमेशा से था. जिसके जन्म की कोई तिथि नही.
2. कथक, भरतनाट्यम करते वक्त भगवान शिव की जो मूर्ति रखी जाती है उसे नटराज कहते है.
3. किसी भी देवी-देवता की टूटी हुई मूर्ति की पूजा नही होती. लेकिन शिवलिंग चाहे कितना भी टूट जाए फिर भी पूजा जाता है.
4. हम शिवरात्री इसलिए मनाते है क्योंकि इस दिन शंकर-पार्वती का ब्याह हुआ था.
5. शंकर भगवान की एक बहन भी थी अमावरी. जिसे माता पार्वती की जिद्द पर खुद महादेव ने अपनी माया से बनाया था.
6. भगवान शिव और माता पार्वती का 1 ही पुत्र था. जिसका नाम था कार्तिकेय. गणेश भगवान तो मां पार्वती ने अपने उबटन (शरीर पर लगे लेप) से बनाए थे.
7. भगवान शिव ने गणेश जी का सिर इसलिए काटा था क्योकिं गणेश ने शिव को पार्वती से मिलने नही दिया था. उनकी मां पार्वती ने ऐसा करने के लिए बोला था.
8. भोले बाबा ने तांडव करने के बाद सनकादि के लिए चौदह बार डमरू बजाया था. जिससे माहेश्वर सूत्र यानि संस्कृत व्याकरण का आधार प्रकट हुआ था.
9. शंकर भगवान पर कभी भी केतकी का फुल नही चढ़ाया जाता. क्योंकि यह ब्रह्मा जी के झूठ का गवाह बना था.
10. शिवलिंग पर बेलपत्र तो लगभग सभी चढ़ाते है. लेकिन इसके लिए भी एक ख़ास सावधानी बरतनी पड़ती है कि बिना जल के बेलपत्र नही चढ़ाया जा सकता.
11. शंकर भगवान और शिवलिंग पर कभी भी शंख से जल नही चढ़ाया जाता. क्योकिं शिव जी ने शंखचूड़ को अपने त्रिशूल से भस्म कर दिया था. आपको बता दें, शंखचूड़ की हड्डियों से ही शंख बना था.
12. भगवान शिव के गले में जो सांप लिपटा रहता है उसका नाम है वासुकि. यह शेषनाग के बाद नागों का दूसरा राजा था. भगवान शिव ने खुश होकर इसे गले में डालने का वरदान दिया था.
13. चंद्रमा को भगवान शिव की जटाओं में रहने का वरदान मिला हुआ है.
14. जिस बाघ की खाल को भगवान शिव पहनते है उस बाघ को उन्होनें खुद अपने हाथों से मारा था.
15. नंदी, जो शंकर भगवान का वाहन और उसके सभी गणों में सबसे ऊपर भी है. वह असल में शिलाद ऋषि को वरदान में प्राप्त पुत्र था. जो बाद में कठोर तप के कारण नंदी बना था.
16. गंगा भगवान शिव के सिर से क्यों बहती है ? देवी गंगा को जब धरती पर उतारने की सोची तो एक समस्या आई कि इनके वेग से तो भारी विनाश हो जाएगा. तब शंकर भगवान को मनाया गया कि पहले गंगा को अपनी ज़टाओं में बाँध लें, फिर अलग-अलग दिशाओं से धीरें-धीरें उन्हें धरती पर उतारें.
17. शंकर भगवान का शरीर नीला इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होने जहर पी लिया था. दरअसल, समुंद्र मंथन के समय 14 चीजें निकली थी. 13 चीजें तो असुरों और देवताओं ने आधी-आधी बाँट ली लेकिन हलाहल नाम का विष लेने को कोई तैयार नही था. ये विष बहुत ही घातक था इसकी एक बूँद भी धरती पर बड़ी तबाही मचा सकती थी. तब भगवान शिव ने इस विष को पीया था. यही से उनका नाम पड़ा नीलकंठ.
18. भगवान शिव को संहार का देवता माना जाता है. इसलिए कहते है, तीसरी आँख बंद ही रहे प्रभु की.
🌺🙏🌺हर हर महादेव 🌺🙏🌺

11/09/2022
*अपने बच्चों के ग्रहों के संकेत को उनके व्यवहार से जाने*1. सूर्य कमजोर होने पर बच्चे को सुबह जागने में परेशानी होगी और प...
04/02/2022

*अपने बच्चों के ग्रहों के संकेत को उनके व्यवहार से जाने*

1. सूर्य कमजोर होने पर बच्चे को सुबह जागने में परेशानी होगी और पिता से दूरी बढ़ेगी।

2. चंद्र जब कमजोर होगा तो कुछ पूछने पर रोने लगेंगे।

3. मंगल जब कमजोर होगा तो गुस्सा बढ़ेंगा और चिड़चिड़े होंगे।

4. बुध जब कमजोर होगा तो कम बात करेंगे, याददाश्त कमजोर होगी। बाजार से क्या लाना है भूल जायेगे, किताब कहाँ रखी,किसको दी भूल जायेगे।

5. गुरु जब कमजोर होगा तो बुजुर्ग का सम्मान नहीं करेंगे,जंक फूड ज़्यादा खायेगे। बच्चे बैठने के बजाय "लेटकर" किताबें पढ़ेंगे।

6. शुक्र जब कमजोर होगा तो काम करने का कोई समय नहीं होगा। सुबह उठकर चादर की घड़ी नही बनायेगे।

7. शनि जब कमजोर होगा तो एकांत में बैठने लगते हैं। पैर घिस कर चलेंगे।

8. राहु जब कमजोर होगा तो मोबाइल में ज़्यादा व्यस्त रहेंगे, चिढ़चिढ़ अधिक करेंगे और कम उम्र में हस्तमैथुन जैसी आदतों के शिकार हो जायेगे।

9. केतु जब कमजोर होगा तो बच्चे अँधेरे में अधिक समय रहते है, कम रोशनी में मोबाइल चलना और कम रोशनी में पढ़ाई करना, बिस्तर पर लेट कर किताब पढ़ना आदि।

*अंबे*

19/09/2021

प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ।।
( चाणक्य नीति - ३/६ )
समुद्र भी प्रलय की स्थिति में अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर देते हैं और किनारों को लांघकर सारे प्रदेश में फैल जाते हैं । परंतु सज्जन व्यक्ति प्रलय के समान भयंकर विपत्ति और कष्ट आने पर भी अपनी सीमा में ही रहते हैं, अपनी मर्यादा नहीं छोड़ते ।।
🙏🌷 ।। सर्वेभ्य: सुप्रभातम् ।। 🌷🙏

Not just a warrior queen, but an amputee who got fitted with prosthetic limb during the Rig ved era, estimated about mor...
09/08/2021

Not just a warrior queen, but an amputee who got fitted with prosthetic limb during the Rig ved era, estimated about more than 10,000 yrs ago.....

And yet we forget our own sciences and praise all that is foreign.
Shame upon us and those who teach us to be bootlickers.
Not to forget, pseudo-feminists need to take a lesson in history and identify who actually curtailed the status of women in India!

17/06/2021

धरती पर रुद्राक्ष को शिव का प्रतीक माना जाता है। रुद्राक्ष को धारण करने से आपकी सभी समस्‍याएं तो दूर होती ही हैं साथ ही भगवान शिव की कृपा भी बनी रहती है। शिव भक्‍तों को तो रुद्राक्ष अवश्‍य ही धारण करना चाहिए।
कुंडली में बैठे अशुभ ग्रहों का मनुष्‍य के जीवन पर अनुकूल-प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कुछ ग्रह तो इतना क्रूर प्रभाव डालते हैं कि इंसान का पूरा जीवन ही तहस-नहस हो जाता है। ग्रहों की शांति के लिए ज्‍योतिष में अनेक उपाय बताए गए हैं। ग्रह शांति के लिए व्रत, उनसे संबंधित चीज़ों का दान और रुद्राक्ष धारण करवाया जाता है।

आज हम आपको बताते हैं कि किस रुद्राक्ष को धारण करने से किस ग्रह की शांति होती है।

रुद्राक्ष और ग्रह का संबंध

सूर्य : अगर कुंडली में सूर्य पीडित है या अशुभ प्रभाव दे रहा है तो आपको इस ग्रह की शांति के लिए एक मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

चंद्रमा : कुंडली में नीच स्‍थान में बैठे चंद्रमा को बली करने के लिए दो मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

मंगल : मंगल का अशुभ प्रभाव अत्‍यंत पीड़ादायक होता है इसलिए आपको इस ग्रह को शांत करने के लिए तीन और ग्‍यारह मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

बुध : बुध ग्रह कुंडली में अशुभ प्रभाव दे रहा है और यदि आपको इस ग्रह से संबंधित क्षेत्रों में नुकसान हो रहा है तो आपको चार मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

गुरु : बृहस्‍पति ग्रह वैवाहिक जीवन का प्रतीक है। यदि गुरु अशुभ स्‍थान में बैठा हो या अनुचित प्रभाव दे रहा हो तो आपको पांच मुखी या दस मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

शुक्र : शुक्र की शांति के लिए छह और तेरह मुखी रुद्राक्ष लाभदायक रहता है। ये रुद्राक्ष धारण करने से आपको शुक्र से संबंधित भौतिक सुखों की प्राप्‍ति होती है।

शनि : ये तो सभी जानते हैं कि अगर कुंडली में शनि देश अशुभ स्‍थान में बैठे हों या कुप्रभाव दे रहे हैं तो उस इंसान का जीवन कैसा बन जाता है। शनि ग्रह की पीड़ा को शांत करना अति आवश्‍यक होता है। शनि की पीड़ा को शांत करने के लिए सात और चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

राहु : राहु की शांति के लिए आठ मुखी रुद्राक्ष बेहतर माना जाता है।

केतु : अगर आपको केतु के कारण परेशानियां आ रही हैं तो आपको नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

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