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☘️ *_चक्कीचालन आसन: खासतौर पर स्त्रियों को लाभप्रद योग जानिए इसके अन्य लाभ और विधि_*योग अपनाए सुंदर जीवन पाये*योगाचार्य ...
02/01/2022

☘️ *_चक्कीचालन आसन: खासतौर पर स्त्रियों को लाभप्रद योग जानिए इसके अन्य लाभ और विधि_*

योग अपनाए सुंदर जीवन पाये
*योगाचार्य विनय*
स्वस्थ भारत सबल भारत

चक्कीचलनासन जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है चक्की= आटे को पीसने की एक मशीन + चलाना+ आसन अर्थात इस आसन में भारतीय गावों में पाए जाने वाली, हाथों से चलाने वाली अनाज की चक्की को चलाने की नक़ल की जाती है। यह एक बहुत अच्छा व आनंदायक व्यायाम है।

*चक्कीचालनासन के लाभ*

इस आसन से महिलाओं की गर्भाशय की मांसपेशियों को पर्याप्त व्यायाम मिलता है

इसके निरंतर अभ्यास से पीड़ादायक मासिक चक्र से आराम मिलता है।

गर्भावस्था के दौरान जमा वसा को कम करने में बेहद कारगर। (इस मुद्रा को करने से पहले अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य ले लें)

छाती व वक्ष स्थल में फैलाव पैदा करता है।

इसका निरन्तर प्रयोग सियाटिका रोकने में लाभप्रद रहता है

कमर ,पीठ,उदर एवं बाजुओं की मांसपेशियों का व्यायाम हो जाता है।

*चक्कीचालनासन की विधि*

सर्वप्रथम आप किसी समतल शांत और स्वच्छ स्थान पर उचित आसन लगाकर अपने दोनों पैरों को पूरी तरह फैलाकर बैठ जाएँ।

15/12/2020

●●●🧿🔯 संभोग और समाधि में सेतु🔯🧿●●●

🔴 कुछ थोड़े से सूत्र आपको कहता हूँ, उन्हें थोड़ा ख्याल में रखेंगे तो ब्रह्मचर्य की तरफ जाने में बड़ी यात्रा सरल हो जाएगी। संभोग करते क्षण में श्वास जितनी शांत और शिथिल होगी, संभोग का काल उतना ही लंबा हो जाएगा। अगर श्वास को बिलकुल शिथिल रहने का थोड़ा सा अभ्यास किया जाए, तो संभोग के क्षणों को कितना ही लंबा किया जा सकता है। और संभोग के क्षण जितने लंबे होंगे, उतने ही संभोग के भीतर से समाधि का जो सूत्र मैंने कहा है-- निरहंकार भाव, ईगोलेसनेस और टाइमलेसनेस का अनुभव शुरू हो जाएगा। श्वास अत्यंत शिथिल होनी चाहिए। श्वास के शिथिल होते ही संभोग की गहराई, अर्थ और नये उद्घाटन शुरू हो जाएंगे।

और दूसरी बात, संभोग के क्षण में ध्यान दोनों आंखों के बीच, जहां योग आज्ञाचक्र को बताता है, वहां अगर ध्यान हो तो संभोग की सीमा और समय तीन घंटों तक बढ़ाया जा सकता है। और एक संभोग व्यक्ति को सदा के लिए ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित कर देगा-- न केवल इस जन्म के लिए, बल्कि अगले जन्म के लिए भी।

तो दो बातें मैंने कहीं उस गहराई के लिए-श्वास शिथिल हो, इतनी शिथिल हो कि जैसे चलती ही नहीं; और ध्यान, सारा अटेंशन आज्ञाचक्र के पास हो, दोनों आंखों के बीच के बिंदु पर हो। जितना ध्यान मस्तिष्क के पास होगा, उतना ही संभोग की गहराई अपने आप बढ़ जाएगी। और जितनी श्वास शिथिल होगी, उतनी लंबाई बढ़ जाएगी। और आपको पहली दफा अनुभव होगा कि संभोग का आकर्षण नहीं है मनुष्य के मन में, मनुष्य के मन में समाधि का आकर्षण है। और एक बार उसकी झलक मिल जाए, एक बार बिजली चमक जाए और हमें दिखाई पड़ जाए अंधेरे में कि रास्ता क्या है, फिर हम रास्ते पर आगे निकल सकते हैं।

एक आदमी एक गंदे घर में बैठा है। दीवालें अंधेरी हैं और धुएँ से पुती हुई हैं। घर बदबू से भरा हुआ है। लेकिन खिलाड़ी खोल सकता है। उस गंदे घर की खिड़की में खड़े होकर भी वह देख सकता है--दूर आकाश को, तारों को, सूरज को, उड़ते हुए पंक्षियों को। और तब उस घर के बाहर निकलने में कठिनाई न रह जाएगी। जिसे एक बार दिखाई पड़ गया कि बाहर निर्मल आकाश है, सूरज है, चांद है, तारे हैं, उड़ते हुए पंछी हैं, हवाओं में झूमते हुए वृक्ष और फूलों की सुगंध है, मुक्ति है बाहर, वह फिर अंधेरी और धुएँ से भरी हुई कोठरियों में बैठने को राजी नहीं होगा, वह बाहर निकल जाएगा। जिस दिन आदमी को संभोग के भीतर समाधि की पहली थोड़ी सी भी अनुभूति होती है, उसी दिन सेक्स का गंदा मकान, सेक्स की दीवालें, अंधेरे से भरी हुई व्यर्थ हो जाती है और आदमी बाहर निकल आता है।

इसलिए मैं कहता हूं कि संभोग के प्रति दुर्भाव छोड़ दें। समझने की चेष्टा, प्रयोग करने की चेष्टा करें, और संभोग को एक पवित्रता की स्थिति दे।•••••

✳योगाचार्य विनय शास्त्री 🔷️🍁 🍁🔷️

20/11/2020
20/11/2020

आज का काढ़ा

गिलोय मंजरी पुनर्नवा अर्जुन की छाल

कली किए हुए पीतल के बर्तन में धीमी आंच पर
उबाल कर आधा पानी रहने पर छान कर मिश्री मिलाकर चाय की तरह पूरी सर्दी पिया जा सकता हैं यह पूरे साल खाद के रूप में खाए हुए विभिन्न प्रकार के विष से शरीर को मुक्त करेगा
रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएगा शरीर की अंतरिक टूट-फूट की मरम्मत करेगा

100 वर्ष की आयु तक निरोगी जीवन कभी गोली कैप्सूल खाकर नहीं जिया जा सकता

13/12/2018

🕉🙏⛳आत्मा स्वयं प्रकाश है⛳🏵🥀🌺🌸🌷🌱💐🌲👉👉 अन्धेरी रात में दो युवक यात्रा कर रहे थे। एक लालटेन थी, उन दोनों का ही काम दे रही थी। चलते-चलते वे एक ऐसे स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ से दोनों के रास्ते अलग-अलग होते थे। जिसकी लालटेन थी वह प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ गया, दूसरे ने जो अन्धकार देखा तो आगे बढ़ने का साहब टूट गया।

क्या करे, क्या न करे वह इसी चिन्ता में था कि पास की एक कुटी से साधु निकले-साधु एक भजन गा रहे थे, जिसका अर्थ होता था-”हे प्रभु! मेरे अन्तर का दीपक जला दो जिससे संसार का अन्धेरा पथ सुविधापूर्वक तय कर ले।”

युवक ने बढ़कर साधु के पैर पकड़ लिये और बोला-”भगवन्! क्या कोई ऐसी भी ज्योति हैं जो हर घड़ी पास रहती हो और कभी न बुझती हो?” साधु ने एक शिला पर बैठते हुए कहा-”क्यों नहीं वत्स! आत्मा स्वयं प्रकाश हैं, तू उसे प्रज्ज्वलित कर और बढ़ जा आगे, संसार में भय किस बात का।”

यह सुनकर युवक को कापुरुषता दूर हो गई और वह प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ गया।🏵🌺🌸🌷🌼🕉🙏जय गुरूदेव जय माँ गायत्री🌷🌸🌺🏵🌹💐🌲🌱🥀

12/09/2018

फ्रोज़न शोल्डर(अववाहक, विश्वाची) :

डॉ अर्जुन मुखीजा जी से आभार सहित!

1. रोग परिचय :

वर्तमान में जिन रोगों का प्रचलन बढ़ रहा है,उनमें अववाहक,विश्वाची रोग भी एक है,जिसे आधुनिक चिकित्सा में फ्रोज़न शोल्डर के नाम से जाना जाता है। प्रचलित भाषा में इसे “कन्धा जाम” रोग भी कहा जाता है।

इस रोग में बाहु पृष्ठ से हाथ तक हर एक अँगुलियों की जो कण्डराएँ(मोटी नसें)होती हैं,उनमें वायु घुसकर पीड़ा पैदा करता है और बाहु को बेकाम कर देता है, बाहु को उठाने में,सिकोड़ने में,किसी चीज़ को थामने में कष्ट होता है।

आयुर्वेद के अनुसार अस्थि सन्धिगत वायु का प्रकोप होकर सन्धिगत जकड़न पैदा हो जाती है,जो अधिकतर कन्धे की संधियों में होती है, जिसे आयुर्वेद में विश्वाची,अववाहक एवं0म आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में थोरेसिक आउटलेट सिंड्रोम कहते हैं।

2. रोग के लक्षण :

इस रोग के प्ररम्भ में रोगी को किसी भी हाथ के कन्धे में दर्द महसूस होता है,और वह समझता है कि सोते समय मेरा हाथ करवट के नीचे आ गया है,और 1-2 दिन में ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता और धीमे-धीमे दर्द के साथ-साथ हाथ में सुन्नता,जड़ता उत्पन्न होने लगती है। रोगी आसानी से ऊँचाई तक हाथ उठाने में असमर्थ हो जाता है। इसमें अधिकतर कन्धे एवं बांह में दर्द होता है। विशेषकर रोगी अपने हाथ को पीछे ठीक तरह लाने में भी असमर्थ हो जाता है,और हाथ ऊपर करने से या कर चलाते समय, बालों में कंघी करते समय असहनीय पीड़ा होती है। रोगी कपड़े पहनना,शौच धोना,बेल्ट लगाना आदि कार्य सुगमता से नहीं कर पाता। किसी रोगी को पीड़ा कम तथा किसी को असहनीय हो जाती है।

अतः विश्वाची का लक्षण हुआ-ऐसी व्याधि जिसमे बाहु के पृष्ठ भाग(Posterior Side) से प्रारम्भ होकर हाथ एवं अँगुलियों के पृष्ठ भाग तथा प्रकोष्ठ,हाथ एवं अँगुलियों के तल भाग(Anterior Side)की पेशियों को सप्लाई करने वाली नाडियों में विकृति हो जाने से हाथ की संकोचन(Flexion)एवं प्रसारण(Extension)शक्ति में विकृति उत्पन्न हो जाती है।

आधुनिक दृष्टि से देखें तो हाथ की संकोचन(Flexion) क्रिया अल्नर नर्व(Ulnar Nerve)एवं प्रसारण (Extension)क्रिया रेडियल नर्व(Radial-Nerve)के अधीन है। अतः इन नाडियों में विकृति का परिणाम विश्वाची रोग हो सकता है,ये विकृतियाँ चार प्रकार की हो सकती हैं–
1. Radial Nerve paisy or
Radial neuritis.
2. Ulnar Nerve paisy or Ulnar neuritis or Ulnar
Paralysis.
3. Radio-Ulnar paisy or Radio Ulnar neuritis.
4. Lesion of the medical cord of the brachial plexus.

आचार्य वाग्भट्ट विश्वाची को भी गृधसी के समान ही विकृति मानते हैं और अन्तर केवल इतना बताते हैं कि गृधसी पैर में होती है और विश्वाची हाथ में।

सामान्य अनुभव में आया है कि यह रोग मधुमेह(शूगर) ग्रस्त रोगियों को अधिक होता है,तथा 40 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति इससे अधिक पीड़ित होते हैं।

3. रोग के कारण :

यद्यपि संहिताओं में विश्वाची के रोग के कारणों का उल्लेख नहीं मिलता है,मगर लक्षणों के आधार पर इसके निम्न कारण हो सकते हैं –

ऐसा कोई भी कारण जिससे कि हाथ की नाडियों में सूजन आ जाए, जैसे अधिक कार्य करना,अधिक वज़न उठाना, गलत स्थिति में हाथ को रख करके लम्बे समय तक बैठे रहना, हाथ को सिरहाने के रूप में रखकर सो जाना,कम्प्यूटर पर अधिक कार्य करना या फिर किसी भी प्रकार के आघात के कारण विश्वाची रोग की उतपत्ति
उत्पत्ति हो सकती है।

आयुर्वेद के मतानुसार वात और कफ का स्कन्ध में प्रकोप होने से सन्धि में जड़ता उत्पन्न हो जाती है।
आधुनिक चिकित्सक इसे मधुमेह या अन्य कारणों से सन्धिगत नाड़ियों की कार्य क्षमता कम हो जाने से यह रोग उत्पन्न होता है, यह मानते हैं।

4. फ्रोज़न शोल्डर की चिकित्सा :

चिकित्सा की दृष्टि से आधुनिक चिकित्सक इस रोग के उपचार में व्यायाम (फिजियोथेरेपी) को विशेष महत्व देते हैं। निसन्देह धैर्यपूर्वक व्यायाम करते रहने से इस रोग में लाभ अवश्य होता है। इस रोग के प्रारम्भ में रैड लेम्प से सिकाई करने से भी लाभ होते देखा गया है।

5. फ्रोज़न शोल्डर की अनुभूत चिकित्सा :

★ बाह्य उपचार :

१. व्यायाम (फिजियोथेरेपी) –

इस रोग के निवारण हेतु विभिन्न प्रकार के व्यायाम हैं जिनमें हाथ का चारों ओर घुमाना, विशेष है। हाथ को जितना अधिक से अधिक उठाया जा सके,उठाने का प्रयत्न करना आदि व्यायाम प्रमुख हैं। रोगी को धैर्य पूर्वक यह व्यायाम औषधि उपचार के साथ-साथ करते रहना ज़रूरी है।

२. वाष्प स्वेदन –

इसके लिए 1 लीटर या कुछ अधिक पानी में 4-4 चम्मच सेंधा नमक,अजवायन,फिटकरी, तथा हल्दी डालकर अच्छी तरह गर्म करें। जब 1 गिलास पानी कम हो जाए तो उतारकर इसमें 2 रुमाल साइज़ के तौलिए भिगोकर, उन्हें अच्छी तरह निचोड़कर कन्धे तथा उसके आसपास के क्षेत्र की सिकाई करें। यह सिकाई कम से कम 20 मिन्ट तक अवश्य होनी चाहिए। इस उपचार को स्नान के तुरन्त बाद करना चाहिए।

३. सिकाई –

50 ग्राम मावा (खोया) लाकर इसमें 50 ग्राम अम्बा हल्दी का चूर्ण,5 ग्राम कुचला का पिसा चूर्ण तथा 4 चम्मच महा विषगर्भ तेल मिलाकर कढ़ाई में गर्म कर लें तथा इसे 2 सूती कपड़ों की पोटली बनाकर पीड़ित भाग पर सेंक करें। बाद में सम्भव हो तो इसे सन्धि पर कपड़े से बांध लें।

४. मालिश –

दिन में 1 बार किसी वात रोगहर तेल(महा विषगर्भ तेल, महा नारायण तेल,महामाश तेल या रुमासिल तेल) की किसी जानकार व्यक्ति से धीमे-धीमे मालिश कराएं।

6. फ्रोज़न शोल्डर की अनुभूत आयुर्वेदिक चिकित्सा :

★ प्रथम उपचार :

१. विश्वाची नाशक मिश्रण –

बृहत वात चिन्तामणि रस 3 ग्राम
एकांगवीर रस 6 ग्राम
महा वात विध्वंसन रस 6 ग्राम
समीरपन्नग रस 6 ग्राम

उपरोक्त सब रसों को अच्छी तरह कांसे के बर्तन में घुटाई कर इसकी 30 पुड़िया बनाकर रख लें।

सेवन विधि –

1-1 पुड़िया प्रात-सायं शहद के साथ सेवन करें। यदि रोगी मधुमेही हो तो कैप्सूल में भरकर पानी से निगल ले।

२.सिंहनाद गुगल 2-2 गोली

दोपहर व रात्रि के भोजन के आधे घण्टे बाद महारास्नादि क्वाथ के साथ सेवन करें।

३. अशवगंधा चूर्ण

3-3 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार दूध के साथ सेवन करें।

★ द्वितीय उपचार :

१.महावात विध्वंसन रस 1 गोली
योगराज गुगल 1 गोली

दिन में 2 बार सेवन करें।

२.विश्वाची नाशक मिश्रण –

अशवगंधा चूर्ण 50 ग्राम
यष्टिमधु(मुलेठी) 25 ग्राम
चोपचीनी 25 ग्राम
पीपलामूल 25 ग्राम
विषतिन्दुक वटी 40 ग्राम

उपरोक्त सबको अच्छी तरह मिश्रित कर रख लें।

3-3 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार सेवन करें।

३.सिंहनाद गुगल 1 गोली
लहसुनादि वटी 1 गोली

दोपहर व रात्रि के भोजन के आधे घण्टे बाद दशमूलारिष्ट के साथ सेवन करें।

★ तृतीय उपचार :

१. दशमूलारिष्ट 4 ढक्कन
महारास्नादि क्वाथ 4 ढक्कन

प्रात: निराहार समजल मिलाकर सेवन करें।

२. महावात विध्वंसन रस1 गोली
एकांगवीर रस 1 गोली

दिन में 2 बार सेवन करें।

३.विश्वाची/ मन्या स्तम्भ नाशक मिश्रण –

अशवगंधा चूर्ण 50 ग्राम
यष्टिमधु(मुलेठी) 25 ग्राम
चोपचीनी 25 ग्राम
पीपलामूल 25 ग्राम
नवजीवन रस 40 ग्राम

उपरोक्त सबको अच्छी तरह मिश्रित कर रख लें।

3-3 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार सेवन करें।

५. लहसुनादि वटी 1-1 गोली

भोजन के आधे घण्टे बाद उष्ण जल के साथ सेवन करें।

★ चतुर्थ उपचार :

योगराज गुग्गल या 2-2 गोली
कैशोर गुग्गल

प्रत्येक भोजन के आधे घण्टे बाद महारास्नादि क्वाथ या दशमूलारिष्ट 4-6 ढक्कन+ समजल के साथ सेवन करनी चाहिए।

विशेष –

१. उपरोक्त किसी एक औषधि व्यवस्था से रोगी को 2-3 माह में स्थाई लाभ हो जाता है।

२. वात एवं कफवर्धक आहार-विहार का सेवन इस रोग में विशेष हानिकर है।

३. यह बात घ्यान देने योग्य है कि यदि रोगी मधुमेही है तो मधुमेह का नियंत्रण अत्यन्त आवश्यक है।

४. अधिक तेज़ हवा, कूलर या एयर कंडीशनर के सामने सोने से भी इस रोग में वृद्धि होती है। Chal Ke Pratham upchar अतः रोगी को इनसे बचना चाहिए।

12/08/2018

》 स्टैमिना के लिए आहार

● अधिक से अधिक काम कर पाने के लिए, हर व्यक्ति चाहता है अपना स्टै़मिना बढ़ाना। लेकिन क्या आप जानते हैं स्टैमिना बढ़ाने के लिए आपको कुछ ऐसे प्रयास करने की जरूरत है जिससे आप अपने शरीर की क्षमता से अधिक अतिरिक्त काम भी आराम से कर सकें। स्टैमिना बढ़ाकर आप अधिक ऊर्जावान बन सकते हैं।

इसके लिए आपको स्वस्थ डाइट लेना भी जरूरी होता है। स्टैमिना बढ़ाने के लिए आपको सब्जियों की मात्रा बढ़ाने के साथ-साथ स्‍वास्‍थ्‍यकर आहार भी लेना चाहिए। आइए जानें स्टैमिना के लिए आहार में क्या-क्या‍ लिया जा सकता है।

1) शोधों के मुताबिक, स्टैमिना बढ़ाने के लिए चुकंदर का जूस बहुत अच्छा रहता है। इसके पीने से आपकी मांसपेशियां भी मजबूत होती है।

2) यदि आप प्रतिदिन व्यायाम करते हैं और हार्ड वर्क करते हैं तो चुकंदर के जूस से बढि़या कोई जूस नहीं।

3) स्टैमिना बढ़ाने के लिए रंग-बिरंगी सब्जियों का जूस लेना लाभकारी है। इनसे शारीरिक क्षमता बढ़ती है और खून में नाइट्रेट का स्तर बढ़ता है। आप अतिरिक्त काम करने के बावजूद थकान का अनुभव नहीं करेंगे।

4) स्टैमिना बढ़ाने के लिए आपको स्पेशल डाइट की खासा जरूरत है। आप अपनी डाइट में विटामिन सी को शामिल कर सकते हैं।
विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में लेने के लिए आप अंगूर जैसे फलों का सेवन कर सकते हैं जिनमें विटामिन सी की मात्रा भरपूर हो।

5) मूंग दाल खान से स्टैमिना बढ़ जाता है, खासकर उसे स्प्राउट्स बनाकर या फिर उबालकर।

6) विटामिन सी की तरह आप विटामिन बी से भी अपना स्टैमिना बढ़ा सकते हैं।

7) अनाज खाने से भी स्टैमिना बढ़ता है। गेहूं की रोटी, गेहूं से बनी चीजों को अपने भोजन में शामिल करके आप अपना स्टैमिना बढ़ा सकते हैं।

8) ओट मील स्टैमिना बढ़ाने के लिए अच्छा रहता है।

9) फलों से बने स्क्वैश पीने से भी शरीर में हार्मोंस और ब्लड शुगर का लेवल ठीक रहता है। जिससे स्टैमिना भी बढ़ता है।

10) अगर आप वाकई अपना स्टैमिना बढ़ाना चाहते है तो आपको अपने आहार में इन चीजों को शामिल करना जरूरी है तभी आप स्व‍स्थ भी रह पाएंगे और फिट रहकर अपना स्टैमिना बढ़ाने में आपको मदद मिलेगी।

23/07/2018

एक शक्तिशाली योग- कुंजल क्रिया


कुंजल क्रिया में पारंगत व्यक्ति के जीवन में कभी भी कोई रोग और शोक नहीं रह जाता। यह क्रिया वास्तव में बहुत ही शक्तिशाली है। पानी से पेट को साफ किए जाने की क्रिया को कुंजल क्रिया कहते हैं। इस क्रिया से पेट व आहार नली साफ हो जाती है। मूलत: यह क्रिया वे लोग कर सकते हैं जो धौति क्रिया नहीं कर सकते हों। इस क्रिया को किसी योग शिक्षक की देखरेख में ही करना चाहिए।

विधि :शौचादि से फारिग होकर, हाथ-मुंह साफ करके पहले एक लीटर पानी गर्म करके रख लें। फिर जब पानी गुनगुना हो जाए तब कगासन की स्थिति में बैठकर जितना संभव हो वह गुनगुना पानी पी लें।

पानी पीने के बाद खड़े होकर थोड़ा सामने की ओर झुकें और तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुली को मिलाकर मुंह के अंदर जीभ के पिछले हिस्से पर घुमाएं। जब तक की उल्टी की इच्छा होकर पानी बाहर नहीं निकलने लगे तब तक घुमाएं। जब पानी निकलने लगे तो अंगुली को बाहर निकाल लें।

जब पानी निकलना बन्द होने लगे तो पुन: अंगुली को अन्दर डालकर उल्टी करें। इस क्रिया को तब तक करें जब तक पेट से सारा पानी बाहर न निकल जाए। फिर जब पानी खट्टा या कड़वा निकलने लगे तो फिर 2 गिलास पानी पीकर पहले की तरह ही अंगुली को जीभ पर घुमाकर उल्टी करें। जब एक लीटर का अभ्यास हो जाए तब पानी की मात्रा बढ़ाकर 2 लीटर पानी से इसका अभ्यास करें।

सावधानी :कुंजल करने के 2 घंटे बाद स्नान करें या कुंजल करने से पहले स्नान करें। कुंजल क्रिया को प्रात: काल शौचादि से निवृत्त होने के बाद करना चाहिए। कुंजल क्रिया के लिए पानी में नमक या सौंफ आदि कुछ भी न मिलाएं। हृदय एवं उच्च रक्तचाप के रोगी को यह क्रिया नहीं करना चाहिए। गले, फेंफड़े में किसी भी प्रकार का कोई गंभीर रोग हो तब भी यह क्रिया ना करें। किसी योग शिक्षक की सलाह अनुसार ही यह क्रिया करें और सप्ताह में दो बार यह क्रिया कर सकते हैं।

कुंजल क्रिया के बाद :क्रिया के बाद थोड़ा आराम करने के बाद ही भोजन करें। भोजन में ताजी हरी पत्तेदार सब्जियां, ताजे फल, दूध या दही और बटरमिल्क का सेवन करें। भोजन अच्छे से चबाकर खाएं। मसालेदार भोजन और जंक फूड से बचें। घर का बना हुआ ताजा खाना खाएं।

लाभ :इस क्रिया के अभ्यास से तीन अंगों को लाभ मिलता है- पहला जिगर (लिवर), दूसरा हृदय (हार्ट) और तीसरा पेट की आंते (इंटेस्टाइन)। इस क्रिया को करने से व्यक्ति शरीर और मन में बहुत ही अच्छा फिल करता है। व्यक्ति में हमेशा प्रसंन्न और स्फूति बनी रहती है।

इस क्रिया को करने से वात, पित्त व कफ से होने वाले सभी रोग दूर हो जाते हैं। बदहजमी, गैस विकार और कब्ज आदि पेट संबंधी रोग समाप्त होकर पेट साफ रहता है तथा पाचन शक्ति बढ़ती है।

यह सर्दी, जुकाम, नजला, खांसी, दमा, कफ आदि रोगों को दूर करता है। इस क्रिया से मुंह, जीभ और दांतों के रोग दूर होते हैं। कपोल दोष, रूधिर विकार, छाती के रोग, ग्रीवा, कण्ठमाला, रतोंधी, आदि रोगों में भी यह लाभदायी है ।।।।

21/07/2018

।। हवन का महत्व और उससे होने वाले फायदे ।।

एक वेबसाइट रिपोर्ट के अनुसार फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नमक गैस उत्पन्न होती है जो की खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओ को मरती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।

टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की मत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च करी की क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है अथवा नही. उन्होंने ग्रंथो. में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलने पर पाया की ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा की सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी

एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बॅक्टेरिया का स्तर 94% कम हो गया। यही नही. उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया की कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओ का स्तर सामान्य से 96 प्रतिशत कम था। बार बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ की इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का नाश होता है।

23/01/2018

जानिए दुनिया के 5 सबसे छोटे देशों के बारे में खास बातें.

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