23/01/2026
गुरुदेव श्री हजारी – ब्रज जन्म जयंती (वसंत पंचमी) 23 जनवरी 2026
*समता योगी, श्रमण संघीय प्रवर्तक, मरुधरा प्रांत मंत्री स्वामी जी श्री हजारीमल जी महाराज के 139 वें और सेवाभावी, उप-प्रवर्तक स्वामी जी श्री ब्रजलाल जी महाराज के 124 वें जन्मोत्सव ( वसंत पंचमी ) पर दोनों महापुरुषों को कोटी कोटी वंदन – नमन ।*
राजस्थान प्रवर्तिनी महासती डॉ श्री सुप्रभा जी म. सा. “सुधा” द्वारा संपादित – अर्चना अभिनंदन ग्रंथ में दोनों महान मुनिराजों के जीवन का सहज और सुंदर वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार है --
स्वामी जी श्री हजारीमल जी महाराज वास्तव में एक सतयुगी संत थे । आपका जनम विक्रम संवत 1943 में वसंत पंचमी के दिन डांसरिया ग्राम (मेवाड़) निवासी श्रीमान मोतीलाल जी मुणोत की धर्मशीला तेजस्विनी धर्मपत्नी श्री नंदुबाई की पावन कुक्षि से हुआ । माता पिता की सतप्रेरणा से आप साधु – संतों की संगति में पहुंचे और धीरे धीरे पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर आपने विक्रम संवत 1954, ज्येष्ठ कृष्ण दशमी के दिन नागौर में पूज्य स्वामी जी श्री जोरावरमल जी महाराज के श्रीचरणों में संयम अंगीकार किया ।
श्रमण संघ के संगठन में आपका योगदान अन्यतम कहा जा सकता है । आपकी सूझबूझ, उदारता व प्रतिष्ठा की भावना से निर्लिप्तता और सभी मुनिवरों के साथ मिलनसारिता ने श्रमण संघ की ऐतिहासिक एकता का मार्ग प्रशस्त किया ।
उत्कृष्ट सहिष्णुता आपका इष्ट गुण था । आप बोलने में एकदम खरे थे, किन्तु खारे नहीं थे । पीड़ा सहने में आप व्रज के समान कठोर थे किन्तु आपका हृदय फूल के समान कोमल था । सत्य और अहिंसा की साधना से आप अभय हो गए थे । आप महान त्यागी मुनिराज थे ।
नोखा चंदावतों का में चेत्र कृष्ण दशमी, विक्रम संवत 2018 को रात्रि में आपने समाधि पूर्वक देह त्याग किया । समता, सत्य निष्ठा और सहिष्णुता का एक जीवन प्रतीक इस धरा से चला गया । आप जैसे उज्ज्वल और सरल संत को सादर नमन – वंदन !!
समतायोगी, श्रमण संघीय उप-प्रवर्तक स्वामी जी श्री ब्रजलाल जी महाराज का जनम तिंवरी ग्राम में वसंत पंचमी, विक्रम संवत 1958 को हुआ । आपके पिता जी श्री अमोलकचंद जी श्रीश्रीमाल और माता जी श्री चम्पाबाई थे ।
अल्पावस्था में आपने उच्च वैराग्य के साथ वैशाख शुक्ल 12, विक्रम संवत 1971 को स्वामी जी श्री जोरावरमल जी महाराज के पास ब्यावर में दीक्षा ग्रहण की । निष्काम सेवा भावना आपका विशिष्ट गुण था । दूसरों की पीड़ा आपको स्वयं की पीड़ा लगती थी और आप तुरंत अन्य संतों की पीड़ा – वेदना दूर करने में तत्पर हो जाते थे । आपकी हस्तलिपि अतिसुन्दर थी तो आपकी कंठकला अतिमधुर थी । मधुर स्वर, निश्चल व्यवहार, सरलता और संयम पथ पर अडिगता से चलना आपके सहज गुण थे । आपने आगमों का और ज्योतिष विध्या का गहन अध्ययन किया । अनेकानेक गुणों के बावजूद आप यश – नाम - किर्ति की भावना से कोसों दूर थे ।
स्वामी जी श्री हजारीमल जी महाराज के देवलोकगमन के पश्चात श्री मधुकर मुनि जी महाराज की साहित्य साधना में आप अनन्यतम सहयोगी और प्रेरक रहे । आपका पिता तुल्य वात्सल्य, सही संतुलित निर्णय और साथी जैसा सम्पूर्ण सहयोग युवाचार्य श्री मधुकर मुनि जी के लिए सदा स्पृहणीय और समादरणीय रहा ।
श्रमण संघ को सुदृढ़ और मज़बूत बनाने के लिए आचार्य श्री आनंद ऋषि जी और युवाचार्य श्री मधुकर मुनि जी के संयुक्त चातुर्मास हेतु आपने 81 वर्ष की वृद्धावस्था में भी नासिक की ओर उग्र विहार किया । पर विधि को कुछ और ही स्वीकार था । अचानक रास्ते में धूलिया में आपका स्वास्थ्य कमजोर हो गया । आषाढ़ कृष्ण 8, विक्रम संवत 2040 को आपने समता भाव से संथारा सहित देह त्याग किया । श्रमण संघ के लिए आपने अपने प्राणों का त्याग कर दिया । जिनशासन की एक अपूर्व ज्योत अनंत में विलीन हो गयी ।
आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज ने आपको श्रमण संघ का महर्षि दधीचि उदबोधन देकर श्रद्धांजलि अर्पित की । ज्ञात रहे – आपके देवलोकगमन के पश्चात जीवन भर आपकी छाया समान रहे युवाचार्य मधुकर मुनि जी महाराज भी आचार्य आनंद ऋषि जी महाराज के साथ नासिक में ऐतिहासिक चातुर्मास पूर्ण कर 5 महीने बाद अपने गुरुभ्राता के समीप चल दिये । श्रमण संघ में आपके जैसी राम – लक्ष्मण की जोड़ी विरली ही है ।
आप दोनों महापुरुषों को सादर वंदन – नमन ।
जैन संजीव नाहटा, अहमदाबाद