18/09/2024
क्रॉह्नस डिजीज क्या है ?
आजकल आप सुनते रहते हो कि इसको क्रॉह्नस डिजीज हुआ है तो आपको होगा कि यह तो पहले कभी सुना नहीं है! तो यह क्रोह्नस डिसीज है क्या ?
क्रॉह्नस डिजीज में आपकी रोग प्रतिकारक क्षमता किसी कारण से बदल जाती है और उसके हिसाब से ज्यादातर आंतों में लेकिन किसी और भी अवयव में आपको बार-बार इंफेक्शन हो सकता है ।अगर यह इन्फेक्शन को त्वरित कंट्रोल में नहीं लिया जा सकता है तो वहां आगे जाकर छोटे छाले पड़ सकते हैं, बड़े छाले पड़ सकते हैं या तो वह इन्फेक्शन नजदीकी अवयवों में चला जाता है जिसको फिस्टुला कहते हैं, और कोई रास्ता ना मिला बाहर निकलने का तो एक पस का गद्दा भी हो जाता है जिसको एबसेस कहते हैं ।
यह मुंह से लेकर मलद्वार तक पाचन तंत्र के किसी भी भाग को असर कर सकता है।
यह वास्तव में होता क्यों है ? तो संभावना है कि किसी तरह से आपकी जो रोग प्रतिकारक शक्ति है जिसको आप इम्यूनिटी कहते हो, उसमें ज्यादा तक अनुवांशिक, खास करके छोटे बच्चों में, या तो किसी भी कारण से अगर उसमें कोई गिरावट आती है तो पेट में छोटे-छोटे इन्फेक्शन भी बढ़ जाते हैं और क्रॉह्नस की तरह पेश आते हैं।
ज्यादातर क्रोहन छोटी आंत के अंतीम भागमै होता है /टरमीनल आइलीयम में होते हैं लेकिन यह आवश्यक नहीं की वहीं हो और यह भी आवश्यक नहीं कि सिर्फ एक जगह हो। एक ही समय पर यह अलग-अलग जगह पर भी हो सकता है तो यह क्रॉह्नस में यह आवश्यक रहता है कि आपको पूरी जांच करनी है ताकि आप जो उपचार दे रहे हो, ट्रीटमेंट दे रहे हो, वह सभी जगह के लिए हो।
क्रॉह्नस के लक्षणों में मुख्यतः पेटमें में दर्द होना, और क्योंकि यह छोटी आंत के अंतीम भागमै होता है जो दाएं साइड में पेट में नीचे है, जिसको राइट लोअर क्वाड्रेंट कहते हैं, तो वहां दर्द होता है । ठीक नहीं लगना, जिसको मैलेस कहते हैं, भूख कम हो जाना, ज्यादा दस्त लगा, खून पड़ना, खून कम हो जाना, यह सामान्य तौर पर इसके लक्षण है।
अगर यह आगे बढ़ा तो आंतों से बहार नजदिकी अवयवों में फैल जाता है, जिसको फिस्टुला कहते हैं तो वह अभी उस अवयव के भी लक्षण देखने मीलतेहैं; जैसे कि अगर यह पेशाब की थैली में चला जाता है तो आपको पेशाब की थैली के जरिए माल आता है, बार-बार इंफेक्शन होता रहता है। अगर यह चमड़ी में बाहर आता है तो चमड़ी पर न मिटने वाला घाव हो जाता है। ज्यादातर यह मलद्वार के आसपास खुलता है जिसको पेरीफनल फिस्टुला कहते हैं।
अगर पस का गड्ढा हो गया जिसको एब्सेस कहते हैं तो बुखार आता है जो मिटता नहीं है, दर्द होता है वह जगह पर, और ज्यादा तक यह मलद्वार के आसपास होता है जिसको पेरीफनल एब्सेस भी कहते हैं।
इसके अलावा आपके मुंह में छाले पड़ सकते हैं, पेट में एसिडिटी ज्यादा बन सकती है, और क्योंकि यह शरीर में कहीं और भी उसका प्रभाव पाड़ सकता है इसलिए बार-बार आंखें लाल हो जाना, कमर में दुखना, जोड़ों में दुखना,खास करके छोटे-छोटे जो है जॉइंट्स हाथ के वह सूज भी जा सकते हैं ।
चमड़ी में कुछ दाग भी हो जाता है जिसको स्किन रैशेज कहते हैं और एरीथेमा नोडोसम नामक एक स्किन रस काफी लाक्षणिक है ।
अभी यह जान लीजिए कि क्रॉह्न डिजीज और टीबी में क्या फर्क है?
जैसे आप सभी जानते हो हमारे देश में ट्यूबरक्लोसिस काफी बड़ा रोग है, और क्रॉह्न की तरह ट्यूबरक्लोसिस भी फेफड़ों में ही होना आवश्यक नहीं है। वह आंतें में भी हो सकता है, जॉइंट्स में भी हो सकता है, हड्डीमें भी हो सकता है और मस्तिष्क में भी हो सकता है। तो वह कहीं भी हो सकता है लेकिन आंतों का टीबी है वह ज्यादा तक छोटी आंत के अंतीम भागमै, बिल्कुल वहां जहां क्रोह्न डीसीझ भी हुआ करता है, वहां ही होता है तो हमारे देश में, क्रोह्नस डिजीज और टीबी को अलग करना कई बार मुमकिन होता नहीं है। टीबी में अगर आप बायोप्सी करते हैं और टीबी के कीटाणु स्पष्ट स्वरूप से मिल जाते हैं तो बात अलग है, लेकिन ना मिले तो उसको क्रोह्नस से अलग करना कई बार बायोप्सी के जरिए मुश्किल होता है।
टीबी ज्यादा तक एक ही जगह पर होता है, छोटी आंत के अंतीम भागमै,और या तो एक जगह पर बड़ी आंत में, या तो मलद्वार के पास जो रेक्टम कहते हैं वहां छाला पड़ता है। तो वह ज्यादा तक एक ही जगह पर होता है और क्रोह्नस से अलग इस तरह से पडता है कि क्रॉह्नस एक साथ कई जगह पर हो सकता है।
टीबी में कई बार 25% में छाती में भी टीबी की असर आपको मिल सकती है।
साथ-साथ आपको बुखार आता है जो शाम को आता है, भूख नहीं लगती है, दस्ते लगती है और वजन निरंतर काम होता जाता है, और ज्यादा तक एक ही जगह पर घाव होता है तो यह टीबी होने की संभावना ज्यादा है।
यह कहकर मैं यह भी कहूंगा कि भारत में टीबी किसी भी दिन ज्यादा है और आपको टीबी के या तो क्रोह्नस के लाक्षणिक चिह्न नहीं मिलते हैं, कोई सबूत नहीं मिलता है और आपकी दुविधा है कि यह टीबी है या तो क्रॉह्नस डिजीज है, तो किसी भी दिन हमारा यह रवैया रहता है कि हम टीबी की दवाई करें क्योंकि टीबी की दवाई एक ही बार करनी पड़ती है और क्रॉह्नस की दवाई बार-बार करनी पड़ती है और अगर क्रॉह्नस की दवाई में आपने स्टेरोइड उपयोग किया और भूल से भी टीबी निकला तो वह पूरे शरीर में फैल सकता है । बीच-बीच में हम ऐसे मरीज देखते रहते हैं जिनको टीबी था और स्टेरॉयड से वह फैल गया।
टीबी की सारवर के बाद भी अगर आपको फिर से आंतों में गड़बड़ हो जाए तभी आप जाकर कह सकते हो कि यह क्रौह्नस है और यह मेरे हिसाब से उचित भी है क्योंकि अगर आपकी उम्र 20-30 साल है और आपको मै क्रोंह्नस कह दूंगा तो गूगल में पढ़कर आप परेशान हो जाएंगे के मेरी लाइफ तो गई!
क्रॉह्नस का निदान:
कोलोनोस्कोपी से पीछे से दूरबीन की जांच के जरिए छोटी आंत में जाकर उसके बायोप्सी लेते हैं और उसमें कुछ विशिष्ट लक्षण आते हैं तो क्रॉह्नस का निदान हो सकता है। खास करके पश्चिमी देशों में जहां टीवी का चलन कम है वहां आप कह सकते हो कि कौह्नस है।
भारत में वह दुविधा रहती है तो आपको टीबी के कीटाणु स्पष्ट रूप से मिल जाए तो आप आत्मविश्वास से टीबी कह सकते हो बाकी दोनों की संभावना रहती है।
तो बायोप्सी जहां से भी हो सकती है वहां से लेना एक गोल्ड स्टैंडर्ड इन्वेस्टिगेशन है और वह ज्यादा तक अगर पहुंच सकते हो तो होनी ही चाहिए।
सोनोग्राफी/ सीटी स्कैन भी काम में आता है।
और आपके पेट की तकलीफ है एसिडिटी या तो उल्टियां होती है तो ऊपर से भी एंडोस्कोपी जिसको गैस्ट्रोस्कॉपी करते हैं वह कर सकते हो और वहां भी छाले मिले तो आप यह कह सकते हो कि इसको कौह्नस होने की संभावना ज्यादा है।
खून में कुछ टेस्ट है खास करके आसका,/ASCA, एनका/ANCA, पी-एनका/ P-ANCA नाम के टेस्ट मददगार साबित हो सकता हैं लेकिन याद रहे कि यह सपोर्टिव एविडेंस है। यह गोल्ड स्टैंडर्ड एविडेंस नहीं है और अगर आपको क्रॉह्नस की संभावना लगती है और यह टेस्ट भी पॉजिटिव है और आप दुविधा में है कि क्या करना? क्या नहीं करना तो यह टेस्ट के पॉजिटिव होते हुए इसको आप क्रॉह्नस मान सकते हो।
जेनेटिक टेस्ट: यह ज्यादा तक इसमें काम में नहीं आते हैं। बच्चों में जो भी जेनेटिक गड़बड़ पता चल सकती है ।
क्रॉह्नस डिजीज की ट्रीटमेंट;
क्रॉस डिजीज कहां है उस पर ट्रीटमेंट का आधार रखता है। मान लो छोटी में है तो ज्यादा तक जो 5 अमीनो सैलिसिलिक एसिड कहते हैं 5 ए एस ए वह वहां ज्यादा काम करती नहीं है तो आपको स्टेरॉयड दिया जाएगा।
अगर वह बड़ी आंत में है तो 5 ए-स-ए काम आ सकती हैं।
अगर बार-बार आवश्यकता होती है तो आपको आपके डॉक्टर ईम्यूनोमोड्यूलर भी देखते हैं देते हैं, और खास करके ऐझाथायोप्रीन और मीथोट्रेकसेट काफी पॉप्युलर है ।और वह देते हैं तो नियमित अंतर से लीवर के टेस्ट और ब्लड के टेस्ट करवाने पड़ते हैं
पिछले कुछ सालों में काफी नई दवाई आई है।
इसमें उपलब्ध दवाइयां में पहले दवा जेक इंन्हीबिटर्स/ टोफासिटीनीब नामक दवाई है।
दूसरी दवाई है बायोलॉजिकल्स ।
आजकल भारी मात्रा में बायोलॉजिकल्स आते हैं जो सूजन को शांत कर सकते हैं!
भविष्य में शायद बायोलॉजिकल्स का उपयोग जो आज पिछली अवस्था में होता है उसके बदले आगे लाया जाएगा, खास करके बच्चों में जहां बार-बार स्टेरॉयड देने से ग्रौथ का प्रॉब्लम हो सकता है।
बायोलॉजिकल्ससे इन्फेक्शन हो सकते हैं।
तो खास करके बच्चों में अगर बायोलॉजिकल देना है तो जितने भी हो सके उतने वैक्सीन दे देने चाहिए।
बायोलॉजिकल्स का असर बहुत अच्छा हैं । कई बार हमारे अनुभव में कुछ मरीज तो इतने अच्छे हो जाते हैं कि जिसको आप ड्रैमेटिक कह सकते हो।
क्रॉह्नस डिजीज में आपको आंतें पर असर होने से आपके पोषण में खामी आ सकती है तो न्यूट्रीशनिस्ट डाइटिशियन और आपके डॉक्टर की मदद लेकर आप आपका पोषण बनाए रखिए।
एलिमेंटल डाइट वगैरा आप उपयोग कर सकते हो
इसके साथ-साथ अगर आपको आयरन की कमी है कैल्शियम की कमी है प्रोटीन की कमी है विटामिन की कमी है तो उसके सप्लीमेंट भी आपको लेने चाहिए ।
अभी बात करते हैं सर्जरी की। कौन से समय पर सर्जरी करवानी है ?
बायोलॉजिकल के आते सर्जरी की आवश्यकता अभी कम होनी चाहिए।
अगर एब्सेस या तो फिस्टुला होती है तो उसके लिए कई बार सर्जरी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा मिनिमम सर्जरी करवानी है कुछ लोगों में आते सूजन के बाद सिकुड़ जाते हैं तो वह भी आजकल बायोलॉजिकल से कम हो गया है। फिर भी अगर यह हो गया तो आपको आज काम से कम मात्रा में आते को काटना है और संभव है तो आपको काटने की बजाय उसे तरह से उसको ऑपरेट करना है कि जहां आंत का कम से कम भाग बाहर निकल जाए।
तो मित्रों अगर आजकल आप क्रॉह्नस के बारे में सुनते हैं तो घबराना नहीं है। अच्छी दवाइयां आ रही है और अच्छी न्यूट्रिशन, अच्छा डाइट,अच्छा सप्लीमेंट, यह सब मिलकर आपका स्वास्थ्य लंबे अरसे तक अच्छा रह सकता है
नमस्कार मैं डॉक्टर मनोज घोड़ा