03/10/2020
परमहँस से स्वामी विवेकानंद की प्रथम भेंट
जो खामोशी थी रात्रि के मध्य प्रहर में,
शून्य विचार और गुप अंधेरे की चुभन में,
उनका अर्थ मैंने कभी नही जाना ।।
प्रतिबिम्ब न था फिर भी था एक आईना,
स्वयं का था व्योम,
या विचारों का था गुम हो जाना,
उनका अर्थ मैंने नही जाना ।।
न ब्रह्म की थी खोज,
न था प्रसन्न होने का बोझ,
फिर भी उसका मुझे बुलाना,
उनका अर्थ मैने कभी नही जाना ।।
न थी चेतना बुद्ध जैसी,
भक्ति भी नही थी परमहंस की,
मुझको मुझसे ही निकाल के मेरे अंदर घुस जाना,
उन सभी बातों अर्थ मैने कभी नही जाना ।।
विवेकानंद जब पहली बार परमहंस से मिले, उनके पास अनंत प्रश्न थे, पैर से लेके माथे तक उनमें केवल प्रश्न ही प्रश्न भरे थे। वो तीन दिन से सोये नही थे, उनका जीना उन्ही के प्रश्नों ने दूभर कर रख्खा था। उनको मालूम था अगर उन्हें इन प्रश्नों से मुक्ति नही मिलेगी तो वो पागल हो जाएंगे। उनकी उत्तर की तलाश उनके अंदर और प्रश्न भरे जा रही थी।
विवेकानंद जब पहली बार परमहंस से मिले, उनके पास अनंत प्रश्न थे, परमहंस ये समझ गए। वो विवेकानंद को देखते ही समझ गए कि वो ताजे पानी की नदी से लगा हुआ गंदे पानी वाला तालाब हैं। ये सत्य के बगल में तो पहुच गयें हैं, पर इनके अंदर की गंदगी उस सत्य को इनके अंदर आने ही नही दे रही है। इनके अंदर के गंदे पानी को निकालने के लिए नदी और तालाब के बीच की मिट्टी को खोद के फेक देना पड़ेगा।
परमहँस का चरण काली माँ का ही चरण था, उसपे महाकाल शिव का स्पर्श था। परमहँस ने विवेकानंद की छाती पे अपने पैर से धक्का दिया, धक्का तेज न था पर कारगर था, विवेकानंद बेहोश गए, वो मिट्टी निकल गई। नदी का ताजा जल, तालाब के गंदे जल को निकालने लगा। जब विवेकानंद को होश आया, तो उनके समस्त प्रश्न जा चुके थे, बह चुके थे। उनके पास कोई उत्तर भी न था, पर प्रश्न भी था। बस था उनसे गुजरता हुआ नदी के ताजे पानी जैसा अनुभव। उन अनुभवों का अर्थ विवेकानंद नही जान पाए।
इसीलिए संध्या को जब उनके एक मित्र ने उनसे पूछा "नरेंद्र तुम्हारे प्रश्नों का तुम्हे उत्तर मिला?"
विवेकानन्द ने उत्तर दिया "अब कोई प्रश्न न बचा मेरे पास, वो प्रश्न बिना किसी उत्तर के ही चले गए, पर मुझे कुछ मिला है, पता नही क्या पर काफी कुछ मिला है और जो मुझे मिला है उनका अर्थ मैंने नही जाना"