Jaiswal Homoeo Hall &resarch Center

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07/11/2025

सोंठ (शुण्ठी) — पेट, श्वास और रस-धातु को सुधारे
आयुर्वेद नाम: शुण्ठी, नागर
Botanical: Zingiber officinale (Dried Ginger)
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📜 आयुर्वेद ग्रंथों में वर्णन
चरक संहिता (सूत स्थान):
“दीपनं पाचनं रूक्षं स्फोटनं कफवातजित्।”
अर्थ:
शुण्ठी अग्नि (जठराग्नि) को प्रज्वलित करती है, पाचन सुधारती है, कफ-पित्त दोष को संतुलित करती है और शरीर में जमा अवरोधों को खोलती है।
सुश्रुत संहिता:
“नागरं कफवातघ्नं, स्वादू, उष्णं, रुचिप्रदम्।”
अर्थ:
शुण्ठी कफ-वात को संतुलित, भूख को शुद्ध और रस (पोषण तत्वों) को बढ़ाती है।
भावप्रकाश निघण्टु:
“शुण्ठी कटुका रुक्षोष्णा दीपन्यन्नलवर्धनी।”
अर्थ:
शुण्ठी रसों (धातुओं) को पचाने वाली अग्नि को प्रबल करती है और शरीर को हल्का बनाती है।
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🌬️ मुख्य कार्य (Pradhana Karma)
कार्य प्रभाव
दीपन-पाचन खाना ठीक से पचता है
कफ-पाचन बलगम, कफ, जकड़न में चमत्कारी
अन्न-वह स्रोतस शोधन पेट हल्का, गैस समाप्त
अग्नि दीपक मन्दाग्नि, बदहजमी में श्रेष्ठ
श्वास-शूल हरण सांस फूलना, सीने की जकड़न में उपयोगी
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🩹 घरेलू नुस्खे (विशेषकर शरदी-जुकाम)
1) खांसी, जुकाम, कफ में
गुनगुना पानी – 1 कप
सोंठ – 1/4 चम्मच
काली मिर्च – 2 दाने
तुलसी – 4 पत्तियाँ
गुनगुना होने पर शहद 1 चम्मच मिलाएँ
लाभ:
गला साफ, सिर भारीपन खत्म, कफ ढीला।
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2) गैस, अपच, भारीपन
खाना खाने के बाद
सोंठ + अजवाइन + काला नमक (समान मात्रा)
1/2 चम्मच गुनगुने पानी से
लाभ:
पेट फूलना, डकार रुकना, जलन — तुरंत आराम।
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3) जोड़ों का दर्द / सर्दी की सूजन
सोंठ + हल्दी + मेथी (समान मात्रा)
गुनगर्म दूध में 1 चम्मच
रात सोने से पहले
लाभ:
सूजन, दर्द, stiffness में अदभुत आराम।
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4) बच्चों में पेट दर्द / सर्दी
सोंठ + काला नमक
गरम पानी में 1 चुटकी
(1 साल से ऊपर बच्चे)
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⚠️ सावधानियाँ
पित्त (ऐसिडिटी) वाले बहुत अधिक ना लें
गर्भावस्था में चिकित्सक की सलाह आवश्यक
दिन में अधिकतम 2–3 ग्राम पर्याप्त
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🌱 क्यों सोंठ हर घर में होनी चाहिए?
✔ पेट ठीक
✔ कफ नियंत्रित
✔ रोग प्रतिकारक शक्ति सक्रिय
✔ दिमाग व शरीर हल्का
✔ भोजन रस-धातु में ठीक से परिवर्तित होता है
> आयुर्वेद का मूल यही है — भोजन सही से पचे, तो शरीर रोगी नहीं होता है

07/11/2025

पनीर के फूल (विथेनिया कोगुलेंस) के औषधीय उपयोग
पनीर के फूल, जिसे आयुर्वेद में "पनीर डोडा" या "पनीर का फूल" के नाम से जाना जाता है, एक महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटी है। यह सोलानेसी कुल (Solanaceae family) का पौधा है, जो मुख्य रूप से भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पाया जाता है। इसके फल और फूलों का उपयोग सदियों से पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता रहा है। यह पौधा प्राकृतिक रूप से दूध को दही में बदलने के लिए भी जाना जाता है, इसलिए इसका नाम "पनीर" पड़ा।
♦️मुख्य औषधीय गुण:
🔹रक्त शर्करा नियंत्रण (एंटी-डायबिटिक): इसमें मौजूद अल्कलॉइड्स और ग्लाइकोसाइड्स इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाते हैं, जिससे डायबिटीज के मरीजों में ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित रहता है।
🔹पाचन तंत्र सुधार: कब्ज, अपच, गैस और अम्लपित्त (एसिडिटी) में राहत देता है। यह पेट की ज्वाला को शांत करता है।
🔹मूत्र विकार: मूत्र संक्रमण, पथरी और मूत्राशय की सूजन में उपयोगी। डाइयुरेटिक गुण के कारण मूत्र प्रवाह बढ़ाता है।
विरोधी भड़काऊ (एंटी-इंफ्लेमेटरी): जोड़ों के दर्द, गठिया और सूजन में फायदेमंद।
🔹अन्य: त्वचा रोग, बाल झड़ना, लीवर की कमजोरी और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक। यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है, जो कैंसर जैसी बीमारियों से बचाव में मदद करता है।
♦️♦️♦️अन्य जड़ी-बूटियों के साथ नुस्खे:♦️♦️♦️
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नीचे कुछ प्रमाणित आयुर्वेदिक नुस्खे दिए गए हैं, जो पनीर के फूल को अन्य जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर बनाए जाते हैं। मात्रा वयस्कों के लिए सामान्य है; बच्चों या बुजुर्गों के लिए कम करें।
♦️1. डायबिटीज नियंत्रण के लिए चूर्ण (पाउडर)
सामग्री:
पनीर के फूल का चूर्ण: 5 ग्राम
मेथी दाना (फेनुग्रीक) का चूर्ण: 5 ग्राम
करेला (बिटर गार्ड) के बीज चूर्ण: 3 ग्राम
गुड़ (जैगरी) का चूर्ण: 2 ग्राम (स्वाद के लिए, वैकल्पिक)
बनाने की विधि:
सभी सामग्री को पीसकर बारीक चूर्ण बना लें।
एक कांच की बोतल में रखें।
उपयोग: सुबह खाली पेट 1 चम्मच गुनगुने पानी के साथ लें। रात को सोने से पहले भी 1 चम्मच लें।
लाभ: ब्लड शुगर को स्थिर रखता है। 15-30 दिनों में असर दिखता है।
♦️2. पाचन सुधार और कब्ज के लिए काढ़ा (डिकॉक्शन)
सामग्री:
पनीर के फूल: 10 ग्राम (सूखे फल)
सौंफ (फेनल) के बीज: 5 ग्राम
अजवाइन (कार्वे सीड्स): 5 ग्राम
त्रिफला चूर्ण (आंवला, हरड़, बहेड़ा): 5 ग्राम
बनाने की विधि:
सभी को 500 मिली पानी में उबालें जब तक पानी आधा न रह जाए।
छानकर गुनगुना होने पर पी लें।
उपयोग: रात को सोने से पहले 1 कप पिएं। 7-10 दिनों तक जारी रखें।
लाभ: आंतों को साफ करता है, गैस और कब्ज दूर करता है। पेट दर्द में तुरंत राहत।
♦️3. मूत्र पथरी और संक्रमण के लिए चाय
सामग्री:
पनीर के फूल का चूर्ण: 3 ग्राम
धनिया बीज (कॉरिएंडर सीड्स): 5 ग्राम
पुनर्नवा (बोएरहाविया डिफ्यूसा) की जड़: 5 ग्राम
नीम की पत्तियां: 3-4 ताजी
बनाने की विधि:
सामग्री को 1 लीटर पानी में 10-15 मिनट उबालें।
छानकर मीठा करने के लिए शहद मिलाएं (वैकल्पिक)।
उपयोग: दिन में 2 बार (सुबह और शाम) 1 कप पिएं। 15 दिनों का कोर्स।
लाभ: मूत्र प्रवाह बढ़ाता है, पथरी को घोलने में मदद करता है। संक्रमण कम करता है।
♦️4. जोड़ों के दर्द और गठिया के लिए तेल मिश्रण
सामग्री:
पनीर के फूल का चूर्ण: 10 ग्राम
अश्वगंधा चूर्ण: 10 ग्राम
तिल का तेल (सिसेम ऑयल): 100 मिली
लहसुन की 4-5 कलियां (कुचली हुई)
बनाने की विधि:
चूर्ण और लहसुन को तेल में धीमी आंच पर 15 मिनट भूनें।
ठंडा होने पर छान लें।
उपयोग: दर्द वाली जगह पर दिन में 2 बार मालिश करें। उसके बाद गर्म सेंक दें।
लाभ: सूजन कम करता है, जोड़ों को मजबूत बनाता है। 20-30 दिनों में सुधार।
♦️5. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए लड्डू
सामग्री:
पनीर के फूल चूर्ण: 50 ग्राम
तुलसी के बीज: 20 ग्राम
मुनक्का (रेजिन): 50 ग्राम (काटकर)
घी: 2 चम्मच
शहद: 1 चम्मच
बनाने की विधि:
सभी को मिलाकर लड्डू बांध लें।
उपयोग: सुबह 1 लड्डू खाएं। सर्दी-जुकाम के मौसम में उपयोगी।
लाभ: इम्यूनिटी बूस्ट करता है, सर्दी-खांसी से बचाव।
🔴✍️सावधानियां: गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और निम्न रक्तचाप वाले व्यक्तियों को इसका उपयोग डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए। अधिक मात्रा में लेने से उल्टी या दस्त हो सकता है। हमेशा प्रमाणित स्रोत से खरीदें और आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लें।
✍️सामान्य सलाह: इन नुस्खों को अपनाने से पहले आयुर्वेदिक वैद्य या डॉक्टर से सलाह लें, खासकर यदि कोई दवा चल रही हो। पनीर के फूल बाजार में सूखे फूल या चूर्ण रूप में उपलब्ध होता है। ताजा पौधा दुर्लभ है। वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे NCBI पर प्रकाशित) से भी इसके एंटी-डायबिटिक गुण सिद्ध हैं।
✍️साथ में DIP डाइट लेने से हर बीमारी में अधिक लाभ मिलता है।
SHARE जरूर करें।
कृपया Text,Copy/Paste न करें।
धन्यवाद!

07/11/2025

"लकवे (Paralysis) में संजीवनी — होम्योपैथिक इलाज जो दे फिर से जीवन की ताकत!"
लकवा यानी शरीर के किसी हिस्से का अकड़ जाना या काम करना बंद हो जाना। ये समस्या मस्तिष्क की नसों में रुकावट या रक्त प्रवाह कम होने से होती है। लेकिन होम्योपैथी में कुछ ऐसी अद्भुत दवाएं हैं जो लकवे के मरीजों में धीरे-धीरे स्नायु शक्ति को पुनर्जीवित (revive) करती हैं और शरीर को फिर से चलने-फिरने की ताकत देती हैं।
💊 1. Causticum 200 — लकवे में नसों की रक्षक दवा
👉 लाभ:
शरीर के किसी एक तरफ के लकवे (right/left side paralysis) में बहुत असरदार।
बोलने में कठिनाई, चेहरे या हाथ-पैर सुन्न होने की स्थिति में लाभकारी।
पुराने लकवे में धीरे-धीरे मांसपेशियों को सक्रिय करने में मदद करती है।
👉 सेवन विधि:
सुबह-शाम 5-5 बूंदें पानी में मिलाकर लें।
एक माह तक नियमित उपयोग से असर दिखने लगता है।
💊 2. Gelsemium 30 — नसों को शांत कर नई ऊर्जा देने वाली दवा
👉 लाभ:
डर, घबराहट, मानसिक तनाव से हुआ लकवा होने पर यह सर्वोत्तम है।
आंखों, चेहरे या जीभ के लकवे में उपयोगी।
सिर और गर्दन की नसों को फिर से सक्रिय करती है।
👉 सेवन विधि:
दिन में 2 बार 5 बूंदें लें।
लगातार 15-20 दिन तक उपयोग करें।
💊 3. Plumbum Metallicum 30 — मांसपेशियों को मजबूत करने वाली दवा
👉 लाभ:
धीरे-धीरे बढ़ते हुए लकवे में (progressive paralysis) असरदार।
हाथ-पैरों में झुनझुनी या कमजोरी में लाभकारी।
नसों और मांसपेशियों को फिर से काम करने की शक्ति देती है।
👉 सेवन विधि:
दिन में 2 बार 5 बूंदें पानी में मिलाकर लें।
1 महीने तक नियमित सेवन करें।
🌼 महत्वपूर्ण सुझाव:
✔ सुबह हल्की फिजियोथेरेपी करें।
✔ विटामिन-B और प्रोटीन युक्त आहार लें।
✔ नकारात्मक सोच से दूर रहें — होम्योपैथी के साथ मन की शक्ति भी जरूरी है।

07/11/2025

🌿 Glonoinum (Glonine) – सिरदर्द के लिए एक अद्भुत होम्योपैथिक औषधि 🧠💊
परिचय:
Glonoinum (जिसे Glonine भी कहा जाता है) एक शक्तिशाली होम्योपैथिक औषधि है जो मुख्यतः सिरदर्द, माइग्रेन, और धूप से होने वाले सिरदर्द (Sun headache) में बेहद प्रभावी होती है। यह औषधि Nitroglycerin से तैयार की जाती है और इसका मुख्य असर मस्तिष्क में रक्त प्रवाह के अचानक बढ़ने (cerebral congestion) पर होता है।
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🔹 मुख्य उपयोग (Key Uses of Glonoinum for Headache):
1. धूप से सिरदर्द (Sun Headache):
तेज धूप या गर्मी में सिरदर्द होना
सिर में खून चढ़ना और चेहरे का लाल पड़ जाना
सिर फटने जैसा दर्द महसूस होना
सिरदर्द के साथ चक्कर और उलझन
2. माइग्रेन (Migraine):
सिर के एक हिस्से में थरथराने वाला दर्द
तेज रोशनी, आवाज़ या गर्मी से दर्द बढ़ना
माथे और कनपटी में धड़कन जैसा अहसास
3. ब्लड प्रेशर से संबंधित सिरदर्द:
जब रक्तचाप बढ़ने पर सिर में धमकन महसूस हो
सिर में भारीपन या गर्मी लगना
अचानक सिर में खून चढ़ना या चक्कर आना
4. धूप या गर्मी से बेहोशी (Heat Stroke):
धूप में सिरदर्द के साथ बेहोशी या मतली
सिर भारी लगना, आँखों में जलन
ठंडे स्थान पर जाने से आराम मिलना
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🔹 मुख्य लक्षण (Characteristic Symptoms):
सिर ऐसा लगता है जैसे फट जाएगा
सिर में धड़कन या धमकन महसूस होना
दर्द से राहत ठंडे पानी या ठंडी हवा से मिलती है
चेहरा लाल और गर्म हो जाता है
मरीज़ को लगता है जैसे सिर में खून उबल रहा हो
थोड़ी सी रोशनी या धूप से भी परेशानी बढ़ना
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🔹 मात्रा (Dosage):
Glonoinum 30 – 2 से 3 बूंदें (या 4 गोलियाँ) दिन में 2 बार
Glonoinum 200 – गंभीर सिरदर्द या माइग्रेन की स्थिति में दिन में 1 बार (केवल चिकित्सक की सलाह पर)
धूप या गर्मी से सिरदर्द की स्थिति में – हर 15–30 मिनट पर 1 डोज दी जा सकती है जब तक आराम न मिले
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⚠️ सावधानियाँ (Precautions):
यह दवा हमेशा डॉक्टर या होम्योपैथिक विशेषज्ञ की सलाह से लें।
अत्यधिक मात्रा में लेने से चक्कर, सिर में भारीपन या बेचैनी हो सकती है।
धूप में काम करने वाले लोगों को यह दवा बहुत फायदेमंद होती है, पर नियमित सेवन डॉक्टर की देखरेख में होना चाहिए।
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🌿 निष्कर्ष (Conclusion):
Glonoinum (Glonine) एक बेहतरीन होम्योपैथिक औषधि है जो धूप, गर्मी या रक्त प्रवाह में असंतुलन से होने वाले सिरदर्द में त्वरित राहत देती है। यह मस्तिष्क और नसों के रक्त प्रवाह को संतुलित करती है, जिससे सिरदर्द में तुरंत आराम मिलता है

05/09/2023

*चाय के शरीर पर दुष्प्रभाव*
🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸
बार बार चाय पीने वाले इसे जरूर पढ़े !
सिर्फ दो सौ वर्ष पहले तक भारतीय घर में चाय नहीं होती थी। आज कोई भी घर आये अतिथि को पहले चाय पूछता है। ये बदलाव अंग्रेजों की देन है। कई लोग ऑफिस में दिन भर चाय लेते रहते है., यहाँ तक की उपवास में भी चाय लेते है । किसी भी डॉक्टर के पास जायेंगे तो वो शराब - सिगरेट - तम्बाखू छोड़ने को कहेगा , पर चाय नहीं,( ये सब भी छोड़ो और चाय भी) क्योंकि यह उसे पढ़ाया नहीं गया और वह भी खुद इसका गुलाम है. परन्तु किसी अच्छे वैद्य के पास जाओगे तो वह पहले सलाह देगा चाय ना पियें। चाय की हरी पत्ती पानी में उबाल कर पीने में कोई बुराई नहीं परन्तु जहां यह फर्मेंट हो कर काली हुई सारी बुराइयां उसमे आ जाती है।
आइये जानते है कैसे?
हमारे गर्म देश में चाय और गर्मी बढ़ाती है, पित्त बढ़ाती है। चाय के सेवन करने से शरीर में उपलब्ध विटामिन्स नष्ट होते हैं। इसके सेवन से स्मरण शक्ति में दुर्बलता आती है। - चाय का सेवन लिवर पर बुरा प्रभाव डालता है।
१👉 चाय का सेवन रक्त आदि की वास्तविक उष्मा को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
२👉 दूध से बनी चाय का सेवन आमाशय पर बुरा प्रभाव डालता है और पाचन क्रिया को क्षति पहुंचाता है।
३👉 चाय में उपलब्ध कैफीन हृदय पर बुरा प्रभाव डालती है, अत: चाय का अधिक सेवन प्राय: हृदय के रोग को उत्पन्न करने में सहायक
होता है।
४👉 चाय में कैफीन तत्व छ: प्रतिशत मात्रा में होता है जो रक्त को दूषित करने के साथ शरीर के अवयवों को कमजोर भी करता है।
५👉 चाय पीने से खून गन्दा हो जाता है और चेहरे पर लाल फुंसियां निकल आती है।
६👉 जो लोग चाय बहुत पीते है उनकी आंतें जवाब दे जाती है. कब्ज घर कर जाती है और मल निष्कासन में कठिनाई आती है।
७👉 चाय पीने से कैंसर तक होने की संभावना भी रहती है।
८👉 चाय से स्नायविक गड़बडियां होती हैं, कमजोरी और पेट में गैस भी।
९👉 चाय पीने से अनिद्रा की शिकायत भी बढ़ती जाती है।
१०👉 चाय से न्यूरोलाजिकल गड़बड़ियां आ जाती है।
११👉 चाय में उपलब्ध यूरिक एसिड से मूत्राशय या मूत्र नलिकायें निर्बल
हो जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप चाय का सेवन करने वाले व्यक्ति को बार-बार मूत्र आने की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

05/09/2023

*नाभी कुदरत की एक अद्भुत देन है*
एक 62 वर्ष के बुजुर्ग को अचानक बांई आँख से कम दिखना शुरू हो गया। खासकर रात को नजर न के बराबर होने लगी।जाँच करने से यह निष्कर्ष निकला कि उनकी आँखे ठीक है परंतु बांई आँख की रक्त नलीयाँ सूख रही है। रिपोर्ट में यह सामने आया कि अब वो जीवन भर देख नहीं पायेंगे।.... मित्रो यह सम्भव नहीं है..
मित्रों हमारा शरीर परमात्मा की अद्भुत देन है...गर्भ की उत्पत्ति नाभी के पीछे होती है और उसको माता के साथ जुडी हुई नाडी से पोषण मिलता है और इसलिए मृत्यु के तीन घंटे तक नाभी गर्म रहती है।
गर्भधारण के नौ महीनों अर्थात 270 दिन बाद एक सम्पूर्ण बाल स्वरूप बनता है। नाभी के द्वारा सभी नसों का जुडाव गर्भ के साथ होता है। इसलिए नाभी एक अद्भुत भाग है।
नाभी के पीछे की ओर पेचूटी या navel button होता है।जिसमें 72000 से भी अधिक रक्त धमनियां स्थित होती है
नाभी में गाय का शुध्द घी या तेल लगाने से बहुत सारी शारीरिक दुर्बलता का उपाय हो सकता है।
1. आँखों का शुष्क हो जाना, नजर कमजोर हो जाना, चमकदार त्वचा और बालों के लिये उपाय...
सोने से पहले 3 से 7 बूँदें शुध्द घी और नारियल के तेल नाभी में डालें और नाभी के आसपास डेढ ईंच गोलाई में फैला देवें।
2. घुटने के दर्द में उपाय
सोने से पहले तीन से सात बूंद इरंडी का तेल नाभी में डालें और उसके आसपास डेढ ईंच में फैला देवें।
3. शरीर में कमपन्न तथा जोड़ोँ में दर्द और शुष्क त्वचा के लिए उपाय :-
रात को सोने से पहले तीन से सात बूंद राई या सरसों कि तेल नाभी में डालें और उसके
चारों ओर डेढ ईंच में फैला देवें।
4. मुँह और गाल पर होने वाले पिम्पल के लिए उपाय:-
नीम का तेल तीन से सात बूंद नाभी में उपरोक्त तरीके से डालें।
*नाभी में तेल डालने का कारण*
हमारी नाभी को मालूम रहता है कि हमारी कौनसी रक्तवाहिनी सूख रही है,इसलिए वो उसी धमनी में तेल का प्रवाह कर देती है।
जब बालक छोटा होता है और उसका पेट दुखता है तब हम हिंग और पानी या तैल का मिश्रण उसके पेट और नाभी के आसपास लगाते थे और उसका दर्द तुरंत गायब हो जाता था।बस यही काम है तेल का।
अपने स्नेहीजनों, मित्रों और परिजनों में इस नाभी में तेल और घी डालने के उपयोग और फायदों को शेयर करिये।
🎭 करने से होता है , केवल पढ़ने से नहीं 🎭

12/05/2022

सफ़ेद बालों को जड़ से खत्म करने के आसान नुश्खे --
(कृप्या पोस्ट को अपने मित्रो से शेयर जरुर करे )
कम उम्र में जिन लोगों के बाल सफेद हो जाते हैं, उनके लिए ये एक बड़ा चिंता का विषय होता है। बालों की हेल्थ पर खानपान का विशेष प्रभाव पड़ता है। बालों के असमय पकने को रोकने के लिए चाय, कॉंफी का सेवन कम करना चाहिए। साथ ही, एल्कोहल का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। खाने में ज्यादा खट्टा, अम्लीय भोज्य-पदार्थ लेने से बालों पर असर पड़ता है। तेल और तीखा भोजन भी बालों से जुड़ी समस्या को और बढ़ा देते हैं।
इन सबके अलावा मानसिक तनाव, चिंता, धूम्रपान, दवाओं का लंबे समय तक उपयोग, बालों को कलर करना आदि से बालों के पकने, झड़ने और दोमुंहा होने का सिलसिला और तेज हो जाता है। यदि आप इन परेशानियों से बचना चाहते हैं तो अपनाइए ये नुस्खे, जो बालों के लिए वरदान की तरह काम करते हैं।
– अदरक को कद्दूकस कर शहद के रस में मिला लें। इसे बालों पर कम से कम सप्ताह में दो बार नियमित रूप से लगाएं। बालों का पकना कम हो जाएगा।
– दही के साथ टमाटर को पीस लें। उसमें थोड़ा-सा नींबू रस और नीलगिरी का तेल मिलाएं। इससे सिर की मालिश सप्ताह में दो बार करें। बाल लंबी उम्र तक काले और घने बने रहेंगे।
– सूखे आंवले को पानी में उबालें। इस पानी को इतना उबालें कि वह आधा रह जाए। इसमें मेहंदी और नींबू रस मिलाकर बालों पर लगाएं। माना जाता है कि ऐसा करने से असमय बालों का पकना रुक जाता है।
– मेथी के दानों को पीसकर मेहंदी में मिला लें। इसमें तुलसी की पत्तियों का रस और सूखी चाय की पत्तियों को मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को बालों पर लगाकर 2 घंटे तक रखें। फिर किसी हर्बल शैम्पू से बालों को धो लें, फायदा होगा।
– 1/2 कप नारियल तेल या जैतून के तेल को हल्का गर्म करें। इसमें 4 ग्राम कर्पूर मिला लें। जब कर्पूर पूरी तरह से घुल जाए तो इस तेल से मालिश करें। इसकी मालिश सप्ताह में एक बार जरूर करनी चाहिए। कुछ ही समय में रूसी खत्म हो जाएगी।

01/05/2022

टाइफाइड के लक्षण, कारण और बचाव के उपाय
टाइफाइड अथवा मोतीझरा क्या है – वैसे तो इस बुखार से प्राय: सभी लोग परिचित रहते हैं। यह एक लंबे समय तक परेशान करने वाला ऐसा बुखार है, जो व्यक्ति को कमजोर और चिड़चिड़ा बना देता है। यह रोग एस. टायफी या पेराटायफी नामक रोगाणुओं द्वारा फैलता है। यह मलमूत्र द्वारा दूषित भोजन या पानी द्वारा मनुष्यों में पहुँच जाते हैं और इसके कारण बनते हैं स्वयं के गंदे हाथ और मक्खियाँ। यह रोग आंतों में होने के कारण ही इसका नाम आन्त्रिक ज्वर पड़ा हैं । इस रोग के जीवाणु स्वस्थ शरीर में मुहँ से प्रवेश करते हैं और आंतों में पहुंच कर अपना विषैला प्रभाव विभिन्न अंगों में फैलाना शुरू कर देते हैं।
लोग टाइफाइड के बुखार से आसानी से बच सकते हैं। अत: इस रोग की जानकारी होना अत्यंत जरूरी है। जीवाणु से पैदा होने वाली इस बीमारी को मियादी बुखार भी कहते हैं। यह रोग दुनिया के उन देशों में पाया जाता है, जहाँ मल-मूत्र और गंदगी के सही निपटाने की व्यवस्था नहीं है अथवा पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है। एक और गंभीर बात यह है कि आजकल 50 प्रतिशत रोगियों में जीवाणु प्रतिरोधक दवाइयाँ असर नहीं कर रही हैं, क्योंकि जीवाणुओं ने इन दवाइयों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। भारत में हर साल लगभग 4 लाख लोग इस टाइफाइड से प्रभावित होते हैं।
जानते हैं टाइफाइड बुखार होने के कारण लक्षण और बचाव के उपाय :
Typhoid fever ke lakshan karan bachav टाइफाइड के लक्षण, कारण और बचाव के उपाय
टाइफाइड के लक्षण, कारण और बचाव
टाइफाइड होने के कारण :
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि टाइफाइड होने का प्रमुख कारक होता है एस. (Salmonella) टायफी नामक जीवाणु, लेकिन इसके साथ ही सालमोनेला पैराटायफी ‘ए’ और ‘बी’ से भी पैरा टाइफाइड बुखार आ सकता है। वैसे तो ये जीवाणु तेज तापमान में उबालने से या जीवाणुनाशक घोल से नष्ट हो जाते हैं। लेकिन ज्यादातर लोग दूषित पानी को उबालकर या फ़िल्टर करके नहीं पीते है जिससे ये कीटाणु मरते नहीं है और सीधे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश जाते है | सभी तरह के रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न बुखारों को एंटरिक फीवर (Enteric Fever) भी कहते हैं।
बीमारी का स्रोत -प्राथमिक स्रोत बीमार या वाहक व्यक्ति का मल एवं मूत्र होते हैं। लेकिन इसके अलावा गंदा पानी, मक्खियाँ या मनुष्य की उँगलियों द्वारा भी रोग के जीवाणु एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं। टाइफाइड के जीवाणु दूषित दूध या अन्य खाद्य वस्तुओं में भी हो सकते हैं। यहाँ तक कि बर्फ और आइसक्रीम में भी ये जीवित रहते हैं।
किन को रोग होता है– यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, परंतु 5 से 19 वर्ष की उम्र में अधिकतर होता है तथा स्त्रियों की बजाय पुरुष वर्ग में ज्यादा पाया जाता है। शारीरिक रोग प्रतिरोधक शक्ति भी रोग के होने या न होने में भूमिका निभाती है। वैसे रोग पूरे वर्ष हो सकता है, लेकिन जुलाई से लेकर सितंबर के महीनों, विशेषकर बरसात में टाइफाइड के अधिक रोगी पाए जाते हैं। क्योंकि इन दिनों मक्खियों की संख्या भी बढ़ जाती है।
खुले मैदानों या खेतों में शौच जाने की आदत तथा पीने के पानी के पाइप गंदी नालियों में से होकर जाने के कारण टाइफाइड या अन्य गम्भीर रोग जैसे हैजा, पीलिया आदि भी फैलते है।
फलो और सब्जियों की गंदगी ठीक से साफ न करने के कारण भी टाइफाइड होता है। जब मक्खियाँ मल पर बैठकर पानी या खाद्य पदार्थों पर बैठती हैं और ऐसे खाद्यों को लोग खाते हैं तो रोग हो जाता है। नाखूनों में मल पदार्थ लगा रह जाए तो भी रोग हो सकता है।
यह रोग अक्सर संक्रमित अंडे खाने से भी शरीर में जाता है। ज्यादातर मुर्गियों में सालमोनेला इंफेक्शन होता है। जो अंडे द्वारा इंसानों में आ जाता है | इसलिए मुर्गी के अंडे को ठीक से पकाकर ही खाना चाहिए ।
बार-बार बुखार आने पर ठीक से इलाज नहीं करवाने से शरीर कमजोर हो जाता है जिससे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाती है |
रोग का संग्राहक एवं वाहक—इस रोग का संग्राहक (Reservoir) एवं वाहक स्वयं मनुष्य ही होता है। उसके मल तथा मूत्र में भी रोग के जीवाणु मौजूद रहते हैं। ये जीवाणु सावधानी एवं साफ-सफाई के अभाव में संपर्क में आनेवाले अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को भी लंबे समय तक रोग का शिकार बना सकते हैं।
टाइफाइड या पेराटाइफाइड रोग का शिकार रोगी बुखार आने के बाद 6 से 8 सप्ताह तक रोग के जीवाणु पैदा करता है जबकि कुछ रोगी कुछ महीनों से लेकर कई वर्षों तक ये रोगाणु पैदा कर अपने आस पास के लोगों में इस रोग को फैलाते रहते हैं।
इतिहास के पन्नों में एक ऐसा मामला भी पाया गया है, जिसमे एक व्यक्ति के द्वारा अपने जीवन में 1,300 स्वस्थ लोगों को टाइफाइड का शिकार बनवाया। कुछ लोग तो इस रोगाणु के वाहक 50 वर्ष तक बने रहे।
मोतीझरा या टाइफाइड के लक्षण :
टाइफाइड होने की शुरुवात में शरीर में रोगाणुओं के प्रवेश के 10 से 14 दिन के भीतर रोग के लक्षण दिखने लगते हैं। कुछ स्थितियों में यह समय 2-3 दिन कम भी हो सकता है।
शुरुवात मामूली बुखार से होती है, जो धीरे-धीरे बढ़ कर 108-104 डिग्री फारेनहाइट तक हो जाता है।
टाइफाइड बुखार में छाती, गरदन तथा पीठ पर लाल-लाल दाने उभर आते हैं, फिर इनमें पानी भर जाता है। दाने धीरे-धीरे ठीक होकर सूख जाते हैं और बुखार कम हो जाता है।
इस बीच हृदय व नाड़ी की गति धीमी होना, बेचैनी, कमजोरी, पेट फूलना, सिर दर्द, मुंह सूखना, होठों पर पपड़ी जमना, जीभ सूखी, पपड़ीदार व लाल होना, दस्त लगना जैसे लक्षण भी उत्पन्न हो सकते हैं।
टाइफाइड में तेज बुखार के साथ कपकपी या ठंड भी लग सकती है। साथ में हाथ-पैर दर्द, खाँसी जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं।
गले में दर्द या सूजन भी हो सकती है।
टाइफाइड बुखार में पेट में दर्द और कब्ज की शिकायत होती है। बाद में दस्त भी लग सकते हैं।
टाइफाइड में सीने और पेट पर चमकीले गुलाबी दाने दिखते हैं।
रोग की जटिलताएँ- लगभग 30 प्रतिशत मामलों में जब इलाज लगातार और पर्याप्त नहीं लिया जाता तो टाइफाइड रोग जटिल अवस्था में पहुँच जाता है। इस स्थिति में आँतों में छेद हो सकता है और मलद्वार से खून आ सकता है। ऐसी स्थिति में रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।
टाइफाइड बुखार में अन्य जटिलताओं में न्यूमोनिया, हृदय झिल्ली की सूजन, दिमागी दौरे एवं गुरदों की सूजन इत्यादि है। रोगी अत्यंत चिड़चिड़ा हो सकता है।
टाइफाइड के बाद सावधानी – कभी-कभी 2 सप्ताह पश्चात् टाइफाइड बुखार फिर से आ सकता है। यह तब होता है जब इलाज सही तरीके से न लिया जाए।
टाइफाइड बुखार का इलाज किसी योग्य चिकित्सक से जल्द ही करवाना चाहिए और टाइफाइड को साधारण रोग समझकर इसके इलाज के प्रति लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए।
टाइफाइड की जाँच :
टाइफाइड का टेस्ट आसानी से हो जाती है। लेकिन प्राय: जाँच के परिणाम सात दिन के बाद ही पोसिटिव मिलते हैं।
टाइफाइड के लिए विडाल (Widal Test) जाँच की जाती है। साथ ही इस रोग में रक्त के श्वेत रक्ताणु की संख्या कम हो जाती है। इसलिए इनकी संख्या भी पैथोलॉजिस्ट अपनी जाँच में देखते हैं। अच्छी पैथोलॉजी में मल एवं रक्त के कल्चर (Culture) द्वारा भी चिकित्सक रोग की पहचान निश्चित करते हैं।
याद रखें इन जांचों के रिजल्ट कभी-कभी फाल्स पॉजीटिव या फाल्स निगेटिव हो सकते हैं। इसका मतलब है कि बीमारी न होने पर भी यह टेस्ट कभी-कभी पॉजीटिवल आ सकता है या बीमारी होने पर भी निगेटिव हो सकता है। इसलिए बीमारी का इलाज और टेस्ट डॉक्टर की सलाह से ही करवाएं।
7 से 10 दिन में टाइफाइड बुखार में कम हो जाता है, लेकिन रोगी काफी कमजोर हो जाता है। इस समय विडाल जाँच में टाइफाइड की पुष्टि हो जाती है।
टाइफाइड, या मियादी बुखार से बचाव के टिप्स :
आपके सिर्फ थोड़े से प्रयास और सावधानी रखकर इस टाइफाइड बुखार में पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि परिवार के किसी सदस्य को यह बीमारी होती है तो हमें प्रयास करना चाहिए कि घर-परिवार के अन्य सदस्यों या साथ उठने-बैठने वालों में न फैले। रोग के नियंत्रण अथवा रोकथाम के लिए तीन तरीके अपनाते हैं |
संग्राहक (Reservoir) मरीज पर नियंत्रण- इसके लिए शीघ्र रोग की पहचान जरूरी होती है, ताकि रोग के संवाहक, रोगी से सावधान रहा जा सके।
टाइफाइड के रोगी को अस्पताल में भरती करवाकर इलाज देना बेहतर रहता है। यदि यह संभव न हो तो घर पर ही उसे अलग रखने का प्रयास करना चाहिए।
परंतु यह ध्यान रहे कि उसे पूरी मात्रा में पर्याप्त समय तक दवाइयाँ खिलाई जाएँ।
टाइफाइड रोगी के मल-मूत्र के संपर्क से बचने के लिए विशेष सावधानियाँ रखी जाए जैसे नाखून काटना, खाने के पहले अच्छी तरह से हाथ साफ करना, खुले स्थानों में शौच न जाना। संभव हो तो प्रत्येक घर में सेप्टिक टेंकवाला पक्का शौचालय बनवाना चाहिए।
ढकी नालियों द्वारा गंदगी के निष्कासन की व्यवस्था भी होनी चाहिए। पेयजल एवं भोजन की शुद्धता पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। क्योंकि यदि भोजन-पानी टाइफाइड के जीवाणुओं से युक्त होगा तो रोग को फैलने से रोकना असंभव है।
टाइफायड के उपचार :
टाइफाइड के इलाज के लिए आजकल अच्छे एंटीबायोटिक्स उपलब्ध हैं। पूर्व में प्रचलित क्लोरेमफेनीकाल तो रोग में असरकारक है ही, अब सिप्रोफ्लाक्सेसिन, एमाक्सीसिलिन, कोट्राइमेक्साजोन इत्यादि दवाइयाँ भी उपलब्ध हैं। इलाज बहुत महँगा भी नहीं है।
मरीज के मल-मूत्र रक्त की जाँच कर उसकी पहचान की जाती है, फिर उसे पर्याप्त मात्रा में एंपीसिलिन अथवा अन्य दवाएँ खिलाते हैं, ताकि रोग के जीवाणु खत्म हो जाएँ और वह टाइफाइड दूसरे व्यक्तियों में न फैला सके।
टीकाकरण (Immunisation )- यह कुछ संतोष की बात है कि आज रोग से बचाव के लिए उसके टीके उपलब्ध हैं। लेकिन टीकाकरण रोग से 100 प्रतिशत सुरक्षा नहीं देता है। तब भी जिन क्षेत्रों में रोग फैल रहा हो या रोगी के परिवारवालों को ये टीके अवश्य लगवा लेना चाहिए। टॉयफायड के टीके-आजकल तीन प्रकार के टीके (Vaccines) उपलब्ध हैं (1) मोनोवेलेंट टीका, (2) बाईवेलेंट टीका तथा (3) टी.ए.बी. (B.) टीका। यह टीका तीन वर्ष तक रोग से रक्षा करता है, तीन वर्ष बाद इसे पुनः लगवाना होता है। इसे टीके की प्रभावी मात्रा या बूस्टर डोज कहते हैं। यह भी पढ़ें – मलेरिया के लक्षण, कारण, बचाव व उपचार
आजकल पोलियो वेक्सीन की तरह मुँह द्वारा ली जानेवाली टाइफाइड वेक्सीन भी विकसित की गई है। टीकाकरण के मामले में अपने डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
टाइफाइड में परहेज :
टाइफाइड बुखार में मरीज को गरिष्ठ, भारी, पेट में गैस पैदा करने वाला भोजन सेवन न करें। शराब आदि का सेवन भी ना करें | मक्खन, घी, पेस्ट्री, तले हुए आहार, मिठाईयाँ, गाढ़ी मलाई आदि ना लें | यह भी पढ़ें – जानिए दिमागी बुखार के लक्षण व बचाव की जानकारी |
टाइफाइड की बीमारी में खुले हुए दूषित खाद्य पदार्थ या पानी न पिएं। दस्त और गैस की तकलीफ मौजूद हो, तो दूध न पिएं। पूरी तरह रोगमुक्त होने तक चपाती का सेवन करने से बचें। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें यह पोस्ट – टाइफाइड में क्या खाएं और टाइफाइड में परहेज
टाइफाइड के मरीज के लिए अन्य सुझाव :
बिस्तर पर आराम करें। टाइफाइड के रोगी के कमरे में पूरी साफ-सफाई रखें और ताजी हवा आती रहे, ऐसी व्यवस्था करें। खाने-पीने का सामान साफ जगह में ढक कर रखें।
टाइफाइड रोगी के कमरे में भीड़-भाड़ न लगाएं। रोगी को ज्यादा घूमने-फिरने न दें। कमरे के दरवाजे, खिड़कियां, रोशनदान बंद करके न रखें।
टाइफाइड बुखार के मरीज को पर्याप्त मात्रा में पानी और पोषक तरल पदार्थ लेना चाहिए। क्योंकि रोगी के शरीर में पानी की कमी नही होनी चाहिए | कुनकुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर पीना टाइफाइड में काफी फायदेमंद होता है। इस रोग से विशेष रूप से बच्चो को बचाना चाहिए क्योंकि अकसर वो साफ सफाई से सम्बंधित नियमो का ठीक से पालन नहीं करते हैं |

01/05/2022

क्या आप भी पके हुए भोजन में ऊपर से नमक डालते हैं? तो जान लीजिए गंभीर नुकसान*
1 अगर आप पके हुए खाने में ऊपर से नमक मिलाते है, तो ऐसा करने से कई बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। क्योंकि कच्चे नमक का सेवन सेहत के हानिकारक हो सकता है।
2 अगर आपको लगता है कि नमक का अधिक सेवन नुकसानदायक है, तो आपको ये भी मालूम होना चाहिए कि नमक का कम सेवन भी सेहत की कई परेशानियां खड़ी कर सकता है।
3 ऐसा माना जाता है कि ज्यादा नमक खाने से ब्लड प्रेशर, मोटापा, अस्थमा जैसी बीमारियां होने की आशंका बढ़ती है। वही कम नमक खाने से दिल और किडनी की बीमारी का खतरा बढ़ता है।
4 जानकारों के अनुसार एक दिन में सिर्फ 2 छोटे चम्मच नमक का सेवन काफी रहता है। अगर किसी को ब्लड प्रेशर की समस्या है, तो उनके लिए आधा चम्मच नमक लेना ही काफी है।

01/05/2022

एक रुपय ये औषधि दिलाएगी इतनी मीठी नींद कि आप हैरान रह जायेंगे
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*मेथी दाना हमारे रसोइघरों में दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तु है, जो अनेक औषधिय-गुणों से भरपूर होती है। प्राचीन काल से ही इसका प्रयोग खाद्य और औषधि के रूप में हमारे घरों में होता आ रहा है। आयुर्वेद के ग्रन्थ भावप्रकाश में कहा गया है कि मेथी वात को शान्त करती है, कफ और ज्वर का नाश करती है। राज निघन्टु में पित्त नाशक, भूख बढ़ाने वाली, रक्त शोधक, कफ और वात का शमन करने वाली बतलाया गया है।*
*मेथी में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेटस, खनिज, विटामिन, केल्शियम, फासफोरस, लोह तत्त्व, केरोटीन, थायमिन, रिवाफलेबिन, विटामिन सी आदि प्रचुर मात्रा में होते हैं। लोह तत्त्व की अधिकता के कारण मेथी रक्त की कमी वालों के लिये विशेष लाभप्रद होती है।*
*मेथी दानों से शरीर की आन्तरिक सफाई होती है। मेथी का उबला पानी बुखार उच्च रक्तचाप मधुमेह को कम करने में बहुत ही लाभप्रद होता है। मेथी सेवन से पाचन तंत्र सुधरता है। पेट में कर्मियों की उत्पत्ति नहीं होती। आंतों में भोजन का पाचन बराबर होता है। बड़ी आंत में, मल में कुछ गाढ़ापन आता है और मल आसानी से बड़ी आंत में गमन करने लगता हैं। मेथी खाने से भूख अच्छी लगती है। मेथी सेवन से गंध और स्वाद इन्द्रियाँ अधिक संवेदनशील होती हैं।*
*यह शरीर का आन्तरिक शोधन करती है। शलेष्मा को घोलती है तथा पेट और आंतों की सूजन ठीक करने में सहायक होती है। मेथी सेवन से मुंह की दुर्गन्ध दूर होती है। कफ, खांसी, इनफ्लेन्जा, निमोनिया, दमा आदि श्वसन संबंधी रोगों में लाभ होता है। गले की खराश में मेथी दाने के पानी से गरारे करने से बहुत लाभ होता है।*
*मेथी सेवन की विभिन्न विधियाँ*
*अलग-अलग रोगों के उपचार हेतु मेथी का प्रयोग अनेक प्रकार से किया जाता है। जैसे- मेथी दाणा भिगोंकर उसका पानी पीना, उसे अंकुरित कर खाना, उबालकर उसका पानी पीना, सब्जी बनाकर खाना, विभिन्न अचारों, सब्जियों अथवा अन्य खाद्य पदार्थों के साथ पकाकर सेवन करना, मेथी दानों को चूसना, चबाना अथवा पानी के साथ निगलना, मेथी की चाय अथवा काढ़ा बनाकर पीना, उसका पाउडर बना पानी के साथ लेना, अथवा लेप करना, मेथी की पुड़िये बनाकर खाना अथवा पकवान लड्डू बनाकर उपयोग करना इत्यादि, कई तरीकों से मेथी का प्रयोग हमारे घरों में होता रहता है।*
*माँ बहनो की मासिकधर्म गर्भाशय के सभी रोगों के लिए रामबाण है इस लिए इसे मैं सहेली का दर्जा देती हूँ साथ गर्भाशय का अपने स्थान से हट जाने पर एलोपैथी में सर्जरी व घरेलू में रामबाण एक मात्र उपचार इसके लड्डू का नियमित सेवन 3 माह*
*गहरी और मीठी नींद लेन का जबरदस्त नुस्खा*
*कागज की चिपकाने वाली टेप पर मेथी दानों को चिपका कर हथेली के अंगूठें के नाखून वाले ऊपरी पोरवे में उस टेप को लगा दें जिससे अंगूठे को मेथी का स्पर्श होता रहे। 20 से 40 मिनट के बाद आपको ऐसी जबरदस्त नींद आने लगेगी। यह नुस्खा बहुत ही उपयोगी है और बहुत से लोगों ने इस नुस्खे को आजमाया है और लाभपाया है. इस चिकित्सा को मेथी स्पर्श चिकित्सा कहते हैं।*
*मेथी स्पर्श चिकित्सा का सिद्धान्त*
*शरीर में अधिकांश दर्द और अंगों की कमजोरी का कारण आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार प्रायः वात और कफ संबंधी विकार होते हैं। मेथी वात और कफ का शमन करती है। अतः जिस स्थान पर मेथी का स्पर्श किया जाता है, वहाँ वात और कफ विरोधी कोशिकाओं का सृजन होने लगता हैं, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है। दर्द वाले अथवा कमजोर भाग में विजातीय तत्त्वों की अधिकता के कारण शरीर के उस भाग का आभा मंडल विकृत हो जाता है। मेथी अपने गुणों वाली तरंगें शरीर के उस भाग के माध्यम से अन्दर में भेजती है।*
*जिसके कारण शरीर में उपस्थित विजातीय तत्त्व अपना स्थान छोड़ने लगते हैं, प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने लगता है। फलतः रोगी स्वस्थ होने लगता है। मेथी रक्त शोधक है, रोगग्रस्त भाग का रक्त प्रायः पूर्ण शुद्ध नहीं होता। जिस प्रकार सोडा कपड़े की गंदगी अलग कर देता है, मेथी की तरंगे रोग ग्रस्त अथवा कमजोर भाग में शुद्ध रक्त का संचार करने में सहयोग करती है जिससे उपचार अत्यधिक प्रभावशाली हो जाता है।*
*मेथी का स्पर्श क्यों प्रभावशाली?*
*मेथी के प्रत्येक दानें में हजारों दाने उत्पन्न करने की क्षमता होती है। अतः उसके सम्पर्क से मृत प्रायः कोशिकाएँ पुनः सक्रिय होने लगती है। मेथी के औषधिय गुणों की तरंगें कमजोर अंगों को शक्तिशाली बनाने, शरीर के दर्द वाले भाग की वेदना कम करने, जलन वाले भाग की जलन दूर करने में चमत्कारी प्रभावों वाली सिद्ध हो रही है। मेथी जो कार्य पेट में जाकर करती है, उससे अधिक एवं शीघ्र लाभ उसके बाह्य प्रयोग से संभव होता है, क्योंकि उससे रोगग्रस्त भाग का मेथी की तरंगों से सीधा सम्पर्क होता है।*
*किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव की संभावना प्रायः नहीं रहती। रोगग्रस्त भाग को मेथी के औषधिय गुणों का पूर्ण लाभ मिलता है जबकि मेथी सेवन से रोगग्रस्त भाग तक उसका आशिंक लाभ ही मिलता है। परिणाम स्वरूप मेथी का बाह्य स्पर्श विभिन्न असाध्य स्थानीय रोगों का सहज, सरल, स्वावलंबी प्रभावशाली उपचार के रूप में विकसित हो रहा है। अनेकों रोगों के उपचार में यांत्रिक एवं रसायनिक परीक्षणों एवं अनुभवी चिकित्सकों के परामर्श की भी आवश्यकता नहीं रहती। मात्र रोगग्रस्त भाग अथवा कमजोर अंग का मेथी से स्पर्श रखना पड़ता है।*
*मेथी स्पर्श द्वारा विविध उपचार*
*• मेथी दानों को शरीर के दर्द वाले भाग पर लगाने से दर्द में तुरन्त राहत मिलती है।*
*• शरीर के कमजोर अंग पर लगाने से वह अंग पुनः सक्रिय और ताकतवर होने लगता है।*
*• जलन, सूजन, दाद, खुजली वाले स्थान पर मेथी लगाने से तुरन्त लाभ मिलता है।*
*• मेथी दानों को चूसते रहने से दांतों का दर्द ठीक होता है और गले संबंधित रोगों में आराम मिलता है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों एवं ऊर्जा चक्रों पर मेथी दाना लगाने से उसके आसपास जमे विकार दूर होने से उनकी सक्रियता बढ़ जाती है।*
*• हथेली और पगथली में मेथी दानों के मसाज से सारे शरीर से संबंधित एक्यूप्रेशर प्रतिवेदन बिन्दू सक्रिय होने लगते हैं। एक्यूप्रेशर के दर्दस्थ प्रतिवेदन बिन्दुओं पर मेथी स्पर्श से वहाँ जमें विजातीय तत्त्व दूर होने लगते हैं और एक्यूप्रेशर चिकित्सा बिना दर्द वाली स्वावलंबी प्रभावशाली उपचार पद्धति से हो जाता है।*
*• अंगूठे के ऊपर वाले पोरवे पर मेथी लगाने से चक्कर एवं सिर दर्द संबंधी विभिन्न रोगों में तुरन्त आराम मिलता हैं। रक्तचाप बराबर होने लगता है। तनाव, भय, अधीरता, क्रोध कम होने लगता है।*
*• रात्रि में सोते समय हाथ के अंगूठों के पहले पोरवे पर मेथी लगाने से अनिद्रा के रोग से छुटकारा मिलता है।*
*• मेथी का हल्का सा मसाज सीने पर करने से फेंफड़े मजबूत होते हैं। कफ, खांसी, दमा में आराम मिलता है।*
*• हृदय रोगियों के हृदय वाले स्थान पर मेथी दाणा लगाने से हृदय शूल और हृदय संबंधी अन्य विकार शीघ्र दूर होने लगते हैं।*
*• स्पलीन पर मेथी स्पर्श करने से मधुमेह ठीक होता है। शरीर में लासिका तंत्र बराबर कार्य करने लगता हैं। जिससे सूजन नहीं आती। आमाशय पर लगाने से पाचन अच्छा होता है। लीवर, पित्ताशय, गुर्दो, आंतों पर मेथी लगाने से संबंधित अंगों से विजातीय तत्व दूर होने लगते हैं और वे सारे अंग अपनी क्षमतानुसार कार्य करने लगते हैं।*
*• शरीर के जिस स्थान पर बाल हो और टेप से मेथी दानों का स्पर्श संभव न हों वहाँ मेथी का लेप कर उपचार किया जा सकता है।*
*• आग से जलने पर दानेदार मेथी को पानी में पीस कर लेप करने से जलन दूर होती है, फफोले नहीं पड़ते।*
*• मेथी का सिर पर लेप करने से बाल नहीं गिरते तथा गंजों के बाल आने लगते हैं। बाल अपने प्राकृतिक रंग में मुलायम बने रहते हैं। बालों की लम्बाई बढ़ती है।*
*• ताजा पत्तियों का पेस्ट रोज नहाने से पूर्व चेहरे पर लेप करने से चेहरे का रुखापन, झुरियाँ, गर्मी से होने वाले फोड़े फुन्सियाँ आदि ठीक होते हैं।*
*• पगथली के अंगूठों और अंगुलियों में मेथी लगाने से नाड़ी संस्थान संबंधी रोगों में शीघ्र राहत मिलती है।*
*मेथी कैसे और कितनी देर लगायें*
*बाजार में अलग-अलग माप की चिपकाने वाली कागज की टेप मिलती है। आवश्यकतानुसार माप की टेप पर मेथीदाणा को चिपका दें। चारों तरफ थोड़ा स्थान खाली छोड़ दें ताकि टेप त्वचा पर आसानी से चिपक सकें। मेथी दाणों का स्पर्श तब तक शरीर पर रहने दें, जब तक उस स्थान पर किसी प्रकार की प्रतिकूलता अथवा सिर में भारीपन अनुभव न हों। मेथी अपना प्रभाव लगाने के तुरन्त बाद अनुभव कराने लग जाती है। मात्र तीन दिन के नियमित प्रयोग से उसके चमत्कारी प्रभावों का अनुभव होना प्रारम्भ होने लगता है।*
*सारांश यही है कि मेथी स्पर्श चिकित्सा सहज, सरल, सस्ती, प्रभावशाली, दुष्प्रभावों से रहित,वैज्ञानिक, पूर्ण स्वावलंबी एवं अहिंसक होती है, जिसका शरीर के रोगग्रस्त भाग पर शीघ्र प्रभाव पड़ता है। मेथी दर्द नाशक एवं रक्त शोधक होती है। विजातीय तत्त्वों को दूर कर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है।*

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