
09/07/2025
दाढ़ी अब पकने लगी है,
ज़ुल्फ़े जो थिरकती थीं गाहे बेगाहे उंगलियों में,
कन्घे की गिरफ़्त से भी सरकने लगी हैं,
दाढ़ी अब पकने लगी है
वो कनखियों से देखना उस छ्त से अब नही होता,
मुहल्ले की नई नस्ल अब अंकल कहने लगी है,
दाढ़ी अब पकने लगी है
कल पुरानी अल्मारी साफ़ करते हुये,
लुढ़ककर गीरे थे कुछ अल्फ़ाज गर्द मे डुबे हुये,
जो कहे थे हमने तुमने आखरी बार, और फ़िर कहना छोड दिया था,
आ अब फ़िरसे सारी “कट्टी” छोड़कर “मीट्ठी” कर लें,
लब खामोश रहें, आँखें सब शिकवे कर ले,
क्योकि घड़ियॉ बडी तेज गुजरने लगी हैं,
दाढ़ी अब पकने लगी है
उसकी लकीर मेरी लकीर से बड़ी कैसे,
बहुत मेहनत की तेरे “मैं” ने मेरे “मैं “ ने,
करली इकठी बहुत डीग्रीया,बहुत सिढिया चढे,
चल अब शुन्य से फ़िर शुरु करे,भुलने की कवायद कर ले,
गुजार दी तमाम उम्र अबतक लड्ने में, बस अब और नही,सीज फ़ायर कर ले,
कानों के उपर सफ़ेद झंडीयाँ, झलकने लगी हैं
दाढ़ी अब पकने लगी है
Shafique Alam