AYUSH Health Wellness Centre

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13/02/2026

Thyroid Health - थायराइड बैलेंस करें नेचुरली: डाइट, योग और घरेलू नुस्खे - इस पोस्ट का टॉपिक बहुत ही इंपॉर्टेंट है - थायराइड। ये कोई छोटी-मोटी ग्रंथि नहीं है, बल्कि ऐसा हार्मोन कंट्रोल सेंटर है जो शरीर की हर एक सेल पर असर डालता है।

अगर ये बैलेंस में है तो सब ठीक, लेकिन जरा सा गड़बड़ हुआ तो वजन, मूड, एनर्जी, बाल, त्वचा, पाचन - सब प्रभावित हो सकते हैं।

तो इस आर्टिकल में हम बिल्कुल डिटेल में समझेंगे:

थायराइड क्या है
क्यों होता है
इसके लक्षण क्या हैं
क्या नहीं खाना चाहिए
और कौन-कौन से घरेलू उपाय मदद कर सकते हैं
थायराइड आखिर है क्या?
थायराइड एक बटरफ्लाई शेप की ग्रंथि है जो गर्दन के सामने, नीचे की तरफ होती है। इसका काम है दो मुख्य हार्मोन बनाना:

T3 (ट्राईआयोडोथायरोनिन)
T4 (थायरॉक्सिन)

ये दोनों हार्मोन हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म कंट्रोल करते हैं।
मतलब - जो खाना हम खाते हैं, उसे ऊर्जा में बदलना, शरीर की गर्मी संतुलित रखना, दिल की धड़कन, पाचन, दिमाग की एक्टिविटी, यहां तक कि प्रोटीन प्रोडक्शन भी।

अगर ये हार्मोन कम या ज्यादा बनने लगें, तो वहीं से शुरू होती है थायराइड की समस्या।

थायराइड के प्रकार
थायराइड मुख्य रूप से दो तरह का होता है:

1. हाइपरथायराइडिज्म - पतला करने वाला
जब थायराइड ग्लैंड जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगे।
मेटाबॉलिज्म बहुत तेज हो जाता है।

2. हाइपोथायराइडिज्म - मोटा करने वाला
जब ग्लैंड जरूरत से कम हार्मोन बनाए।
मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है।

महिलाओं में ये समस्या पुरुषों की तुलना में ज्यादा देखी जाती है। इसे कई बार “साइलेंट किलर” भी कहा जाता है क्योंकि शुरुआत में लक्षण बहुत हल्के होते हैं और लोग नजरअंदाज कर देते हैं।

थायराइड होने के कारण
अब समझते हैं कि ये होता क्यों है।

आयोडीन की गड़बड़ी
हमारा शरीर खुद आयोडीन नहीं बनाता।

कमी होगी - हाइपोथायराइड
ज्यादा होगा - हाइपरथायराइड

जन्मजात समस्या
कुछ बच्चों में जन्म से ही थायराइड ग्रंथि ठीक से विकसित नहीं होती — इसे कंजेनिटल हाइपोथायराइडिज्म कहते हैं।

प्रेगनेंसी
गर्भावस्था में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिससे थायराइड असंतुलित हो सकता है।

दवाइयों का असर
कैंसर या हृदय रोग की कुछ दवाइयां थायराइड हार्मोन कम कर देती हैं।

फैमिली हिस्ट्री
अगर परिवार में किसी को है, तो रिस्क बढ़ जाता है।

ज्यादा सोया प्रोडक्ट
सोयाबीन, टोफू, सोया मिल्क आदि का अत्यधिक सेवन थायराइड हार्मोन बनने में बाधा डाल सकता है।

तनाव (Stress)
क्रॉनिक स्ट्रेस थायराइड ग्लैंड पर सीधा असर डालता है।

थायराइड के लक्षण
अब सबसे जरूरी हिस्सा - पहचान कैसे करें?

वजन बढ़ना
मेटाबॉलिज्म धीमा - फैट जमा - मोटापा।

बिना काम के थकान
हर समय कमजोरी महसूस होना।

ठंड या गर्मी सहन न होना
तापमान के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाना।

आवाज भारी होना
डिप्रेशन
कम थायरॉक्सिन - मूड हार्मोन प्रभावित।

नींद की समस्या
बाल झड़ना
रूखे, कमजोर बाल।
जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द
त्वचा सूखी होना
नाखून पतले और जल्दी टूटना
कब्ज
धीमा मेटाबॉलिज्म - स्लो पाचन।

अगर ये लक्षण लगातार दिख रहे हैं तो टेस्ट जरूर करवाएं।

थायराइड के नॉर्मल लेवल्स (Lab Values Guide)
अब सबसे ज़रूरी सवाल — रिपोर्ट में कौन-सा लेवल नॉर्मल माना जाता है?
कई लोग टेस्ट तो करा लेते हैं, लेकिन समझ नहीं पाते कि रिपोर्ट सही है या नहीं।

थायराइड की जांच में मुख्य रूप से ये तीन चीजें देखी जाती हैं:

1. TSH (Thyroid Stimulating Hormone)
यह सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट है।
TSH पिट्यूटरी ग्लैंड बनाती है और यह थायराइड को कंट्रोल करती है।

नॉर्मल रेंज:
0.4 से 4.0 mIU/L (कुछ लैब 0.5–5.0 भी मानती हैं)
अगर TSH ज्यादा है (4 से ऊपर) - हाइपोथायराइड का संकेत

अगर TSH कम है (0.4 से नीचे) - हाइपरथायराइड का संकेत
याद रखें: शुरुआती स्टेज में TSH ही पहले गड़बड़ होता है।

2. Free T4 (Thyroxine)
यह मुख्य हार्मोन है जो थायराइड बनाती है।

नॉर्मल रेंज:
0.8 से 1.8 ng/dL

कम T4 - हाइपोथायराइड
ज्यादा T4 - हाइपरथायराइड

3. Free T3 (Triiodothyronine)
यह ज्यादा एक्टिव हार्मोन है।

नॉर्मल रेंज:
2.3 से 4.2 pg/mL

कम T3 - थकान, सुस्ती
ज्यादा T3 - घबराहट, तेज धड़कन

स्पेशल सिचुएशन
प्रेग्नेंसी में
TSH की नॉर्मल रेंज थोड़ी कम रखी जाती है (लगभग 0.1–2.5 पहले ट्राइमेस्टर में)।
इसलिए प्रेग्नेंसी में अलग रेफरेंस रेंज फॉलो होती है।

सबक्लिनिकल थायराइड
TSH थोड़ा बढ़ा हुआ
लेकिन T3 और T4 नॉर्मल

इसमें लक्षण हल्के हो सकते हैं, पर निगरानी जरूरी है।

एक जरूरी बात
हर लैब की रेफरेंस रेंज थोड़ी अलग हो सकती है, इसलिए अपनी रिपोर्ट में दी गई रेंज जरूर देखें।

सिर्फ नंबर देखकर घबराएं नहीं -
लक्षण + रिपोर्ट + डॉक्टर की सलाह - तीनों मिलाकर निर्णय लें।

Allopathy Treatment
अब बात करते हैं - अगर रिपोर्ट में थायराइड गड़बड़ आ जाए तो एलोपैथी में क्या इलाज किया जाता है?

इलाज पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आपको हाइपोथायराइड है या हाइपरथायराइड।

1. हाइपोथायराइड (थायराइड कम काम कर रहा है)
इसमें शरीर में थायरॉक्सिन हार्मोन कम बनता है।
इलाज सीधा और काफी प्रभावी होता है।

मुख्य दवा:
Levothyroxine (T4 tablet)
(ब्रांड नाम अलग-अलग हो सकते हैं)

कैसे ली जाती है?
सुबह खाली पेट
पानी के साथ
खाने से 30–45 मिनट पहले
रोज एक ही समय पर
डोज कैसे तय होती है?
उम्र

वजन
TSH लेवल
हार्ट की स्थिति
प्रेग्नेंसी
डोज व्यक्ति-व्यक्ति पर अलग होती है।
6–8 हफ्ते बाद TSH टेस्ट करके डोज एडजस्ट की जाती है।

ध्यान रखें:
कैल्शियम, आयरन की दवा 3–4 घंटे बाद लें
दवा अचानक बंद न करें
यह अक्सर लंबी अवधि की दवा होती है

2. हाइपरथायराइड (थायराइड ज्यादा काम कर रहा है)
इसमें हार्मोन जरूरत से ज्यादा बनता है।

मुख्य दवाएं:
Methimazole
Carbimazole
Propylthiouracil (PTU)

ये दवाएं थायराइड हार्मोन का निर्माण कम करती हैं।

साथ में:
अगर धड़कन तेज है या घबराहट है तो
Beta blockers (जैसे Propranolol) दिए जाते हैं।

अगर दवाओं से कंट्रोल न हो तो?
तीन ऑप्शन होते हैं:

1. Radioactive Iodine Therapy
- थायराइड कोशिकाओं को धीरे-धीरे कम करता है

2. सर्जरी (Thyroidectomy)
- जब गांठ बड़ी हो या कैंसर का शक हो

3. लंबे समय तक दवा मॉनिटरिंग

सबक्लिनिकल केस में
अगर TSH थोड़ा ही बढ़ा है और लक्षण कम हैं,
तो डॉक्टर तुरंत दवा शुरू नहीं भी कर सकते -
सिर्फ मॉनिटरिंग की जाती है।

सबसे जरूरी बात
खुद से दवा शुरू न करें
डोज खुद से बदलना खतरनाक हो सकता है
प्रेग्नेंसी में कंट्रोल बहुत जरूरी है
हार्ट पेशेंट्स में सावधानी जरूरी

थायराइड का इलाज मुश्किल नहीं है -
बस सही डायग्नोसिस, सही डोज और नियमित फॉलो-अप जरूरी है।

थायराइड में क्या नहीं खाना चाहिए?
अब डाइट की बात करते हैं - क्योंकि सही खाना आधा इलाज है।

ज्यादा कैफीन
चाय-कॉफी अधिक मात्रा में लेने से समस्या बढ़ सकती है।

ज्यादा आयोडीन
अगर हाइपोथायराइड है तो आयोडीन का ओवरडोज न लें।

सोया प्रोडक्ट
थायराइड हार्मोन बनने की प्रक्रिया बाधित कर सकते हैं।

क्रूसिफेरस सब्जियां (अगर आयोडीन की कमी हो)
ब्रोकली, फूलगोभी, पत्तागोभी — सीमित मात्रा में लें।

ज्यादा शुगर
कोल्ड ड्रिंक, केक, पेस्ट्री — सिर्फ कैलोरी, कोई पोषण नहीं।

ग्लूटेन
गेहूं, मैदा, पास्ता, ब्रेड — कुछ लोगों में समस्या बढ़ा सकता है।

जंक फूड
तला-भुना, प्रोसेस्ड फूड — कोलेस्ट्रॉल और वजन दोनों बढ़ाते हैं।

थायराइड के घरेलू उपाय
अब बात करते हैं नेचुरल सपोर्ट की।

1. तेजपत्ता (सेज की पत्ती) चाय
एक कप पानी उबालें।
उसमें 1–2 तेजपत्ता डालें।
5–10 मिनट ढककर रखें।
छानकर चाहें तो शहद/नींबू मिलाएं।
सुबह खाली पेट पिएं।

प्रेग्नेंट महिलाएं और मिर्गी मरीज बिना सलाह न लें।

2. धनिया पानी
2 चम्मच साबुत धनिया
एक गिलास पानी में रातभर भिगो दें।
सुबह उबालें जब तक आधा न रह जाए।
छानकर पिएं।

3. दालचीनी + अजवाइन + मेथी पाउडर
तीनों 25-25 ग्राम लें।
पीसकर मिक्स करें।
रोज 1 चम्मच गुनगुने पानी से लें।

4. अदरक पानी
1 इंच अदरक कद्दूकस करें।
डेढ़ कप पानी में उबालें।
एक कप बचे तो छानकर पिएं।

5. लौकी का रस
सुबह खाली पेट एक गिलास।
2–3 तुलसी पत्ते मिलाएं तो और बेहतर।

6. मल्टीग्रेन आटा
5 किलो गेहूं + 1 किलो बाजरा + 1 किलो ज्वार
इसकी रोटी खाएं।

योग से थायराइड कंट्रोल
उज्जायी प्राणायाम

सीधे बैठें
नाक से गहरी सांस लें
हल्की खर्राटे जैसी आवाज गले से आए
कुछ सेकंड रोकें
एक नासिका बंद कर दूसरी से छोड़ें
10–20 मिनट अभ्यास करें
लंबे समय तक करने से अच्छा लाभ मिलता है।

अनानास का सेवन
सुबह अनानास या उसका जूस लें।
विटामिन C, ब्रोमेलेन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर।
वजन नियंत्रण में भी मददगार।

सबसे जरूरी बात – वजन कंट्रोल रखें
थायराइड में वजन तेजी से बढ़ता है।
अगर वजन कंट्रोल में है, तो आधी समस्या अपने आप कम हो जाती है।

Conclusion
थायराइड कोई अचानक आने वाली बीमारी नहीं है।
ये धीरे-धीरे शरीर में असंतुलन पैदा करती है।

अगर:

समय पर टेस्ट
सही डाइट
स्ट्रेस कंट्रोल
वजन कंट्रोल
नियमित योग
इन पांच चीजों पर ध्यान दिया जाए, तो थायराइड को काफी हद तक मैनेज किया जा सकता है।

ध्यान रखें — घरेलू उपाय सपोर्ट करते हैं, लेकिन दवाई चल रही हो तो डॉक्टर की सलाह के बिना बंद न करें।

अपना ख्याल रखें। शरीर संकेत देता है — बस हमें सुनना आना चाहिए।

आपका थायराइड लेवल बैलेंस है या नहीं, कमेंट में लिखें

वात दोष टेस्ट – आसान चेकलिस्ट* मानसिक लक्षण- * जल्दी डर या चिंता होना* बार-बार सोच बदलना / मन अस्थिर रहना।* ध्यान लगाने ...
07/02/2026

वात दोष टेस्ट – आसान चेकलिस्ट
* मानसिक लक्षण-
* जल्दी डर या चिंता होना
* बार-बार सोच बदलना / मन अस्थिर रहना।
* ध्यान लगाने में परेशानी होती है।
* जल्दी तनाव या घबराहट होना।
* नींद कम आना या बार-बार टूटना।
शरीर से जुड़े लक्षण-
* शरीर या त्वचा में सूखापन आना ।
* हाथ-पैर ठंडे रहना ।
* वजन कम या दुबला शरीर होना।
* जोड़ों में दर्द या आवाज आना।
* बाल रूखे या टूटने लगना।
पाचन से जुड़े लक्षण-
* गैस बनना
* कब्ज रहना
* पेट फूलना
* भूख कभी ज्यादा, कभी कम लगना
⚡ आदत और व्यवहार-
* जल्दी थक जाना।
* काम शुरू करके जल्दी छोड़ देना।
* ज्यादा सोचने की आदत।
* ठंडी हवा या मौसम से परेशानी।
📊 रिजल्ट कैसे समझें-
✔ 0 – 4 लक्षण
👉 वात सामान्य है।
* 5 – 8 लक्षण
👉 वात थोड़ा बढ़ा हुआ है (ध्यान रखने की जरूरत)
* 9 या उससे ज्यादा
👉 वात दोष ज्यादा बढ़ा हुआ हो सकता है (लाइफस्टाइल और खान-पान सुधार जरूरी)
अगर वात ज्यादा दिखे तो जल्दी याद रखने वाला छोटा सा मंत्र 👇
“गर्म, ताज़ा, तेलीय और नियमित दिनचर्या”
यही वात को शांत करने का बेसिक फंडा माना जाता है।

05/02/2026

🌿 1. तनाव, डिप्रेशन, नींद न आना
मुद्रा 👉 ज्ञान मुद्रा
प्राणायाम 👉 अनुलोम-विलोम (10–15 मिनट)
आयुर्वेद उपाय 👉
• ब्राह्मी चूर्ण ½ चम्मच रात को दूध के साथ
• अश्वगंधा 1 चम्मच गुनगुने दूध में
🌿 2. शरीर की कमजोरी, थकान, इम्यूनिटी कम
मुद्रा 👉 प्राण मुद्रा
प्राणायाम 👉 कपालभाति (हल्का, 5–7 मिनट)
आयुर्वेद उपाय 👉
• च्यवनप्राश सुबह 1 चम्मच
• आंवला जूस 20 ml
🌿 3. कब्ज, गैस, पेट साफ न होना
मुद्रा 👉 अपान मुद्रा
प्राणायाम 👉 पवनमुक्तासन + भस्त्रिका
आयुर्वेद उपाय 👉
• त्रिफला चूर्ण 1 चम्मच रात को
• गुनगुना पानी सुबह
🌿 4. हार्ट, घबराहट, ब्लड प्रेशर
मुद्रा 👉 अपान-वायु मुद्रा / हृदय मुद्रा
प्राणायाम 👉 अनुलोम-विलोम + भ्रामरी
आयुर्वेद उपाय 👉
• अर्जुन छाल का काढ़ा
• लहसुन 1 कली खाली पेट
🌿 5. मोटापा, थायरॉइड, सुस्ती
मुद्रा 👉 सूर्य मुद्रा
प्राणायाम 👉 कपालभाति + भस्त्रिका
आयुर्वेद उपाय 👉
• गुग्गुल
• मेथी दाना भिगोकर सुबह
⚠️ ज्यादा गर्मी वालों में सावधानी
🌿 6. कान दर्द, कान में आवाज, चक्कर
मुद्रा 👉 शून्य मुद्रा
प्राणायाम 👉 अनुलोम-विलोम
आयुर्वेद उपाय 👉
• सरसों तेल हल्का गर्म कर कान में 2 बूंद
• तिल का तेल सिर पर मालिश
🌿 7. सर्दी-खांसी, बलगम, फेफड़े कमजोर
मुद्रा 👉 लिंग मुद्रा
प्राणायाम 👉 भस्त्रिका + कफ निस्सार
आयुर्वेद उपाय 👉
• तुलसी-अदरक-शहद
• सितोपलादि चूर्ण
🌿 8. डायबिटीज, पेशाब की समस्या
मुद्रा 👉 अपान मुद्रा + ज्ञान मुद्रा
प्राणायाम 👉 कपालभाति
आयुर्वेद उपाय 👉
• करेला जूस
• जामुन बीज चूर्ण
🧘‍♂️ जरूरी नियम
✔ खाली पेट करें
✔ रोज कम से कम 20–30 मिनट
✔ दवा चल रही हो तो बंद न करें
✔ 40 दिन नियमित करें

29/01/2026

Vata Pitta Kapha Diet - अपनी प्रकृति के अनुसार सही डाइट क्यों ज़रूरी है? अपनी प्रकृति यानी बॉडी टाइप के अनुसार खानपान कैसे चुना जाए। अक्सर लोग यही गलती करते हैं कि एक ही डाइट प्लान को सब पर लागू करने की कोशिश करते हैं, जबकि आयुर्वेद साफ़ कहता है कि हर व्यक्ति अलग है।

हर इंसान की प्रकृति अलग होती है—वात, पित्त या कफ।

जब इनमें से कोई भी दोष असंतुलित होता है, तभी शरीर में लक्षण और बीमारियाँ दिखने लगती हैं।
अच्छी बात यह है कि आयुर्वेद हमें यह भी सिखाता है कि दोष बढ़ने पर उसी के अनुसार खानपान बदलकर स्थिति को संतुलित किया जा सकता है।

वात दोष कैसे पहचानें?
आयुर्वेद में वात दोष का मुख्य गुण बताया गया है—रूक्षता (Dryness)।

अगर आपके शरीर में वात बढ़ा हुआ है, तो आपको ये लक्षण दिख सकते हैं:

त्वचा और बालों में ज़्यादा रूखापन
कब्ज़, हार्ड स्टूल, मल त्याग में तकलीफ
जोड़ों में दर्द या कटकट की आवाज़
वज़न बढ़ाने में कठिनाई, लेकिन जल्दी वज़न घट जाना
मन की चंचलता, ज़्यादा सोच, नींद की कमी, एंग्ज़ायटी

ऐसे लोगों की पाचन शक्ति भी विषम (Irregular) होती है-
कभी बहुत भूख लगती है, कभी बिल्कुल नहीं।

वात दोष में डाइट का मूल सिद्धांत
आयुर्वेद में वात चिकित्सा का पहला सूत्र है:
“स्नेह से वात को शांत करो।”

आजकल ज़ीरो ऑयल कुकिंग का ट्रेंड है, लेकिन यह वात प्रकृति वालों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
क्योंकि वात पहले से ही रूखा होता है, ऐसे में तेल या घी पूरी तरह बंद करना समस्याएँ बढ़ा देता है।

तिल का तेल और घी क्यों ज़रूरी है?
तिल का तेल (Sesame Oil) वात के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है
इसमें स्निग्धता है और इसकी तासीर गर्म होती है
वात में ठंडापन होता है, इसलिए तिल का तेल उसे संतुलित करता है

कैसे लें?
थोड़े गुनगुने पानी में 1–2 चम्मच तिल का तेल मिलाकर पी सकते हैं।
अगर तेल पसंद न हो, तो देसी गाय का घी बेहतर विकल्प है।

दिन में 2–3 चम्मच घी
दाल, चावल या रोटी पर लगाकर लें।

वात दोष में कौन-से स्वाद ज़रूरी हैं?
आयुर्वेद में छह रस बताए गए हैं:
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय

वात को शांत करने के लिए ज़रूरी हैं:

1. मधुर (मीठा)
दूध, घी, मक्खन
मुनक्का, खजूर, अंजीर
गुड़, मिश्री

2. अम्ल (खट्टा)
नींबू, अनार
आंवले, हल्दी या नींबू का अचार

3. लवण (नमकीन)
हल्का सुपाच्य नमकीन भोजन
सूप, दलिया, खिचड़ी
खाना हमेशा गर्म और ताज़ा होना चाहिए।

मिलेट्स: किसके लिए सही, किसके लिए नहीं?
मिलेट्स रूखे होते हैं।
अगर किसी को मोटापा, फैटी लिवर या हाई कोलेस्ट्रॉल है, तो मिलेट्स फायदेमंद हैं।

लेकिन वात प्रकृति वालों के लिए ज़्यादा मिलेट्स नुकसान कर सकते हैं।

सर्दियों में:

बाजरा लिया जा सकता है
बाजरे की रोटी पर घी और थोड़ा गुड़ ज़रूर जोड़ें
रोज़ाना मिलेट्स लेना वात वालों के लिए सही नहीं।

पित्त दोष कैसे पहचानें?
पित्त के गुण हैं: तीक्ष्णता और उष्णता (Heat)

पित्त बढ़ने पर ये लक्षण दिखते हैं:

शरीर में अंदरूनी गर्मी
ज़्यादा पसीना, बदबू
स्किन एलर्जी, रैशेज़
बालों का जल्दी सफेद होना
हथेलियों, तलवों या पेशाब में जलन
गुस्सा, चिड़चिड़ापन
बार-बार भूख और प्यास लगना

पित्त दोष में क्या खाएं?
घी पित्त का सबसे अच्छा संतुलक
देसी गाय का घी रोज़ लें
रात को गर्म दूध में 1 चम्मच घी फायदेमंद है

अन्य लाभकारी चीजें
नारियल तेल
सफेद मक्खन + मिश्री
काले मुनक्के (8–10 भिगोकर)
अंजीर
आंवले का मुरब्बा
गुलकंद

औषधियाँ
मुलेठी चूर्ण: ½–1 चम्मच
शतावरी चूर्ण या कल्क

पित्त में कौन-से स्वाद बढ़ाएं?
पित्त को शांत करते हैं:

मधुर (मीठा)
तिक्त (कड़वा)
कषाय (कसैला)

जैसे:

करेले की सब्ज़ी
नीम के पत्ते
आंवला

कफ दोष कैसे पहचानें?
कफ प्रकृति के लोग:
मज़बूत शरीर वाले
वज़न जल्दी बढ़ता है
सुस्ती, आलस
ज़्यादा नींद
बार-बार सर्दी-खांसी
इनकी पाचन अग्नि मंद होती है।

कफ दोष में डाइट कैसे रखें?
हल्का, रूखा और गर्म खाना
भूनी हुई चीजें
जौ और मिलेट्स
मसाले: अदरक, काली मिर्च, दालचीनी

शहद का सही उपयोग
पानी उबालें, ठंडा करें
फिर शहद मिलाएँ
गर्म पानी + शहद नहीं

कफ में कौन-से स्वाद ज़रूरी हैं?
कटु (तीखा)
तिक्त (कड़वा)
कषाय (कसैला)

जैसे:
त्रिकटु चूर्ण
करेले, नीम
गिलोय
मसाला छाछ
हरड़
पान (अजवायन के साथ)

कफ में उपवास कब करें?
कफ ज़्यादा हो तो:
लंघन या हल्का उपवास लाभकारी
लेकिन वात और पित्त वालों को फास्टिंग से बचना चाहिए।

Conclusion
वात, पित्त और कफ—तीनों के लिए डाइट अलग होती है।
एक ही खानपान सबके लिए सही नहीं होता।

अगर हम अपनी प्रकृति को समझकर खाते हैं,
तो बीमारियों से बचाव अपने आप हो जाता है।

आपकी प्रकृति क्या है? कमेंट करें

Latest “Diabetes Treatment Guidelines” 20261️⃣ When should treatment be started?👉 At the time of diagnosis (Dx) without ...
26/01/2026

Latest “Diabetes Treatment Guidelines” 2026

1️⃣ When should treatment be started?

👉 At the time of diagnosis (Dx) without delay!!

2️⃣ Initial combination therapy – in which patients?

👉 HbA1C above goal by 1.5–2%
👉 High risk for CVD or established CVD irrespective of HbA1C levels
→ GLP-1 RA + SGLT2i

3️⃣ Heart Failure (HF)

👉 Symptomatic HF
What medications should be given?
🖍 EF ≤40 → HFrEF GDMT
✔️ SGLT2i (if eGFR ≥20) or SGLT1/2i (can be used instead of SGLT2i if eGFR ≥30)
✔️ ARNI or ACEi/ARB if ARNI not tolerated
✔️ β-Blocker
✔️ MRA (if eGFR ≥30, K 40 → HFmrEF/HFpEF GDMT
✔️ SGLT2i or SGLT1/2i
✔️ If obesity: dual GIP/GLP-1 RA or GLP-1 RA
✔️ ACEi or ARB if HT, prior MI, or CKD
✔️ nonsteroidal MRA (nsMRA) (finerenone)
(if eGFR ≥25, K 30)
👉 “Metformin should be avoided” ❌
in unstable HF or hospitalized HF!!
👉 TZD is contraindicated in HF ❌
👉 Saxagliptin is contraindicated in HF ❌

4️⃣ “ASCVD” or “indicators of high CVD risk”

ASCVD = established CVD (MI, stroke, arterial revascularization procedure),
TIA, unstable angina, amputation, symptomatic or asymptomatic CAD
Indicators of high CVD risk =
Age ≥55 + ≥2 additional risk factors (HT, smoking, dyslipidemia, obesity, albuminuria)
or end-organ damage such as LVH, retinopathy
👉 First-line drug → GLP-1 RA or SGLT2i
May consider GLP-1 RA + SGLT2i combination for additive reduction in
risk of adverse CV & kidney events
👉 Second-line drug → TZD
(Low-dose TZD is better tolerated than high-dose with similar efficacy)

5️⃣ Chronic Kidney Disease (CKD)

(eGFR

आयुर्वेद में डायबिटीज को 'प्रमेह' कहा गया है। आयुर्वेद का मानना है कि यदि हम शरीर की शुरुआती चेतावनियों को पहचान लें, तो...
21/01/2026

आयुर्वेद में डायबिटीज को 'प्रमेह' कहा गया है। आयुर्वेद का मानना है कि यदि हम शरीर की शुरुआती चेतावनियों को पहचान लें, तो इस बीमारी को न केवल रोका जा सकता है, बल्कि इसे उलटा (Reverse) भी किया जा सकता है।

डायबिटीज के 'अर्ली वार्निंग' लक्षण: क्या आपका शरीर ये संकेत दे रहा है?
डायबिटीज अचानक नहीं होती; शरीर महीनों पहले संकेत देना शुरू कर देता है। आयुर्वेद के अनुसार, इन्हें 'पूर्वरूप' कहा जाता है:

अत्यधिक प्यास और बार-बार पेशाब (Polydipsia & Polyuria): यदि आपको रात में बार-बार टॉयलेट जाने के लिए उठना पड़ रहा है और पानी पीने के बावजूद गला सूख रहा है, तो यह ब्लड शुगर बढ़ने का प्राथमिक लक्षण है।

अकारण थकान (Unexplained Fatigue): पर्याप्त नींद और भोजन के बाद भी अगर आप ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं, तो समझ लें कि आपकी कोशिकाएं ग्लूकोज को ऊर्जा में नहीं बदल पा रही हैं।

हाथों-पैरों में झुनझुनी (Neuropathy): उंगलियों या तलवों में सुई जैसी चुभन या सुन्नपन महसूस होना नसों पर शुगर के प्रभाव का संकेत है।

घाव भरने में देरी: छोटी सी खरोंच या चोट अगर हफ्तों तक ठीक नहीं हो रही है, तो यह हाई शुगर लेवल की चेतावनी है।

त्वचा का काला पड़ना (Acanthosis Nigricans): गर्दन, बगल या कोहनियों के पास की त्वचा का गहरा और मखमली काला होना 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' का बड़ा संकेत है।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण: "प्रमेह" और दोषों का खेल
आयुर्वेद के अनुसार, डायबिटीज मुख्य रूप से कफ दोष के बिगड़ने और मंदाग्नि (धीमी पाचन शक्ति) के कारण होती है। आचार्य चरक ने स्पष्ट कहा है:

"आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि। नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम्॥"

अर्थ: आरामकुर्सी वाली जीवनशैली (आस्यासुखं), अधिक सोना (स्वप्नसुखं), दही, मांसाहार, दूध के बने पदार्थ, नए अनाज और गुड़/चीनी से बनी चीजों का अत्यधिक सेवन 'प्रमेह' का मुख्य कारण है।

बचाव के 5 अचूक आयुर्वेदिक मंत्र (Prevention Tips)
यदि आपके लक्षण शुरुआती हैं, तो इन बदलावों से आप शुगर को जड़ से रोक सकते हैं:

कटु और तिक्त रस का सेवन: अपनी डाइट में कड़वी और तीखी चीजें बढ़ाएं। मेथी दाना, नीम, करेला और हल्दी इंसुलिन की संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं। रोज सुबह खाली पेट एक चम्मच मेथी चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें।

तांबे के बर्तन का जल: रात भर तांबे के बर्तन में रखा पानी सुबह खाली पेट पिएं। यह कफ दोष को संतुलित करता है और मेटाबॉलिज्म तेज करता है।

त्रिफला और आंवला: आंवला विटामिन-C और क्रोमियम का बेहतरीन स्रोत है, जो कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म को ठीक रखता है। रोज रात को एक चम्मच त्रिफला चूर्ण का सेवन शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालता है।

नियमित व्यायाम (विहार): आयुर्वेद में 'कफ' को हराने का एकमात्र तरीका गति है। रोजाना 30-45 मिनट तेज चलना या मंडूकासन और सूर्यनमस्कार जैसे योग करना पैंक्रियाज को सक्रिय करता है।

रात्रि भोजन और नींद: सूरज ढलने के बाद हल्का भोजन करें और रात 10 बजे तक सो जाएं। देर रात का भोजन और जागरण इंसुलिन के स्तर को बिगाड़ देता है।

दुर्लभ सत्य तथ्य (Rare Facts)
तनाव और शुगर: क्या आप जानते हैं कि आयुर्वेद 'चिंता' को प्रमेह का प्रमुख कारण मानता है? अत्यधिक मानसिक तनाव 'कोर्टिसोल' बढ़ाता है, जो सीधे आपके ब्लड शुगर को स्पाइक करता है।

पुराना अनाज: आयुर्वेद के अनुसार, नया गेहूं या चावल कफ बढ़ाता है। डायबिटीज से बचने के लिए कम से कम एक साल पुराना अनाज या जौ (Barley) और बाजरा खाना चाहिए।

निष्कर्ष: डायबिटीज कोई सजा नहीं, बल्कि शरीर द्वारा जीवनशैली सुधारने का एक आग्रह है। यदि आप ऊपर दिए गए लक्षणों को समय पर पहचान लेते हैं और आयुर्वेद के नियमों का पालन करते हैं, तो आप बिना दवाओं के एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

पैरों के तलवों पर  #कांसे (Kansa) धातु की कटोरी से मालिश करना एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है, जिसे  #कांसा वाट...
12/01/2026

पैरों के तलवों पर #कांसे (Kansa) धातु की कटोरी से मालिश करना एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है, जिसे #कांसा वाटी मसाज कहा जाता है।
यह मालिश सिर्फ आराम ही नहीं देती, बल्कि इसके कई गहरे शारीरिक और मानसिक फायदे भी हैं,,,,,,

कांसे की धातु, जो तांबे और टिन का मिश्रण होती है, आयुर्वेद में इसके औषधीय गुणों के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह मालिश शरीर के ऊर्जा बिंदुओं (मर्म) को उत्तेजित करती है, जिससे कई लाभ होते हैं।

कांसे की कटोरी से मालिश के फायदे ,,,,,,,,,:

शरीर की गंदगी (टॉक्सिन) बाहर निकालना:
कांसे की धातु में शरीर की गर्मी और विषाक्त पदार्थों (toxins) को खींचने का गुण होता है।
जब तलवों पर तेल या घी लगाकर कांसे की कटोरी से मालिश की जाती है, तो कटोरी का निचला हिस्सा धीरे-धीरे काला या भूरा हो जाता है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि कटोरी शरीर से जमी हुई गंदगी को बाहर निकाल रही है।

तनाव और थकान दूर करना:

पैरों के तलवों में हजारों तंत्रिकाएं (nerves) होती हैं। मालिश करने से ये तंत्रिकाएं शांत होती हैं, जिससे पूरे शरीर को गहरा आराम मिलता है।
यह दिन भर की थकान, तनाव और चिंता को दूर करने का एक बेहतरीन तरीका है।

बेहतर नींद में सहायक:

तनाव और थकान दूर होने से मन शांत होता है।
यह मस्तिष्क को आराम देता है, जिससे रात में गहरी और आरामदायक नींद आने में मदद मिलती है।

रक्त संचार बढ़ाना:

तलवों पर मालिश से रक्त वाहिकाओं (blood vessels) में रक्त का प्रवाह बढ़ता है।
बेहतर रक्त संचार से पैरों में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे पैरों की सूजन और दर्द में कमी आती है।

आंखों की रोशनी के लिए:

आयुर्वेद और रिफ्लेक्सोलॉजी (Reflexology) के अनुसार, पैरों के तलवे में कुछ खास बिंदु आंखों से जुड़े होते हैं।
कांसे की कटोरी से इन बिंदुओं पर दबाव पड़ने से आंखों की रोशनी बेहतर होती है और आंखों का तनाव कम होता है।

वात और पित्त दोष को शांत करना:

कांसे की तासीर ठंडी मानी जाती है, जो शरीर की अतिरिक्त गर्मी (पित्त दोष) को शांत करती है।
मालिश की क्रिया से वात दोष (जो दर्द और सूखापन का कारण बनता है) संतुलित होता है। इस तरह, यह शरीर में तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने में मदद करती है।
पैरों की त्वचा और मांसपेशियों को स्वस्थ रखना:
यह मसाज पैरों की मांसपेशियों को आराम देती है और उनकी कठोरता को कम करती है।
यह तलवों की सूखी और फटी हुई त्वचा को नरम बनाने में भी मदद करती है।

इस मालिश को करने के लिए आप घी या कोई भी प्राकृतिक तेल (जैसे नारियल तेल) का उपयोग कर सकते हैं। यह बहुत ही सरल और प्रभावी तरीका है अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का।
जानकारी अच्छी लगी हो तो कृपया पेज को फॉलो करें,,,,

🌿🌿पुरुषों (Male) में होने वाली आम समस्याओं के लिए प्रचलित होम्योपैथिक दवाओं के नाम दिए जा रहे हैं।👉 ध्यान रखें: सही दवा ...
01/01/2026

🌿🌿पुरुषों (Male) में होने वाली आम समस्याओं के लिए प्रचलित होम्योपैथिक दवाओं के नाम दिए जा रहे हैं।
👉 ध्यान रखें: सही दवा का चयन लक्षणों के अनुसार होता है, इसलिए किसी योग्य होम्योपैथिक डॉक्टर से सलाह ज़रूरी है।

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🌿 1. यौन कमजोरी / शीघ्रपतन (Sexual Weakness / Premature Ej*******on)

प्रचलित दवाएँ:

Selenium 30

Agnus Castus 30

Caladium 30

Conium 200

Lycopodium 200

Nux Vomica 200

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🌿 2. नाइटफॉल / स्वप्नदोष (Nightfall)

Selenium 30

Phosphoric Acid 200

Kali Phos 6x

China 30

Staphysagria 30

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🌿 3. इरेक्शन की समस्या (Erectile Dysfunction)

Agnus Castus Q

Sabal Serrulata Q

Caladium 30

Lycopodium 200

Conium 200

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🌿 4. प्रोस्टेट बढ़ना / पेशाब की दिक्कत (Prostate Problems)

Sabal Serrulata Q

Conium 200

Thuja 200

Hydrangea Q

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🌿 5. धातु गिरना / वीर्य पतलापन

Phosphoric Acid 200

China 30

Selenium 30

Calcarea Phos 200

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🌿 6. तनाव, कमजोरी, थकान

Kali Phos 6x

Ginseng (Q)

Avena Sativa (Q)

Acid Phos 200

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31/12/2025

आयुर्वेदीय वनस्पति से निर्मित एक चमत्कारी कल्प चतु:षष्टि प्रहरी पिप्पला

पिप्पली जिसे लैटिन भाषा में पाइपर लौंगन (Pipur Longum Linn) कहा जाता है, यह पिप्पली (Piperaceai-पाइपरेसी) कुल का पादप है। इसकी लता गन्धयुक्त होती है जो भूमि पर फैलती है या दूसरे वृक्षों के सहारे ऊपर उठ जाती है।
आयुर्वेद ग्रन्थों में तो- १. पिप्पली २. गजपिप्पली ३. सैंहली ४. वनपिप्पली भेद से ४ प्रकार की पिप्पली वर्णित है पर व्यवहार में दो ही प्रकार की पिप्पली- बड़ी एवं छोटी ही प्रयोग की जाती है।

बड़ी पिप्पली आजकल मलेशिया, इण्डोनेशिया और सिंगापुर से आयातित होती है और छोटी पिप्पली ‘वन पिप्पली’ है इस देश में अधिक प्राप्त होती है। यह भारत के उष्ण प्रदेशों में तथा मलेशिया, इण्डोनेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका तथा निकोबार द्वीप में उत्पन्न होती है। व्यापारिक प्रयोग के लिए इसकी खेती भी की जाती है। इसका गीला फल गुरु, मधुर रस और शीतवीर्य होता है इसीलिए भाव प्रकाश में इसे पित्त प्रशमनी कहा गया है यही फल जब सूख जाता है तो ‘शुष्क तु प्रकोपिनी’ के अनुसार पित्त प्रकुपित करने वाला हो जाता है।

पिप्पली के गुण- पिप्पली लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, रस-कटु विपाक-मधुर, वीर्य-अनुष्णशीत है। यद्यपि पिप्पली का प्रयोग अनेकों आयुर्वेदिक औषधि निर्माण में होता है पर इससे एक ऐसे विशिष्ट योग का निर्माण भी होता है जो वास्तव में अनेक रोगों में त्वरित और चामत्कारिक परिणाम देता है उसका नाम है- ‘चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली।’

यह इतना शक्तिशाली कल्प है कि क्षयरोग तक के कीटाणुओं का नाश कर देता है। यह एक श्रेष्ठ ‘एण्टीबायोटिक’ (जन्तुघ्न) गुण सम्पन्न है और वात कफ जनित विकारों में उत्तम लाभ देता है अत: प्रसूत ज्वर, शीत ज्वर, कफ ज्वर, जीर्ण शूल (Pain) के साथ कोरोना से बचाव में भी श्रेष्ठ लाभ पहुँचाता है। यह हृदय की शिथिलता में त्वरित लाभ पहुँचाता है।
निर्माण विधि-बड़ी पिप्पली का फाण्ट १०० मि.ली. लेकर छोटी पिप्पली के कपड़छन चूर्ण में मिलाकर ६४ बार (लगातार ८ दिन) तक घुटाई कर छाया में सुखाकर अच्छी तरह चूर्ण कर सुरक्षित रख लें।

मात्रा एवं अनुपान- २५० से ५०० मि.ग्रा. तक दिन में २ बार शहद से या रोगानुसार उचित अनुपान के साथ सेवनीय है।

कुछ रोगों में अनुभूत प्रयोग

१. मूत्रकृच्छ्र- पेशाब में अचानक कड़क या जलन होने पर चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली ५०० मि.ग्रा., यवक्षार ५०० मि.ग्रा. मिलाकर १ कप मीठे दूध के साथ सेवन करने से तुरन्त लाभ मिलता है।

२. शीतज्वर/मलेरिया में- ठण्ड देकर आने वाले शीतज्वर में यदि रक्त परीक्षण में मलेरिया पॉजिटिव की रिपोर्ट आये तो पुटपक्व विषमज्वरान्तक लौह २५० मि.ग्रा., सेंधा नमक २५० मि.ग्रा., शु. हिंगु १२५ मि.ग्रा. अच्छी तरह घोंटकर दिन में ३ बार शहद से चटाने से ३ दिन में मलेरिया ज्वर समाप्त हो जाता है। रक्ताणु (हेमोग्लोबिन) की वृद्धि होती है, दुर्बलता का नाश होता है, भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। यह सैकड़ों बार का हमारा अनुभूत प्रयोग है। इसके विपरीत मलेरिया ज्वर में एलोपैथिक चिकित्सा से क्या-क्या दुष्परिणाम होते हैं यह सर्व विदित है। विषम ज्वर के बाद भी रक्त के लाल कणों का पुनर्निर्माण करने, थकी हुयी प्लीहा को आराम देने और यकृत् क्रिया को उद्दीप्त करने का कार्य यदि कोई योग कर सकता है तो वह है उपर्युक्त योग।

३. फायलेरिया ज्वर में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५०-२५० मि.ग्रा., नित्यानन्द रस २५० मि.ग्रा., आरोग्यवर्द्धिनी वटी २५० मि.ग्रा., प्रवालपिष्टी २५० मि.ग्रा., चन्द्रप्रभा वटी २५० मि.ग्रा. घोंटकर दिन में ३ मात्रा दशमूल क्वाथ और अभयादि क्वाथ के अनुपान से एक वर्ष तक सेवन करने से फायलेरिया ज्वर से तो मुक्ति मिलती ही है साथ ही फायलेरिया से भी मुक्ति मिलती है। यह योग वात-कफ प्रधान श्लीपद में वात-कफ प्रकृति के रोगियों में विशेष उपयोगी है।

४. क्षयरोग में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली ५०० मि.ग्रा., स्वर्णमालती वसंत १२५-२५० मि.ग्रा., वंशलोचन चूर्ण २५० मि.ग्रा., गिलोयघन ५०० मि.ग्रा., प्रवालपिष्टी २५० मि.ग्रा., रुदन्ती चूर्ण २ ग्राम मिलाकर दिन में २-३ बार सेवन करने से क्षयरोग में सत्वर लाभ होता है।

५. हृदय की शिथिलता में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५० मि.ग्रा., अभ्रक भस्म सहस्रपुटी १२५ मि.ग्रा., मोतीपिष्टी १२५ मि.ग्रा., अर्जुनघन २५० मि.ग्रा. मिश्रित कर दिन में २-३ बार सेवन करने से तत्काल सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है।

६. वातार्श में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५० मि.ग्रा., अर्शोघ्नी वटी ५०० मि.ग्रा., शु. भल्लातक १२५ मि.ग्रा. मिलाकर जल के साथ दिन में दो बार ४० दिन तक सेवन करने से बादी बवासीर (वातार्श) समूल नष्ट हो जाता है।

भोजनोपरान्त अभयारिष्ट और द्राक्षासव २०-२० मि.ली. बराबर जल के साथ मिलाकर देने से विशेष लाभ होता है।

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