Vasdei memorial children hospital

Vasdei memorial children hospital It's the one of Best Hospital for pediatric In Azamgarh. It Has best faculty and Experienced Doctors. Must consult there.

11/09/2021
25/03/2019

Tips on How to Heal from "Bad Past Memories that keep haunting you"?

1) Avoid stressful situations whenever possible. Specially avoid Any stressor that can trigger your "past memories"

2) Stop keeping news or stalking those who have given you bad memories. Any good news from their side, can be bad news for you.

3) Distance yourself from negative or toxic individuals.In case you cannot, then learn to keep the distance and adjust to some of their nuances.

4) Have at least one person in your life to whom you can reach out, call, or text whenever you need.

5) Create VENT OUTs - selfies, food photos, social media, singing, cooking, photography, all good.

6) Make alone time for yourself each day. Go inwards, explore your innerself.
You will need a good guide to help you in this step.

7) Set boundaries. You will have trigger points - topics, songs, places that will bring out the bad memories very fast. Be careful of them.

8) Burn the bad energy - I have successfully used this technique with thousands of my patient and share it with you. Before going to bed, light a small incense stick in your room. While lighting it, experience your bad energies being burnt and taken away.

9) Give yourself permission to have bad days. They happen, and sometimes there’s nothing to do about it.

10) Practice gratitude daily. The best way is not just by saying thanks, but also eating healthy and reading motivational posts.

11) Get an expert mind guide. Many times you need guidance for those traumatic memories.

आज आधुनिक मेडीकल साईंस के एक दिग्गज डाक्टर हेनरी ग्रे का जन्मदिवस है, 1827 से 1861 (34 वर्ष) के अपने छोटे से जीवन काल मे...
20/05/2018

आज आधुनिक मेडीकल साईंस के एक दिग्गज डाक्टर हेनरी ग्रे का जन्मदिवस है, 1827 से 1861 (34 वर्ष) के अपने छोटे से जीवन काल में जिसमें सामान्य डाक्टर अपने कैरियर की शैश्वावस्था में होता है, डाक्टर ग्रे ने ऐसा काम कर दिया था कि आधुनिक समय में जो भी कोई चिकित्सक की उपाधि प्राप्त करता है वो किसी ना किसी रूप में डाक्टर ग्रे से छात्रत्व प्राप्त करता है!

1858 (31 वर्ष की आयु में) में शरीर रचना (Human Anatomy जो मेरी नजर में मेडीकल साइंस का सबसे कठीन और दुर्दांत विष्य है) की आज तक की सबसे प्रतिष्ठीत पुस्तक Gray's Illustrated Anatomy का प्रकाशन करवाया! उस समय मानव रचना को समझने के लिए डाक्टर ग्रे ने बारिकी से मृत मरीजो का Dissection किया और अपने मित्र की मदद से आंतरिक अंगो, मासपेशियो, नसो, धमनियो और नाडीयो आदि के बेहतरिन रेखा चित्र बनाए!

आज अपने प्रकाशन के 160 साल बाद भी ये Anatomy की अधिकारीक पुस्तक है!

पुस्तक के प्रकाश के तीसरे वर्ष में ही डाक्टर हेनरी ग्रे अपने भतीजे का इलाज करते करते चिकनपॉक्स के कारण अत्याधिक बिमार हो गए और अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए! वो बच्चा जिसका इन्होने इलाज किया वो ठीक हो गया!

महान डाक्टर ग्रे को श्रद्धा सुमन!

Doctors Day पर एक संदेश अधिकतर चिकित्सक शिशु को दस्त होने पर माँ का दूध बंद करवा देते हैं।किसी शोध पत्र, विश्व स्वास्थ्य...
14/05/2018

Doctors Day पर एक संदेश

अधिकतर चिकित्सक शिशु को दस्त होने पर माँ का दूध बंद करवा देते हैं।

किसी शोध पत्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन और किताब में इस तरह का कोई शोध पत्र नहीं मिला जहाँ दस्त होने पर माँ का दूध बंद कर देने की सलाह हो। वरन साफ़ लिखा है हज़ारों शोध पत्रों और यूनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन,
भारतीय चिकित्सा गाइडलाइन्स में क़ि, माँ का दूध ज़रूर देते रहना चाहिए।

अब इसका तार्किक ,वैज्ञानिक विश्लेषण निम्न है।

1. किसी भी एविडेंस बेस्ड मॉडर्न मेडिसिन (जिसे allopath कहते हैं लोग) के किसी भी recomendation में माँ का दूध बंद करना नहीं कहा गया है। ज़ाहिर है ऐसा लाखों बच्चों में वर्षों तक चले शोधों के बाद है।

ऐसे में चिकित्सकों का माँ का दूढ बंद करने कहना न सिर्फ उस बच्चे, परिवार का गंभीर नुकसान वरन उनके गाँव,मोहल्ले में 'दूध से दस्त होते हैं' की धारणा को स्वयं चिकित्सक द्वारा पुष्ट कर देश की तरक्क़ी और जीडीपी पर अरबों रूपये का बोझ
बढ़ाता है। कैसे??!!!

देखिये, माँ का दूध ही सिर्फ 6माह तक शिशु को दिया जाना चाहिए पानी भी नहीं। माँ का दूध सर्वक्षेष्ठ प्राकृतिक टीकाकारण है जो कि रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर कीटाणुओं और एलर्जी से रक्षा करता है। जीवनपर्यंत।

ऐसे में मात्र 4 दिन के लिए भी मां का दूध बंद करना माँ को दूध आना कम करवा सकता है। क्योंकि दूध न पिलाने पर प्रकृति दूध ख़त्म कर देती है। फिर यह शिशु प्रतिमहीने हज़ारों रूपये के डब्बा बंद या गाय के निम्न गुणवत्ता के दूध पर निर्भर हो जाता है। कम रोगप्रतिरोधक क्षमता, कम बुद्धिमत्ता और कम प्रतिभा मिल पाती है । बीमारियों का खर्च, बोतल दूध का खर्च,कुपोषण
कम स्किल की पीढ़ी बनना देश को बरसों पीछे करता है और अरबों का बोझ प्रतिवर्ष देश पर पड़ता है।

स्वयं विज्ञान को मानने वाले व्यवसाय से जब यह सलाह आती है तो उसका इम्पेक्ट वृहत होता है।

शिशु रोग विशेषज्ञ की इस सलाह की नक़ल अन्य जनरल practitioanar, आयुर्वेद,होमियोपैथ नर्स, बिना डिग्री वाले चिकित्सक , दाई, इत्यादि करने लगते हैं।

मां का दूध बंद करवाने पर भी दस्त ज़ल्दी ठीक नहीं होते।
साथ ही शिशु माँ का दूध न मिलने पर चिड़चिड़ा और कमज़ोर हो जाता है। माँ भी इस एक हफ्ते मे शिशु के चिड़चिड़ेपन से परेशान रहती है। कुल मिलाकर अनगिनत दीर्घकालिक नुकसान के साथ ही कोई तात्कालिक लाभ भी नहीं है।

2. 6 माह से छोटे शिशु में दस्त का मुख्य कारण फिजियोलॉजिकल होता है। फिजियोलॉजिकल अर्थात सामान्य
शारीरिक प्रक्रिया। जिसमे अधिकांशतः किसी इलाज की आवश्यकता नहीं होती । फिजियोलॉजिकल दस्त बच्चे को लेशमात्र भी नुकसान नहीं पंहुचाते भले 2 माह तक रोज़ाना 12 बार भी हों। अतः जो सामान्य है उसे ठीक करने की ज़रूरत भी नहीं होती।

लेकिन दस्त फिजियोलॉजिकल हैं या बीमारी वाले यह निर्णय शिशु रोग विशेषज्ञ ही ले पाते हैं। इसलिए शिशु को दिखाएं भले वे कोई दवा न लिखें मात्र आपको तसल्ली दे दें।

दूसरा सबसे ज़्यादा होने वाला कारन rota virus नाम का
वायरस है। यह पानी की कमी, भर्ती, और शिशु मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। इसमें इलाज़ की ज़रूरत है।

इसके बचाव का टीका अब सरकारी अस्पतालों और प्राइवेट में
उपलब्ध है। जो क़ि 6 सप्ताह के से 4माह के शिशु को पिलवाया जाता है।

प्राइमरी लैक्टोस इनटॉलेरेंस (दूध में मौजूद लैक्टोस नाम की शक्कर)
बेहद रेयर समस्या है।

सेकेंडरी लैक्टोस इनटॉलेरेंस स्वयं 10 दिन में ठीक हो जाता है।
इसलिए माँ का दूध बंद करना एक अवैज्ञानिक सलाह है।

दस्त रोकने दी जाने वाली कुछ दवाएं ज़ैसे लोमोफेन, lamotil
बच्चों में उपयोग करना वर्ज़ित है। बेहद नुकसानदायक हो सकती हैं। आँतों में रुकावट, सुस्ती, गंभीर संक्रमण का शिकार हो सकता है बच्चा।

किंतु फिर भी कुछ चिकित्सक अपने मरीज़ को तुरंत ठीक करने
के मानसिक दबाव में आ कर यह लिखते हैं।

बहुत से माता पिता भी चिकित्सक पर तुरंत ठीक करने का अपेक्षाओं का दबाव बनाते हैं। जबकि वायरल दस्त 3 से 12 दिन ले सकते हैं ठीक होने में।

लेकिन प्रिय चिकित्सको यदि थोड़ा सा समय माता पिता को समझाने में लगाओगे यह वैज्ञानिक पहलू, तो 90 प्रतिशत से ज़्यादा माता पिता धैर्य रखेंगे और आपको छोड़ कर नहीं जाएंगे। वैसे भी स्वयं के और विज्ञान के सच, अपने मरीज़ की भलाई कहीं
ज़्यादा महत्वपूर्ण है बनिस्पत जो अभागे अभिभावक आपको नहीं समझ नहीं पाए इस पर ध्यान देने के।

3. दस्त में कराई जाने वाली स्टूल की जांच ज़्यादातर केसेस में व्यर्थ है, अवैज्ञानिक है एवं अविश्वनीय है।

अंत में सभी साथी चिकित्सकों को Happy doctors Day..

Scientific रूप से updated रहना हमारी जिम्मेदारी है।
देश भक्ति का एक हिस्सा है।

स्वस्थ जन
समृद्ध राष्ट्

जो मित्र , मरीज़, छात्र,पाठक ,शुभचिंतक मुझे doctors Day पर विश करना चाहते हैं वे सिर्फ इतना करें। मेरे इस संदेश को
जितना शेयर करें facebook , whatsapp,blogs पर।

Animal Bites: RabiesरैबिजThe Rabies is one of the disease known from the antiquity and one of the most feared diseases t...
13/05/2018

Animal Bites:
Rabies

रैबिज

The Rabies is one of the disease known from the antiquity and one of the most feared diseases too. There is no cure of the disease and the patient dies a horrible and most painful death. Fortunately, animal bites, if managed appropriately and timely the disease is preventable to a large extent. In this regard the post-exposure treatment of animal bite cases is of prime importance.

Q: Do every animal bite is potential rabid bite and entitled to treatment???
Yes, In rabies endemic country like India, where every animal bite is potentially suspected as a rabid animal bite the treatment should be started immediately.

Type of contact, exposure and recommended post-exposure prophylaxis:

Category 1: Touching or feeding of animal and licks on intact skin'
Rx: None, but if it can be proven beyond doubts that skin was intact and animal healthy.

Category II: Nibbling of uncovered skin, Minor scratches or abrasions without Bleeding.
Rx: 1. Wound Management
2. Antirabies-vaccine

category III: Transdermal bites or scratches, licks on broken skin, contamination of mucous membranes with animal saliva

Rx:-1. Wound management
2. Rabies immuniglobulin
3. Anti-rabies vaccine.

Note: it is noteworthy that now, the WHO has also revised the categories and anybite (I stress any) is included in cat III (previously cat III included bites on hands and face)

Q: my animal is vaccinated, should i go for treatment.??
yes, even if animal is vaccinated, Rx is must because vaccination failure do occur.

Q: It was a proved bite, should i go for vaccination???
Ans: again yes. The treatment should be started immediately after the bite. The treatment may be modified if animal involved (dog or cat) remains healthy throughout the observation period of 10 days by converting post-exposure prophylaxis to pre-exposure vaccination by skipping the vaccine dose on day 14 and administering it on day 28. The observation period is valid for dogs and cats only and not for other animals.

Bite by wild animals: Bite by all wild animals should be treated as category III exposure.

Q: I am pregnant, should i go for it???
Ans: Yes, you must, Pregnancy, lactation, infancy, old age and concurrent illness are no contraindications for rabies prophylaxis. it takes preference over any other consideration being a life saving procedure. Rabies vaccine does not have any adverse effect on fetus, mother-to-be and the course of pregnancy.

Management of Animal Bite:
1. Management of wound: Clean with water, soap or detergent and clean thoroughly at least for 10 minutes under running water. thereafter any available antseptic viz betadine, soframycin, dettol etc.
Note: victim should not be deprived of the benefit of wound toilet as long as there is an unhealed wound which can be washed even if the patient reports days late.

2. Local infiltration of rabies immunoglobulin: in all bites it should be infilterated in depth and in and around the wound to inactivate locally present viruses.

it is of 2 types : 1) Horse serum derived (EQUIRAB) dose is 40units/kg, (moximun 3000units) given after sensitivity check and may cause allergic response, although these days it is very purified and there is very low chance of same but caution is warrented.
2) human derived:- very safe but very costly, dose is 20units/kg.(maximum 1500units)

it is injected in and around the wound, and remaining can be injected intramuscularly on a separate site than the vaccine.

If by chance the immunoglobulin is not available, greater emphasis on wound toileting and vaccine alone should be started, on first day two doses of vaccine are given one each on each shoulder and immunoglobulin must be injected as soon as it can be made possible (upto 7 days , after 7 days vaccination itself produce antibodies).

3. Vaccines: schedule is 0, 3, 7, 14 and 28 , another vaccine at 90 days should also be given. it must be injected on deltoid(shouders) and must not be on hips. in infants it can be injected on anterolateral aspect of thigh.

Q. What about the intradermal vaccines???
Ans: it is found that intra dermal vaccines produce quick response and amount of vaccine injected is less. but the technique is difficult and vaccine is to be injected on multiple sites. (if someone require further detail please contact).

Q: How to identify a patient with Rabies???
Ans: Rabid patient is restless, apprehensive, frightens with voice, light, sudden gust of wind (aerophobia), noise and sight of water (hydrophobia). He is thirsty but cannot drink. In late stages the neck extends and curves and patient body is tightened and in spasm.

Q: What is pre-exposure prophylaxis???
Ans: Given to high risk persons like veterinary doctors, dog and cat breeders etc. here 3doses of vaccines are given before the bite on 0, 7, 21/28 and booster when antibodies titre falls beow 0.5 units/ml. These people if bitten need only 2 doses on 0 and 3 and no anti rabies serum on immunoglobulin :)

So, Now, next time you encounter someone who has been bitten dont get confused what to do, just proceed with 1,2,3 and you are done. Please offer Immunoglobulin + vaccination to everyone however minor the wound is (virus donot need big wounds to enter), domestic or wild animal and immunised or unimmunised,,,, because rabies once occurred cannot be cured...

Stay happy, stay cool and stay Healthy......

मलेरिया:मलेरिया एक कुख्यात बुखार का नाम है जो मच्छर के काटने से होता है, ये हर साल 6लाख 50 हजार से ज्यादा लोगो की मौत का...
03/05/2018

मलेरिया:

मलेरिया एक कुख्यात बुखार का नाम है जो मच्छर के काटने से होता है, ये हर साल 6लाख 50 हजार से ज्यादा लोगो की मौत का कारण है! भारत देश के ज्यादातर इलाको में ये एक महामारी है!

लक्षण:
मध्यम से तेज बुखार
कंपकपी
पसीना
सिरदर्द
दस्त
पिलिया

कैसे फैलता है मलेरिया :
1. रोगी से मच्छर और मच्छर से स्वस्थ मनुष्य को
2. माँ से होने वाले बच्चे को

बच्चो को होने वाल मलेरिया:
बच्चो की मेलेरिया से लडने की क्षमता बडे लोगो की बजाय बहुत कम होती है.... जिससे यदि मलेरिया बच्चे को हो तो वो अधिक गंभीर हो सकता है... मलेरिया से होने वाली मृत्यु के शिकार सबसे ज्यादा 5 वर्ष तक के बच्चे होते हैं (लगभग 80%)

अधिकतर मामलो में मलेरिया से होने वाले मृत्यु निमनलिखित कारणों से होती है,
1. दिमाग का मलेरिया: इससे दिमाग में सूजन और कोमा की स्थिति उतपन्न होती है
2. एलजिड मलेरिया: मलेरिया के कारण बल्डप्रेसर कम हो जाना और खून का दौरा कम होने से शरीर के अव्यवो का फेल हो जाना
3. मलेरिया के साथ बल्ड शूगर कम होना
4. मलेरिया के साथ पिलिया और लीवर का फेल होना
5. मलेरिया के साथ सांस लेने की दिक्कत (फेफडो में पानी भरना)
7. मलेरिया के साथ खून की कमी

मलेरिया पैदा करने वाले परजीवि कोनसे होते है
नाम: प्लाजमोडीयम
चार मुख्य प्रजातिया: फैल्सिपैरम : अधिकतर मामलो में खतरनाक और जानलेवा मलेरिया का कारक
वाईवैक्स: बार बार होने वाला मलेरिया

इसके अलावा ovale तथ malariae भी हैं जो भारत में अपेक्षाकृत कम पाए जाते हैं

बचाव:
मच्छरों से बचाव
अपने चारो तरफ से कूडे नमी और सीलन भरी गंदगी को नष्ट करे, जमा हुएपानी, कुलर में भरे पानी, पंकचर देखने के टायर टयूब, जोहड और तालाबो के पानी का ट्रीटमेंट या निकास अति आवस्यक है!
मच्छर भगाने वाले अगरबत्ती, लोशन आदि का प्रयोग
अंग प्रदर्शन कम करे और पूरे शरीर को ढकने वाले कपडे
यदि महोल्ले में मलेरिया फैला है तो विशेष तौर पर ध्यान दे और दवाई आदि का छिडकाव जरूरी है

मच्छरदानी का प्रयोग सुदर, सस्ता टीकाउ उपाय है

आम तौर पर सरकारी कार्यक्रम अनुसार हर बुखार वाले आदमी के बुखार को मलेरिया मान कर उसकी खून की जांच की जाती है और उसे मलेरिया की दवा दे दी जाती है... यदि जांच में मलेरिया आए तो उसे पूरा कोर्स दिया जाता है!

वाईवेक्स मलेरिया के रोगी को लीवर में पडे हुए hypnozoits (बीज रूप) को खत्म करने के लिए radical treatment भी देना होता है किंतु उससे पहले G6PDनामका एक बल्ड रिपोर्ट चाहिए होता है

वैक्सीन: अब तक इसका कोई वैक्सीन नही

जांच: बल्ड टैस्ट के द्वारा, कार्ड टैस्ट भी उपलब्धहै

ईलाज: चिकित्सक की देखरेख में!

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आपका
डाक्टर वीरेन्द्र सिंह
MBBS, MD, PFCCS, PGD (neonatology)
वरिष्ठ शिशु एवम् बाल रोग चिकित्सक
वासदेई हस्पताल
ICICI बैंक के सामने
प्रताप डाईगनोसिस के बगल में
सिविल लाईंस
आजमगढ

01/05/2018

/ #थैलेसीमिया

थैलेसीमिया शरीर में खून बनने की प्रक्रिया की विकृति से संबंधित एक अनुवांसिक विकार है, जिससे शरीर में हिमोग्लोबिन (Hb) तथा लाल रक्त जो सामान्य रूप से आपके शरीर में कम हीमोग्लोबिन और कम लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाती है। हीमोग्लोबिन हमारे शरीर में प्राकृतिक रूप से बनने वाला एक लाल रंग का यौगिक होता है जो आक्सीजन को फेफडो से अन्य अंगो तक ले कर जाता है।

प्रश्न :थैलेसीमियाँ रोग कितने प्रकार का होता है?
उत्तर: सामानयत: ये रोग 2 प्रकार का होता है, एल्फा थैलेसीमियाँ तथा बीटा थैलेसीमियाँ। लक्षण एवम् उपचार की दृष्टी से प्रत्येक थैलेसीमियाँ को फिर से लक्षणो की उग्रता के हिसाब से तीन प्रकारो में बाँटा 7जाता है!
उदाहरण के लिए:
बीटा थैलेसीमियाँ आमतौर पर 3 पिरकार के होते हैं:
बीटा थैलेसीमियाँ माईनर (Minor)
बीटा थैलेसीमियाँ इंटरमीडिएट(Intermediate)
बीटा थैलेसीमियाँ मेजर (Major)

प्रश्न :थैलेसीमियाँ के लक्षण क्या हैं?

उत्तर:
थकान
दुर्बलता
बच्चे की रंगत पीली ( Pale) या सफेद पडना
चेहरे की हड्डी विकृति तथा गाल माथे तथा जबडे की हड्डी का असामान्य रूप से फूलना
धीमी वृद्धि
पेट की सूजन (पेट में लीवर और तिल्ली का बढना)
गहरे रंग की पेशाब
पित्त की थैली में पत्थरी

आम तौर पर थैलेसीमियाँ माईनर वाले लोग नोर्मल होतें हैं। किंतु ये Defected gene के वाहक होते हैं तथ ऐसे किसी वाहक का संसर्ग दुसरे वाहक से होने पर संतान को थैलेसीमियाँ होने की संभावना बढ जाती है।

इंटरमीडिएट वाले रोगी आमतौर पर सामान्य रहते है किंतु बिमारी के समय इन रोगियो को बाहर से खून चढाना सकता है!

मेजर वाले रोगी ही आमतौर पर असली थैलेसीमियाँ रोग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस बीमारी में खून बनने की प्रक्रिया पूरी तरह से खराब होती है और बच्चे को बाहरी खून के बिना जीवित रखना संभव नही है, इन बच्चो को जीवन पर्यंत समय समय पर खून चढाना पडता है।
अपवादों को छोड़ जीवन के पहले छह माह बच्चे को तकलीफ कम होती है क्योकि उस समय शरीर में दूसरी तरह का हिमोग्लोबिन (गर्भ हिमोग्लोबिन HbF) होता है, किंतु छह महिने के बाद खून बहुत कम हो जाता है और बच्चे का बार बार बाहर से खून देना पडता है।

प्रश्न :डॉक्टर को कब दिखाएँ?
उत्तर: आमतौर पर टीकाकरण के साथ ही डाक्टर बच्चे की जाँच करते हैं, तथा उसी समय गिरता हुआ हिमोग्लोबिन का स्तर तथा सामान्य से बडे लीवर तथा तिल्ली इस रोग का प्रथम लक्षणहोतें हैं। ये रोग उन परिवारों में अधिक होता है जिनमें आपसी परिवार में ही शादियाँ हो जाती हैं। ये रोग पूरे भारत में पाया जाता है। किसी भी समय उपरोक्त लक्षणों में से कोई लक्षण पाए जाने पर या किसी परिवार के किसी सदस्य में इस रोग की पुष्टी होने पर डाक्टर से मिलना फायदेमंद हो सकता है।

प्रश्न :क्या निरोगी दिखने वाले माता पिता के बच्चो को थैलेसीमियाँ हो सकता है?
उत्तर:बिलकुल हो सकता है, इसका कारण है आमतौर पर माईनर वाले रोगियों में लक्षणों का ना होना किंतु उनके शरीर में विकृति होती है, ऐसे गुणसूत्रो वाला पुरूष जब ऐसी ही महिला के सम्पर्क में आता है तो संतान को इंटरमीडिएट या मेजर थैलेसीमियाँ होने की संभावनाएँ बढ जाती है।

प्रश्न : इस रोग को पहचानने के लिए कोई जाँच?
उत्तर: चिकित्सक द्वारा किया गया निरिक्षण, मरीज की हिस्ट्री तथा उचित जाँच से रोग की पहचान होती है। कई प्रकार के टैस्ट होते हैं किंतु हिमोगेलोबिन ईलैक्ट्रोफोरेसिस नामका टैस्ट बीटा थैलेसीमियाँ लिए Gold standard है। एल्फ थैलेसीमियाँके लिए जटील जैनेटीक टैस्ट की जरूरत पड सकती है। जिस बच्चे में थैलेसीमियाँ पाया जाता है उसके माता पिता तथा भाई बहनों की जाँच भी होनी चाहिए ताकी परिवार में वाहको का पता चले। जहाँ तक संभव हो एक वाहक का रिश्ता दूसरे वाहक या मरीज से नहीं जोडना चाहिए।

ईलाज:

1. अस्थि मज्जा प्रतिरोपण: Bone marrow transplant: ये ईलाज बच्चे को पूरी तरह से ठीक कर सकता है, जितना जल्दी हो उतना बेहतर है। किंतु करने की प्रक्रिया जटील, लम्बी और मंहगी हैं आम तौर पर 15 से 20 लाख का खर्च आता है तथा केवल चुनिंदा केन्द्रो पर उपलब्ध है तथा हर रोगी पर इसे करना संभव भी नहीं।

2. Hypertransfusion and Iron Chelation: मतलब बच्चे को बार बार खून चढाना और किसी भी स्थिति में उसका हिमोग्लोबिन का स्तर 7g/dL से कम नही होना चाहिए (10 g/dL आदर्श स्तर है). इसके साथ साथ शरीर में बार बार खून चढाने से Iron का स्तर सामान्य से कई गुना बढ जाता और शरीर को नुकसान करता है, heart MRI द्वारा iron overload की जाँच करना Gold standard है किंतु इसे करना हर जगह संभव नही होता अत: Serum Ferritin नाम के एक सरल टैस्ट द्वारा आमतौर पर iron के स्तर पर नजर रखी जाती है।
शरीर से Iron overload को कम करने के लिए Chelation थैरेपि जो मुँह से खने वाली अथवा टीके द्वारा देने वाली दवाओं द्वारा की जाती है, को काम में लाया जाता है। Deferasirox, Deferiprone, Deferoxamine नामकी दवाएँ Chelation में प्रयोग आती हैं। दवाओं की मात्रा तथा प्रकार चिकित्सक तय करेंगे।
इसके अलावा folic acid तथा कैल्सियम की दवाएँ भी थैलेसीमियाँ मेजर के रोगियों को निरंतर देनी चाहिए।
3. तिल्ली को निकाल देना: सर्जरी द्वारा डाक्टर की सलाह से तिल्ली को निकालना पड सकता है, ऐसा आमतौर पर तब किया जाता है जब खून चढाने के बीच का समय बहुत कम हो जाए।
4. जीन थैरेपी: इस पर अभी शोध चल रहा है।

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आपका
डाक्टर वीरेन्द्र सिंह
वासदेई मेमोरियल होस्पिटल
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आजमगढ (उत्तर प्रदेश)

अस्पताल फोन: 8115806666

01/05/2018

चिकित्सकीय और सुधारात्मक जबड़े की सर्जरी

आपके दांत का महत्व: मुंह-शरीर कनेक्शन
जब हम अपने शरीर और अपने आप का ख्याल रखते हैं तो हम अपने दांतों के महत्व के बारे में कभी नहीं सोचते। दुर्भाग्य से यह मदद नहीं करता है कि अधिकांश बीमा कंपनियां आपके स्वास्थ्य कवरेज के साथ शामिल चिकित्सकीय कवरेज प्रदान नहीं करती हैं। लेकिन आपके दांत आपके शरीर से जुड़ रहे हैं। वे चबाने और पाचन के साथ मदद करते हैं, वे बोलने, मुस्कुराहट और उपस्थिति के लिए महत्वपूर्ण हैं।

एक स्वस्थ मुंह और स्वस्थ शरीर के बीच एक संबंध है।

रक्तस्राव मसूड़ों, दृश्य रूट सतहों और ढीले दांत किसी भी उम्र में सामान्य नहीं होते हैं और वे पीरियडोंन्टल बीमारी नामक संक्रमण के लक्षण हैं।

हाल के अध्ययन आपके मुंह, आपके दिल और फेफड़ों में संक्रमण के बीच एक लिंक दिखाते हैं, जिससे हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और श्वसन रोग जैसी गंभीर चिकित्सा समस्याएं खराब हो रही हैं।

कई सिद्धांत आपके मुंह में बैक्टीरिया को जोड़ते हैं जो हृदय रक्त वाहिकाओं में फैटी प्लेक में पाए जाने वाले जीवाणुओं के साथ बनाते हैं।

एक और संभावना यह है कि पीरियडोंन्टल बीमारी के कारण होने वाली सूजन पट्टिका का निर्माण करती है जो धमनियों की सूजन में योगदान दे सकती है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि इलाज न किए गए पीरियडोंटल बीमारी वाले लोग कोरोनरी धमनी रोग से ग्रस्त होने की संभावना है, फिर पीरियडोंन्टल बीमारी के बिना।

अंत में आपके मौखिक स्वास्थ्य आपके समग्र स्वास्थ्य और इसके विपरीत के लिए महत्वपूर्ण है।

आपके दांत मरम्मत या प्रतिस्थापित करने के लिए कभी भी बूढ़े नहीं होते हैं।

दांतों में किसी भी प्रकार की समस्या होने पर आप हमें सम्पर्क कर सकते हैं।
कौन सी जांच कब करवानी है ये डाक्टर तय करेंगे!

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Dr. A.N.Yadav,BDS,MDS( ORAL AND MAXILLOFACIAL SURGEON)
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हमारे  #उल्टी_दस्त वाले आर्टीकल को तीन बडे आॅनलाईन पोर्टलस ने जगह दी, इसके लिए मित्रो से मिले प्यार और दुलार के लिए दिल ...
16/04/2018

हमारे #उल्टी_दस्त वाले आर्टीकल को तीन बडे आॅनलाईन पोर्टलस ने जगह दी, इसके लिए मित्रो से मिले प्यार और दुलार के लिए दिल से शुक्र गुजार हूँ, मात्र एक महिने में हमारी likes पूरे पूर्वांचल तक पहुची, लखनउ और गौरखपुर जैसे बडे शहरो से मरीज हमारी दी गई जानकारियो से फयदा उठा कर फोन द्वारा धन्यवाद दे रहे हैं, इसके लिए मैं सभी मित्रो का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ! विशेष तौर पर Drdigvijay Singh Rathore जी को जो पूर्वांचल युनिवर्सिटी जौनपुर में सह आचार्य हैं जिनके प्रयासो के कारण मिडीयाँ हमें जगह दे पाई! ..

आपका प्यार और हमारा प्रयास... हम अग्रसर है एक बेहतर कल की तरफ.... स्वस्थ आजमगढ, स्वस्थ उत्तरप्रदेश, स्वस्थ भारत!

1. * वासदेई अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डा वीरेन्द्र सिंह से बदलते मौसम में बच्चों के लिए दी सलाह | *

http://www.nayasabera.com/2018/04/azamgarh-nayasabera.html

2. * वासदेई अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डा वीरेन्द्र सिंह से बदलते मौसम में बच्चों के लिए दी सलाह | *

http://www.nayasabera.com/2018/04/azamgarh-nayasabera.html

3. http://goodnewsbharat.com/बदलते-मौसम-में-बच्चों-को-ह/

बदलते मौसम में बच्चों को होने वाली प्रमुख बीमारियों से कैसे बचाए ?पढ़िए डाक्टर की सलाह Bharat Good News 2 mins ago 1 Views आज़मगढ़ में सिवि.....

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