खुशियों का राज

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02/05/2026

सबसे पहले अपना ख्याल रखो
अति सर्वत्र वर्जयते

29/03/2026

होमियोपैथी में इलाज का मतलब सिर्फ दर्द दबाना नहीं, बल्कि उसकी जड़ तक पहुँचना है। हर इंसान की मिट्टी, स्वभाव और अनुभव अलग होते हैं, इसलिए दवा भी अलग होती है। जब जड़ समझ में आती है, तभी स्थायी राहत मिलती है, वरना बीमारी बार-बार लौटती रहती है।

27/03/2026

जब एक घर जलता है,
पूरा समाज राख होता है।

ये मत समझो कि ये आग सिर्फ़ किसी एक की दीवारों तक सीमित है,
ये वो चिंगारी है जो खामोशियों से हवा पाकर हर दरवाज़े तक पहुँचती है।

आज अगर तुम खामोश हो,
तो याद रखना — कल ये आग तुम्हारे आँगन का रास्ता भी जान जाएगी।

समाज तब तक सुरक्षित नहीं हो सकता,
जब तक हर बेटी, हर औरत, हर इंसान सुरक्षित न हो।

अब वक्त है डरने का नहीं,
वक्त है आवाज़ उठाने का।

✊ उठो, बोलो, और इस आग को यहीं बुझाओ।



15/03/2026

क्या आप भी हैं हींग के शौक़ीन, तो सावधान....

15/03/2026

उस मोटे भैसे को जवाब है ये मेरा रैप
हाल ही में बादशाह के रिलीज़ हुए एक गाने में जिस तरह से महिलाओं के लिए अपमानजनक शब्दों और घटिया सोच को दिखाया गया है, वह सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज की मानसिकता को बिगाड़ने का काम करता है।

संगीत और कला का उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाना।
लड़कियों को वस्तु की तरह पेश करना, उन्हें नीचा दिखाना या उनका मज़ाक बनाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हम मनोरंजन के नाम पर ऐसी भाषा और सोच को सामान्य नहीं होने देंगे।

समाज के हर जिम्मेदार व्यक्ति से निवेदन है कि ऐसी सामग्री का विरोध करें और कलाकारों को यह संदेश दें कि लोकप्रियता के लिए सम्मान और मर्यादा को कुचलना स्वीकार नहीं है।

होली पर सिर्फ रंग नहीं, संस्कार भी उड़ें 🌸🙏सावधानी में समझदारी – केमिकल रंगों से बचें, आँख-त्वचा की सुरक्षा करें, ज़बरदस...
04/03/2026

होली पर सिर्फ रंग नहीं, संस्कार भी उड़ें 🌸

🙏सावधानी में समझदारी – केमिकल रंगों से बचें, आँख-त्वचा की सुरक्षा करें, ज़बरदस्ती किसी पर रंग न डालें।
🙏नैतिकता में मर्यादा – “बुरा न मानो होली है” का अर्थ यह नहीं कि हम सीमाएँ तोड़ दें। सम्मान, विशेषकर महिलाओं और बुजुर्गों का, सर्वोपरि रहे।
🙏समाज में सद्भाव – होली का सच्चा रंग तब है जब पड़ोसी, मित्र और परिवार पुराने मनमुटाव भूलकर गले मिलें।
🙏 खुशियों में सादगी – पानी और संसाधनों की बर्बादी न करें। प्रकृति भी हमारी ही है।

इस होली रंग से पहले रिश्तों को रंगिए,
आवाज़ से पहले हृदय को सजाइए,
और उत्सव से पहले चरित्र को ऊँचा उठाइए।

याद रखिए — असली गुलाल वह है जो चेहरे पर नहीं, दिल पर चढ़े।

आप सभी को सुरक्षित, मर्यादित और आनंदमय होली की शुभकामनाएँ

आपका.... गिरिराज

#सद्भाव #संस्कार

 ी_परछाइयाँक्रमशः आगे अभी भी जज़ साहब के आने में थोड़ा वक्त था, इसलिए अभय फिर से कोर्ट के सीढ़ियों पर जा के बैठ गया। समय व्...
27/02/2026

ी_परछाइयाँ

क्रमशः आगे

अभी भी जज़ साहब के आने में थोड़ा वक्त था, इसलिए अभय फिर से कोर्ट के सीढ़ियों पर जा के बैठ गया। समय व्यतित करने के लिए अतीत से बेहतर कुछ समझ नहीं आ रहा था।...

घर कभी सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं होता,
वो हँसी की आवाज़ों, रसोई की खुशबू और शाम की चाय में घुली बातों से बनता है।

अभय और नंदिता का घर भी ऐसा ही था।
आठ साल पहले जब नंदिता दुल्हन बनकर आई थी, तो अभय ने हँसते हुए कहा था —
“देखो, यह घर अब तुम्हारी हँसी से चलेगा।”
नंदिता ने झेंपते हुए जवाब दिया था —
“और आपकी ज़िद से रुकेगा भी नहीं।”
वो दिन जैसे किसी और जन्म के थे।

धीरे-धीरे ज़िंदगी की रफ्तार तेज़ हुई।
किस्तों का बोझ, बच्चों की फीस, ऑफिस की टारगेट मीटिंग्स…
और उन्हीं सब के बीच रिश्ते की डोर पतली होने लगी।

बरसात की एक रात मोबाइल की स्क्रीन बार-बार बिजली सी चमक रही थी।
नंदिता पानी लेने उठी तो देखा —
“रिया ऑफिस”
उसने कुछ नहीं कहा, बस दिल में एक लकीर खिंच गई।
सुबह उसने सहज स्वर में पूछा —
“रिया कौन है?”
अभय ने जल्दी में जूते पहनते हुए कहा —
“ऑफिस में नई प्रोजेक्ट हेड है, काम की बात है।”
“काम रात के ग्यारह बजे?”
“नंदिता, हर बात का बतंगड़ मत बनाओ।”
बस यही वाक्य तीर बन गया।
“हर बात का बतंगड़…”
उस दिन से नंदिता ने महसूस किया —
अब उसे समझाने की जगह, समझाने से बचा जा रहा है।

दिन बीतते गए।
अभय देर से आने लगा।
नंदिता चुप रहने लगी।
कहते हैं —
“शक का कीड़ा लग जाए तो दूध में भी धुआँ दिखता है।”

एक रात नंदिता ने फोन चेक कर लिया।
साधारण ऑफिस चैट थी, पर उसके मन में हर शब्द जहर बन गया।
“तुमने मेरा फोन क्यों देखा?” अभय की आवाज़ काँपी।
“क्योंकि तुमने मुझे भरोसा देना बंद कर दिया!” नंदिता चीख पड़ी।....

बच्चे दरवाज़े के पीछे सिमट गए।
उस रात पहली बार घर की दीवारों ने वो सुना,
जो कभी सुनने के लिए नहीं बनी थीं।

नंदिता रोते हुए बोली —
“मैंने तुम्हारे लिए अपना शहर छोड़ा, सपने छोड़े… और तुम?”
अभय ने थके स्वर में कहा —
“मैं दिन-रात काम कर रहा हूँ, ताकि ये घर चले… और तुम मुझे कटघरे में खड़ा कर रही हो।”
दोनों सही थे।
और दोनों गलत।

शक अब परछाईं नहीं रहा था,
वो दीवार बन चुका था।

“रिश्तों में दरार जब पड़ती है,
तो आवाज़ नहीं आती,
बस सुकून चटक कर टूट जाता है।”

शेष जल्दी ही....
✍️...आपका गिरिराज

आज अदालत की सीढ़ियों पर खड़ा अभय अपने ही अतीत में उतर रहा था।अदालत की सीढ़ियाँ हमेशा ठंडी क्यों लगती हैं?शायद इसलिए कि व...
26/02/2026

आज अदालत की सीढ़ियों पर खड़ा अभय अपने ही अतीत में उतर रहा था।
अदालत की सीढ़ियाँ हमेशा ठंडी क्यों लगती हैं?
शायद इसलिए कि वहाँ फैसले गर्म नहीं होते, ठंडे दिमाग से लिखे जाते हैं।
अभय उसी ठंडी सीढ़ी पर बैठा था। हाथ में तलाक की फाइल थी। नाम साफ़ लिखा था —
अभय वर्सेस नंदिता।
वो कागज़ नहीं था… आठ साल का इतिहास था।
भीड़ शोर कर रही थी, वकील बहस कर रहे थे, पर उसके भीतर अजीब सा सन्नाटा था।
जज की आवाज़ अभी-अभी कानों में गूँजी थी —
“छह महीने का समय दिया जाता है।”
छह महीने…
अभय ने सिर झुका लिया।
अचानक उसे लगा जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे पीछे खींच रहा हो —
सालों पीछे।..............

“तुम्हें पता है, मैंने तुम्हारे लिए कितना लड़ा था?”

वो दिन उसे साफ़ याद है जब उसने पहली बार नंदिता को देखा था।
मामा की बेटी की शादी थी। भीड़ में लाल साड़ी में एक लड़की खड़ी थी — आँखों में शांति, चेहरे पर सादगी।
उसने दोस्त से धीरे से पूछा —
“कौन है वो?”
“नंदिता। मास्टरजी की बेटी।”
अभय ने बस एक बार देखा… और दिल ने फैसला कर लिया।
कहते हैं —
“इश्क़ की शुरुआत आँखों से होती है,
पर उसे निभाने के लिए हौसला चाहिए।”
हौसला उसके पास था।
पर रास्ता आसान नहीं था।
घर आकर उसने माँ से कहा —
“मुझे वही लड़की पसंद है।”
माँ ने चौंककर देखा —
“पहले कभी किसी के लिए ज़िद नहीं की, आज इतनी जल्दी?”
“माँ, वो अलग है।”
पिता ने अखबार मोड़ते हुए कहा —
“उनका परिवार हमसे अलग है। उनकी हैसियत कम है। रिश्ते बराबरी में होते हैं।”
ये पहला पत्थर था जो उसके रास्ते में रखा गया।
पर अभय ने ठान लिया था।
वो अगले ही हफ्ते मास्टरजी के घर पहुँचा।
छोटा सा घर, साफ-सुथरा आँगन, दीवार पर भगवान की तस्वीर।
मास्टरजी ने चाय रखते हुए कहा —
“बेटा, हमने तो सोचा भी नहीं था कि तुम लोग रिश्ता लेकर आओगे।”
अभय ने सीधे कहा —
“मैं दहेज नहीं लूँगा। बस नंदिता चाहिए।”
मास्टरजी की आँखें भर आईं।
पर कहानी इतनी सरल कहाँ थी।
परिवार की दीवारें
घर लौटते ही विरोध शुरू हो गया।
चाची बोलीं —
“आजकल के लड़के भावुक हो जाते हैं।”
ताऊजी ने कहा —
“कल को ताने सुनने पड़ेंगे कि कमज़ोर घर से बहू लाई।”
अभय ने पहली बार ऊँची आवाज़ में कहा —
“कमज़ोर घर नहीं है वो। कमज़ोर सोच है हमारी।”
माँ रो पड़ीं —
“तू हमारे खिलाफ खड़ा हो जाएगा?”
अभय चुप हो गया।
उसने माँ के आँसू देखे, पर दिल की आवाज़ दबा नहीं पाया।
कई हफ्ते तक घर में बात बंद रही।
खाना खामोशी में होता, नज़रें चुराई जातीं।
पर अभय हर रविवार मास्टरजी के घर जाता।
कभी किताब लेकर, कभी मिठाई।
एक दिन नंदिता ने धीमे से पूछा —
“आप इतना क्यों कर रहे हैं?”
अभय मुस्कुराया —
“क्योंकि मैं आधे रास्ते से लौटना नहीं जानता।”
आर्थिक परीक्षा
उसी दौरान अभय की नौकरी में संकट आ गया।
प्रोजेक्ट बंद हुआ, वेतन रुका।
पिता ने ताना मारा —
“पहले अपनी कमाई पक्की कर ले, फिर सपने देखना।”
अभय ने हार नहीं मानी।
रात में फ्रीलांस काम किया, दिन में इंटरव्यू दिए।
तीन महीने बाद नई नौकरी मिली — बेहतर वेतन के साथ।
उसने सबसे पहले क्या किया?
मास्टरजी के घर जाकर मिठाई रखी और कहा —
“अब कोई बहाना नहीं है।”
नंदिता का डर
शादी से पहले एक दिन नंदिता ने उससे कहा —
“अगर कभी मैं आपको बोझ लगूँ तो…?”
अभय ने बीच में ही रोक दिया —
“तुम मेरी ज़िम्मेदारी नहीं, मेरी पसंद हो।”
वो मुस्कुरा दी।
उस मुस्कान के लिए ही तो उसने इतना संघर्ष किया था।
शादी का दिन
बारात जब पहुँची तो बारिश शुरू हो गई।
लोग बोले —
“अपशगुन है।”
अभय ने हँसकर कहा —
“बारिश नहीं, दुआ बरस रही है।”
फेरे लेते समय उसने मन ही मन वादा किया था —
“हर हाल में साथ निभाऊँगा।”
आज अदालत की सीढ़ियों पर बैठा वही आदमी सोच रहा था —
कहाँ खो गया वो वादा?
वर्तमान में वापसी
अचानक वकील ने कंधे पर हाथ रखा —
“चलना है?”
अभय ने फाइल कसकर पकड़ी।
उसकी आँखों में नमी थी।
“मैंने जिसके लिए दुनिया से लड़ा…
क्या आज उससे हार मान लूँ?”
हवा का झोंका आया।
उसे वो पहली बारिश याद आई —
जब उसने कहा था, “दुआ बरस रही है।”
शायद आज भी आसमान इशारा दे रहा था।
अभय धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
दिल में एक सवाल था —
क्या अभी भी देर नहीं हुई?
लेकिन इस बार देर था जज़ साब के आने में फिर वो उन्ही यादों में दुबारा खो गया जहां से वो आना नहीं चाहता था।

क्रमशः......।

23/02/2026

देश का मान सम्मान बढ़ाने का मौका बहुत काम मिलता है। जब भी मिले जी भर के इसका फायदा उठाना चाहिए।
लेकिन देश की इज्जत मिट्टी में मिलाने की कला चाइनीज़ कुत्ते और भारतीय कुछ गधो से सीख सकते है.

हफ्ते में एक दिन खुद से मिलने निकलो…काम की भीड़ से मन को थोड़ा निकालो…दोस्तों संग हँसी की दवा पियो…थाली में स्वाद, दिल म...
17/02/2026

हफ्ते में एक दिन खुद से मिलने निकलो…
काम की भीड़ से मन को थोड़ा निकालो…
दोस्तों संग हँसी की दवा पियो…
थाली में स्वाद, दिल में सुकून भरो…
तनाव को कहो — आज छुट्टी है…
मोबाइल रखो नीचे, ज़िंदगी ऊपर है…
थक गया हो मन तो आराम भी इलाज है…
खुद को वक्त देना सबसे बड़ी परहेज़ है…
आज मुस्कराओ बिना वजह…
कल दुनिया जीतने की ताक़त मिलेगी…

सप्ताह में एक दिन जरूर निकालो — अपने दिमाग और मन के लिए।
काम रोज रहेगा, जिम्मेदारियाँ भी।
लेकिन अगर आप ही टूट गए तो सब अधूरा रह जाएगा।
दोस्तों के साथ बैठो।
हँसो।
खाओ।
खिलाओ।
पुरानी यादें ताज़ा करो।
मोबाइल साइड में रखो।
दिल से बात करो।
थोड़ा हल्का बनो।
क्योंकि जीवन सिर्फ नौकरी नहीं है।
सिर्फ पैसा नहीं है।
सिर्फ बीवी-बच्चे और परिवार की चिंता नहीं है।
सिर्फ पॉलिटिक्स और बहस नहीं है।
जीवन है — साँस लेने का नाम।
जीवन है — मुस्कुराने का नाम।
खुद को रिचार्ज करो।
और फिर नई ताकत से आगे बढ़ो।

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