26/02/2026
आज अदालत की सीढ़ियों पर खड़ा अभय अपने ही अतीत में उतर रहा था।
अदालत की सीढ़ियाँ हमेशा ठंडी क्यों लगती हैं?
शायद इसलिए कि वहाँ फैसले गर्म नहीं होते, ठंडे दिमाग से लिखे जाते हैं।
अभय उसी ठंडी सीढ़ी पर बैठा था। हाथ में तलाक की फाइल थी। नाम साफ़ लिखा था —
अभय वर्सेस नंदिता।
वो कागज़ नहीं था… आठ साल का इतिहास था।
भीड़ शोर कर रही थी, वकील बहस कर रहे थे, पर उसके भीतर अजीब सा सन्नाटा था।
जज की आवाज़ अभी-अभी कानों में गूँजी थी —
“छह महीने का समय दिया जाता है।”
छह महीने…
अभय ने सिर झुका लिया।
अचानक उसे लगा जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे पीछे खींच रहा हो —
सालों पीछे।..............
“तुम्हें पता है, मैंने तुम्हारे लिए कितना लड़ा था?”
वो दिन उसे साफ़ याद है जब उसने पहली बार नंदिता को देखा था।
मामा की बेटी की शादी थी। भीड़ में लाल साड़ी में एक लड़की खड़ी थी — आँखों में शांति, चेहरे पर सादगी।
उसने दोस्त से धीरे से पूछा —
“कौन है वो?”
“नंदिता। मास्टरजी की बेटी।”
अभय ने बस एक बार देखा… और दिल ने फैसला कर लिया।
कहते हैं —
“इश्क़ की शुरुआत आँखों से होती है,
पर उसे निभाने के लिए हौसला चाहिए।”
हौसला उसके पास था।
पर रास्ता आसान नहीं था।
घर आकर उसने माँ से कहा —
“मुझे वही लड़की पसंद है।”
माँ ने चौंककर देखा —
“पहले कभी किसी के लिए ज़िद नहीं की, आज इतनी जल्दी?”
“माँ, वो अलग है।”
पिता ने अखबार मोड़ते हुए कहा —
“उनका परिवार हमसे अलग है। उनकी हैसियत कम है। रिश्ते बराबरी में होते हैं।”
ये पहला पत्थर था जो उसके रास्ते में रखा गया।
पर अभय ने ठान लिया था।
वो अगले ही हफ्ते मास्टरजी के घर पहुँचा।
छोटा सा घर, साफ-सुथरा आँगन, दीवार पर भगवान की तस्वीर।
मास्टरजी ने चाय रखते हुए कहा —
“बेटा, हमने तो सोचा भी नहीं था कि तुम लोग रिश्ता लेकर आओगे।”
अभय ने सीधे कहा —
“मैं दहेज नहीं लूँगा। बस नंदिता चाहिए।”
मास्टरजी की आँखें भर आईं।
पर कहानी इतनी सरल कहाँ थी।
परिवार की दीवारें
घर लौटते ही विरोध शुरू हो गया।
चाची बोलीं —
“आजकल के लड़के भावुक हो जाते हैं।”
ताऊजी ने कहा —
“कल को ताने सुनने पड़ेंगे कि कमज़ोर घर से बहू लाई।”
अभय ने पहली बार ऊँची आवाज़ में कहा —
“कमज़ोर घर नहीं है वो। कमज़ोर सोच है हमारी।”
माँ रो पड़ीं —
“तू हमारे खिलाफ खड़ा हो जाएगा?”
अभय चुप हो गया।
उसने माँ के आँसू देखे, पर दिल की आवाज़ दबा नहीं पाया।
कई हफ्ते तक घर में बात बंद रही।
खाना खामोशी में होता, नज़रें चुराई जातीं।
पर अभय हर रविवार मास्टरजी के घर जाता।
कभी किताब लेकर, कभी मिठाई।
एक दिन नंदिता ने धीमे से पूछा —
“आप इतना क्यों कर रहे हैं?”
अभय मुस्कुराया —
“क्योंकि मैं आधे रास्ते से लौटना नहीं जानता।”
आर्थिक परीक्षा
उसी दौरान अभय की नौकरी में संकट आ गया।
प्रोजेक्ट बंद हुआ, वेतन रुका।
पिता ने ताना मारा —
“पहले अपनी कमाई पक्की कर ले, फिर सपने देखना।”
अभय ने हार नहीं मानी।
रात में फ्रीलांस काम किया, दिन में इंटरव्यू दिए।
तीन महीने बाद नई नौकरी मिली — बेहतर वेतन के साथ।
उसने सबसे पहले क्या किया?
मास्टरजी के घर जाकर मिठाई रखी और कहा —
“अब कोई बहाना नहीं है।”
नंदिता का डर
शादी से पहले एक दिन नंदिता ने उससे कहा —
“अगर कभी मैं आपको बोझ लगूँ तो…?”
अभय ने बीच में ही रोक दिया —
“तुम मेरी ज़िम्मेदारी नहीं, मेरी पसंद हो।”
वो मुस्कुरा दी।
उस मुस्कान के लिए ही तो उसने इतना संघर्ष किया था।
शादी का दिन
बारात जब पहुँची तो बारिश शुरू हो गई।
लोग बोले —
“अपशगुन है।”
अभय ने हँसकर कहा —
“बारिश नहीं, दुआ बरस रही है।”
फेरे लेते समय उसने मन ही मन वादा किया था —
“हर हाल में साथ निभाऊँगा।”
आज अदालत की सीढ़ियों पर बैठा वही आदमी सोच रहा था —
कहाँ खो गया वो वादा?
वर्तमान में वापसी
अचानक वकील ने कंधे पर हाथ रखा —
“चलना है?”
अभय ने फाइल कसकर पकड़ी।
उसकी आँखों में नमी थी।
“मैंने जिसके लिए दुनिया से लड़ा…
क्या आज उससे हार मान लूँ?”
हवा का झोंका आया।
उसे वो पहली बारिश याद आई —
जब उसने कहा था, “दुआ बरस रही है।”
शायद आज भी आसमान इशारा दे रहा था।
अभय धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
दिल में एक सवाल था —
क्या अभी भी देर नहीं हुई?
लेकिन इस बार देर था जज़ साब के आने में फिर वो उन्ही यादों में दुबारा खो गया जहां से वो आना नहीं चाहता था।
क्रमशः......।