03/07/2025
---------: एडोमेट्रियोसिस में, पिचु-उपनाह उपचार :-------
एंडोमेट्रियोसिस एक जटिल स्त्री रोग है, जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) की ऊत्तकें गर्भाशय के बाहर—जैसे डिंबग्रंथि, अंडवाहिनी या श्रोणि गुहा—में बढ़ने लगती हैं, जिससे तीव्र दर्द, अनियमित मासिक धर्म, बांझपन व सूजन आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।
आयुर्वेद में इसे " वन्ध्यत्व हेतुक योनिविकार " और " वात-कफज योनिशूलय " की श्रेणियों में रखा जाता है।
1- एंडोमेट्रियोसिस में पिचु व उपनाह चिकित्सा ------
योनि पिचु (Yoni Pichu)
(1) उद्देश्य -------
* गर्भाशय की शुद्धि, वात-कफ शमन।
* दर्द व सूजन नियंत्रण।
* योनिकांठ, गर्भाशय की नसों में पौष्टिकता।
(2) सामग्री ---------
* सुपर्णिका तैल (स्त्रीजनन संस्थान हेतु विशेष तैल)।
* या बालान तैल (गर्भाशय व योनिशूल में लाभकारी)।
* रुई (स्वच्छ व कोमल)।
* गुनगुना जल।
(3) विधि -------
* रात्रि में सोने से पहले, सुपर्णिका तैल को थोड़ा गुनगुना करें।
* रुई में तैल भिगोकर निचोड़ें, ताकि वह टपके नहीं।
* उसे योनिमार्ग में धीरे-से प्रवेश कराएं (2–3 cm तक)।
* 3–4 घंटे तक रखें या पूरी रात।
* सुबह गुनगुने पानी से स्नान करें।
* 21 दिन तक रोज, फिर 7 दिन विराम। इस चक्र को 2–3 बार दोहराएं।
2- अधोवस्ति उपनाह (Lower Abdomen Upanaha)
(1) उद्देश्य -------
* श्रोणि क्षेत्र में रुके रक्त, कफ व वात का निवारण।
* सूजन, मासिक पीड़ा में आराम।
(2) सामग्री ------
* रसनादि चूर्ण या अरिष्टक चूर्ण या गोक्षुर + गुडुचि + अरंडी मूल।
* सुपर्णिका तैल या माष तैल।
* जौ या गेंहूं का आटा (संयोजन हेतु)।
* एरण्ड पत्र (बांधने के लिए)।
* गरम पट्टी या ऊन का कपड़ा
(3) विधि ------
* चूर्ण + तैल + आटा मिलाकर गाढ़ा लेप बना लें।
* हल्का गरम करके, नाभि के नीचे अधोवस्ति क्षेत्र पर लगाएं।
* ऊपर से एरण्ड पत्र या कपड़ा रखें।
* हल्की पट्टी से बांधें।
* 3–4 घंटे तक रखें या रातभर।
* दिन में एक बार, 21 दिन तक प्रयोग करें।
3- पूरक उपाय (With Pichu & Upanaha)
उपचार/ औषधि या विधि -----
(1) औषध सेवन/ अशोकघन वटी, सुपर्णिका वटी, राजःप्रवर्तिनी वटी (चक्रानुसार)
(2) क्वाथ या काढ़ा/ दशमूल क्वाथ + अशोक + लोध्र।
(3) वास्ति (बस्ती)/ स्नेहबस्ती – सुपर्णिका तैल (पंचकर्म वैद्य देखरेख में)।
(4) योग/ सुप्तबद्धकोणासन, मंडूकासन, पवनमुक्तासन।
(5) पथ्य आहार/ तिक्त-काशाय रस, त्रिकटु युक्त भोजन, तेल मुक्त, लघु सुपाच्य आहार।
4- सावधानी --------
(1) पिचु, मासिक धर्म के दिनों में न करें।
(2) संक्रमण, जलन, या अज्ञात योनि रोगों में पिचु न डालें।
(3) उपनाह, यदि बहुत गर्म हो, तो त्वचा जल सकती है — पहले हाथ पर परीक्षण करें।
(4) औषधि चयन हेतु, वैद्य की सलाह अवश्य लें।
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