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क्या आपकी मनोकामनाएँ पूरी नहीं हो पा रही हैं?जीवन में बार-बार रुकावटें आ रही हैं?”“तो अब समाधान मिलेगा —🎙️ “मां विंध्यवा...
12/04/2026

क्या आपकी मनोकामनाएँ पूरी नहीं हो पा रही हैं?
जीवन में बार-बार रुकावटें आ रही हैं?”

“तो अब समाधान मिलेगा —
🎙️ “मां विंध्यवासिनी आध्यात्मिक अनुष्ठान केंद्र , बैंगलोर में सभी प्रकार के हवन, पूजन, जाप व अनुष्ठान पूरी विधि-विधान से किए जाते हैं।
शादी-विवाह, प्रेम बाधा , कर्ज मुक्ति, नौकरी व्यापार, मनोकामना पूर्ति के लिए विशेष अनुष्ठान भी उपलब्ध हैं।”

📞 संपर्क: 9480299283
🙏 पण्डित डॉक्टर उत्तम आचार्य जी

🎙️ “जीवन की हर समस्या का समाधान -
विश्वास, विद्या और सच्ची साधना के साथ।”

Big thanks to Rudrani Acharyafor all your support! Congrats for being top fans on a streak 🔥!
12/04/2026

Big thanks to Rudrani Acharya

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क्या आपकी मनोकामनाएँ पूरी नहीं हो पा रही हैं?जीवन में बार-बार रुकावटें आ रही हैं?”“तो अब समाधान मिलेगा — मां विंध्यवासिन...
03/12/2025

क्या आपकी मनोकामनाएँ पूरी नहीं हो पा रही हैं?
जीवन में बार-बार रुकावटें आ रही हैं?”

“तो अब समाधान मिलेगा — मां विंध्यवासिनी आध्यात्मिक अनुष्ठान केंद्र में!”

🎙️ यहाँ किया जाता है —
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✔ विवाह बाधा निवारण
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🎙️ “मां विंध्यवासिनी आध्यात्मिक अनुष्ठान केंद्र —
सभी प्रकार के हवन, पूजन, जाप व अनुष्ठान पूरी विधि-विधान से किए जाते हैं।
शादी-विवाह के विशेष अनुष्ठान भी उपलब्ध हैं।”

📞 संपर्क: 9480299283
🙏 पण्डित डॉक्टर उत्तम आचार्य जी

🎙️ “जीवन की हर समस्या का समाधान…
विश्वास, विद्या और सच्ची साधना के साथ।”

05/06/2024

🙏 वटसावित्री व्रत (अमावस्या पक्ष) वृहस्पतिवार, 6 जून, 2024

अमावस्या तिथि आरंभ:- 5 जून- 7:54 pm

*अमावस्या तिथि समाप्त:-6 जून- 6:07 pm*

सनातन पौराणिक कथाओं के अनुसार सावित्री नाम की एक पतिव्रता स्त्री ने मृत्यु के देवता भगवान यम को भ्रमित कर उन्हें अपने पति सत्यवान के प्राण को लौटाने पर विवश किया था, इस लिए प्रतिवर्ष विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की सकुशलता एवं दीर्घायु की कामना से वट सावित्री व्रत का पालन करती हैं।

सनातन धर्मशास्त्रो मे "वटसावित्री व्रत" को मनाये जाने के "दिन" के संबंध मे कथा प्रचलित है-

1. निर्णयामृत के अनुसार वटसावित्री का व्रत ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या को करने का विधान है। इसके अनुसार ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक व्रत रखा जाता हैं। ( वर्ष 2024 मे त्रयोदशी 4 जून से अमावस्या 6 जून तक)

व्रत का उद्देश्य एक ही है, "सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को मानना तथा उसका पालन करना"।

उत्तर भारत मे यह पर्व ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात तथा दक्षिण भारत में यह पर्व ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है ।

6 जून को वटसावित्री व्रत के दिन ही शनैश्चर जयंती भी मनाई जायेगी। इसी दिन अमावस्या का भी व्रत किया जाएगा। ऐसे में "वटसावित्री, अमावस्या तथा शनैश्चर जयंती" तीनो के संयुक्त होने से इस दिन व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।

ज्येष्ठ अमावस्या को मनाये जाने वाले नियम के अनुसार सन् 2024 मे यह व्रत 6 जून, वृहस्पतिवार के दिन मनाया जायेगा।

वटसावित्री व्रत (6 जून) में स्त्रियाँ, "त्रयोदशी से अमावस" तक वटवृक्ष का पूजन करके तीन दिवसीय व्रतानुष्ठान करती हैं,

वट अर्थात बरगद वृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा ऊपरी भाग में देवाधिदेव शिव प्रतिष्ठित रहते हैं। यह व्रत स्त्रियों के वैधव्यादि दोषों की निवृत्ति में एवं पति-पुत्रादि सुख-सौभाग्य प्राप्ति के लिए विशेष प्रशस्त माना जाता है।

वटसावित्री व्रत-पूजन मे सत्यवान, सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। इस व्रत को रखने वाली महिलाओं का सुहाग अटल रहता है। ऐसी मान्यता है कि सावित्री ने इसी व्रत के प्रभाव से अपने मृत पति सत्यवान को धर्मराज से भी जीत लिया था।

वट सावित्री व्रत में 'वट' और 'सावित्री' दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है। पीपल की तरह वट या बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है। पाराशर मुनि के अनुसार- 'वट मूले तोपवासा' ऐसा कहा गया है। पुराणों में यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है।

*पूजा/व्रत की विधि:-*
ज्येष्ठ मास कृष्णपक्ष त्रयोदशी तिथि को स्नानादि के पश्चात् प्रातःवट वृक्ष की एक डाली लाकर उसे किसी मिट्टी के गमले में लगाया जाता है। तत्पश्चात एक लकड़ी की वेदी पर, बांस की टोकरी रखकर उसमे लाल कपड़ा बिछा कर उसमे यह गमला रखकर, प्रतीक रूप में मिट्टी से निर्मित ब्रह्म जी की प्रतिमा, और इनके बाईंं ओर सावित्री, सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यमराज की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
(वर्तमान काल मे की स्थानो पर केवल अमावस्या को ही इस पूजा/व्रत की शुरुआत या नियोजन होता है।)

तत्पश्चात सकंल्प करे -

*सकंल्प:-*
*मम वैधव्यादि सकल-दोष-परिहारार्थं सत्यवत् सावित्री प्रीत्यर्थं च वट सावित्री व्रतम् अहं करिष्ये।*

यह संकल्प करके तीन दिन उपवास करे। यदि सामर्थ्य न हो तो त्रयोदशी को रात्रि भोजन चतुर्दशी को अयाचित, और अमावस्या को पूर्ण उपवास करके शुक्ल प्रतिपदा को समाप्त करे।

सकंल्प के पश्चात प्रतिमाओं का पूजन जल, चंदन, रोली, अक्षत पुष्प, फल धूप-दीप आदि से किया जाता है।

तत्पश्चात निम्नलिखित मंत्र से सावित्री को अर्ध्य देना चाहिए -

*अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते ।*
*पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥*

पूजन करने के उपरांत निम्नलिखित दो मंत्रो का जाप किया जा सकता है ।
*मंत्र:-*
*।। सती सावित्राय नम: ।।*
*।। यम धर्मराजाय नम: ।।*

मंत्र का जप एक माला करें।
तत्पश्चात कच्चे सूत या मौली को बरगद वृक्ष की डाली में बांधने के उपरांत वृक्ष के गिर्द सात फेरे लेकर सावित्री- सत्यवान कथा करना चाहिए।

इसके उपरांत निम्नलिखित मंत्र से प्रार्थना करे-

*वट सिंचामि ते मूल सलिलैरमृतोपमैः।*
*यथा शाखा प्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले।*
*तथा पुत्रैश्च पीत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा ॥*

(वट सावित्री व्रत पूजन विधि में अपने - अपने क्षेत्र के अनुसार कुछ-कुछ अंतर पाया जाता है। प्रायः सभी भक्त अपनी-अपनी परम्परा के अनुसार ही वट सावित्री व्रत पूजा करते हैं।

पूजन समाप्त होने के बाद वस्त्र, फल आदि का बांस की टोकरी या पत्तों में रखकर दान करना चाहिए और चने का प्रसाद बांटना चाहिए ।

इस दिन महिलाएँ सुबह स्नान कर नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन निराहार रहते हुए सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष में कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। वट पूजा के समय फल, मिठाई, पूरी, पुआ भींगा हुआ चना और पंखा चढ़ाती हैं।

उसके बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। पुनः सावित्री की तरह वट के पत्ते को सिर के पीछे लगाकर घर पहुंचती हैं। इसके बाद पति को पंखा झलती है,

भारत वर्ष मे वटसावित्री का पूजन कुछ इस प्रकार से भी किया जाता है-
इस पूजन में स्त्रियाँ चौबीस बरगद फल (आटे या गुड़ के) और चौबीस पूरियाँ अपने आँचल में रखकर बारह पूरियां को बारह बरगद वट वृक्ष में चढ़ा देती हैं। (बारह वृक्षों की जगह एक वृक्ष भी मान्य है।) तत्पश्चात वृक्ष में एक लोटा जल चढ़ाकर हल्दी-रोली लगाकर फल-फूल, धूप-दीप से पूजन करती हैं। कच्चे सूत को हाथ में लेकर वे वृक्ष की बारह परिक्रमा करती हैं। हर परिक्रमा पर एक चना वृक्ष में चढ़ाती जाती हैं। और सूत तने पर लपेटती जाती हैं।

परिक्रमा के पूरी होने के बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। उसके बाद बारह कच्चे धागा वाली एक माला वृक्ष पर चढ़ाती हैं और एक को अपने गले में डालती हैं। पुनः छः बार माला को वृक्ष से बदलती हैं, बाद में एक माला चढ़ी रहने देती हैं और एक स्वयं पहन लेती हैं। जब पूजा समाप्त हो जाती है तब स्त्रियाँ ग्यारह चने व वृक्ष के फूल की कली (वृक्ष की लाल रंग की कली) तोड़कर जल से निगलती हैं, तथा इस तरह व्रत खोलती हैं।

इसके पीछे यह मिथक है कि सत्यवान जब तक मरणावस्था में थे तब तक सावित्री को अपनी कोई सुध नहीं थी लेकिन जैसे ही यमराज ने सत्यवान को जीवित कर दिए तब सावित्री ने अपने पति सत्यवान को जल पिलाकर स्वयं वटवृक्ष की कली खाकर जल ग्रहण की थी।

*वटसावित्री व्रत की कथा:-*

भद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री रुप में गुण सम्पन्न सावित्री का जन्म हुआ। राजकन्या ने द्युत्मसेन के पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें पतिरुप में वरण कर लिया। इधर यह बात जब ऋषिराज नारद को ज्ञात हुई तो वे अश्वपति से जाकर कहने लगे- आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल कि है, सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा है, परन्तु उनकी अल्पायु है, और एक वर्ष के बाद ही उसकी मृ्त्यु हो जाएगी।

नारद जी की यह बात सुनते ही राजा अश्वपति का चेहरा विवर्ण हो गया,
"वृथा न होहिं देव ऋषि बानी"

ऎसा विचार करके उन्होने अपनी पुत्री को समझाया की ऎसे अल्पायु व्यक्ति के साथ विवाह करना उचित नहीं है, इसलिये अन्य कोई वर चुन लो।

इस पर सावित्री बोली पिताजी- आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती है, राजा एक बार ही आज्ञा देता है, पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते है, तथा कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है। अब चाहे जो हो, मैं सत्यवान को ही वर रुप में स्वीकार करूंगी। सावित्री ने नारद से सत्यवान की मृत्यु का समय मालूम कर लिया था।

अन्ततोगत्वा उन दोनो को पाणिग्रहण संस्कार में बांधा गया। वह ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा में रत हो गई। कुछ समय के पश्चात ससुर का बल क्षीण होता देख शत्रुओं ने उनका राज्य छिन लिया।

नारद का वचन सावित्री को दिन-प्रतिदिन अधीर करने लगा। उसने जब जाना की पति की मृ्त्यु का दिन नजदीक आ गया है। तब तीन दिन पूर्व से ही उपवास शुरु कर दिया।

नारद द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया। नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान अपने समय पर लकडी काटने के लिये चला गया, तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा से अपने पति के साथ जंगल में चलने के लिए तैयार हो गई़।

सत्यवान वन में पहुंचकर लकडी काटने के लिये वृ्क्ष पर चढ गया, वृक्ष पर चढते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीडा होने लगी, वह व्याकुल हो गया और वृ्क्ष से नीचे उतर गया। सावित्री अपना भविष्य समझ गई. तथा अपनी गोद का सिरहाना बनाकर अपने पति को लिटा लिया। उसी समय दक्षिण दिशा से अत्यन्त प्रभावशाली महिषारुढ यमराज को आते देखा।

धर्मराज सत्यवान के जीवन को जब लेकर चल दिए, तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पडी। पहले तो यमराज ने उसे देवी-विधान समझाया परन्तु उसकी निष्ठा और पतिपरायणता देख कर उसे वर मांगने के लिये कहा।
सावित्री बोली- मेरे सास-ससुर वनवासी तथा अंधे है. उन्हें आप नेत्र ज्योति प्रदान करें। यमराज ने कहा -ऎसा ही होगा।

जाओ अब लौट जाओ। यमराज की बात सुनकर उसने कहा-भगवान मुझे अपने पतिदेव के पीछे -पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है, यह सुनकर उन्होने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिये कहा।

सावित्री बोली-हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे वे पुन: प्राप्त कर सकें, साथ ही धर्मपरायण बने रहें।

यमराज ने यह वर देकर कहा की अच्छा अब तुम लौट जाओ।
पर सावित्री यम के पीछे पीछे चलती रही, यह देख कर
यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने को कहा।

इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्य का वरदान मांगा। यमराज ने इसका वरदान भी सावित्री को दे दिया। फिर,
सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। यमराज अंतध्यान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गई जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था।

सत्यवान जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे।

अतः पतिव्रता सावित्री के अनुरूप ही, प्रथम अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वो टल जाता है।

जय हो सत्यवान और सावित्री माई की ।
पंडित उत्तम आचार्य जी
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05/06/2024

ज्येष्ठ अमावस्या 06 जून गुरुवार को

ज्येष्ठ अमावस्या के दिन अपनी राश‍ि के अनुसार करें दान

ज्येष्ठ अमावस्या,ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 05 जून बुधवार शाम 07 बजकर 56 मिंट पर शुरू होगी और 06 जून शाम 06 बजकर 08 पर समाप्त होगी,सूर्योदय व्यापिनी अमावस्या तिथि 06 जून गुरुवार को है इसलिए ज्येष्ठ अमावस्या 06 जून गुरुवार को मनाई जाएगी। स्नान,दान, जप,तप आदि करना 06 जून गुरुवार को ही शुभ होगा।

अमावस्या पर हरिद्वार जैसे तीर्थ स्थलों और पवित्र नदियों पर स्नान करने का विशेष महत्व होता है। किसी कारण वश पवित्र नदियों पर स्नान ना कर सके तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करने से भी इसका पुण्य प्राप्त होता है और इस दिन घर के आस पास जरूरतमंद लोगों को कुछ ना कुछ दान अवश्य करें।

अमावस्या पर करे ये विशेष उपाय जिन्हें करके आप भी सुखी और समृद्धिशाली जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

अमावस्या पर पितरों की शांति के लिए उपवास रखने से न केवल पितृगण बल्कि ब्रह्मा, इंद्र, सूर्य, अग्नि, वायु, ऋषि, पशु-पक्षी समेत भूत प्राणी भी तृप्त होकर प्रसन्न होते हैं।

अमावस्या तिथि के दिन सूर्योदय काल में पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान करने तथा साम‌र्थ्य के अनुसार दान करने से सभी पाप क्षय हो जाते हैं तथा पुण्य कि प्राप्ति होती है।

तिल, दूध और तिल से बनी मिठाइयों का दान दरिद्रता मिटाने वाला है।

प्रत्येक अमावस्या के दिन अपने पितरों का ध्यान करें। ध्यान के साथ पीपल के पेड़ पर कच्ची लस्सी, थोड़ा गंगाजल, काले तिल, चीनी, चावल, जल तथा पुष्प अर्पित करें। इस क्रिया को करते समय 'ॐ पितृभ्य: नम:' मंत्र का जाप करें। उसके बाद पितृसूक्त का पाठ करना शुभ फल प्रदान करता है।

अमावस्या के दिन सूर्य देव को ताम्र बर्तन में लाल चंदन, गंगा जल और शुद्ध जल मिलाकर 3 बार अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय 'ॐ पितृभ्य: नम:' का बीज मंत्र का जाप करें।

अमावस्या पर नीलकंठ स्तोत्र का पाठ, सर्पसूक्त पाठ, श्रीनारायण कवच का पाठ करने के बाद ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिवंगत की पसंदीदा मिठाई तथा दक्षिणा सहित भोजन कराना चाहिए।

नि:संतानों की कुंडली में संतान प्राप्ति के योग बन जाते हैं। राहू नीच रूप में यदि किसी के भाग्‍य वाले स्‍थान पर बैठा हो तो इस दिन किया गया व्रत इसके दुष्‍प्रभाव को नष्‍ट कर देता है।

शाम के समय घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक लगाएं। बत्ती में लाल रंग के धागे का उपयोग करें।

गरीबी दूर करने, संतान की प्राप्ति के लिए, व्यवसाय में उन्नति के लिए चांदी का छोटा सा पीपल बनाकर दान करें।

अमावस्या के दिन कालसर्प दोष वालों को सुबह स्नान कर के चांदी के नाग-नागिन की पूजा करनी चाहिए। उजले फूल के साथ इसे फिर किसी बहते पानी में प्रवाहित करें।

भगवान विष्णु के मन्दिर में झंडा लगाएं,मां लक्ष्मी को खीर मेवा डाल कर प्रसाद भोग लगाएं माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।

ज्योतिष के अनुसार चंद्रमा को मन का देवता माना जाता है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा नहीं दिखाई देता। इसका प्रभाव सबसे अधिक उन्ही लोगों पर पड़ता है जो बहुत भावुक होते है। लड़कियों का मन सबसे अधिक भावुक होता है।

इस दिन चंद्रमा नहीं दिखाई देता जिसके कारण हमारे शरीर में हलचल होने लगती है।और जो व्यक्ति नकारात्मक सोच वाले होते है उन्हें नकरात्मक शक्ति प्रभाव में ले लेती है।

अमावस्या के दिनों में किन बातों का खास ख्याल रखें।

अमावस्या के दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए, ब्रहम्चर्य का पालन करना चाहिए, इन दिनों में शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए, व्रत रखने वालों को इस व्रत के दौरान दाढ़ी-मूंछ और बाल नाखून नहीं काटने चाहिए, व्रत करने वालों को पूजा के दौरान बेल्ट, चप्पल-जूते या फिर चमड़े की बनी चीजें नहीं पहननी चाहिए,काले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए,किसी का दिल दुखाना सबसे बड़ी हिंसा मानी जाती है। गलत काम करने से आपके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम होते है।

अमावस्या के दिन अपनी राश‍ि के अनुसार करें दान

अमावस्या के दिन आपके द्वारा किया जाने वाला दान आपकी राशि से जुड़ा हो। राशि के अनुसार आपके लिए कौन सा दान फलदायी साबित होगा, यहां जानें -

मेष राशि: मेष राशि का स्वामी ग्रह मंगल है। इन राशि के जातकों को मूंगफली,काले चने,भूमि दान देना चाहिए।

वृष राशि: इस राशि का स्वामी ग्रह शुक्र होने के कारण इन लोगों को सफेद वस्त्र, मोती, तेल,दूध, चीनी का दान करना चाहिए।

मिथुन राशि : इस राशि का स्वामी ग्रह बुध है। इस राशि के लोगों को हरी वस्तु, कांसा,हरा चारा,पन्ना दान देना चाहिए।

कर्क राशि: इस राशि का स्वामी ग्रह चंद्र है। इस राशि के जातकों को चावल,आटा, घी,मोती,दूध, दही,सफेद रंग के वस्त्र दान करें।

सिंह राशि : इस राशि का स्वामी ग्रह सूर्य है। राशि अनुसार लाल चीजों का दान करना आपके लिए शुभ रहेगा। जैसे तांबा, केसर, लाल रंग के वस्त्र ,गुड़ दान कर सकते हैं।

कन्या राशि: इस राशि का स्वामी ग्रह बुध है। इस राशि के लोगों को हरी वस्तु, कांसा,हरा चारा गाय माता को,हरी सब्जियां, पन्ना दान देना चाहिए।

तुला राशि: इस राशि का स्वामी ग्रह शुक्र होने के कारण इन लोगों को सफेद वस्त्र, मोती,दही,चीनी का दान करना चाहिए।

वृश्चिक राशि: इस राशि के जातकों का स्वामी ग्रह मंगल है। इस राशि के जातकों को लाल वस्त्र, मूंगा,भूमि,नारियल का दान करना चाहिए।

धनु राशि: इस राशि का स्वामी बृहस्पति है। इस राशि के जातकों को पीली वस्तु,केला,सोना, केसर, किताब और पीली वस्तुओं का दान करना बेहद शुभ माना गया है।

मकर राशि : इस राशि का स्वामी ग्रह शनि है। इस राशि के जातक को तेल, नीले और काले कपड़े, तिल, लोहा आदि का दान कर सकते हैं।

कुंभ राशि: इस राशि का स्वामी ग्रह शनि होने के कारण इनसे संबंधित प्रिय वस्तुओं का दान किया जाना चाहिए। जैसे लोहा, काले कपड़े, नीले कपड़े, तिल, सरसों का तेल आदि का दान करना शुभ रहेगा।

मीन राशि: इस राशि का स्वामी ग्रह गुरु होने के कारण इन लोगों को हल्दी,केला, दाल चने ,शहद, पुस्तक, पीली चीजें दान करना चाहिए।

इस दिन श्रीशनि देव जयंती और वटसावित्री व्रत भी है।
वटसावित्री करने वाली माता बहने बड़े ही नियम से व्रत पूजन करें। मनोकामना सिद्धि निश्चित है।
पंडित उत्तम आचार्य जी
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10/02/2024

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28/10/2023

खण्डग्रास (आंशिक) चन्द्र ग्रहण (शंका समाधान)
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अश्विन शुक्ल पूर्णिमा 28 अक्टूबर 2023 शनिवार वार को यह ग्रहण सम्पूर्ण भारत में आंशिक रूप में दिखाई देगा। यह ग्रहण का देश के समस्त भाग में आशिंक रूप दिखेगा इसके अलावा यह ग्रहण सम्पूर्ण भारत प्रारंभ से अंत (स्पर्श-मध्य-मोक्ष) तक दिखायी देगा। भारत के अलावा यह ग्रहण पश्चिमी प्रशांत महासागर, ऑस्ट्रेलिया, एशिया, यूरोप, अफ्रीका, पूर्वी दक्षिणी अमेरिका, उत्तरी-पूर्वी एवं उत्तरी अमेरिका, अटलाण्टिक महासागर, हिन्द महासागर, दक्षिणी प्रशांत महासागार में दिखायी देगा। ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी प्रशान्त महासागर एवं रूस के पूर्वी हिस्से में ग्रहण का स्पर्श चन्द्रास्त के समय दिखायी देगा एवं दक्षिणी-उत्तरी अटलाण्टिक महासागर, ब्राजील के पूर्वी भाग एवं कनाडा में ग्रहण का स्पर्श चन्द्रोदय के समय दिखायी देगा। इस ग्रहण में चन्द्रबिम्ब दक्षिण की ओर ग्रस्त दिखेगा। ग्रहण का सूतक 28 नवम्बर 2023 ई. को सायं 4 बजकर 5 मिनट पर प्रारम्भ हो जायेगा। सामान्यतः चन्द्रग्रहण का सूतक स्पर्श से 9 घण्टे पूर्व माना जाता है। आश्विन पूर्णिमा के दिन यह ग्रहण घटित होने से अश्विन पूर्णिमा के स्नान व दान का महत्व अनन्त हो जायेगा।

ग्रहण का विस्तृत विवरण
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उपच्छाया प्रवेश👉 मध्यरात्रि 11:30,

ग्रहण प्रारम्भ👉 मध्यरात्रि 01:05,

ग्रहण मध्य👉 मध्यरात्रि 01:44,

ग्रहण समाप्त👉 मध्यरात्रि 02:24,

उपच्छाया अन्त👉 अंतरात्रि 03:58,

ग्रहण ग्रासमान👉 0.126,

ग्रहण अवधि (स्पर्श से अन्त)👉 04 घण्टा 25 मिनट ,

ग्रहण अवधि (प्रारंभ से मोक्ष)👉 01 घण्टा 19 मिनट पर होगा।

ग्रहण का 12 राशियों पर प्रभाव
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यह ग्रहण अश्विनी नक्षत्र (मेष राशि) में घटित हो रहा है इसलिए इस राशि एवं नक्षत्र में उत्पन्न जातकों को चन्द्रमा-राहु तथा राशिस्वामी मंगल का जाप, दान करना चाहिए।

विभिन्न राशियों के लिए फल
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1. मेष👉 दुर्घटना, शरीर कष्ट, शत्रुता, 2. वृष👉 धनिहानि, चिन्ता,
3. मिथुन👉 धनलाभ, उन्नति,
4. कर्क👉 रोग, कष्ट भय,
5. सिंह👉 संतान संबंधी चिंता,
6. कन्या👉 शत्रुभय, साधारण लाभ, व्यय,
7. तुला👉 स्त्री / पति संबंधी कष्ट,
8. वृश्चिक👉 रोग, गुम चिंता, संघर्ष,
9. धनु👉 व्यय की अधिकता, कार्य में विलम्ब,
10. मकर👉 लाभ,
11. कुम्भ👉 धनलाभ, उन्नति,
12. मीन👉 धनहानि, व्यर्थ यात्रा।

जिस राशि के ग्रहण का फल अशुभ बताया गया है, वह यथाशक्ति जप-पाठ, ग्रह- ह-शांति (चन्द्र-मंगल की) एवं दानादि द्वारा ग्रहण के अशुभ फल का उपाय करे। ग्रहण के पश्चात् औषधिय स्नान करें एवं रोग निवृत्ति हेतु 'महामृत्युजय मंत्र का जप करे काँसे की कटोरी में घी भरकर उसमें ताम्रादि का सिक्का डालकर अपना मुँह देखकर छायापात्र मंत्र पढ़कर ग्रहण समाप्ति के बाद वस्त्र, फल व दक्षिणा सहित ब्राह्मण को दान करे। ग्रहण के पश्चात् अगले दिन 29 अक्टूबर 2023 को प्रातः सूर्योदय के समय पुनः स्नान करके संकल्पपूर्वक सामग्री दान करे।

यथा -पुत्रजन्मनि यज्ञे च तथा सङ्क्रमणे रवेः । राहोश्च दर्शने कार्यं प्रशस्तं नान्यथा निशि ।।

आश्विन मास में ग्रहणफल
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️यह खण्ड चन्द्रग्रहण आश्विनमास में हो रहा है, अतः चीन, ईरान, सिन्ध आदि देशों में कष्ट, प्राकृति प्रकोप, शिल्पकार, वैद्य, डॉक्टर आदि को कष्ट होगा एवं श्रेष्ठ सुभिक्ष के योग बनेंगे। यथा दृष्टोसुरो युजि भूरि सुभिक्षकृत ।।

ग्रहण का वारफल
〰️〰️〰️〰️〰️〰️चन्द्रग्रहण शनिवार को हो रहा है, अतः चोरों का उपद्रव,
मन्त्रियों को कष्ट, धान्य, चावल, मूंग, ताँबा, कालीमिर्च, सरसों, एरण्डी आदि का संग्रह करने से आगे उत्तम लाभ मिलेगा।

ग्रहण का नक्षत्रफल
〰️〰️〰️〰️〰️〰️अश्व, सेनापति, वैद्य, डॉक्टर, नौकरीपेशा लोग, व्यापारी- वर्ग को कष्ट होगा।

ग्रहण का योगफल
〰️〰️〰️〰️〰️〰️सिद्धियोग में होने से धातुओं के बर्तन बनाने वाले लोग एवं तपस्वियों को कष्ट होगा।

ग्रहण का राशिफल
〰️〰️〰️〰️〰️〰️मेषराशि में ग्रहण होने से पंजाब, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, मथुरा आदि क्षेत्र के लोगों को तथा शस्त्र /अग्नि गैस आदि संबंधित व्यापार करने वाले लोग त्रस्त होंगे।

ग्रहणकालीन चन्द्रमा पर दृष्टिफल
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ग्रहण के समय मेषराशिस्थ चन्द्रमा गुरु- राहु के साथ है तथा इन पर शनि-मंगल आदि ग्रहों की दृष्टियां है, यह अनिष्टकारक संयोग है। कहीं वर्षा से जन-धन की हानि, कहीं दुर्भिक्ष (अकाल) के योग बनेंगे। चोर आदि का भय, उड़द आदि कृष्ण धान्य, लोहा, क्रूड ऑयल आदि काले तथा लाल रंग की वस्तुएं एवं धातुएं मंहगी होगी। राजाओं को युद्धभय एवं प्रजा को मंहगाई से कष्ट होगा।

यथा👉 शनैश्चरश्चेद्-ग्रहणं निरीक्षेत्, दुर्भिक्षचौरोत्थभयं त्ववृष्ट्या । कृष्णानि धान्यानि च कृष्णधातून् | कुर्यान्महर्षान्यसितान् विलेपान् ।।

क्या है चंद ग्रहण पौराणिक एवं वैज्ञानिक मान्यता
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एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार समुद्र मंथन के दौरान असुरों और दानवों के बीच अमृत के लिए घमासान चल रहा था इस मंथन में अमृत देवताओं को मिला लेकिन असुरों ने उसे छीन लिया अमृत को वापस लाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी नाम की सुंदर कन्या का रूप धारण किया और असुरों से अमृत ले लिया जब वह उस अमृत को लेकर देवताओं के पास पहुंचे और उन्हें पिलाने लगे तो राहु नामक असुर भी देवताओं के बीच जाकर अमृत पिने के लिए बैठ गया जैसे ही वो अमृत पीकर हटा, भगवान सूर्य और चंद्रमा को भनक हो गई कि वह असुर है तुरंत उससे अमृत छिना गया और विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी। क्योंकि वो अमृत पी चुका था इसीलिए वह मरा नहीं उसका सिर और धड़ राहु और केतु नाम के ग्रह पर गिरकर स्थापित हो गए। ऐसी मान्यता है कि इसी घटना के कारण सुर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगता है, इसी वजह से उनकी चमक कुछ देर के लिए चली जाती है। इसके साथ यह भी माना जाता है कि जिन लोगों की राशि में सुर्य और चंद्रमा मौजूद होते हैं उनके लिए यह ग्रहण बुरा प्रभाव डालता है।

वहीं, विज्ञान के अनुसार यह एक प्रकार की खगोलीय स्थिति है. जिनमें चंद्रमा, पृथ्वी और पृथ्वी तीनों एक ही सीधी रेखा में आ जाते हैं। इससे चंद्रमा पृथ्वी की उपछाया से होकर गुजरता है, जिस वजह से उसकी रोशनी फिकी पड़ जाती है।

ग्रहण-सूतक के समय पालनीय
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सूतक के समय तथा ग्रहण के समय दान तथा जापादि का महत्व माना गया है. पवित्र नदियों अथवा तालाबों में स्नान किया जाता है। मंत्र जाप किया जाता है तथा इस समय में मंत्र सिद्धि का भी महत्व है। तीर्थ स्नान, हवन तथा ध्यानादि शुभ काम इस समय में किए जाने पर शुभ तथा कल्याणकारी सिद्ध होते हैं। धर्म-कर्म से जुड़े लोगों को अपनी राशि अनुसार अथवा किसी योग्य ब्राह्मण के परामर्श से दान की जाने वाली वस्तुओं को इकठ्ठा कर के रख लेना चाहिए फिर अगले दिन सुबह सूर्योदय के समय दुबारा स्नान कर संकल्प के साथ उन वस्तुओं को योग्य व्यक्ति को दे देना चाहिए।

ग्रहण-सूतक में वर्जित कार्य
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सूतक के समय और ग्रहण के समय भगवान की मूर्ति को स्पर्श करना निषिद्ध माना गया है। खाना-पीना, सोना, नाखून काटना, भोजन बनाना, तेल लगाना आदि कार्य भी इस समय वर्जित हैं. इस समय झूठ बोलना, छल-कपट, बेकार का वार्तालाप और मूत्र विसर्जन से परहेज करना चाहिए. सूतक काल में बच्चे, बूढ़े, गर्भावस्था स्त्री आदि को उचित भोजन लेने में कोई परहेज नहीं हैं।

सूतक आरंभ होने से पहले ही अचार, मुरब्बा, दूध, दही अथवा अन्य खाद्य पदार्थों में कुशा तृण डाल देना चाहिए जिससे ये खाद्य पदार्थ ग्रहण से दूषित नहीं होगें। अगर कुशा नहीं है तो तुलसी का पत्ता भी डाल सकते हैं. घर में जो सूखे खाद्य पदार्थ हैं उनमें कुशा अथवा तुलसी पत्ता डालना आवश्यक नहीं है।

ग्रहण में क्या करें, क्या न करें ?
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चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्धि होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक् सिद्धि प्राप्त कर लेता है। सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक 'अरुन्तुद' नरक में वास करता है। सूर्यग्रहण में ग्रहण चार प्रहर (१२ घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (९) घंटे पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए। ग्रहण वेध के प्रारम्भ में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिए। ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और श्राद्ध तथा अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए। स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए। ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए। ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए। ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा जमीन में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, (साधारण) बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है। ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरूरतमंदों को वस्त्रदान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ने चाहिए। बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिए व दंतधावन नहीं करना चाहिए। ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल-मूत्र का त्याग, मैथुन और भोजन – ये सब कार्य वर्जित हैं। ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए। ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए। तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किन्तु संतानयुक्त गृहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिए। भगवान वेदव्यासजी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- 'सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। यदि गंगाजल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।' ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम-जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है। ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण) भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए। (देवी भागवत) अस्त के समय सूर्य और चन्द्रमा को रोगभय के कारण नहीं देखना चाहिए।

चंद्र ग्रहण का 12 राशियों पर विस्तृत प्रभाव
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1. मेष राशि👉 आपकी राशि पर इसका प्रभाव अशुभ बताया जा रहा रहा है। उनके साथ किसी भी प्रकार की घात, कष्ट, भय एवं धन्यवाद की हानि होने की सम्भावना है।

2. वृषभ राशि👉 आपकी राशि पर इसका प्रभाव अशुभ रहेगा। आपको किसी भी प्रकार की हानि एवं गृहकलेश हो सकता है।

3. मिथुन राशि👉 आपकी राशि पर यह ग्रहण शुभ फल दायक रहेगा धन के साथ विविध सुख मिल सकता है।

4. कर्क राशि👉 आपकी राशि पर यह ग्रहण विविध कष्ट के साथ चिंता एवं अकारण ही भय का वातावरण बना सकता है।

5. सिंह राशि👉 आपकी राशि पर यह ग्रहण अशुभ है। मान-सम्मान को क्षति पहुंचने के साथ संतान को कष्ट एवं हानि होने की संभावना है।

6. कन्या राशि👉 आपकी राशि पर यह चंद्र ग्रहण अशुभ है। आपको किसी भी प्रकार के मृत्युतुल्य कष्ट के साथ हानि एवं अपव्यय हो सकता है।

7. तुला राशि👉 आपकी राशि पर यह ग्रहण अशुभ है। आपको स्त्री अथवा पति को पीड़ा हो सकती है।

8.वृश्चिक राशि👉 आपकी राशि के लिए भी यह चंद्र ग्रहण अशुभ रहेगा रोग, चिंता एवं कार्यों मे नुकसान होने की सम्भवना रहेगी।

9. धनु राशि👉 आपकी राशि के लिए भी यह चंद्र ग्रहण अशुभ माना जा रहा है। यह किसी प्रकार की चिंता, संघर्ष एवं मानसिक-शारीरिक विकार दे सकता है।

10. मकर राशि👉 आपकी राशि पर भी यह चंद्र ग्रहण शुभ है। आपको किसी कार्य से लाभ हो सकता है.

11.कुम्भ राशि👉 आपकी राशि के लिए भी यह चंद्र ग्रहण शुभ रहेगा जीवन मे प्रगति, अकस्मात लाभ और सुख प्रपर होने की सम्भावना बढ़ेगी।

12.मीन राशि👉 आपकी राशि पर यह चंद्र ग्रहण अशुभ असर देने वाला माना जा रहा है। यह किसी भी प्रकार की धन अथवा मान हानि करा सकता है।

चन्द्रग्रहण पर बाधा नाशक खास उपाय
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चंद्र ग्रहण के शुभ प्रभाव प्राप्त करने के उपाय धर्म शास्त्रों और वेदों में ग्रहण के दौरान बालक, वृद्ध और रोगी के लिए कोई नियम नहीं बताया गया है ।

1👉 चीटियों को पिसा हुआ चावल व आटा डालें।

2👉 मोती, चांदी, चावल, मिश्री, सफेद कपड़ा, सफेद फूल, शंख, कपूर, श्वेत चंदन, पलाश की लकड़ी, दूध, दही, चावल, घी, चीनी आदि का दान करें।

3👉 चन्द्रमा को मन और मां का कारक माना गया है, जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस भाव में बैठा हो उसके स्वामी अनुसार दान-पुण्य करना चाहिए।

4👉 चन्द्र वृष राशि के लिए शुभ और वृश्चिक राशी के लिए अशुभ होता है, जब चन्द्र जन्म कुण्डली में उच्च भाव का हो तब चन्द्र से सम्बन्धित वस्तुओं का दान नही करना चाहिए।

5👉 अगर चन्द्र कुण्डली के दूसरे और चौथे भाव में हो तो चावल चीनी दूध का दान न करें।

6👉 यदि वृश्चिक राशि में हो तो चन्द्र की शुभता प्राप्त करने के लिए धार्मिक स्थल या शमशान के पास आम जनता के लिए प्याउ (पानी की टंकी) बनवाएं या किसी मिट्टी के बर्तन में पक्षियों के लिये पानी रखें।

7👉 चन्द्र दोष दूर करने के लिए सोमवार, अमावस्या का दिन बहुत ही शुभ होता है। किंतु चन्द्र दोष से पीड़ित के लिए चन्द्रग्रहण के दौरान चन्द्र उपासना बहुत ही जरूरी होती है। शिव जी की आराधना करें अपने श्री इष्ट देवता जाप करें।

8👉 यदि आपका व्यवसाय ठीक नहीं चल रहा है तो ग्रहण से पहले नहाकर लाल या सफेद कपड़े पहन लें। इसके बाद ऊन व रेशम से बने आसन को बिछाकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं।

9👉 जब ग्रहण काल प्रारंभ हो तब चमेली के तेल का दीपक जला लें। अब दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला लें तथा बाएं हाथ में 5 गोमती चक्र लेकर नीचे लिखे मंत्र का 54 बार जप करें ।

!! ऊँ कीली कीली स्वाहा !!
इसके बाद इन गोमती चक्रों को एक डिब्बी में डाल दें और फिर क्रमश: 5 हकीक दाने व 5 मूंगे के दाने लेकर पुन: इस मंत्र का 54 बार उच्चारण करें। अब इन्हें भी एक डिब्बी में डालकर उसके ऊपर सिंदूर भर दें। अब दीपक को शांत कर उसका तेल भी इस डिब्बी में डाल दें। इस डिब्बी को बंद करके अपने घर, दुकान या ऑफिस में रखें। आपका बिजनेस चल निकलेगा।

10👉 तंत्र शास्त्र के अनुसार चन्द्रग्रहण किया गया प्रयोग बहुत प्रभावी होता है और इसका फल भी तुरंत प्राप्त होता है। इस मौके का लाभ उठाकर यदि आप धनवान होना चाहते हैं तो नीचे लिखा उपाय करने से आपकी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होगी ।और आपको धन लाभ होगा।

11 उपाय👉 चंद्र ग्रहण के पूर्व नहाकर साफ पीले रंग के कपड़े पहन लें और ग्रहण काल शुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठ जाएं।
अपने सामने चौकी पर एक थाली में केसर का स्वास्तिक या ऊँ बनाकर उस पर महालक्ष्मी यंत्र स्थापित करें। इसके बाद उसके सामने एक दिव्य शंख थाली में स्थापित करें। अब थोड़े से चावल को केसर में रंगकर शंख में डालें। घी का दीपक जलाकर नीचे लिखे मंत्र का कमलगट्टे की माला से ग्यारह माला जप करें-

मन्त्र👉 सिद्धि बुद्धि प्रदे देवी मुक्ति मुक्ति प्रदायिनी।
पुते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।

मंत्र जप के बाद इस पूरी सामग्री को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। इस प्रयोग से कुछ ही दिनों में आपको अचानक धन लाभ होगा।
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