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Ojas Ojas is a wellness startup whose mission is to spread spirituality and uplift society.

Ojas provides physical and emotional healing services such as Prana chikitsa and yoga-medication to people as well as teaches this technique to new students.

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
01/06/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।*

अर्थ (विस्तार से):
हमारे कार्यों और व्यवहार से एक सकारात्मक, शुद्ध और सज्जन वातावरण बनना चाहिए।
अनुकरण की प्रक्रिया:
रोज़ किसी से भी मिलें, तो उनका स्वागत मुस्कान और सौम्यता से करें।
अपने घर और कार्यस्थल को स्वच्छ रखें।
सादगी में ही सुंदरता है, यह समझें और उसी के अनुसार अपना जीवन जीएं।
सज्जनता से व्यवहार करें और किसी को भी आहत न करें।
सामान्य स्थिति में व्यक्ति वातावरण से प्रभावित होता है, पर अन्तरंग श्रेष्ठता का विकास होने पर वह वातावरण को प्रभावित करने लगता है। ऊपर जिन गुणों का उल्लेख किया गया है वे सभ्य समाज की रचना के लिए आवश्यक हैं। जिस व्यक्ति में वह विकसित होते हैं उसके व्यक्तित्व में जादू जैसा प्रभाव आ जाता है। हर व्यक्ति उसके सान्निध्य में रहना पसंद करता है तथा स्नेह सम्मान एवं सहयोग देना चाहता है।

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .

हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन ....

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
31/05/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।*

साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य, प्रमाद न होने देने की बात पर जोर दिया गया है। आलस्य, प्रमाद जीवन की किसी भी धारा को कुंठित कर देते हैं, अतः इनसे जितना बचा जाय उतना ही अच्छा है। किन्तु जीवन विकास के इन मूल आधारों की सीमा में उनका आना सर्वाधिक हानिकारक सिद्ध होता है। अस्तु इन अपने ही अन्दर बसने वाले महा-शत्रुओं को इन नियमों पर आघात करने का अवसर नहीं देना चाहिए।
उनमें व्यतिक्रम न आने पावे इसके लिए नियमों में कठोरता बरतनी चाहिए। उपासना बिना भोजन न करना स्वाध्याय किए बिना सोना नहीं, संयम एवं सेवा का नियम टूटने पर उसे दण्ड स्वरूप कुछ बढ़ाकर लागू करना, ऐसे सूत्र हैं जिनके आधार पर आलस्य-प्रमाद को उस दिशा में हावी होने से बखूबी रोका जा सकता है।

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .

हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन ....

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
30/05/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।*

समाजिक दृष्टि से भी सेवा एक अत्यन्त उपयोगी प्रक्रिया है उससे पिछड़े हुए लोगों को ऊपर उठने और दीन-दुखियों को राहत प्राप्त करने का अवसर मिलता है। दुख और सुख को बांट लेना आध्यात्मिक साम्यवाद है। सुखी लोग अपने सुख का एक अंश दुखियों को बांट दें तो उनके ऊपर लदा हुआ सुविधाओं का अनावश्यक भार घट सकता है और मोटे पेट वाले रोगी को वादी छूट जाने से जैसी प्रसन्नता होती है वैसी ही उन्हें भी मिल सकती है। इसी प्रकार दुखियों का दुख थोड़ा-थोड़ा वे लोग बांट लें तो उन बेचारों का सुख भी हल्का हो सकता है।
एक के पास नमक दूसरे के पास शक्कर हो और दोनों अपने-अपने से ही काम चलावें तो दोनों के भोजन अस्वादिष्ट रहेंगे पर यदि वे दोनों आपस में बांट लें तो नमकीन और मीठा स्वाद का व्यंजन दोनों को ही मिल सकता है। धन के बंटवारे की मांग भौतिक साम्यवाद के क्षेत्रों में उठ रही है। आध्यात्मिक साम्यवाद की मांग दुख और सुख के बटवारे की है। इसी का सक्रिय रूप सेवा धर्म है। सेवा सदाचार का अंग है, अध्यात्म का प्रमुख सोपान और समाज की प्रगति का इसे आधार स्तम्भ कह सकते हैं। सहयोग और सामूहिकता की सत्प्रवृत्तियां सेवा वृद्धि की उदारता होने पर ही पनप सकती हैं और उनके पनपने पर ही कोई राष्ट्र सुसम्पन्न एवं समुन्नत हो सकता है।

*क्रमशः* *........*
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*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
29/05/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।*

सेवा— मनुष्य का आत्मिक विकास कितना हुआ है, इसका प्रमाण उसकी सेवावृत्ति से लगाया जा सकता है। सेवा वह अग्नि है जिसमें तपे बिना कोई अन्तःकरण, शुद्धता, निर्मलता, उदारता एवं आध्यात्मिकता की कसौटी पर खरा उतर सकने योग्य नहीं बन सकता। संन्यास लेने से पूर्व जीवन का एक चौथाई भाग वानप्रस्थ में रहकर समाज सेवा करने के लिए नियत किया हुआ है। जो लोग सेवा धर्म की अत्यन्त आवश्यक प्रक्रिया से कतराते हैं और केवल भजन करके आत्मिक प्रगति की आशा करते हैं वे वैसे ही बालक हैं जो प्रथम कक्षा से छलांग मारकर अन्तिम कक्षा उत्तीर्ण करना चाहते हैं और बीच की सभी कक्षाओं को छोड़ देना चाहते हैं।
सद्विचारों का क्रियात्मक रूप सेवा है। आत्म शुद्धि का प्रत्यक्ष चिन्ह सेवा एवं परमार्थ में रुचि होना ही है। सेवा का आत्म सन्तोष से सीधा सम्बन्ध है। परोपकार की दृष्टि से निस्वार्थ भावना से हम जो कुछ करते हैं उसकी प्रतिक्रिया आत्म सन्तोष के रूप में तुरन्त ही परिलक्षित होने लगती है। आत्म-सन्तोष को ही शास्त्रों में सोम रस कहा गया है, उसे ही पीकर ऋषि-मुनि देवपद प्राप्त किया करते थे। सत्कार्यों द्वारा आत्म-सन्तोष की कुछ बूंदें जिन्हें उपलब्ध होती रहती हैं वे अपने को कृतकृत्य माने बिना नहीं रह सकते।

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .

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