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*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
18/04/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*

हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे।
ईश्वर में आस्था रखे बिना हमारी दुष्प्रवृत्तियां बिना नकेल के ऊंट की तरह, बिना लगाम के घोड़े की तरह, बिना नाथ के बैल की तरह, बिना अंकुश के हाथी की तरह, उच्छृंखलता अनीति और उद्दण्डता की ओर द्रुतगति से दौड़ने लगती हैं। पानी को ऊंचा चढ़ाने के लिए अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं पर नीचे की ओर तो वह बिना किसी प्रयास के ही बहने लगता है। मन की गति भी पानी के समान है, उसे सत्मार्ग पर चलाना हो तो अत्यधिक श्रमसाध्य साधन प्रयत्न करने पड़ते हैं, पर कुमार्ग की ओर तो वह सहज ही सरपट दौड़ने लगता है।
आस्तिकता मन को कुमार्ग पर दौड़ने से रोकने के लिए सबसे बड़ा अंकुश सिद्ध होता है।
पाप को छिपा लेने और राजदण्ड से बचे रहने की अगणित तरकीबें मनुष्य ने ढूंढ़ निकाली हैं। यों अदालत पुलिस, जेल, कचहरी सब कुछ व्यवस्था अपराधों के लिए मौजूद है, पर उनसे बचे रहकर अनीति बरतते रहने की जितनी कुशलता मनुष्य को प्राप्त है उसकी तुलना में राजदण्ड के सारे साधन तुच्छ मालूम पड़ते हैं।

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .
https://www.awgp.org/en/literature/akhandjyoti/1940/February/v2.6

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सर्वोत्तम तीर्थ - सर्वोत्तम तीर्थ - February 1940 - FebruaryNone

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*युग निर्माण सत्-सं...
16/04/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*सफल और सार्थक जीवन का आधार*

हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे।

युग निर्माण सत्-संकल्प के पहले वाक्य में आस्तिकता एवं कर्तव्य परायणता को अंगीकार करने की बात कही गयी है। उसे मानव जीवन के ‘धर्म कर्तव्य’ के रूप में स्वीकार करने एवं अपनाने की घोषणा की गयी है। धर्म-कर्तव्य यहां किन्हीं सम्प्रदायगत सीमित अर्थों में प्रयुक्त नहीं किया गया है। भारतीय संस्कृति में धर्म बड़ा व्यापक अर्थ रखता है। वह नियम जिन्हें धारण करने से व्यक्ति एवं समाज का सर्वांगीण हित साधन होता है, उसे धर्म कहा गया है। ‘धारणात् धर्म इत्याहु’ आदि से यही भाव निकलता है। अन्य परिभाषा में धर्म को लौकिक अभ्युदय एवं आत्मिक उत्कर्ष का आधार कहा गया है। ‘‘यतोभ्युदयः निश्रेयः सिद्धिः सः धर्म’’ वाक्य का यही निष्कर्ष है।
अस्तु धर्म कर्तव्य सामान्य कर्तव्यों से ऊपर वह कर्तव्य है जिनको जीवन में अपनाकर व्यक्ति से लेकर समाज तक और लौकिक से लेकर आत्मिक उत्कर्ष के मार्ग प्रशस्त होते हैं। इसीलिए धर्म कर्तव्यों को कष्ट सहकर भी, विपरीत परिस्थितियों में भी अपनाए रखने का आग्रह शास्त्रों एवं विचारकों द्वारा किया जाता रहा है। नव युग के अवतरण के लिए आस्तिकता एवं कर्तव्य परायणता को पूरी निष्ठा एवं दृढ़ता पूर्वक अपनाये रखने का मर्म यहां उभारा गया है। क्योंकि उसके अभाव में कोई उपयुक्त एवं स्थायी समाधान निकालना सम्भव नहीं है।

*क्रमशः* *........*
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15/04/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*महागायत्री की आराधना*

ब्रह्म निर्विकार है। इन्द्रियों से अतीत तथा बुद्धि से अगम्य है। उस तक सीधा पहुंचने का कोई मार्ग नहीं। नाम जप रूप का ध्यान, प्रार्थना, तपस्या, साधना, चिन्तन श्रवण, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण मात्र हैं। सतोगुणी माया, एवं चित शक्ति के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है क्योंकि यह खुला रहस्य है कि शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति राधा, सीता, सावित्री, पार्वती, आदि के रूप में गायत्री की पूजा की जाती है।
पिता से संबंध होने का कारण माता है। इसलिए पिता से माता का दर्जा ऊंचा है समुद्र से जल ला लाकर मेघ मालाएं ही वर्षा आयोजन करती हैं। ईश्वर की असीम आनन्द राशि का अस्वादन करने का सौभाग्य गायत्री माता द्वारा ही मानव प्राणी को प्राप्त होता है।
ब्रह्म की इच्छा, शक्ति, एवं क्रिया गायत्री है। उसी से उत्पत्ति, विकास एवं अवसान का आयोजन होता है। सुन्दरता, मधुरता, क्रीणा, सम्पत्ति, कीर्ति, आशा, प्रसन्नता, करुणा, मैत्री, आदि के रूप में यह महाशक्ति ही जीवन क्षेत्र को आनंदित एवं तरंगित करती रहती है। इस विश्वनारी की, महागायत्री की, महा माता की आराधना करके हम अधिकाधिक आनंद की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

*क्रमशः* *........*
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https://www.awgp.org/en/literature/book/Gayatri_no_Vainanik_adhar/v2.2

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गायत्री का वैज्ञानिक आधार - गायत्री का वैज्ञानिक आधार - गायत्री का वैज्ञानिक आधार - Gayatri no Vainanik adharNone

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*गायत्री साधना की व...
14/04/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*शिव से पहले शक्ति की पूजा*

इस विष विकार की भावना का शमन करने के लिए गायत्री साधना परम उपयोगी है। विश्व नारी के रूप में भगवान की मातृभाव से परम पुण्य भावनाओं के साथ आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दशा में जितनी सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से अन्य इन्द्रियों का निग्रह, मन का निरोध एवं अनेक मनो विकारों का शमन अपने आप होता जाता है। मातृ भक्त के हृदय में दुर्वासनाएं अधिक देर नहीं ठहर सकतीं।
श्री रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविंद घोष, छत्रपति शिवाजी आदि कितने ही महापुरुष शक्ति उपासक थे शक्ति धर्म भारत का प्रधान धर्म है। जन्म भूमि को हम भारत माता के रूप में पूजते हैं सभी राष्ट्र वादी भारत माता को, मातृ शक्ति की जय बोलते हैं और उसकी उपासना करते हैं। शिव से पहले शक्ति की पूजा है। लक्ष्मी नारायण, सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, आदि नामों में नारी को प्रथम और नर को गौण रखा गया है माता का, पिता और गुरु से भी पहला स्थान है। इस प्रकार विश्व नारी के रूप में भगवान की पूजा करना नर पूजा की अपेक्षा अधिक उत्तम उपयोगी है। गायत्री उपासना की यही विशेषता है।

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