16/01/2026
नशे में चूर, हिंसा की भूख से पागल,
AK-47 और RPG उठाए
दो हज़ार से ज़्यादा हत्यारे
एक गांव की ओर बढ़ रहे थे…
उस गांव में
तीस हज़ार निहत्थे लोग थे—
मांएं, बच्चे, बुज़ुर्ग
जिन्हें मौत बस एक कदम दूर से घूर रही थी।
और उन 30,000 जिंदगियों और कत्लेआम के बीच
सिर्फ़ 40 भारतीय सैनिक
चट्टान की तरह खड़े थे।
बाक़ी मदद रास्ते में थी,
पर रास्ते काट दिए गए थे।
चारों तरफ़ दुश्मन,
पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं।
यह कोई फ़िल्मी दृश्य नहीं था।
यह भारतीय सेना की वह गाथा थी
जो शोर नहीं करती—
सीधे इतिहास में उतरती है।
यह कहानी है
दक्षिण सूडान के मलाकाल की।
जहाँ संयुक्त राष्ट्र की शांति चौकी
अचानक
“व्हाइट आर्मी” नाम के
नरसंहार के इरादे से आए विद्रोहियों से घिर गई।
गांव वालों को लगा—
अब सब खत्म है।
लेकिन वे भूल गए थे
कि उनके गांव के दरवाज़े पर
कौन खड़ा है।
भारतीय सेना।
इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे
मेजर समर तूर
(8 राजपूताना राइफल्स)
जब हालात देखकर
कई पीसकीपिंग दस्ते डगमगा गए,
तब समर तूर आगे बढ़े—
और नेतृत्व को आदेश नहीं,
उदाहरण बना दिया।
व्हाइट आर्मी ने झुंड बनाकर
चौकी को रौंदने की कोशिश की।
उनका भरोसा संख्या पर था—
घमंड हथियारों पर।
पर उन्हें नहीं पता था
कि सामने
रणनीति खड़ी है।
72 घंटे।
लगातार।
भारतीय सैनिकों ने ऐसा जवाब दिया
कि 2,000 की भीड़
अपने ही साए से डरने लगी।
यह सिर्फ़ गोलीबारी नहीं थी—
यह दिमाग़ की जंग थी।
भारतीय स्नाइपर्स ने
800 मीटर दूर से
विद्रोही कमांडरों को
एक-एक कर खामोश करना शुरू किया।
दुश्मन को समझ ही नहीं आया—
गोली कहां से आ रही है,
कमान कौन संभाले,
और अब भागें या लड़ें?
मेजर तूर की बनाई रणनीति ने
उनकी कमान भी तोड़ी
और मनोबल भी।
जब उग्र भीड़ ने
घेरा तोड़ने की कोशिश की,
तब BMP-2 बख़्तरबंद वाहन
आगे बढ़े
और दुश्मन का रास्ता
उसी पर बंद कर दिया।
नतीजा साफ़ था—
2,000 हारे।
40 जीते।
अनुशासन ने
अराजकता को कुचल दिया।
व्हाइट आर्मी
पीछे नहीं हटी—
वो हथियार छोड़कर भागी।
मलाकाल बच गया।
हज़ारों जिंदगियां बच गईं।
इस अद्वितीय नेतृत्व और साहस के लिए
मेजर समर तूर को
शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।
उन्होंने साबित कर दिया—
भारतीय सैनिक के लिए
सीमा नहीं,
कर्तव्य सर्वोपरि होता है।
लेकिन यह विजय
बलिदान के बिना नहीं आई।
लेफ्टिनेंट कर्नल महिपाल सिंह
(9 मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री)
घात में फंसे BMP काफ़िले को
खुद लीड करते हुए आगे बढ़े
ताकि भारतीय घेरा न टूटे।
छाती में गोलियां लगीं,
पर बंदूक नहीं गिरी।
आख़िरी सांस तक
जवाबी फायर करते रहे।
सूबेदार धर्मेश सांगवान
और
सूबेदार कुमार पाल सिंह
अकोबो में
2,000 की उग्र भीड़ के सामने
डटकर खड़े रहे।
निर्दोष नागरिकों को सौंपने से इनकार किया—
और वीरगति को स्वीकार किया।
हवलदार हीरा लाल
हवलदार भारत ससमाल
नायब सूबेदार शिव कुमार पाल
ये नाम
तारीख़ नहीं—
संस्कार हैं।
जब दुनिया ने सूडान से मुंह मोड़ लिया,
तब भारतीय शांति सेना
ढाल बनकर खड़ी रही।
मलाकाल ने फिर सिखाया—
चाहे कारगिल की बर्फ़ हो
या अफ्रीका की धूल,
भारतीय सेना
वहीं मिलती है
जहाँ मानवता खतरे में होती है।
इस युद्ध के बाद
मेजर समर तूर ने
बंदूक छोड़ दी—
ताकि अपने भाइयों के लिए
और बेहतर हथियार बना सकें।
आज उनकी रक्षा कंपनी
उन्हीं विशेष बलों को सशक्त कर रही है
जिनके साथ
उन्होंने मोर्चा संभाला था।
अब सिनेमा भी
इस कहानी की ओर बढ़ रहा है।
लेकिन फ़िल्म से पहले
हमें
असली नायकों को जानना होगा।
मलाकाल कोई कहानी नहीं—
यह सबक है।
जब देश और संस्थाएं डगमगाती हैं,
तब सैनिक
शांत, नैतिक
और निर्णायक बनकर खड़ा रहता है—
जान लेने को भी
और जान देने को भी।
मलाकाल में
भारतीय सेना पीछे हट सकती थी।
ना वो देश हमारा था,
ना वो लोग।
फिर भी वे लड़े—
क्योंकि
मानवता भारत की फितरत है।
वे अपनी सेना के नाम पर लड़े—
जिसका इतिहास स्वर्णिम है।
वे लड़े
बाघों की तरह।
मलाकाल
संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में
भारतीय सेना की विरासत का
स्वर्ण अध्याय है।
इसे कहा जाना चाहिए।
इसे याद रखा जाना चाहिए।
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