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पद्मा एकादशी (जलझूलनी एकादशी) व्रत  (7 सितम्बर 2022, बुधवार) कथा:इसे जयंती, वामन और परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। युधिष...
07/09/2022

पद्मा एकादशी (जलझूलनी एकादशी) व्रत (7 सितम्बर 2022, बुधवार) कथा:
इसे जयंती, वामन और परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

युधिष्ठिर ने पूछा : केशव ! कृपया यह बताइये कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है, उसके देवता कौन हैं और कैसी विधि है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें आश्चर्यजनक कथा सुनाता हूँ, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद से कहा था ।

नारदजी ने पूछा : चतुर्मुख ! आपको नमस्कार है ! मैं भगवान विष्णु की आराधना के लिए आपके मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

ब्रह्माजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । क्यों न हो, वैष्णव जो ठहरे ! भादों के शुक्लपक्ष की एकादशी ‘पद्मा’ के नाम से विख्यात है । उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा होती है । यह उत्तम व्रत अवश्य करने योग्य है । सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि हो गये हैं । वे अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया करते थे । उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था, मानसिक चिन्ताएँ नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था । उनकी प्रजा निर्भय तथा धन धान्य से समृद्ध थी । महाराज के कोष में केवल न्यायोपार्जित धन का ही संग्रह था । उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने अपने धर्म में लगे रहते थे । मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देनेवाली थी । उनके राज्यकाल में प्रजा को बहुत सुख प्राप्त होता था ।

एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर राजा के राज्य में तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई । इससे उनकी प्रजा भूख से पीड़ित हो नष्ट होने लगी । तब सम्पूर्ण प्रजा ने महाराज के पास आकर इस प्रकार कहा :

प्रजा बोली: नृपश्रेष्ठ ! आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए । पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नार’ कहा है । वह ‘नार’ ही भगवान का ‘अयन’ (निवास स्थान) है, इसलिए वे‘नारायण’ कहलाते हैं । नारायणस्वरुप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापकरुप में विराजमान हैं । वे ही मेघस्वरुप होकर वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है । नृपश्रेष्ठ ! इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, अत: ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे हमारे योगक्षेम का निर्वाह हो ।

राजा ने कहा : आप लोगों का कथन सत्य है, क्योंकि अन्न को ब्रह्म कहा गया है । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जगत जीवन धारण करता है । लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराण में भी बहुत विस्तार के साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है, किन्तु जब मैं बुद्धि से विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं दिखायी देता । फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूर्ण प्रयत्न करुँगा ।

ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने गिने व्यक्तियों को साथ ले, विधाता को प्रणाम करके सघन वन की ओर चल दिये । वहाँ जाकर मुख्य मुख्य मुनियों और तपस्वियों के आश्रमों पर घूमते फिरे । एक दिन उन्हें ब्रह्मपुत्र अंगिरा ॠषि के दर्शन हुए । उन पर दृष्टि पड़ते ही राजा हर्ष में भरकर अपने वाहन से उतर पड़े और इन्द्रियों को वश में रखते हुए दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनि ने भी ‘स्वस्ति’ कहकर राजा का अभिनन्दन किया और उनके राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी । राजा ने अपनी कुशलता बताकर मुनि के स्वास्थय का समाचार पूछा । मुनि ने राजा को आसन और अर्ध्य दिया । उन्हें ग्रहण करके जब वे मुनि के समीप बैठे तो मुनि ने राजा से आगमन का कारण पूछा ।

राजा ने कहा : भगवन् ! मैं धर्मानुकूल प्रणाली से पृथ्वी का पालन कर रहा था । फिर भी मेरे राज्य में वर्षा का अभाव हो गया । इसका क्या कारण है इस बात को मैं नहीं जानता ।

ॠषि बोले : राजन् ! सब युगों में उत्तम यह सत्ययुग है । इसमें सब लोग परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं तथा इस समय धर्म अपने चारों चरणों से युक्त होता है । इस युग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे लोग नहीं । किन्तु महाराज ! तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या करता है, इसी कारण मेघ पानी नहीं बरसाते । तुम इसके प्रतिकार का यत्न करो, जिससे यह अनावृष्टि का दोष शांत हो जाय ।

राजा ने कहा : मुनिवर ! एक तो वह तपस्या में लगा है और दूसरे, वह निरपराध है । अत: मैं उसका अनिष्ट नहीं करुँगा । आप उक्त दोष को शांत करनेवाले किसी धर्म का उपदेश कीजिये ।

ॠषि बोले : राजन् ! यदि ऐसी बात है तो एकादशी का व्रत करो । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो ‘पधा’ नाम से विख्यात एकादशी होती है, उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय ही उत्तम वृष्टि होगी । नरेश ! तुम अपनी प्रजा और परिजनों के साथ इसका व्रत करो ।

ॠषि के ये वचन सुनकर राजा अपने घर लौट आये । उन्होंने चारों वर्णों की समस्त प्रजा के साथ भादों के शुक्लपक्ष की ‘पद्मा एकादशी’ का व्रत किया । इस प्रकार व्रत करने पर मेघ पानी बरसाने लगे । पृथ्वी जल से आप्लावित हो गयी और हरी भरी खेती से सुशोभित होने लगी । उस व्रत के प्रभाव से सब लोग सुखी हो गये ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! इस कारण इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए । ‘पद्मा एकादशी’ के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढकँकर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए, साथ ही छाता और जूता भी देना चाहिए । दान करते समय निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए :

नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक ॥
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव ।
भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥

‘बुधवार और श्रवण नक्षत्र के योग से युक्त द्वादशी के दिन बुद्धश्रवण नाम धारण करनेवाले भगवान गोविन्द ! आपको नमस्कार है… नमस्कार है ! मेरी पापराशि का नाश करके आप मुझे सब प्रकार के सुख प्रदान करें । आप पुण्यात्माजनों को भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा सुखदायक हैं |’

राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।
Rajesh Sharma

08/07/2022

प्रश्नकर्ता - क्या दुर्गा पूजा में वेश्या के घर से मिट्टी लाकर मूर्ति बनाने का विधान है ?

निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु - दुर्गा पूजा में प्रतिमा निर्माण हेतु वेश्या के घर से मिट्टी लाने का आचार कई परम्पराएं पालन करती आ रही हैं। इसको माध्यम बनाकर परम मूढ़ता और मूर्खता से ग्रस्त कुमार्गगामी नरपिशाच गण श्रीदेवी के सन्दर्भ में अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं। सबसे पहले हम वेश्या की तन्त्रोक्त परिभाषा देखेंगे :-

कुलमार्गे प्रवृत्ता या सा वेश्या मोक्षदायिनी।
एवंविधा भवेद्वेश्या न वेश्या कुलटा प्रिये॥

शिव जी कहते हैं, कि व्यभिचार में रत कुलटा स्त्री को तन्त्र में वेश्या नहीं कहा गया है, अपितु कुलमार्ग में स्थित जो मोक्ष को देने वाली साधिका है, उसे वेश्या कहा गया है।

अब कुलमार्ग क्या है, यह गुरुपरम्परागम्य गूढ़ शाक्ताचार से सम्बंधित है, इसीलिए अधिक नहीं लिखूंगा, किन्तु कुलार्णव तन्त्र में वर्णित सामान्य परिभाषा बताता हूँ :-

कुलं कुंडलिनी शक्तिरकुलन्तु महेश्वर:।
कुलाकुलस्यतत्वज्ञ: कौल इत्यभिधीयते॥

कुण्डलिनी शक्ति को कुल और परमशिव को अकुल कहा गया है, इन दोनों का रहस्य जानने वाला ब्रह्मवेत्ता ही कौल यानी कुलमार्ग का अनुसरण करने वाला है।

तन्त्र की परिभाषा के अंतर्गत जिस वेश्या का वर्णन है, वह परम साध्वी होती है :-

शिवलिंगगता साध्वी शिवलिंगगता सती।
शिवलिंगगता वेश्या कीर्तिता सा पतिव्रता॥
(निरुत्तर तन्त्र)

शिवलिंग (ब्रह्मभाव की पहचान) में जो स्थित है, वही साध्वी, सती, वेश्या है और उसे ही पतिव्रता कहा गया है।

यहां साध्वी, सती, पतिव्रता तो ठीक है, किन्तु वेश्या शब्द का अर्थ विरोधाभासी होने से इसका कारण निम्न उक्ति से स्पष्ट किया गया है :-
वेश्यावद्भ्रमते यस्मात्तस्माद्वेश्या प्रकीर्तिता।

जैसे (लोक)वेश्या बिना किसी के प्रति आसक्ति रखे केवल धनपरायणा होकर स्वच्छन्द विहार करती है, वैसे ही (बिना किसी के प्रति आसक्ति रखे केवल ब्रह्मपरायणा होकर) स्वच्छन्द विहार करने वाली होने से ऐसी साधिका को वेश्या कहा गया है।

अब यह वेश्या सात प्रकार की होती है :-

गुप्तवेश्या महावेश्या कुलवेश्या महोदया।
राजवेश्या देववेश्या ब्रह्मवेश्या च सप्तधा॥
(निरुत्तर तन्त्र)

गुप्तवेश्या, महावेश्या, कुलवेश्या, महोदयावेश्या, राजवेश्या, देववेश्या एवं ब्रह्मवेश्या, ये सात प्रकार की वेश्याओं का वर्णन तन्त्र में है।

गरुड़ पुराण, नारद पुराण, गर्ग संहिता आदि में निम्न सात तीर्थपुरियों को मोक्षदायिनी बताया गया है :-

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥
(मायापुरी हरिद्वार को कहते हैं)

इसी प्रकार हमारे पुराणों में वर्णित सात महान् मोक्षमूलक तीर्थों का भी तन्त्र में यही संकेत है :-

गुप्तवेश्या महावेश्या अयोध्या मथुरा प्रिये।
माया च कुलवेश्या स्यात् महोदया च कालिका॥
राजवेश्या देववेश्या द्वारका परिकीर्तिता।
कांची च राजवेश्या स्याद्देववेश्या अवन्तिका॥
द्वारावती ब्रह्मवेश्या सप्तैते मोक्षदायिका॥
(निरुत्तर तन्त्र)

अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, अवन्तिका एवं द्वारिका, ये क्रमशः गुप्तवेश्या, महावेश्या, कुलवेश्या, महोदयावेश्या, राजवेश्या, देववेश्या एवं ब्रह्मवेश्या हैं। द्वारिका को मतांतर से राजवेश्या अथवा देववेश्या भी कहा गया है।

इस प्रकार से उपर्युक्त परिभाषा से युक्त साधिका के घर की मिट्टी अथवा उपर्युक्त तीर्थों की मिट्टी लेकर प्रतिमा बनाने का विधान तन्त्रशास्त्र में है। उपर्युक्त तीर्थों का सेवन करने वाला ही तन्त्रोक्त परिभाषा के अनुसार वेश्यागामी है और इसीलिए वेश्यागामी को तत्वज्ञानी एवं मोक्ष का अधिकारी बताया गया।

कुलपूजां विना देवि तत्वज्ञानं न जायते।
तत्वज्ञानं विना देवि निर्वाणं नैव जायते॥

हमारे शास्त्रों में सर्वाधिक गूढ़ और गोपनीयता की बातें तन्त्रग्रंथ में ही हैं जिन्हें समझना ऊपरी दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं। बहुत से तंत्रों को जानबूझकर कर ऐसी भाषा और शैली में बताया और लिखा गया है कि सामान्य लोग उसे न जान पाएं और सिद्धियों का दुरूपयोग न हो। अतएव अपने धर्म और धर्मग्रंथों में पूर्ण आस्था रखें औए यदि कोई संदेह हो तो साधक एवं रहस्यवादियों के पास जाकर शंका समाधान करें। गूगल बाबा और पाखंडियों के फेर में न रहें।

(यह लेख मेरी पुस्तक "अमृत वचन" - पृष्ठ ३९३ में प्रकाशित हो चुका है)

24 एकादशी में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी व्रत:11 जून 2022 शनिवार महात्म्य: युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के ...
11/06/2022

24 एकादशी में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी व्रत:
11 जून 2022 शनिवार

महात्म्य: युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं ।

तब वेदव्यासजी कहने लगे : दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए ।

यह सुनकर भीमसेन बोले : परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी ।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना ।

भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा ।

व्यासजी ने कहा : भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे । वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है ।

एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते । अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं । अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो । स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है । जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है । उसे एक एक प्रहर में कोटि कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है । मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है । निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है । इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है ।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।

कुन्तीनन्दन ! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं । जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है । निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए । जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है । चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है । पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि : ‘मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा ।’ द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए । गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे :

देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक ।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

‘संसारसागर से तारनेवाले हे देवदेव ह्रषीकेश ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये ।’

भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए । उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है । तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे । जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है ।
यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया । तबसे यह लोक मे ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई ।
इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है। हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

अपरा एकादशी (दिनांक 26 मई 2022 गुरुवार)व्रत कथा(इस कथा को मात्र पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है)युधिष...
26/05/2022

अपरा एकादशी (दिनांक 26 मई 2022 गुरुवार)

व्रत कथा

(इस कथा को मात्र पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है)

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है सो कृपा कर कहिए?

भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! यह एकादशी ‘अचला’ तथा’ अपरा दो नामों से जानी जाती है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं।

इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भू‍त योनि, दूसरे की निंदा आदि के सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी बनना तथा झूठा वैद्य बनना आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए वे नरकगामी होते हैं, परंतु अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं। मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं।

जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्णदान करने से अथवा अर्द्ध प्रसूता गौदान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है।

यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए ‍अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है।

इसकी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा।

एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया।

दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।

हे राजन! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है। इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

मोहिनी एकादशी व्रत आज 12 मई गुरुवार :मोहिनी एकादशी व्रत कथाधर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे कृष्ण! वैशाख मास की शुक्ल एक...
12/05/2022

मोहिनी एकादशी व्रत आज 12 मई गुरुवार :

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे कृष्ण! वैशाख मास की शुक्ल एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी क्या कथा है? इस व्रत की क्या विधि है, सो सब विस्तारपूर्वक कहिए। श्रीकृष्ण जी कहने लगे कि हे धर्मराज! मैं आपसे एक कथा कहता हूँ, जिसको महर्षि वशिष्ठ जी ने श्री रामचंद्रजी से कहा था एक समय श्री रामचंद्रजी बोले, हे गुरुदेव! कोई ऐसा व्रत बतलाओ जिससे समस्त पाप और दु:ख नाश को प्राप्त हो जाएँ। मैंने सीताजी के वियोग में बहुत से दु:ख भोगे हैं अत: आप कोई व्रत बतलाइए। महर्षि वशिष्ठ बोले, हे राम! आपने बहुत सुंदर प्रश्न किया है।

आपकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध और पवित्र है। यद्यपि आपके नाम का स्मरण करने से ही मनुष्य पवित्र और शुद्ध हो जाता है तो भी आपका यह प्रश्न लोकहित के लिए बहुत ही सुंदर है। वैशाख मास में जो एकादशी आती है उसका नाम मोहिनी एकादशी है। इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य सब पापों से तथा दु:खों से छूटकर मोह जाल से मुक्त हो जाता है। अत: यह व्रत दु:खी मनुष्‍यों को अवश्य करना चाहिए। इससे मनुष्य के सब पाप और दु:ख नाश को प्राप्त हो जाते हैं। अब आप इसकी कथा ध्यानपूर्वक सुनिए। सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नामक एक नगरी थी, वहाँ पर द्युतिमान नामक चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। इसी नगरी में धन-धान्य से पूर्ण पुण्यवान धनपाल नामक एक वैश्य भी रहता था। वह अत्यंत धर्मात्मा एवं विष्णु भक्त था। उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुआँ, सरोवर, धर्मशाला आदि बनवाए थे और सड़क पर आम, जामुन, नीम आदि के अनेक वृक्ष लगवाए थे। उस वैश्य के पाँच पुत्र थे – सुमना, सद्‍बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि। इनमें धृष्टबुद्धि नाम वाला पाँचवाँ पुत्र महापापी था। वह पितर आदि को नहीं मानता था। वह वेश्या और दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेलता तथा पर-स्त्रियों के साथ भोग विलास करता, मद्य-माँस का सेवन करता।

और भी अनेक कुकर्मों में वह अपने पिता के धन को नष्ट करता था। वेश्याओं के साथ गले में हाथ डालकर फिरता रहता था। इन्हीं कारणों से उसके पिता, भाइयों तथा कुटुम्बियों ने उसको घर से निकाल दिया और उसकी निंदा करने लगे। घर से निकाल देने के बाद वह अपने गहने और कपड़े बेचकर निर्वाह करने लगा। जब सब धन नष्ट हो गया तो वेश्या और दुष्ट संगी-साथियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। अब वह भूख और प्यास से अत्यंत दु:खी रहने लगा। और कोई सहारा ने देख कर वह चोरी करने लगा। एक बार वह पकड़ा गया परंतु राज्य कर्मचारियों ने उसको वैश्य का पुत्र जानकर छोड़ दिया। मगर जब दूसरी बार वह फिर पकड़ा गया तो उसे उन्होंने राजा के सामने उपस्थित कर दिया। राजा ने उसे कारागार में बंद कर दिया। कारागार में राजा ने उसको बहुत ‍दु:ख दिए और कहा कि तू मेरी नगरी से निकल जा। वह नगरी से निकल वन में चला गया और वन में पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। कुछ समय के पश्चात् वह बहेलिया बन गया और धनुष्य-बाण लेकर पशु-पक्षियों को मार-मारकर खाने लगा। एक दिन वह भूख और प्यास से दुखित होकर खाने की खोज में फिर रहा था कि कौडिन्य ऋषि के आश्रम पर पहुँच गया।

उस समय वैशाख मास था और कौडिन्य ऋषि गंगा स्नान करके आ रहे थे। उनके भीगे वस्त्र के छींटे पड़ने से उसको कुछ सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई और वह मुनि के सामने हाथ जोड़कर कहने लगा कि हे मुने! मैंने अपने जीवन में बहुत भारी पाप किए हैं आप उन पापों से छूटने का कोई साधारण और बिना धन का उपाय बतलाइए। उसके दीन वचन सुनकर ऋषि कहने लगे कि ध्यान देकर सुनो। तुम वैशाख शुक्ल एकादशी व्रत करो। इस एकादशी का नाम मोहिनी है और इससे तेरे सब पाप नष्ट हो जाएँगे। मुनि के वचन सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उनके द्वारा बताई हुई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी का व्रत किया। हे राम! इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक गया। इस व्रत से मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं। संसार में इस व्रत से श्रेष्ठ अन्य कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य को पढ़ने अथवा सुनने से एक हजार गौ दान का फल प्राप्त होता है।

पुत्रदा एकादशी 13/1/2022 गुरुवार : (इसके माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है )युधिष्ठिर बोले: श...
12/01/2022

पुत्रदा एकादशी 13/1/2022 गुरुवार :

(इसके माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है )

युधिष्ठिर बोले: श्रीकृष्ण ! कृपा करके पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का माहात्म्य बतलाइये । उसका नाम क्या है? उसे करने की विधि क्या है ? उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ?
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: राजन्! पौष मास के शुक्लपक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम ‘पुत्रदा’ है ।
‘पुत्रदा एकादशी’ को नाम-मंत्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा श्रीहरि का पूजन करे । नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा नींबू, जमीरा नींबू, अनार, सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम के फलों से देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए । इसी प्रकार धूप दीप से भी भगवान की अर्चना करे ।
‘पुत्रदा एकादशी’ को विशेष रुप से दीप दान करने का विधान है । रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए । जागरण करनेवाले को जिस फल की प्राप्ति होति है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने से भी नहीं मिलता । यह सब पापों को हरनेवाली उत्तम तिथि है ।
चराचर जगतसहित समस्त त्रिलोकी में इससे बढ़कर दूसरी कोई तिथि नहीं है । समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता भगवान नारायण इस तिथि के अधिदेवता हैं ।
पूर्वकाल की बात है, भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे । उनकी रानी का नाम चम्पा था । राजा को बहुत समय तक कोई वंशधर पुत्र नहीं प्राप्त हुआ । इसलिए दोनों पति पत्नी सदा चिन्ता और शोक में डूबे रहते थे । राजा के पितर उनके दिये हुए जल को शोकोच्छ्वास से गरम करके पीते थे । ‘राजा के बाद और कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो हम लोगों का तर्पण करेगा …’ यह सोच सोचकर पितर दु:खी रहते थे ।
एक दिन राजा घोड़े पर सवार हो गहन वन में चले गये । पुरोहित आदि किसीको भी इस बात का पता न था । मृग और पक्षियों से सेवित उस सघन कानन में राजा भ्रमण करने लगे । मार्ग में कहीं सियार की बोली सुनायी पड़ती थी तो कहीं उल्लुओं की । जहाँ तहाँ भालू और मृग दृष्टिगोचर हो रहे थे । इस प्रकार घूम घूमकर राजा वन की शोभा देख रहे थे, इतने में दोपहर हो गयी । राजा को भूख और प्यास सताने लगी । वे जल की खोज में इधर उधर भटकने लगे । किसी पुण्य के प्रभाव से उन्हें एक उत्तम सरोवर दिखायी दिया, जिसके समीप मुनियों के बहुत से आश्रम थे । शोभाशाली नरेश ने उन आश्रमों की ओर देखा । उस समय शुभ की सूचना देनेवाले शकुन होने लगे । राजा का दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ फड़कने लगा, जो उत्तम फल की सूचना दे रहा था । सरोवर के तट पर बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे । उन्हें देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ । वे घोड़े से उतरकर मुनियों के सामने खड़े हो गये और पृथक् पृथक् उन सबकी वन्दना करने लगे । वे मुनि उत्तम व्रत का पालन करनेवाले थे । जब राजा ने हाथ जोड़कर बारंबार दण्डवत् किया, तब मुनि बोले : ‘राजन् ! हम लोग तुम पर प्रसन्न हैं।’
राजा बोले: आप लोग कौन हैं ? आपके नाम क्या हैं तथा आप लोग किसलिए यहाँ एकत्रित हुए हैं? कृपया यह सब बताइये ।
मुनि बोले: राजन् ! हम लोग विश्वेदेव हैं । यहाँ स्नान के लिए आये हैं । माघ मास निकट आया है । आज से पाँचवें दिन माघ का स्नान आरम्भ हो जायेगा । आज ही ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी है,जो व्रत करनेवाले मनुष्यों को पुत्र देती है ।
राजा ने कहा: विश्वेदेवगण ! यदि आप लोग प्रसन्न हैं तो मुझे पुत्र दीजिये।
मुनि बोले: राजन्! आज ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी है। इसका व्रत बहुत विख्यात है। तुम आज इस उत्तम व्रत का पालन करो । महाराज! भगवान केशव के प्रसाद से तुम्हें पुत्र अवश्य प्राप्त होगा ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: युधिष्ठिर ! इस प्रकार उन मुनियों के कहने से राजा ने उक्त उत्तम व्रत का पालन किया । महर्षियों के उपदेश के अनुसार विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ का अनुष्ठान किया । फिर द्वादशी को पारण करके मुनियों के चरणों में बारंबार मस्तक झुकाकर राजा अपने घर आये । तदनन्तर रानी ने गर्भधारण किया । प्रसवकाल आने पर पुण्यकर्मा राजा को तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट कर दिया । वह प्रजा का पालक हुआ ।
इसलिए राजन्! ‘पुत्रदा’ का उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिए । मैंने लोगों के हित के लिए तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है । जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर ‘पुत्रदा एकादशी’ का व्रत करते हैं, वे इस लोक में पुत्र पाकर मृत्यु के पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है ।

शास्त्रों के अनुसार दीपावली के दिनों में न करें ये 7 कामदीपावली के दिनों में देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए कई प्रक...
30/10/2021

शास्त्रों के अनुसार दीपावली के दिनों में न करें ये 7 काम

दीपावली के दिनों में देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के उपाय किए जाते है, पूजा की जाती है, लेकिन इन उपायों के साथ ही कुछ सावधानियां भी रखनी जरूरी हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि दीपावली के दिनों में हमें कौन-कौन काम नहीं करना चाहिए। यदि वर्जित किए गए काम दीपावली पर किए जाते हैं तो कई उपाय करने के बाद भी लक्ष्मी कृपा प्राप्त नहीं हो पाती है।
१. सुबह देर तक नहीं सोना चाहिए

वैसे तो हर रोज सुबह जल्दी उठ जाना चाहिए, लेकिन काफी लोग ऐसे हैं जो सुबह देर से ही उठते हैं। शास्त्रों के अनुसार दीपावली के दिनों में ब्रह्म मुहूर्त में ही उठ जाना चाहिए। जो लोग इन दिनों में सूर्योदय के बाद तक सोते रहते हैं, उन्हें महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं हो पाती है।

२. माता-पिता और बुजुर्गों का अपमान न करें🙏🙏

दीपावली पर इस बात का विशेष ध्यान रखें कि किसी भी परिस्थिति में कोई अधार्मिक काम न हो। माता-पिता एवं बुजुर्गों का सम्मान करें। जो लोग माता-पिता का अनादर करते हैं, उनके यहां देवी-देवताओं की कृपा नहीं होती है और दरिद्रता बनी रहती है। किसी को धोखा ना दें। झूठ न बोलें। सभी से प्रेम पूर्वक व्यवहार करें।

३. घर में गंदगी न रखें👌👌
दीपावली पर घर में गंदगी नहीं होना चाहिए। घर का कोना-कोना एकदम साफ एवं स्वच्छ होना चाहिए। किसी भी प्रकार की बदबू घर में या घर के आसपास नहीं होनी चाहिए। सफाई के साथ ही घर को महकाने के लिए सुगंधित पदार्थों का उपयोग किया जा सकता है।

४.क्रोध न करें🙏🙏
दीपावली पर क्रोध नहीं करना चाहिए और जोर से चिल्लाना भी अशुभ रहता है। जो लोग इन दिनों क्रोध करते हैं या जोर से चिल्लाते हैं, उन्हें लक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं हो पाती है। घर में शांत, सुखद एवं पवित्र वातावरण बनाए रखना चाहिए। लक्ष्मी ऐसे घरों में निवास करती हैं जहां शांति रहती है।

५. शाम के समय न सोएं🙏🙏
कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर दिन में या शाम के समय सोना नहीं चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बीमार है, वृद्ध है या कोई स्त्री गर्भवती है तो वह दिन में या शाम को सो सकती हैं, लेकिन स्वस्थ व्यक्ति को दिन में या शाम को सोना नहीं चाहिए। शास्त्रों के अनुसार जो लोग ऐसे समय में सोते हैं, वे निर्धन बने रहते हैं।

६. वाद-विवाद न करें🙏🙏
इन दिनों में इस बात का भी ध्यान रखें कि घर में किसी भी प्रकार का कलह या झगड़ा नहीं होना चाहिए। घर-परिवार के सभी सदस्य प्रेम से रहें और खुशी का माहौल बनाकर रखें। जिन घरों में झगड़ा या कलह होता है, वहां देवी की कृपा नहीं होती है। घर के साथ ही बाहर भी इस बात का ध्यान रखें कि किसी से वाद-विवाद या झगड़ा ना करें।

७.नशा न करें🙏👍
शास्त्रों के अनुसार इन दिनों में किसी भी प्रकार का नशा करना वर्जित किया गया है। जो लोग दीपावली के दिन नशा करते हैं, वे हमेशा दरिद्र रहते हैं। नशे की हालत में घर की शांति भंग हो सकती है और सभी सदस्यों को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। इससे बचना चाहिए। अन्यथा वाद-विवाद हो सकते हैं और लक्ष्मी पूजा भी ठीक से नहीं हो पाती है।

🚩जय श्री हरि 🚩
🚩जय सियाराम 🚩

.                        कार्तिक माहात्म्य                              अध्याय - 10          राजा पृथु बोले – हे ऋषिश्रे...
30/10/2021

. कार्तिक माहात्म्य
अध्याय - 10

राजा पृथु बोले – हे ऋषिश्रेष्ठ नारद जी! आपको प्रणाम है। कृपया अब यह बताने की कृपा कीजिए कि जब भगवान शंकर ने अपने मस्तक के तेज को क्षीर सागर में डाला तो उस समय क्या हुआ?
नारद जी बोले – हे राजन्! जब भगवान शंकर ने अपना वह तेज क्षीर सागर में डाल दिया तो उस समय वह शीघ्र ही बालक होकर सागर के संगम पर बैठकर संसार को भय देने वाला रूदन करने लगा। उसके रूदन से सम्पूर्ण जगत व्याकुल हो उठा। लोकपाल भी व्याकुल हो गये। चराचर चलायमान हो गया। शंकर सुवन के रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याकुल हो गया। यह देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि व्याकुल होकर ब्रह्माजी की शरण में गये और उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे। उन सभी ने ब्रह्मा जी से कहा – हे पितामह! यह तोन बहुत ही विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। हे महायोगिन! इसको नष्ट कीजिए।
देवताओं के मुख से इस प्रकार सुनकर ब्रह्माजी सत्यलोक से उतरकर उस बालक को देखने के लिए सागर तट पर आये। सागर ने ब्रह्मा जी को आता देखकर उन्हें प्रणाम किया और बालक को उठाकर उनकी गोद में दे दिया। आश्चर्य चकित होते हुए ब्रह्मा जी ने पूछा – हे सागर! यह बालक किसका है, शीघ्रतापूर्वक कहो।
सागर विनम्रतापूर्वक बोला – प्रभो! यह तो मुझे ज्ञात नहीं है परन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि यह गंगा सागर के संगम पर प्रगट हुआ है इसलिए हे जगतगुरु! आप इस बालक का जात कर्म आदि संस्कार कर के इसका जातक फल बताइए।
नारद जी राजा पृथु से बोले – सागर ब्रह्माजी के गले में हाथ डालकर बार-बार उनका आकर्षण कर रहा था। फिर तो उसने ब्रह्माजी का गला इतनी जोर से पकड़ा कि उससे पीड़ित होकर ब्रह्मा जी की आँखों से अश्रु टपकने लगे। ब्रह्माजी ने अपने दोनों हाथों का जोर लगाकर किसी प्रकार सागर से अपना गला छुड़वाया और सागर से कहा – हे सागर! सुनो, मैं तुम्हारे इस पुत्र का जातक फल कहता हूँ। मेरे नेत्रों से जो यह जल निकला है इस कारण इसका नाम जलन्धर होगा। उत्पन्न होते ही यह तरुणावस्था को प्राप्त हो गया है इसलिए यह सब शास्त्रों का पारगामी, महापराक्रमी, महावीर, बलशाली, महायोद्धा और रण में विजय प्राप्त करने वाला होगा।
यह बालक सभी दैत्यों का अधिपति होगा। यह किसी से भी पराजित न होने वाला तथा भगवान विष्णु को भी जीतने वाला होगा। भगवान शंकर को छोड़कर यह सबसे अवध्य होगा। जहां से इसकी उत्पत्ति हुई है यह वहीं जायेगा। इसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता, सौभाग्यशालिनी, सर्वांगसुन्दरी, परम मनोहर, मधुर वाणी बोलने वाली तथा शीलवान होगी।
सागर से इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी ने शुक्राचार्य को बुलवाया और उनके हाथों से बलक का राज्याभिषेक कराकर स्वयं अन्तर्ध्यान हो गये। बालक को देखकर सागर की प्रसन्नता की सीमा न रही, वह हर्षित मन से घर आ गया। फिर सागर में उस बालक का लालन-पालन कर उसे पुष्ट किया, फिर कालनेमि नामक असुर को बुलाकर वृन्दा नामक कन्या से विधिपूर्वक उसका विवाह करा दिया। उस विवाह में बहुत बड़अ उत्सव हुआ। श्री शुक्राचार्य के प्रभाव से पत्नी सहित जलन्धर दैत्यों का राजा हो गया।
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