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B S Chauhan Page Dr Brijpal Singh Chouhan
ND (Naturopathy)

गुरुवर श्री के चरणों में नमन करता हुआ आप सभी देशवासियों को नए वर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनायें
01/01/2026

गुरुवर श्री के चरणों में नमन करता हुआ आप सभी देशवासियों को नए वर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनायें

🌸 संस्कारों का अमर प्रकाश: धन की क्षणभंगुर चमक से परे 🌸तमिलनाडु की हरी-भरी वादियों में, जहां समुद्र की लहरें चट्टानों से...
16/12/2025

🌸 संस्कारों का अमर प्रकाश: धन की क्षणभंगुर चमक से परे 🌸
तमिलनाडु की हरी-भरी वादियों में, जहां समुद्र की लहरें चट्टानों से टकराकर गीत गाती हैं, वहां एक शांत आश्रम था। उस आश्रम में बैठे थे संत तिरुवल्लुवर – वे महान कवि और दार्शनिक, जिनकी आंखों में जीवन का पूरा सार झलकता था। उनकी सादगी भरी मुस्कान और गहरी वाणी से हजारों लोग मार्गदर्शन पाते थे। एक दोपहर, जब सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों से छनकर जमीन पर सुनहरी चादर बिछा रही थीं, दूर से एक धनी सेठ आता दिखाई दिया।
सेठ का नाम था रामनाथन। उसके कदम भारी थे, जैसे दिल पर बोझ लदा हो। रेशमी वस्त्र, सोने की अंगूठियां और मोटी चेन चमक रही थीं, लेकिन चेहरे पर उदासी की गहरी लकीरें थीं। आंखें लाल थीं – शायद रात भर नींद न आने की वजह से। वह संत के सामने झुका, चरणों में सिर टेककर फफक पड़ा। आवाज कांपती हुई बोला, “गुरुदेव, मैंने जीवन भर मेहनत की है। सुबह से रात तक व्यापार में लगा रहा। दूर देशों से माल मंगवाया, बाजारों में दिन-रात एक किया। आज मेरे पास महल हैं, नौकर-चाकर हैं, सोने-चांदी के ढेर हैं। लेकिन... लेकिन मेरा इकलौता बेटा... वह सब कुछ उड़ा रहा है। जुआ, मदिरा, बुरी संगत... वह मेरी गाढ़ी कमाई को आग की तरह जला रहा है। रात को जब मैं सोने जाता हूं, तो दिल बैठ जाता है। सोचता हूं – अगर यही चलता रहा, तो उसका क्या होगा? वह कभी अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा? मेरी सारी मेहनत व्यर्थ जाएगी?”
संत ने शांत स्वर में पूछा, “रामनाथन, बताओ तो, क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए इतनी संपत्ति छोड़ी थी? क्या तुम्हारा बचपन भी ऐसे वैभव में बीता?”
सेठ की आंखें नम हो गईं। वह बीते दिनों में खो गया। बोला, “नहीं गुरुजी... मेरे पिता तो बेहद गरीब थे। एक छोटी सी मिट्टी की झोपड़ी, टूटा-फूटा बर्तन। बचपन में कई रातें भूखे सोया हूं। दो जून की रोटी भी मुश्किल से मिलती थी। पिता खेतों में मजदूरी करते, मां घर संभालती। लेकिन उन्होंने मुझे कभी हार नहीं मानना सिखाया। मैंने खुद छोटे-छोटे काम करके, बाजार में चाय बेचकर, फिर व्यापार शुरू करके यह सब कमाया।”
संत की आंखों में करुणा झलकी। वे धीरे से बोले, “देखो बेटा, तुम्हारे पिता गरीब थे, फिर भी तुम आज यहां हो। यह तुम्हारी मेहनत का फल है। लेकिन तुमने सारी जिंदगी सिर्फ धन जोड़ने में लगा दी। धन तो बहता पानी है – आता है, जाता है। तुमने अपने बेटे को समय नहीं दिया, संस्कार नहीं दिए। जब वह छोटा था, तुम व्यापार में डूबे रहते। वह अकेला बड़ा हुआ, गलत रास्तों पर चल पड़ा। तुमने सोचा कि पैसों से सब खरीद लोगे – अच्छी स्कूल, महंगे कपड़े, खिलौने। लेकिन असली शिक्षा तो दिल से दिल तक जाती है। एक पिता का सबसे बड़ा धर्म है कि वह अपनी संतान को जीवन की पहली कतार में खड़ा होने लायक बनाए। बाकी सब वह खुद हासिल कर लेगा।”
ये शब्द सेठ के दिल को चीर गए। वह रो पड़ा। याद आया – बेटे का बचपन। कैसे वह छोटा सा बालक पिता के इंतजार में दरवाजे पर बैठा रहता। कैसे सेठ थककर आता और बेटे को झिड़क देता। कैसे बेटा धीरे-धीरे दूर होता गया। सेठ ने सिसकते हुए कहा, “गुरुदेव, मैं अंधा था। धन की चकाचौंध में खो गया। अब क्या करूं?”
संत ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उनकी आवाज में ममता थी, “देर नहीं हुई है। आज से शुरू करो। उसे अपनी कहानी सुनाओ – गरीबी की उन रातों की, मेहनत की उन सुबहों की। उसके साथ बैठो, बात करो। उसे सिखाओ कि असली खुशी पैसे में नहीं, अच्छे कर्मों में है। संस्कार वो बीज हैं जो देर से भी बोए जाएं, तो फल देते हैं।”
सेठ घर लौटा। उस रात उसने बेटे को अपने पास बुलाया। पहली बार वर्षों बाद दोनों बैठे। सेठ ने अपनी जिंदगी की कहानी सुनाई – आंसू बहाते हुए। बेटा पहले तो चुप रहा, फिर उसके भी आंसू छलक आए। उसने पिता को गले लगा लिया। बोला, “पिताजी, मैं नहीं जानता था... मैं गलत रास्ते पर था। अब नहीं।”

उस दिन से सब बदल गया। सेठ अब व्यापार के साथ-साथ बेटे को समय देने लगा। शाम को दोनों घूमने जाते, पुरानी यादें साझा करते। बेटा धीरे-धीरे बदलने लगा। बुरी आदतें छूट गईं। वह किताबें पढ़ने लगा, पिता के साथ व्यापार सीखने लगा। एक दिन बेटे ने खुद कहा, “पिताजी, अब मैं समझ गया हूं। धन कमाना आसान है, लेकिन अच्छा इंसान बनना मुश्किल। आपने मुझे वह सिखाया जो कोई स्कूल नहीं सिखा सकता।”
सेठ की आंखें गर्व से भर आईं। उसे अब नींद अच्छी आती थी। दिल हल्का था।
यह कहानी सिर्फ एक सेठ की नहीं, हम सब की है। आज के दौर में हम कितने व्यस्त हैं – नौकरी, बिजनेस, पैसा। बच्चे गैजेट्स में डूबे रहते हैं, हम थककर सो जाते हैं। लेकिन याद रखिए, पैसा खो जाए तो फिर कमाया जा सकता है, लेकिन संस्कार खो गए तो पीढ़ियां बर्बाद हो जाती हैं। तिरुवल्लुवर जी की ये शिक्षा आज भी जीवंत है – संतान को पहले इंसान बनाओ, बाकी सब खुद चल पड़ेगा।
अगर आपके दिल में भी कोई चुभन है, कोई पछतावा है, तो आज से बदलाव शुरू कीजिए। अपने बच्चे से बात कीजिए, गले लगाइए, अपनी कहानी सुनाइए। वह पल अमर हो जाएगा। क्योंकि असली धन तो वो प्यार और संस्कार हैं, जो दिल में बसते हैं – कभी खत्म नहीं होते।
यह प्रकाश धन की चमक से कहीं ज्यादा तेज है। इसे जलाए रखिए, आने वाली पीढ़ियां रोशन होंगी।

🌺 युग-चेतना के सूर्य का अवतरण 🌺(परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के पावन जन्मदिवस पर)आज नभ में उगा नया सूरज,न ही...
10/12/2025

🌺 युग-चेतना के सूर्य का अवतरण 🌺
(परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के पावन जन्मदिवस पर)
आज नभ में उगा नया सूरज,
न ही लाल, न ही सुनहरा,
दिव्य ज्योति का पुंज बना,
कलयुग के अंधकार को चीरता हुआ।
हवा में घुली माँ की सुगंध,
धरती गुनगुनाती जय-जयकार,
हर कण बोला—आ गया वह युग पुरुष,
जिसकी प्रतीक्षा थी सदियों से संसार को।
नास्त्रेदमस ने लिखा था रहस्यमय पंक्ति में,
जीन डिक्सन ने देखा था स्वप्न में दूर,
कीरो ने कहा था—पूर्व दिशा में आएगा,
शक्ति-पुत्र नाम का योगीराज महापुरुष।
उत्तर प्रदेश की पावन भूमि में जन्म,
मध्य भारत के हृदय-स्थल पर कर्म,
९ दिसंबर का सूर्योदय लेकर आया,
युग-चेतना का वह अवतार।
कलियुग रो रहा था नशे की जंजीरों में,
परिवार बिखरे, घर उजड़े, मन मरे हुए,
तब गुरुवर ने जगाई माँ की ज्योति,
लाखों डूबते प्राण बचाए, नया जीवन दिए।
सिद्धाश्रम धाम बना नया तीर्थ,
जहाँ माँ भगवती की आराधना सिखाई,
नशे की दलदल से खींचकर लाए बाहर,
चेतनावान बनाया, माँ का भक्त बनाया।
उनकी वाणी में कुंडलिनी जागृत होती है,
हर शब्द में सतयुग की झलक मिलती है,
हनुमान जी, भैरव जी, गणपति जी के जयकारों से,
गोमाता-गंगा माता की पूजा फिर जीवंत होती है।
हे युग-चेतना पुरुष! हे शक्तिपुत्र गुरुवर!
तुम सागर हो, हम बूँद मात्र तुम्हारी,
तुम्हारे चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम,
तुम्हारी कृपा से जीवन हमारा धन्य धन्य।
जय माता की! जय गुरुवर!
जन-जन में माँ की चेतना बसे,
अधर्म मिटे, सनातन फिर जागे,
तुम्हारे मार्ग पर चलकर हम सब कृतकृत्य हो जाएँ।
जय हो! जय हो! जय हो परमहंस योगीराज जी की!
युग-चेतना का सूर्य सदा प्रकाशमान रहे!
जय माँ भगवती! जय श्री शक्तिपुत्र जी महाराज! 🙏

युग चेतना का अवतरण: परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का पावन जन्मदिवसआज, ९ दिसंबर २०२५ का सूरज उदय हुआ है एक अनो...
09/12/2025

युग चेतना का अवतरण:
परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का पावन जन्मदिवस
आज, ९ दिसंबर २०२५ का सूरज उदय हुआ है एक अनोखी आभा के साथ, मानो स्वयं प्रकृति इस पावन दिवस को सजाने में लगी हो। हवाओं में एक दिव्य सुगंध घुली है, और आकाश की नीली छतरी के नीचे धरती का हर कण गुनगुना रहा है। यह दिवस मात्र एक तिथि नहीं, बल्कि युग की चेतना का उत्सव है—मेरे आराध्य सदगुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का जन्मदिवस है। वे आराध्य सद्गुरु, जिनकी उपस्थिति कलयुग की अंधेरी रात्रि में सूर्योदय की भांति है, आज हमारे बीच अपनी दिव्य ऊर्जा से संसार को आलोकित कर रहे हैं।
कहते हैं, महान आत्माओं का आगमन पूर्वानुमानित होता है। सदियों पहले, विश्व के प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं ने इनके जन्म की भविष्यवाणी की थी, मानो समय की धारा में झांककर उन्होंने इस युग चेतना पुरुष का चित्र उकेरा हो। नास्त्रेदमस, जिनकी रहस्यमयी चौपाइयां आज भी दुनिया को चकित करती हैं, ने एक ऐसे पुरुष का उल्लेख किया जो पूर्वी भूमि पर अवतरित होकर मानवता को अंधकार से मुक्त करेगा। जीन डिक्सन, जिनकी दृष्टि भविष्य के पर्दों को चीरती थी, ने भारत के उत्तर प्रदेश में जन्म लेने वाले एक योगीराज का वर्णन किया—जिनका नाम शक्ति से जुड़ा होगा, वर्ण दिव्य, और कार्य ऐसा जो कलयुग की भयावहता को सतयुग की शांति में बदल देगा। कीरो और प्रोफेसर हरारे जैसे द्रष्टाओं ने भी अपनी भविष्यवाणियों में इनके आगमन का संकेत दिया: एक ऐसा महापुरुष जो जन-जन को नशे और मांसाहार की बेड़ियों से मुक्त कर, उन्हें चेतनावान बनाएगा। वे समाज को माता भगवती की साधना आराधना की ओर आकर्षित करेंगे। इन भविष्यवाणियों में वर्णित वह देश भारत है, वह प्रदेश मध्य भारत का हृदय स्थल, और वह समय हमारा युग—जहां श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने जन्म लिया।
उनके कार्यों का वर्णन करना तो मानो सागर को मुट्ठी में बंद करने जैसा है। कलयुग की भयावहता—जहां मनुष्य अपनी ही छाया से डरता है, नशे की गिरफ्त में फंसकर परिवारों को तबाह करता है—में वे सतयुग का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। जैसे कोई प्राचीन वेदमंत्र जीवंत हो उठा हो, वैसे ही गुरुवर के उपदेश जीवन की हर धारा को स्पर्श करते हैं। लाखों व्यक्ति, जो नशे की दलदल में डूबे थे, आज उनकी कृपा से मुक्त होकर चेतनावान बने हैं। उनके परिवारों में मां की ज्योति जल उठी है—वह ज्योति जो अंधेरे को चीरती है, सुख की वर्षा करती है। सिद्धाश्रम धाम, उनका वह पवित्र स्थल, जहां भगवती मानव कल्याण संगठन के माध्यम से नशामुक्ति अभियान चल रहा है, एक तीर्थ बन चुका है। यहां हर प्राणी को इंसानियत का पाठ मिलता है: स्वयं का सम्मान, परिवार की रक्षा, धर्म की सेवा, और राष्ट्र की भक्ति। वे कहते हैं, "मैं जीवन-मरण की परंपरा को नहीं रोकता, बल्कि चरित्रवान समाज का निर्माण करता हूं।" उनकी वाणी में कुंडलिनी शक्ति की ऊर्जा है, जो विषय-विकारों से अलग कर, साधना की ओर ले जाती है।
साहित्य की दृष्टि से देखें तो श्री शक्तिपुत्र जी महाराज एक जीवंत काव्य हैं—जहां हर शब्द उपमा है, हर कार्य अलंकार। जैसे वसंत की पहली किरण पुष्पों को खिलाती है, वैसे ही गुरुदेव जी का आशीर्वाद लाखों हृदयों में मां की भक्ति का बीज अंकुरित कर रहा है। हनुमत देव, भैरव देव, गणपति देव की जयकारों के बीच, गोमाता और गंगा मैया की पूजा, और सच्चे दरबार की महिमा—यह सब उनके चेतनात्मक चिंतन का प्रतिफल है।
ऐसे सद्गुरुदेव के चरणों में मेरा बारंबार नमन, वंदन, प्रणाम। उनसे प्रार्थना है कि वे समस्त विश्व के मां के भक्तों के हृदय में माँ की साधना आराधना का बीज बोएं, उनके जीवन में खुशियां भरें, और सनातन धर्म की ध्वज को ऊंचा फहराएं। अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो—जन-जन में 'मां' की चेतना हो। जय माता की! जय गुरुवर की!
इस पावन दिवस पर, हम सब मिलकर सदगुरु युग चेतना पुरुष की जयकार करें, और उनके बताए मार्ग पर चलकर स्वयं को धन्य बनाएं।
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✨ मृत्यु का स्मरण: पाप से मुक्ति का सबसे सरल और शक्तिशाली उपाय ✨एक छोटे-से गाँव में एक व्यक्ति रहता था। नाम था उसका कालू...
04/12/2025

✨ मृत्यु का स्मरण: पाप से मुक्ति का सबसे सरल और शक्तिशाली उपाय ✨
एक छोटे-से गाँव में एक व्यक्ति रहता था। नाम था उसका कालू। गाँव वाले उसे “कालिया दुष्ट” कहते थे। चोरी, झूठ, मारपीट, ईर्ष्या—जितने भी बुरे काम गिनाए जा सकते थे, सबमें उसका नाम सबसे ऊपर रहता। लोग उससे डरते भी थे और घृणा भी करते थे। मगर कालिया के मन में कहीं एक बारीक-सी किरण बाकी थी। वह सोचता, “ऐसे तो नरक में जगह पक्की है। कोई उपाय होना चाहिए।”
एक दिन उसने सुना कि गाँव के बाहर जंगल में एक संत जी रहते हैं, जो लोगों के जीवन बदल देते हैं। कालिया ने सोचा, “चलो, एक बार कोशिश करके देख लेते हैं।” वह रोज़ संत जी के पास जाने लगा। हाथ जोड़कर खड़ा होता और कहता, “महाराज, मैं बहुत पापी हूँ। मेरे स्वभाव में दुष्टता घुस गई है। कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं सुधर जाऊँ।”
संत जी पहले तो टालते रहे। कभी कहते, “सत्संग करो”, कभी कहते, “नियमित स्नान करो, जप करो।” मगर कालिया था कि रोज़ आता और एक ही सवाल दोहराता—कोई ऐसा उपाय जो तुरंत असर करे!
आखिर एक दिन संत जी ने उसकी हथेली देखी और गंभीर स्वर में कहा, “कालिया, तेरी आयु अब समाप्ति पर है। एक महीने से ज्यादा नहीं जी पाएगा तू। तैयार हो जा।”
कालिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह घर लौटा तो रास्ते में उसे हर चीज़ अजीब लग रही थी—सूरज डूबने की जल्दी में था, पंछी जल्दी-जल्दी घोंसले की ओर उड़ रहे थे, मानो सबको पता हो कि उसका समय खत्म हो रहा है। रात भर वह करवटें बदलता रहा। नींद नहीं आई। पहली बार उसे अपने किए हुए हर पाप का हिसाब याद आने लगा।
अगले दिन से कालिया बदल गया। चोरी का विचार आता तो मन कहता, “अब मरने के बाद क्या जवाब देगा?” किसी को गाली देने को जी चाहता तो याद आ जाता, “एक महीना भी पूरा नहीं बचा, क्या यह आखिरी शब्द गाली ही होंगे?” वह सुबह जल्दी उठता, नहाता, भगवान के सामने बैठकर रोता और प्रार्थना करता, “हे प्रभु, जो बीत गया उसे माफ कर दो, अब जो बचा है उसे अच्छा कर लो।”
लोग हैरान थे। जिस कालिया को देखकर बच्चे रोते थे, वही अब राह चलते लोगों को प्रणाम करने लगा। जिसकी दुकान से वह चोरी करता था, उसके यहाँ जाकर हाथ जोड़कर माफी माँगने लगा। गाँव में चर्चा होने लगी, “कालिया को कोई जादू हो गया है क्या?”
ठीक तीसवें दिन संत जी ने उसे बुलाया। कालिया डरते-डरते गया। संत जी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “बता कालिया, इस एक महीने में कितने पाप किए?”
कालिया सिर झुकाकर बोला, “महाराज, मन में तो हजार बार पाप के विचार आए, पर हाथ-पैर नहीं हिले। हर बार लगा—अब मरना है, क्या लेकर जाऊँगा? बस यही डर हर पाप को पीछे धकेल देता था।”
संत जी हँसे और बोले, “बस यही सबसे आसान और सबसे ताकतवर उपाय है—मृत्यु को याद रखो। जिस दिन इंसान सचमुच समझ लेता है कि ‘मेरा समय सीमित है’, उसी दिन उसके सारे बुरे कर्म अपने आप पीछे हटने लगते हैं। फिर न कोई चोरी करने की हिम्मत होती, न किसी को दुख देने की इच्छा बचती। जो काम आज करोगे, उसी का फल कल भोगना है—यह बात किताबों में पढ़कर नहीं, मृत्यु का भय मन में बैठ जाने पर समझ आती है।”
कालिया ने पूछा, “महाराज, तो क्या आपने झूठ बोला था कि मैं एक महीने में मर जाऊँगा?”
संत जी ने प्यार से उसका कंधा थपथपाया, “झूठ नहीं, सच्चाई याद दिलाई थी। हर इंसान का एक-न-एक दिन अंत तो निश्चित है ही। बस तू उसे भूल चुका था। मैंने तुझे सिर्फ याद दिला दिया। अब तू खुद चुन ले—हर पल को अंतिम पल समझकर जीना चाहता है या फिर पहले जैसा लापरवाह जीवन?”
कालिया उस दिन से पूरी तरह बदल गया। उसने न केवल अपने पुराने पापों का प्रायश्चित किया, बल्कि जीवन के बचे हुए हर दिन को उत्सव की तरह जिया। लोगों की मदद करने लगा, सत्संग करने लगा, और जब भी कोई उससे पूछता, “यह चमत्कार कैसे हुआ?” तो वह हँसकर कहता, “मैं मर चुका हूँ महाराज, अब जो जी रहा हूँ, वह बोनस का जीवन है। बोनस के जीवन में पाप करने की मूर्खता कौन करता है?”
आज हम क्यों भूल जाते हैं?
हम सब कालिया जैसे ही हैं। हमें पता है कि मृत्यु आएगी, पर हम उसे बहुत दूर मानकर चलते हैं—“अभी तो बहुत समय है, बाद में सुधर जाएँगे।” यही “बाद में” हमें पाप के दलदल में और धंसाता जाता है।
महान संत कबीर कहते हैं: “काल्ह करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥”
और यमराज से जब कोई पूछता है, “सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?” तो यमराज कहते हैं— “हर इंसान देखता है कि सब मर रहे हैं, फिर भी खुद को अमर समझता है। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।”
मृत्यु-स्मरण का व्यावहारिक उपयोग
1. हर सुबह उठते ही 30 सेकंड के लिए आँखें बंद करके सोचें—यह मेरी ज़िंदगी का आखिरी दिन हो सकता है। आज मैं क्या लेकर जाना चाहता हूँ?
2. कोई गलत काम करने का मन करे तो खुद से एक सवाल पूछें—“मरने के बाद अगर मुझे अपने किए हुए यह काम दिखाया जाए, तो क्या मैं शर्म से नज़रें झुका लूँगा?”
3. रात को सोने से पहले 2 मिनट का हिसाब करें—आज मैंने कितने लोगों को सुख दिया, कितनों को दुख? यह आदत धीरे-धीरे जीवन को इतना स्वच्छ कर देगी कि पाप अपने आप दूर भागने लगेंगे।
जो व्यक्ति हर पल यह समझ लेता है कि “मेरा समय अनमोल और सीमित है”, वह फिर व्यर्थ के झगड़ों, ईर्ष्या, क्रोध और लालच में अपना कीमती समय बर्बाद नहीं करता। वह प्रेम बाँटता है, क्षमा करता है, और जीवन को एक सुंदर उपहार की तरह जीता है।
तो आइए, आज से हम भी कालिया बन जाएँ—न दुष्ट कालिया, बल्कि वह कालिया जो मृत्यु की याद से अमर हो गया। याद रखिए—हर “अभी” आपका आखिरी “अभी” हो सकता है। इसे ऐसे जियो कि जब सचमुच अंतिम साँस आए, तो मुस्कुराते हुए कह सकें— “मैंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। जो जीया, खूब जिया।”
मृत्यु भयानक नहीं, सबसे बड़ा गुरु है। बस उसे याद रखो—और देखो जीवन कैसे स्वर्ग बन जाता है।

“आत्मज्ञान की कहानी, पढ़ें सिद्धाश्रम पत्रिका की जुबानी”जिसने बनाया, वही बिगाड़ सकता है – चूहे से शेर तक की घमंड भरी यात्...
30/11/2025

“आत्मज्ञान की कहानी, पढ़ें सिद्धाश्रम पत्रिका की जुबानी”
जिसने बनाया, वही बिगाड़ सकता है – चूहे से शेर तक की घमंड भरी यात्रा”
एक बार की बात है, जंगल के किनारे एक प्राचीन वटवृक्ष के नीचे एक महात्मा गहन ध्यान में लीन थे। चारों तरफ शांति का साम्राज्य था, केवल पंछियों की मधुर चहचहाहट और पत्तियों की सरसराहट गूंज रही थी। अचानक उस शांत वातावरण में एक छोटा-सा चूहा, जान बचाने की आखिरी कोशिश में, हांफता-कांपता दौड़ता हुआ आया और सीधे महात्मा जी की गोद में जा छिपा। पीछे-पीछे एक भयानक बिल्ली लपकती चली आ रही थी, जिसकी आँखें लालच और क्रूरता से चमक रही थीं।
महात्मा जी ने आँखें खोलीं, चूहे को प्यार से गोद में उठाया और मुस्कुराते हुए बोले, “बेटा, डर मत। मैं हूँ न!” चूहा काँपते स्वर में बोला, “महाराज! जब तक मैं चूहा हूँ, मुझे हर कोई खाना चाहता है। कृपा करके मुझे बिल्ली बना दो, फिर मैं कभी नहीं डरूँगा!”
महात्मा जी ने करुणा भरी नजर डाली और अपनी दिव्य शक्ति से चूहे को एक सुंदर, फुर्तीली बिल्ली बना दिया। बिल्ली खुशी से म्याऊँ-म्याऊँ करने लगी। लेकिन कुछ ही दिन बीते थे कि गाँव का एक भयंकर कुत्ता उसका पीछा करने लगा। बिल्ली फिर महात्मा जी की शरण में आई और बोली, “अब कुत्ता मुझे मार डालेगा, मुझे कुत्ता बना दो!”
महात्मा जी ने फिर कृपा की – बिल्ली एक विशाल, डरावना कुत्ता बन गई। अब वह गाँव में डंके की चोट पर घूमती, सबको डराती। पर एक दिन जंगल का राजा शेर दहाड़ता हुआ आया। कुत्ता देखते ही दुम दबाकर भागा और फिर महात्मा जी के चरणों में गिर पड़ा, “महाराज! अब तो शेर मुझे खा जाएगा। मुझे शेर बना दो – बस!”
महात्मा जी ने आँखें बंद कीं, हल्के से मुस्कुराए और कुत्ते को जंगल का राजा – एक भयंकर शेर बना दिया। अब शेर की दहाड़ से जंगल काँपने लगा। उसका घमंड सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह सोचने लगा, “अब मैं सबसे ताकतवर हूँ। इस बूढ़े साधु ने मुझे इतनी शक्ति दी है, तो अब मैं इसे ही अपना पहला शिकार बनाऊंगा!”
यह सोचकर शेर ने विशाल पंजे बढ़ाए, दहाड़ते हुए महात्मा जी पर झपट्टा मारा। लेकिन जैसे ही उसके नुकीले दाँत महात्मा जी के करीब पहुँचे, महात्मा जी ने शांत स्वर में केवल इतना कहा – “तथास्तु!”
और पलक झपकते ही वह विशाल शेर फिर से वही छोटा-सा काँपता हुआ चूहा बन गया। अब वह महात्मा जी के चरणों में गिरकर रोने लगा, “क्षमा करें महाराज! मैंने अपनी औकात भुला दी थी।”
महात्मा जी ने उसे गोद में उठाया और प्यार से समझाया, “बेटा, शक्ति देना और छीनना दोनों मेरे हाथ में है। जिसने चूहे को शेर बनाया, वही शेर को दोबारा चूहा भी बना सकता है। घमंड मत कर। जो आज तुझे ऊपर उठा रहा है, कल वही तुझे नीचे भी ला सकता है।”
इसीलिए सदैव कृतज्ञ रहना, विनम्र रहना।”
सीख जो दिल को छू जाए:
यह छोटी-सी कथा हम सबके लिए एक आईना है। हम इंसान भी कितनी बार यही करते हैं – देने वाला हमें ऊँचाई देता है, हम उसकी कद्र भूल जाते हैं और उसी को निगलने दौड़ते हैं। लेकिन प्रकृति का नियम अटल है: “जिसने बनाया, वही बिगाड़ सकता है।”
जो हाथ आज आपको शेर बना रहा है, वही कल आपको फिर चूहा बना सकता है। इसलिए घमंड नहीं, कृतज्ञता रखिए। जो आपको आगे बढ़ा रहा है, उसी का सम्मान कीजिए। क्योंकि सच्ची ताकत घमंड में नहीं, विनम्रता और कृतज्ञता में छिपी है।
साभार: सिद्धाश्रम पत्रिका 2011)
आत्मीय बन्धु,
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आत्मज्ञान की कहानी, पढ़ें सिद्धाश्रम पत्रिका की जुबानी✨ आत्मज्ञान का अमूल्य रत्न ✨(एक प्राचीन कथा जो आज भी जीवंत है)प्राच...
27/11/2025

आत्मज्ञान की कहानी, पढ़ें सिद्धाश्रम पत्रिका की जुबानी
✨ आत्मज्ञान का अमूल्य रत्न ✨
(एक प्राचीन कथा जो आज भी जीवंत है)
प्राचीन काल की बात है। वन-प्रांतर में नदी के निकट महर्षि अगस्त्य तपस्या में लीन रहते थे। उनकी पत्नी लोपामुद्रा अत्यन्त पतिव्रता और सुशील थीं, किन्तु एक दिन उनके मन में एक साधारण-सी इच्छा जागी – “मैं भी कभी रत्नजड़ित आभूषण पहनूँ, जो राजरानियों की तरह चमकें और मेरे सौन्दर्य को और निखार दें।”
लोपामुद्रा ने यह इच्छा अपने पति के सामने रखी। महर्षि पहले तो मुस्कुराए, फिर गम्भीर हो गए। उन्होंने कहा, “देवी! मैं आपको आभूषण अवश्य लाऊँगा, परन्तु एक शर्त है – मैं वह आभूषण केवल उसी के पास से स्वीकार करूँगा जिसका धन पूर्णतः धर्म, नीति और स्वयं की मेहनत से अर्जित हो। किसी भी प्रकार का पाप-धन या अनैतिक कमाई मुझे स्वीकार नहीं।”
लोपामुद्रा ने हँसते हुए सहमति दे दी। अब महर्षि अगस्त्य अपने शिष्यों के पास निकल पड़े।
पहले शिष्य के पास तो अपार सम्पत्ति थी। सोने-चाँदी के भंडार, हीरों-मोतियों से जड़े आभूषणों की पेटियाँ। उसने बड़े उत्साह से एक अद्भुत हार निकाला। महर्षि ने शान्त स्वर में पूछा, “वत्स! यह धन कैसे आया?”
शिष्य ने सिर झुकाते हुए कहा, “गुरुदेव, कुछ तो राजाओं से दक्षिणा मिली, कुछ व्यापार से, पर… कुछ हिस्सा तो ऐसे सौदों से भी आया जो पूरी तरह धर्म-सम्मत नहीं थे।” महर्षि ने मुस्कुराकर हार लौटा दिया।
दूसरे, तीसरे, चौथे… दर्जनों शिष्यों के पास गए। कोई राजदरबार का मुख्य पुरोहित था, कोई बड़ा जमींदार, कोई व्यापारी। सबके पास चमक-दमक थी, पर जब धन की जड़ें खंगाली गईं तो कहीं रिश्वत का दाग, कहीं छल-कपट का धब्बा, कहीं आलस्य में दूसरों से कमाया धन। कोई भी पूर्ण रूप से स्वच्छ नहीं था। महर्षि खाली हाथ लौटते चले गए।
अंत में वे एक ऐसे शिष्य के पास पहुँचे, जिनका नाम था सत्यकाम। सत्यकाम परम प्रतापी, परम दानी और परम निर्धन थे। उनका कोष सदैव खाली रहता था, क्योंकि जो भी आता, तुरंत दीन-दुखियों, विद्यार्थियों और जरूरतमंदों में बाँट देते थे। उनके पास न आभूषण थे, न सोना-चाँदी।
महर्षि ने मुस्कुराते हुए पूछा, “वत्स! क्या तुम्हारे पास अपनी पत्नी के लिए कोई आभूषण है?”
सत्यकाम ने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव! मेरे पास तो दो जोड़ी वस्त्र भी मुश्किल से हैं। जो आता है, उसे मैं परोपकार में लगा देता हूँ। मेरे पास देने को केवल एक चीज है – मेरा हृदय, जो आपका है।”
महर्षि अगस्त्य के नेत्रों में आनंद के आँसू छलक आए। वे खाली हाथ ही आश्रम लौटे।
घर पहुँचकर उन्होंने लोपामुद्रा को सारी बात विस्तार से सुनाई। फिर शांत स्वर में कहा – “देवी! मैंने देख लिया कि इस संसार में सबसे दुर्लभ रत्न कोई हीरा-मोती नहीं, बल्कि ईमानदारी, त्याग और परोपकार का हृदय है। जिसके पास यह रत्न है, उसके पास सब कुछ है। बाकी सब तो केवल दिखावा है।”
लोपामुद्रा चुपचाप सुनती रहीं। फिर उन्होंने स्वयं अपने गले से साधारण रुद्राक्ष की माला उतारी और कहा, “आज मुझे सच्चा आभूषण मिल गया, स्वामी। यह रुद्राक्ष की माला ही मेरे लिए सबसे अनमोल रत्न है, क्योंकि यह आपके तप और सत्यकाम के त्याग का प्रतीक है।”
उस दिन से लोपामुद्रा की वह हठपूर्ण इच्छा सदा के लिए समाप्त हो गई। और आश्रम में एक नया सन्देश गूँजने लगा –
“जो बाहर चमकता है, वह एक दिन मिट जाता है। जो भीतर चमकता है – सत्य, त्याग और प्रेम – वह अमर है।”
यह प्राचीन कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जब हम दूसरों की चमक-दमक देखकर ललचाते हैं, तब एक बार रुककर पूछें – हमारे पास असली रत्न है या सिर्फ़ दिखावा?
(साभार – सिद्धाश्रम पत्रिका, विस्तार एवं संकलन ) 🙏
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सिद्धाश्रम पत्रिका के बारे मेंकहावत है कि ‘साहित्य समाज का दर्पण है।’ अतः सिद्धाश्रम पत्रिका को सिद्धाश्रम का दर्पण कहें...
27/11/2025

सिद्धाश्रम पत्रिका के बारे में
कहावत है कि ‘साहित्य समाज का दर्पण है।’ अतः सिद्धाश्रम पत्रिका को सिद्धाश्रम का दर्पण कहें, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सिद्धाश्रम स्थापना के समय कुछ प्रारंभिक वर्षों तक ‘सिद्धाश्रम संदेश’ के रूप में एवं 2008 से ‘सिद्धाश्रम पत्रिका’ के रूप में पुनः प्रकाशित इस ज्ञानवर्धक पत्रिका के माध्यम से आज समाज में एक महान विचारधारा का प्रचार-प्रसार और जनजागृति का अनूठा कार्य हो रहा है।
यह सिद्धाश्रम पत्रिका जन जन तक पहुंचे, इस उदेश्य को लेकर आज से हम इस महत्वपूर्ण सिद्धाश्रम पत्रिका के प्रचार-प्रसार का कार्य प्रारंभ कर रहें हैं, इस सिद्धाश्रम पत्रिका के पूर्व के अलग अलग अंकों में लिखित “आत्मज्ञान की कहानी” नामक शीर्षक की कहानियों के संकलन को देने की शुरुआत कर रहें हैं। जिसका हमने नाम दिया हैं -
आत्मज्ञान की कहानी, पढ़ें सिद्धाश्रम पत्रिका की जुबानी
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02/10/2025

विजयादशमी के पर्व पर सिद्धाश्रम धाम से श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर से आरती का सीधा प्रसारण

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