04/12/2025
✨ मृत्यु का स्मरण: पाप से मुक्ति का सबसे सरल और शक्तिशाली उपाय ✨
एक छोटे-से गाँव में एक व्यक्ति रहता था। नाम था उसका कालू। गाँव वाले उसे “कालिया दुष्ट” कहते थे। चोरी, झूठ, मारपीट, ईर्ष्या—जितने भी बुरे काम गिनाए जा सकते थे, सबमें उसका नाम सबसे ऊपर रहता। लोग उससे डरते भी थे और घृणा भी करते थे। मगर कालिया के मन में कहीं एक बारीक-सी किरण बाकी थी। वह सोचता, “ऐसे तो नरक में जगह पक्की है। कोई उपाय होना चाहिए।”
एक दिन उसने सुना कि गाँव के बाहर जंगल में एक संत जी रहते हैं, जो लोगों के जीवन बदल देते हैं। कालिया ने सोचा, “चलो, एक बार कोशिश करके देख लेते हैं।” वह रोज़ संत जी के पास जाने लगा। हाथ जोड़कर खड़ा होता और कहता, “महाराज, मैं बहुत पापी हूँ। मेरे स्वभाव में दुष्टता घुस गई है। कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं सुधर जाऊँ।”
संत जी पहले तो टालते रहे। कभी कहते, “सत्संग करो”, कभी कहते, “नियमित स्नान करो, जप करो।” मगर कालिया था कि रोज़ आता और एक ही सवाल दोहराता—कोई ऐसा उपाय जो तुरंत असर करे!
आखिर एक दिन संत जी ने उसकी हथेली देखी और गंभीर स्वर में कहा, “कालिया, तेरी आयु अब समाप्ति पर है। एक महीने से ज्यादा नहीं जी पाएगा तू। तैयार हो जा।”
कालिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह घर लौटा तो रास्ते में उसे हर चीज़ अजीब लग रही थी—सूरज डूबने की जल्दी में था, पंछी जल्दी-जल्दी घोंसले की ओर उड़ रहे थे, मानो सबको पता हो कि उसका समय खत्म हो रहा है। रात भर वह करवटें बदलता रहा। नींद नहीं आई। पहली बार उसे अपने किए हुए हर पाप का हिसाब याद आने लगा।
अगले दिन से कालिया बदल गया। चोरी का विचार आता तो मन कहता, “अब मरने के बाद क्या जवाब देगा?” किसी को गाली देने को जी चाहता तो याद आ जाता, “एक महीना भी पूरा नहीं बचा, क्या यह आखिरी शब्द गाली ही होंगे?” वह सुबह जल्दी उठता, नहाता, भगवान के सामने बैठकर रोता और प्रार्थना करता, “हे प्रभु, जो बीत गया उसे माफ कर दो, अब जो बचा है उसे अच्छा कर लो।”
लोग हैरान थे। जिस कालिया को देखकर बच्चे रोते थे, वही अब राह चलते लोगों को प्रणाम करने लगा। जिसकी दुकान से वह चोरी करता था, उसके यहाँ जाकर हाथ जोड़कर माफी माँगने लगा। गाँव में चर्चा होने लगी, “कालिया को कोई जादू हो गया है क्या?”
ठीक तीसवें दिन संत जी ने उसे बुलाया। कालिया डरते-डरते गया। संत जी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “बता कालिया, इस एक महीने में कितने पाप किए?”
कालिया सिर झुकाकर बोला, “महाराज, मन में तो हजार बार पाप के विचार आए, पर हाथ-पैर नहीं हिले। हर बार लगा—अब मरना है, क्या लेकर जाऊँगा? बस यही डर हर पाप को पीछे धकेल देता था।”
संत जी हँसे और बोले, “बस यही सबसे आसान और सबसे ताकतवर उपाय है—मृत्यु को याद रखो। जिस दिन इंसान सचमुच समझ लेता है कि ‘मेरा समय सीमित है’, उसी दिन उसके सारे बुरे कर्म अपने आप पीछे हटने लगते हैं। फिर न कोई चोरी करने की हिम्मत होती, न किसी को दुख देने की इच्छा बचती। जो काम आज करोगे, उसी का फल कल भोगना है—यह बात किताबों में पढ़कर नहीं, मृत्यु का भय मन में बैठ जाने पर समझ आती है।”
कालिया ने पूछा, “महाराज, तो क्या आपने झूठ बोला था कि मैं एक महीने में मर जाऊँगा?”
संत जी ने प्यार से उसका कंधा थपथपाया, “झूठ नहीं, सच्चाई याद दिलाई थी। हर इंसान का एक-न-एक दिन अंत तो निश्चित है ही। बस तू उसे भूल चुका था। मैंने तुझे सिर्फ याद दिला दिया। अब तू खुद चुन ले—हर पल को अंतिम पल समझकर जीना चाहता है या फिर पहले जैसा लापरवाह जीवन?”
कालिया उस दिन से पूरी तरह बदल गया। उसने न केवल अपने पुराने पापों का प्रायश्चित किया, बल्कि जीवन के बचे हुए हर दिन को उत्सव की तरह जिया। लोगों की मदद करने लगा, सत्संग करने लगा, और जब भी कोई उससे पूछता, “यह चमत्कार कैसे हुआ?” तो वह हँसकर कहता, “मैं मर चुका हूँ महाराज, अब जो जी रहा हूँ, वह बोनस का जीवन है। बोनस के जीवन में पाप करने की मूर्खता कौन करता है?”
आज हम क्यों भूल जाते हैं?
हम सब कालिया जैसे ही हैं। हमें पता है कि मृत्यु आएगी, पर हम उसे बहुत दूर मानकर चलते हैं—“अभी तो बहुत समय है, बाद में सुधर जाएँगे।” यही “बाद में” हमें पाप के दलदल में और धंसाता जाता है।
महान संत कबीर कहते हैं: “काल्ह करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥”
और यमराज से जब कोई पूछता है, “सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?” तो यमराज कहते हैं— “हर इंसान देखता है कि सब मर रहे हैं, फिर भी खुद को अमर समझता है। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।”
मृत्यु-स्मरण का व्यावहारिक उपयोग
1. हर सुबह उठते ही 30 सेकंड के लिए आँखें बंद करके सोचें—यह मेरी ज़िंदगी का आखिरी दिन हो सकता है। आज मैं क्या लेकर जाना चाहता हूँ?
2. कोई गलत काम करने का मन करे तो खुद से एक सवाल पूछें—“मरने के बाद अगर मुझे अपने किए हुए यह काम दिखाया जाए, तो क्या मैं शर्म से नज़रें झुका लूँगा?”
3. रात को सोने से पहले 2 मिनट का हिसाब करें—आज मैंने कितने लोगों को सुख दिया, कितनों को दुख? यह आदत धीरे-धीरे जीवन को इतना स्वच्छ कर देगी कि पाप अपने आप दूर भागने लगेंगे।
जो व्यक्ति हर पल यह समझ लेता है कि “मेरा समय अनमोल और सीमित है”, वह फिर व्यर्थ के झगड़ों, ईर्ष्या, क्रोध और लालच में अपना कीमती समय बर्बाद नहीं करता। वह प्रेम बाँटता है, क्षमा करता है, और जीवन को एक सुंदर उपहार की तरह जीता है।
तो आइए, आज से हम भी कालिया बन जाएँ—न दुष्ट कालिया, बल्कि वह कालिया जो मृत्यु की याद से अमर हो गया। याद रखिए—हर “अभी” आपका आखिरी “अभी” हो सकता है। इसे ऐसे जियो कि जब सचमुच अंतिम साँस आए, तो मुस्कुराते हुए कह सकें— “मैंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। जो जीया, खूब जिया।”
मृत्यु भयानक नहीं, सबसे बड़ा गुरु है। बस उसे याद रखो—और देखो जीवन कैसे स्वर्ग बन जाता है।