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02/12/2018

Bhagwan Kon
Surya:Pita,Prathavi:Mata,Chandrama:Mama,Budh:Bhuwa,Brahaspti:Guru,Sukar:Guru,Shani:Chacha tab Bhagwan kon Ye Garah ya Brahma, Vishnu, Mahesh, Ram, Krishna aadi ya anya koi aur ham Bhagwan kise mane?

06/11/2018

Celebrate the magic and joys of Diwali

17/06/2018

गतांक से आगे:- मेलापक भाग 4
वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाले व्यक्तियों को दो श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं-
1.जन्म-पत्रियों के बिना मिलाए ही संबंध तय करने के इच्छुक l
2. जन्म-पत्रियों का मिलान होने पर ही संबंध तय करने पर कटिबद्ध l
पहली श्रेणी के व्यक्तियों की सहायता ज्योतिष-विज्ञान नहीं कर सकता क्योंकि वह सहायता लेना ही नहीं चाहते. यह भी हो सकता है कि यह लोग वर या कन्या की जन्मपत्री में विपरीत योग अथवा गुण-दोष पर पर्दा डालने के लिए जन्मपत्री न मिलाने वाले दल में सम्मिलित हो गए हो. खैर कुछ भी हो, प्रथम श्रेणी में के व्यक्ति ज्योतिष के दायरे में नहीं आते. ज्योतिष में श्रद्धा रखने वाले माता-पिता विज्ञापन अथवा मैरिज ब्यूरो के माध्यम से प्राप्त प्रस्तावों (बायोडाटा) में से कुल, जाती, उप जाती, आयु , व्यक्तित्व, योग्यता, व्यवसाय आदि के आधार पर चयनित प्रस्ताव को से कन्या की जन्म पत्रिकाए मंगवाते हैं अथवा पत्र व्यवहार करते हुए अपनी कन्या के जन्म-पत्री वर पक्ष को भिजवाते हैं. जन्म-पत्रीयों का मिलान होने के पश्चात विवाह तय कर दिया जाता है, बशर्ते कि वित्तीय दीवार आडे ना आए. जो माता-पिता विज्ञापनों अथवा मैरिज ब्यूरो का सहारा नहीं लेते हैं उनके पास नातेदारों तथा परिचित व्यक्तियों के माध्यम से प्रस्ताव आते हैं.
सामान्यतः माता-पिता द्वारा जन्मपत्रियो का मिलान करवाने तथा किसी ज्योतिर्विद द्वारा हरी झंडी दिखाने के पश्चात ही विवाह तय किए जाते हैं. परंतु हम देखते हैं कि विवाह के कुछ ही समय पश्चात आनेक युगलो का दांपत्य जीवन नष्ट हो जाता है. दिन-रात की कलह के कारण जीवन नरक बन जाता है. चरित्र हनन का शिकार होकर पुरुष पर-स्त्रीगामी अथवा वैश्यगामी बन जाता है तो कहीं पत्नी पर-पुरुषगामी होकर वेश्या तुल्य हो जाती है. पति अपनी पत्नी को छोड़कर अन्य स्त्री से विवाह रचा लेता है तो पत्नी अपने पति से विमुख होकर पुनर्विवाह कर लेती है. पति विधुर तथा पत्नी विधवा हो जाती है. विपरीत परिस्थितियों की चरम सीमा 'जीवन साथी' द्वारा तलाक या हत्या का कारण भी बन जाती है तो कभी जीवन साथी आत्महत्या करने पर विवश हो जाता है. कुछ युगल ऐसे भी होते हैं जो नरक तुल्य दांपत्य जीवन भाेगते हुए भी अंतिम निर्णय ( तलाक, हत्या या आत्महत्या) नहीं कर पाते और जीवन रूपी गाड़ी के पहियों में ऑयल (स्नेह) एवं ग्रिस (मधुरता) दिए बिना ही गाड़ी खींचते रहते हैं.
जन्मपत्रियो के मिलान से संतुष्ट होकर विवाह करने पर भी उपरोक्त अशोभनीय घटनाओं का होना चिंता का विषय है. चिंता दांपत्य जीवन नष्ट होने की तो है ही परंतु चिंता इस बात की है कि इस प्रकार ज्योतिष जैसे पुनीत विज्ञान पर से लोगों का विश्वास उठ सकता है. यदि हम इस विरोधाभास पर गहराई से चिंतन करें तो इसके लिए ज्योतिष विज्ञान का कोई दोष दिखाई नहीं देता वरन् निम्न तथ्य स्पष्ट रूप से उत्तरदाई सिद्ध होते हैं -
1. बिना जन्म-पत्री मिलाए विवाह करना
2. प्रचलित नाम से मिलान करवा कर विवाह करना
3. नकली जन्मपत्री बनवाकर मिलान करवालेना
4. जन्मपत्रियों का सही ना होना
5. सही व्यक्ति से जन्मपत्रियों का मिलान न करवाना

क्रमशः
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ऑस्ट्रो केडिया जी घनश्यामदास केडिया ज्योतिषाचार्य WhatsApp नंबर 9416838298

27/05/2018

गतांक से आगे.... भाग 3......
प्रश्न यह उठता है कि दांपत्य जीवन व्यतीत करने के लिए क्या पारंपरिक विधि से विवाह करना आवश्यक है? अधिकांश विवाह तो पारंपरिक विधि से ही संपन्न होते हैं परंतु कतिपय वयस्क स्त्री-पुरुष बिना पारंपरिक विवाह किए ही एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में वर्ण कर लेते हैं. ऐसे युगल या तो मंदिर या गिरजाघर में वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं अथवा कोर्ट द्वारा वैवाहिक मान्यता प्राप्त कर लेते हैं. ऐसे युगल भी दांपत्य जीवन व्यतीत करते हुए परिवार के संरचना करते हैं. ऐसे युगलों की संताने कभी-कभी सामाजिक मान्यता से वंचित हो जाती है अथवा इन्हें सामाजिक मान्यता काफी संघर्ष के उपरांत विलंब से मिल पाती है. ऐसे विवाह प्राचीन काल में गंधर्व विवाह की श्रेणी में रखे जाते थे. वर्तमान में इन्हें प्रेम-विवाह कहा जाता है.
मनुस्मृति के अनुसार विवाह आठ प्रकार के बताए गए हैं- 1. ब्राह्म विवाह:- माता-पिता द्वारा गुणी वर तलाश कर कन्या का विवाह करना. वर्तमान में पूर्वनियोजित विवाह इसी श्रेणी में आते हैं.
2. देव विवाह:- यज्ञ के समय पुरोहित को कन्यादान करना.
3. आर्ष विवाह:- किसी विवाह के इच्छुक ऋषि को एक जोड़ी बैल व गाय के बदले कन्यादान करना.
4. प्राजापत्य विवाह:- धर्म प्रसार हेतु कन्या का विवाह करना.
5. असुर विवाह:- कन्या के पिता को धन देकर विवाह करना.
6. गंधर्व विवाह:- पारस्परिक प्रेम के फलस्वरुप वर-कन्या द्वारा वरमाला डालकर विवाह करना. स्वयंवर तथा वर्तमान-प्रेम विवाह इसी श्रेणी में आते हैं.
7.राक्षस विवाह:- युद्ध अथवा बलपूर्वक हरनोपरांत विवाह करना.
8. पैशाच विवाह :- बिना विवाह कन्या को पत्नी बनाकर रखना अथवा बलात्कार के पश्चात पत्नी बनाना.
प्रथम चार प्रकार के विवाह उत्कृष्ट माने गए हैं, शेष में से असुर व गंधर्व विवाह निकृष्ट तथा अंतिम दो राक्षस एवं पैशाच विवाह अधम माने गए है. देव, आर्ष, प्राजापत्य तथा राक्षस विवाह अब नहीं होते. सामान्य विवाह ब्राह्म विवाह की श्रेणी में आता है. इसी प्रकार का विवाह सर्वश्रेष्ठ माना जाता है.
क्रमशः
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10/05/2018

गतांक से आगे :- भाग 2
यौन-संतुष्टि मानव की आधारभूत अनिवार्यताओं में से एक है. मानव के अतिरिक्त अन्य प्राणी भी यौन-इच्छाओं की पूर्ति करते हैं, परंतु उनका यह कार्य मात्र दैहिक आधार पर है. इसलिए स्वच्छंद यौन-संतुष्टि करते हैं. मानव में यौन इच्छा की संतुष्टि का आधार दैहिक होने के साथ-साथ भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक भी है. यौन-इच्छाओं की पूर्ति की आवश्यकता ने मानव-जीवन में विवाह, दंपत्ति,परिवार, रिश्तेदारी, नातेदारी को जन्म दिया है. अन्य प्राणियों की भांति स्वच्छंद एवं मुक्त यौन-संतुष्टि को मानव समाज स्वीकृति नहीं देता.
विवाह का एक और प्रमुख आधार स्त्री में मां और पुरुष में पिता बनने की लालसा भी है जिसकी पूर्ति वैध रूप से विवाह द्वारा ही संभव है. बिना विवाह संतानोत्पत्ति को मानव समाज मान्यता नहीं देता. इसके अतिरिक्त विवाह के उपरांत ही एक पुरुष व एक स्त्री पति-पत्नी के रुप में साथ-साथ रह सकते हैं. मानव अकेला नहीं रह सकता. बिना विवाह किसी भी पुरुष या स्त्री का जीवन अधूरा है क्योंकि यौन-इच्छाओं की पूर्ति तथा संतानोत्पत्ति के अतिरिक्त पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक के रूप में जीवन यापन करते हैं.
विवाह तभी वैध माना जाता है जब इसे समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो. विवाह, समाज की निरंतरता बनाए रखने का कार्य भी करता है. मृत्यु एक शाश्वत सत्य है. यदि संतानोत्पत्ति न हो तो एक अवधि में पूरा विश्व ही मानव हीन हो जाएगा. वैध संतानोत्पत्ति के लिए विवाह आवश्यक है. संतान ही अपने माता-पिता के जीवन-मूल्यों, संस्कारों, रीति-रिवाजों, सभ्यता व संस्कृति को अगली पीढ़ी को स्थानांतरित करती है. इस प्रकार संस्कृति की निरंतरता बनी रहती है.
विवाह एक ऐसा पवित्र एवं अटूट बंधन है जिसके आधार पर पति-पत्नी के मध्य एक स्थाई दैहिक, आत्मिक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जुड़ाव स्थापित होता है. पति-पत्नी के मध्य यह संबंध "दांपत्य जीवन" कहलाता है तथा विवाहित युगल "दंपति". दांपत्य जीवन समाज की पहली कड़ी है. दांपत्य जीवन के अटूट संबंध से "परिवार" की संरचना होती है. विवाह, दांपत्य जीवन का आधार है तथा दांपत्य जीवन, परिवार का आधार है. परिवार से ही समाज का सृजन होता है.
क्रमशः

21/03/2018

विवाह में मेलापन की आवश्यकता क्यों हैं:-
दंपत्ति को हमारे देश में धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष से संबंधित उत्तरदायित्व के निर्वहन हेतु समानता का दर्जा दिया जाता है. पति-पत्नी जीवन रूपी रथ के दो पहिए हैं. यदि इन दोनों पहियों मे असमानता हो तो रथ का चलना कठिन होगा. इसी प्रकार यदि पति-पत्नी में असमानता हो अथवा सामंजस्य की कमी हो तो दांपत्य जीवन रूपी रथ का संचालन कष्ट पूर्ण होगा.
दांपत्य जीवन सुखद, सरस, स्नेहपूर्ण एवं सफल हो इसके लिए यह आवश्यक है कि पति व पत्नी के शारीरिक गुणों, स्वभाव, प्रकृति, विचारधारा, मनोवृति, मान्यताओं, आस्था तथा जीवन मूल्यों में समानता हो. सच ही कहा है,"अपने सम सों कीजिए ब्याह, वैर अरू प्रीति." उद्धृत दोहांश विवाह के लिए समान पक्षों का होना आवश्यक बताता है. वर्तमान में यह समानता केवल कुल, जाती, आर्थिक स्तर तथा मान-सम्मान तक ही सीमित होकर रह गई है. आजकल यह तो देखा जाता है कि वधू पक्ष की आर्थिक स्थिति क्या है परंतु वर-वधू में गुणात्मक समानता है या नहीं इस पर सावधानीपूर्वक विचार नहीं किया जाता. "अपने सम सों" का वास्तविक अर्थ यह लगाना चाहिए कि वह तथा वधू में दांपत्य जीवन को सुरुचिपूर्ण एवं सुखद बनाने हेतु गुणों में समानता है या नहीं. इसी समानता एवं सामंजस्य पर ही दांपत्य जीवन की सफलता निर्भर करती है. पति-पत्नी में जितना अधिक शारीरिक एवं भावनात्मक तालमेल होगा, दांपत्य जीवन उतना ही सुखद एवं सफल होगा.
भावी पति-पत्नी में सुखद तालमेल बना रहे, इसी उद्देश्य से विवाह से पूर्व इसका अनुमान लगाना आवश्यक है. इस हेतु ज्योतिष विज्ञान एक बहुत बड़ा संबल है. यह ज्योतिष विज्ञान ही है जो वर-वधु के भावी तालमेल का पूर्वानुमान विवाह से पूर्व ही लगा सकता है. इस क्षेत्र में यह हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षियों की अनुपम देन है. इसी कारण विवाह से पूर्व वर-वधु के गुणावगुणों के तालमेल की जांच करने हेतु जन्म कुंडलियों के मेलापन (मिलान) की व्यवस्था सदियों से चली आ रही है.
क्रमशः-

17/03/2018

जन्म कुंडली क्या है?
जन्म कुंडली आकाश का नक्शा है, जिस समय किसी बालक का जन्म होता है उस समय आकाश पर जो - जो ग्रह जहां - जहां जिस स्थिति में होते हैं ,उन्हें हम यहां बैठे- बैठे एक कागज पर लिखकर नक्शा - सा तैयार कर लेते हैं ,उसे ही जन्म कुंडली कहते हैं.

17/03/2018

जब हम भारतीय शास्त्रों को देखते हैं तो ज्योतिष शास्त्र ही ऐसा शास्त्र है जो समय के तीनों आयामों (भूत ,भविष्य और वर्तमान) की संपूर्ण , शत-प्रतिशत जानकारी देने की क्षमता रखता है. इसके प्रमुख दो भेद हैः गणित और फलित. गणित- एस्ट्रोनॉमी अर्थात खगोल विद्या के द्वारा आकाशीय ग्रहों की स्थिति, अवस्था, परिभाषा, दूरी इत्यादि का ज्ञान होता है. पंचांगादि भी इसके द्वारा निर्मित होते हैं जबकि फलित-एस्ट्रोलॉजी में ग्रहों के आधार पर फलादेश करना, भविष्य कथन आदि कार्य किए जाते हैं. यह पूरे संसार में सर्वाधिक प्रसिद्ध है. कोई भी व्यक्ति जब 'ज्योतिष' की बात करता है, तो उसका अभीप्राय प्रायः इसी से होता है.

17/03/2018

वेद के निर्मल चक्षु रूप ज्योतिषशास्त्र के तीन रूप हैं- सिद्धांत, संहिता और होरा. जिस भाग से ग्रहों की गति, उदय, अस्त, ग्रहण अादि का पता चलता है, उसे सिद्धांत कहते हैं. जिस भाग से ग्रहों के फल, उल्कापात, संक्रांति, सृष्टि, महार्घ-समर्थ (तेजी मंदी) आदि निर्मित विषयक बातों का ज्ञान हो सके, वह संहिता कहलाता है तथा जिस भाग से ग्रहों की तात्कालिक स्थिति के द्वारा स्थानवशात, प्राणियों के सुख-दुख, लाभ-हानि एवं कब क्या होगा, इनका सही निर्णय हो सके, वह होरा कहलाता है. ये तीनों भाग भी गनित एवं फलित हो चुके हैं, इनमें से सिद्धांत एवं संहिता का गणित में तथा होरा का फलित ज्योतिष में समावेश है.

17/03/2018

ज्योतिष पर हो रहे अनुसंधानों पर यदि दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्योतिष कि इस विद्या काे वैज्ञानिक स्वीकार करने लगे हैं-ग्रहणो के निश्चित समय आदि कुछ ऐसे व्यवहारिक उदाहरण हैं, जिनमें ज्योतिष की साख को कोई नकार नहीं पा रहा है , इसीलिए गणित-ज्योतिष में तो विश्व स्तर पर प्राप कहर पर्याप्त अन्वेषण हो रहे हैं , पर फलित-ज्योतिष पर नहीं. वैसे यह विश्वास है कि गणित ज्योतिष की खोजों का प्रभाव फलित-ज्योतिष पर भी सकारात्मक रूप से अवश्य पड़ेगा. इन अनुसंधानों का अर्थ यह कभी भी नहीं लेना चाहिए कि इससे इस शास्त्री की परिपक्वता पर कोई शक होता है , बल्कि इससे तो यह सिद्ध होता है कि विदेशी आक्रमणो और अपने ज्ञान के प्रति कीगई उपेक्षाओं से सच में हमने बहुत कुछ खोया है. बराहमिहिर, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, मुंजाल, भारोतपल, शतानंद भास्कर आदि ज्योतिषाचार्यो की थाती को हम बचा नहीं पाए तक्षशीला, नालंदा, मगध, उज्जैन, तंजौर, काशी आदि की विश्व प्रसिद्ध वैेधशालाएं और ज्योतिष की पाठशालाएं नष्ट कर दी गई. रावण संहिता, पुलस्त्य सहित, जंबाली संहिता, इंद्र संहिता, सूर्य संहिता, अरुण संहिता, जैमिनी संहिता, रुद्र संहिता आदि अनेक गणित तथा फलित-ज्योतिष के ग्रंथों के नाम ही शेष रह गए हैं, और फिर सबसे बड़ी बात है इन शास्त्रों के पढ़ने पढ़ाने की विधि का नष्टप्राय हो जाना.

17/03/2018

अब तो कंप्यूटर के प्रचार-प्रसार के साथ प्रयास हो रहा है कि ज्योतिषियों से भी छुटकारा पा लिया जाए. इस विकास से सिर्फ इस बात को लेकर प्रसन्नता होती है कि तकनीकी विकास ने इस और भी ध्यान दिया है. देश-विदेश से जो आंकड़े प्राप्त होते हैं, वे बताते हैं कि भारत में ही नहीं जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड और विशेष रूप से अमरीका में ज्योतिष सॉफ्टवेयर धड़ल्ले से बिक रहा है. तरह-तरह की जन्मपत्री और विविध कुंडलियां बनाने वाले सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों की बाढ़ आ गई है. बस बटन दबाते ही जन्म कुंडली कई प्रकार की दशाओं, अष्टकवर्ग शोधन तथा विविध चार्ट सहित मिनटों में छपकर तैयार हो जाती है. फलित भी छप कर बाहर आ जाता है.पर यह तो सभी जानते हैं कि कंप्यूटर इंट्यूशन अंतर्ज्ञान नहीं होता, और बिना उसके भविष्य कथन की बात न केवल हास्यास्पद है बल्कि भयंकर परिणामों वाली भी है.

17/03/2018

असल में, कंप्यूटर एक मशीन है, जिनमें इतनी तीव्र गति से गणित करने की क्षमता है कि दिनों का काम क्षणाे में हो जाता है. यह गणित के लिए तो नि:संदेह लाभकारी है, जबकि भविष्य कथन के लिए यह निरर्थक है.
अब होता क्या है कि कंप्यूटर में लग्न के अनुसार फलादेश के फ्लॉपी डाल दी जाती है और जो जन्मपत्रिका कंप्यूटर से निकलती है उसमें जन्म लग्न के अनुसार भविष्यफल छपकर निकला आता है. इस प्रकार कंप्यूटर से एक ही लगन की जितनी भी जन्म पत्रिकाएं निकलेंगी- चाहे किसी का जन्म किसी भी वर्ष मैं हो, किसी भी मास में हो या किसी भी समय का हो- भविष्यफल सब मे एक जैसा ही होगा. इसी से यह गलत सिद्ध हो जाता है.
ज्योतिष के अनुसार, एक ही लगने की कुंडलियां तो लाखों हो सकती है किंतु फलादेश सबका अलग-अलग होता है. ज्योतिष के अनुसार, भविष्य कथन केवल लगन से ही नहीं, अपितु जन्म लग्न, जन्म राशि, नक्षत्र, ग्रह स्थिति,दृष्टि, योग एवं ग्रहों के बलाबल इत्यादि का समन्वय करके करना होता है. ग्रह स्थिति की भिन्नता से कुंडलियां अरबों-खरबों हो सकती है. अतः कंप्यूटर द्वारा भविष्यफल कथन असंभव है. जो हो रहा है वह प्रामाणिक नहीं है.

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