22/11/2025
*कोशिश से परिवर्तन* श्रीमती नीलम पवार की कलम से
" *जब बच्चे चुप हो जाते हैं — तब स्कूल को सुनना चाहिए"*
जयपुर की 9 वर्ष की अमायरा और दिल्ली के 10वीं के छात्र शौर्य, दोनों की आत्महत्या की खबरें सुनकर पूरा देश स्तब्ध रह गया।
दो अलग शहर, दो अलग परिवार, पर दर्द एक जैसा—
दोनों बच्चे हँसते दिखते थे, लेकिन भीतर टूट चुके थे।
इन घटनाओं के बाद अक्सर *शिक्षक दोषी ठहराए जाते हैं,* लेकिन सच यह है कि समस्या केवल अनुशासन या पढ़ाई की नहीं—समस्या यह है कि हमारे स्कूलों में बच्चों की भावनाओं को समझने और सुनने की व्यवस्था अभी भी कमजोर है।
बच्चे किताबों से नहीं, रिश्तों और संवाद से सुरक्षित महसूस करते हैं।
लेकिन कई बच्चे ऐसे होते हैं जो—
माता-पिता से अपनी बात नहीं कह पाते,
दोस्तों के सामने खुद को कमजोर नहीं दिखाना चाहते,
और हर शिक्षक के पास वह भावनात्मक जगह नहीं होती जहाँ वे भरोसे से बात कर सकें।
शायद अमायरा और शौर्य ने भी बहुत कुछ कहना चाहा होगा।
शायद उन्होंने संकेत भी दिए होंगे।
लेकिन जब कोई सुनने वाला न हो तो चुप्पी ही आवाज़ बन जाती है—वह आवाज़ जिसे हम अक्सर देर से समझते हैं।
ऐसी स्थितियों में काउंसलर शिक्षक बच्चों के लिए जीवन रक्षा का सहारा बन सकते हैं।
काउंसलर शिक्षक सिर्फ सलाह नहीं देते—
वे बिना जज किए सुनते हैं…
वे बच्चे के शब्दों से ज़्यादा उनकी चुप्पियों को समझते हैं…
वे डर, तनाव, दबाव और भ्रम की परतों में छिपे असली दर्द तक पहुँचते हैं।
उनकी थेरेपी और संवेदनशील संवाद बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच पुल का काम करता है।
वे समय रहते वह पहचान सकते हैं जो आमतौर पर छूट जाती है—
बच्चे की थकान, निराशा, अकेलापन और हार की भावना।
अगर अमायरा और शौर्य के स्कूलों में सक्रिय काउंसलर होते,
अगर किसी ने उनसे मन की बात सुनी होती,
अगर किसी ने समय रहते संकेत पहचान लिए होते—
तो शायद आज वे ज़िंदा होते।
अब समय दोष देने का नहीं—
प्रणाली बदलने का है।
स्कूलों को सिर्फ अंक देने वाले नहीं, जीवन समझने वाले स्थान बनना होगा।
बच्चों को सिर्फ शिक्षक नहीं,
एक संवेदनशील सुनने वाला भी चाहिए।
क्योंकि कभी-कभी—
एक बातचीत, एक समझदार व्यक्ति और एक विश्वास—
एक पूरी ज़िंदगी बचा सकता है ।
श्रीमती नीलम पवार
सांदीपनी विद्यालय गुरैया छिंदवाड़ा