25/04/2026
अक्सर हर जनसेवा को जाति, क्षेत्र या पहचान के चश्मे से देख लिया जाता है।
किसी राजनेता को किसी जाति विशेष का, किसी भामाशाह को अपने क्षेत्र तक सीमित, और किसी मददगार को सिर्फ अपने लोगों का हितैषी कहकर एक टैग दे दिया जाता है।
लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका काम इन सीमाओं से बहुत बड़ा होता है।
ऐसा ही एक नाम है डॉ. सुनील तेतरवाल बज्जू (बीकानेर)।
आज के समय में शिक्षा, खासकर मेडिकल जैसी पढ़ाई, आम किसान और गरीब परिवार के लिए बहुत कठिन हो चुकी है। NEET की तैयारी, कोचिंग, हॉस्टल और वर्षों की मेहनत—यह सब मिलाकर लाखों रुपये मांगती है। एक साधारण किसान परिवार के लिए यह सपना कई बार सिर्फ सपना ही रह जाता है।
लेकिन यहीं से शुरू होती है एक अलग कहानी…
Desert80 Foundation के माध्यम से डॉ. सुनील तेतरवाल और उनके साथियों ने रेगिस्तान के बच्चों को सिर्फ कोचिंग नहीं दी, बल्कि हौसला दिया—
कि अगर प्रतिभा है, तो पैसा बाधा नहीं बनेगा…
अगर सपने बड़े हैं, तो गाँव का बच्चा भी डॉक्टर बन सकता है…
यह पहल किसी एक तहसील, जिले या जाति तक सीमित नहीं है।
यह मंच जोधपुर, बीकानेर, फलोदी, जैसलमेर, नागौर, बाड़मेर, जालौर सहित मरुस्थल के अनेक क्षेत्रों के बच्चों के लिए खुला है।
यहाँ General, OBC, SC, ST, हर वर्ग के बच्चे; जाट, राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम, राइका, चारण, मेघवाल—हर समाज के बच्चे समान अवसर पाते हैं।
यह सिर्फ शिक्षा नहीं, सामाजिक समरसता का आंदोलन है।
पिछले वर्ष NEET 2025 में Desert80 Foundation से 11 रेगिस्तानी बच्चे चयनित होकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS के लिए पहुँचे।
आज वे डॉक्टर बनने की राह पर आगे बढ़ चुके हैं।
सोचिए…
पाकिस्तान बॉर्डर के पास बसे बज्जू जैसे क्षेत्र से शुरुआत कर, गरीब किसान परिवारों के बच्चों को निःशुल्क कोचिंग देकर डॉक्टर बनाने का सपना गढ़ना—यह साधारण कार्य नहीं, यह सेवा है… तपस्या है… पुण्य है।
और इस कहानी की खूबसूरती सिर्फ डॉ. सुनील तक सीमित नहीं है।
उनके साथ खड़े उनके मित्र…
जो बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी नाम या प्रसिद्धि की चाह के, इस सपने को साकार करने में दिन-रात जुटे हैं—वे भी इस प्रेरक यात्रा के नायक हैं।
ऐसे दोस्त कम मिलते हैं, जो किसी व्यक्ति नहीं, एक मिशन के साथ खड़े हों।
आज जब बहुत लोग सीमाएँ खींचते हैं, तब ये लोग सीमाएँ तोड़ रहे हैं।
जहाँ लोग अवसर खरीदते हैं, वहाँ ये लोग अवसर बाँट रहे हैं।
बज्जू से शुरू हुआ यह दीपक अगर ऐसे ही जलता रहा, तो मरुधरा का हर प्रतिभाशाली बच्चा कह सकेगा—
“गरीबी मेरी मजबूरी हो सकती है, पर मेरे सपनों की सीमा नहीं।”
सच कहें तो
आज के समय में गरीब किसान परिवार के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाकर डॉक्टर बनाना, इससे बड़ा पुण्य शायद कोई नहीं।
सलाम ऐसे प्रयासों को, सलाम ऐसी दोस्ती को, और सलाम उस सोच को जो रेगिस्तान में भी सपनों की फसल उगा रही है।