27/01/2026
कहते हैं कि सच्ची मित्रता समय के साथ और मजबूत होती जाती है। ऐसा ही एक प्रेरक उदाहरण हमें डॉ. सुनील तेतरवाल बज्जू और मनफूल सारण के जीवन में देखने को मिलता है। दोनों ने अपनी 10वीं तक की पढ़ाई एक ही विद्यालय में, एक ही कक्षा में साथ-साथ पूरी की। गाँव की सीमित संसाधनों वाली शिक्षा व्यवस्था में पढ़ते हुए भी, दोनों के सपने बड़े थे और इरादे अडिग।
10वीं के बाद दोनों मित्रों के रास्ते अलग-अलग हुए, पर लक्ष्य एक ही रहा—शिक्षा के माध्यम से समाज को बेहतर बनाना।
एक मित्र ने विज्ञान (Science) विषय चुना और कठिन परिश्रम, निरंतर संघर्ष व समर्पण के बल पर डॉक्टर बनकर मानव सेवा का मार्ग अपनाया। आज वे ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य और शिक्षा—दोनों के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य कर रहे हैं।
वहीं दूसरे मित्र ने कला (Arts) विषय को चुना और शिक्षा को ही अपना जीवन लक्ष्य बनाकर व्याख्याता (Lecturer) के रूप में विद्यार्थियों के भविष्य को सँवारने में जुट गए।
दोनों की खास बात यह है कि वे किसान परिवार से आते हैं। खेत-खलिहान, मेहनत, अभाव और संघर्ष को बहुत करीब से देखने के बावजूद उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। गाँव की मिट्टी से जुड़े रहते हुए उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा और परिश्रम के आगे संसाधनों की कमी कभी बाधा नहीं बन सकती।
आज डॉ. सुनील तेतरवाल बज्जू और मनफूल सारण न केवल अपने-अपने क्षेत्र में सफल हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत भी हैं। दोनों अपने अनुभवों के माध्यम से ग्रामीण बच्चों को यह संदेश देते हैं कि—
“यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो गाँव से निकलकर भी देश और समाज के लिए बड़ा योगदान दिया जा सकता है।”
इन दोनों मित्रों की कहानी ग्रामीण शिक्षा की ताकत, मित्रता की गहराई और किसान परिवारों की जुझारू भावना को दर्शाती है। यह लेख हर उस विद्यार्थी के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों में भी बड़े सपने देखने का साहस रखता है।