16/07/2023
विश्व प्लास्टिक सर्जरी दिवस
1200 से 600 ई ० पूर्व महर्षि सुश्रुत का शल्य चिकित्सा काशी स्थित आश्रम सम्पूर्ण आर्यावर्त एवं खाड़ी के देशों में प्रसिद्ध था। दूर दूर से विद्यार्थी एवं चिकित्सक उनसे शल्य चिकित्सा की आधुनिक विधा सीखने आते। यहां से प्राप्त ज्ञान को वह अपने अपने क्षेत्रो में प्रसारित करते और मरीजों की चिकित्सा भी करते।
सुश्रुत आधुनिक शल्य चिकित्सक थे। काशी में सुरसरि गंगा जी के तट पर शवों को पानी से भीग जाने पर वो काष्ठ तूलिकाओं एवं कूंचियों से उसकी शरीर रचना , मांशपेशियों, रक्त नलिकाओं ,तंत्रिकाओं , अंदरूनी अंगों ,अस्थियों एवं अस्थि संधियों का अध्ययन करते एवं विद्यार्थियों को भी अभ्यास करने देते। उनके समय अनेकों प्रकार की शल्य चिकित्सा की जाती थी। आधुनिक यन्त्र एवं औजार भी थे जिनके नाम बहुधा पशु पक्षियों के मुंह अथवा चोंच पर रखे गए थे। आज भी बहुत से शल्य औजार सुश्रुत की औजारों से मेल खाते हैं।
शल्य चिकित्सा की विधा तब विज्ञान संगत थी, और गहन शरीर रचना के अध्ययन एवं शल्य चिकित्सा के सिद्धांतो पर आधारित थी. महर्षि सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र भी माना जाता है।
तब आँखों , त्वचा, अंदरूनी अंगों की शल्य चिकित्सा के अतिरिक्त सुगठन अथवा पुनर्निर्माण शल्य जिसे आजकल प्लास्टिक सर्जरी कहा जाता है, में वो सिद्धहस्त थे। कटी नाक का पुनर्निर्माण उनमें से एक है।
महर्षि सुश्रुत को आज सम्पूर्ण विश्व में प्लास्टिक सर्जरी का जनक या फादर ऑफ़ प्लास्टिक सर्जरी माना जाता है। उनके जन्म के बारे में कोई एक राय नहीं है। कुछ लोग यह भी मानते हैं की सुश्रुत एक शल्य गुरुओं की एक श्रंखला थी जो ईसा से 1200 वर्ष पूर्व से ईसा के जन्म तक भारत वर्ष में काशी में अति सफल और प्रसिद्ध हुयी। तदुपरांत, भारत के अन्य विश्वविद्यायलों में यथा तक्षशिला में ,यह विधा अधिक उन्नत एवं और प्रसिद्ध हुयी।