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जब आप शोरूम से नई कार या बाइक खरीदते हैं, तो चाबियों के गुच्छे के साथ अक्सर एक छोटा सा मेटल या एल्युमीनियम के टुकड़ा लगा...
12/03/2026

जब आप शोरूम से नई कार या बाइक खरीदते हैं, तो चाबियों के गुच्छे के साथ अक्सर एक छोटा सा मेटल या एल्युमीनियम के टुकड़ा लगा होता है। ज्यादातर लोग इसे सिर्फ एक साधारण टुकड़ा या टैग समझते हैं और की रिंग लगाने के बाद इसे निकालकर फेंक देते हैं।
वहीं कुछ लोग चाबी के साथ इसे सालों-साल लटका कर रखते हैं।

हम अक्सर गाड़ी के इंजन, माइलेज और फीचर्स पर तो घंटों चर्चा करते हैं, लेकिन इस छोटे से धातु के टुकड़े को नजरअंदाज कर देते हैं। असल में, यह कोई साधारण चीज नहीं है, बल्कि यह आपकी गाड़ी की सुरक्षा और सुविधा से जुड़ा एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। यकीनन 80-99% लोगों को इसके पीछे का सही और असली काम पता नहीं होता है। अगर आपकी चाभी में भी यह टुकड़ा लगा है, तो इसे बेकार या फर्जी न समझें। नीचे लेख में जानें इसके पीछे का कारण।

चाबी के गुच्छे से साथ क्यों लगा होता है मेटल का टुकड़ा?
चाबी के साथ लगे हुए मेटल के टुकड़े पर कुछ अंक लिखे होते हैं, जिसे की कोड कहते हैं। इसका काम तब शुरू होता है जब आपकी गाड़ी की असली चाबी खो जाती है। पहले के समय में चाबी खोने पर पूरा लॉक तोड़ना पड़ता था, लेकिन आज की आधुनिक गाड़ियों में इमोबिलाइजर और सेंट्रल लॉकिंग जैसे सिस्टम होते हैं। अगर आपकी दोनों चाबियां खो जाएं, तो नई चाबी बनवाना परेशानी वाला काम बन सकता है। ऐसे में यह मेटल कोड ही वह चाबी है, जिसे दिखाकर कंपनी आपके लिए हूबहू वैसी ही नई चाबी तैयार कर सकती है।
अगर आपके पास यह कोड है, तो आपको पूरी गाड़ी का लॉक सेट बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। जब आप ऑथोराइज्ड सर्विस सेंटर पर यह कोड देते हैं, तो वे अपनी मशीन में इस नंबर को फीड करते हैं। यह मशीन उस कोड के आधार पर चाबी के खांचे को बिल्कुल सटीक तरीके से काट देती है। इससे आपकी नई चाबी पुरानी वाली की तरह ही स्मूथ काम करती है। बिना इस कोड के, मैकेनिक को काफी मेहनत करनी पड़ती है और कई बार गाड़ी का पूरा लॉक सिस्टम ही बदलना पड़ जाता है, जो महंगा सौदा साबित होता है।

सुरक्षा के लिहाज से है जरूरी
स्मार्ट की के समय में कितना हेल्पफुल है यह कोड?

आजकल की कई गाड़ियों में फिजिकल चाबी के बजाय स्मार्ट की या की-फोब आते हैं। उनमें भी एक छोटी इमरजेंसी चाबी अंदर छिपी होती है। उस इमरजेंसी चाबी को दोबारा बनाने के लिए भी यह मेटल कोड उतना ही जरूरी है। अगर आपकी चाबी चोरी हो गई है, तो इसी कोड की मदद से कंपनी पुरानी चाबी के सिग्नल को डी-रजिस्टर्ड कर सकती है।
मेटल का टुकड़ा जितना मददगार है, उतना ही इसे संभालकर रखने की भी जरूरत होती है। टुकड़े पर लिखे नंबर आपकी गाड़ी का डिजिटल फिंगरप्रिंट है। अगर यह नंबर किसी गलत हाथ में लग जाए, तो वह व्यक्ति आपकी गाड़ी की डुप्लीकेट चाबी बनवा सकता है। इसलिए मेटल टैग को चाबी के साथ लटकाकर न घूमें। इसे अपनी गाड़ी के पेपर्स के साथ या घर पर किसी सुरक्षित अलमारी में रखना चाहिए। शोरूम से गाड़ी लेते ही इस कोड की एक फोटो खींचकर अपने फोन या ईमेल पर सेव कर लें।

With DrRavindra Narolia – I'm on a streak! I've been a top fan for 3 months in a row. 🎉
02/03/2026

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पतझड़ में सिर्फ पत्ते गिरते हैं, नज़रों से गिरने का कोई मौसम नहीं होता "साहेब" ।
02/03/2026

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नज़रों से गिरने का कोई मौसम नहीं होता "साहेब" ।

ख़त लिख रहे हो वो भी वफ़ादारों के पते पर….डाकिये की उम्र बीत जाएगी शहर ढूंढते ढूंढते....!!
02/03/2026

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डाकिये की उम्र बीत जाएगी शहर ढूंढते ढूंढते....!!

मैरे घनिष्ठ सम्मानीय, डॉ रविन्द्र नारोलिया जी आपको वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी पद से उप- निदेशक पद पर पदोन्नति होने पर हार्द...
13/02/2026

मैरे घनिष्ठ सम्मानीय, डॉ रविन्द्र नारोलिया जी आपको वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी पद से उप- निदेशक पद पर पदोन्नति होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं! 💐💐

पुस्तकों से बड़ा कोई मित्र नहीं है।
04/02/2026

पुस्तकों से बड़ा कोई मित्र नहीं है।

जिनके उजाले,आपकी अंधी आस्था से जलते हैं...वे आपके सोचने से डरते हैं।क्योंकि तर्क सवाल खड़े करता है…और सवाल, सबसे पहले सु...
04/02/2026

जिनके उजाले,
आपकी अंधी आस्था से जलते हैं...
वे आपके सोचने से डरते हैं।

क्योंकि तर्क सवाल खड़े करता है…
और सवाल, सबसे पहले सुविधाओं को हिलाते हैं।

जो लोग आपको
“जैसा चल रहा है वैसा चलने दो” सिखाते हैं,
असल में वो चाहते हैं कि
आप सोचें नहीं,
बस मानते रहें।
वे आपको भावुक बनाए रखेंगे,
डराएंगे, शर्मिंदा करेंगे,
परंपरा, रिश्ते, संस्कार और मर्यादा की दुहाई देंगे
ताकि आप कभी यह न पूछ सकें कि
“क्यों?”

क्योंकि जिस दिन आपने
क्यों पूछना शुरू कर दिया,
उस दिन किसी का
राज, रुतबा, अधिकार
आप पर नहीं चलेगा।

तर्कशील इंसान
न आसानी से बहकता है,
न डर से चुप रहता है,
और न ही किसी के कह देने भर से
अपने विवेक का गला घोंटता है।

इसलिए याद रखिए
आपकी चुप्पी किसी की ढाल हो सकती है,
और आपकी समझ
किसी की सबसे बड़ी परेशानी।

असल में समस्या ये नहीं है
कि आप तर्कशील हो गए
समस्या ये है कि
अब आप उपयोग के लिए आसान नहीं रहे।

"हंसना आता हैं मुझे मुझसे गम की बात नहीं होती ,मेरी बातों में मजाक होता है ,पर मेरी हर बात मजाक नहीं होती...!!"🥺❤️
04/02/2026

"हंसना आता हैं मुझे
मुझसे गम की बात नहीं होती ,
मेरी बातों में मजाक होता है ,
पर मेरी हर बात मजाक नहीं होती...!!"🥺❤️

04/02/2026

"घाव गहरा था
बहुत पर दिखता न था ,
दिल भी बहुत दुखता था
पर कोई समझता न था ,
बाद में सब कहते तो हैं कि
मुझसे कह सकता था ,
पर जब-जब कहना चाहा कोई सुनता न था...!!"🥺❤️

सन् 1950 में 24 जनवरी को यानी संविधान लागू होने गणतंत्र दिवस से 2 दिन पहले द हिंदुस्तान टाइम्स में यह कार्टून छपा था यह ...
29/01/2026

सन् 1950 में 24 जनवरी को यानी संविधान लागू होने गणतंत्र दिवस से 2 दिन पहले द हिंदुस्तान टाइम्स में यह कार्टून छपा था यह उस ज़माने के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अनवर अहमद ने बनाया था इस ऐतिहासिक कार्टून में अपने राष्ट्र को माँ के रूपमें दिखाया गया है जिसने एक शिशु को जन्म दिया जिसे द रिपब्लिक ऑफ इंडिया कहां गया संविधान निर्माता उस नवजात शिशु को अपने हाथों में लिए हुए प्रसन्न हों उसे कोमल स्पर्श दे रहे है उस कार्टून में संविधान सभा को नर्स के रूपमें दिखाया अन्य महानुभावों में जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल खड़े ये सभी नवजात शिशु को बड़ी चिंता से देख रहे है पहले रिपब्लिक डे के अवसर पर इस कार्टून को बहुत पसंद किया गया था बुद्ध काल की विरासत के रूपमें देश को गणतंत्र के मार्ग पर प्रशस्त करने में बाबासाहेब आंबेडकर जी की भूमिका की हर ओर से सराहना की गई थी...!

*- ग्लोबल आंबेडकर*

जिस बच्चे को कभी स्कूल में पानी छूने का अधिकार तक नहीं मिला, आज उसी नाम से दुनिया की सबसे बड़ी महानगरों में से एक की सड़...
29/01/2026

जिस बच्चे को कभी स्कूल में पानी छूने का अधिकार तक नहीं मिला, आज उसी नाम से दुनिया की सबसे बड़ी महानगरों में से एक की सड़क पहचानी जाएगी। अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के वुडलसाइड, क्वींस में 61st स्ट्रीट और ब्रॉडवे का चौराहा अब “डॉ. बी. आर. आंबेडकर वे” के नाम से जाना जाएगा—यह केवल एक नामकरण नहीं, बल्कि सदियों की पीड़ा पर न्याय की मुहर है।
दलित परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने अपमान, बहिष्कार और जातिगत अन्याय को किताबों में नहीं, अपने जीवन में जिया। स्कूल में अलग बैठाया जाना, पानी तक न छू पाने की विवशता—ये सब उनके संघर्ष की शुरुआत थी , अंत नहीं। उन्होंने अपने जख़्मों को कलम बनाया और उस कलम से इतिहास लिख दिया।
अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, महान समाज सुधारक और स्वतंत्र भारत के पहले क़ानून मंत्री के रूप में बाबासाहेब ने अपना पूरा जीवन समानता, न्याय और मानवीय गरिमा को समर्पित कर दिया। संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ऐसा संविधान दिया, जो केवल क़ानूनों का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वंचितों की ढाल और लोकतंत्र की आत्मा है।
आज बाबासाहेब की सोच सरहदों से आगे निकल चुकी है। न्यूयॉर्क की सड़क पर उनका नाम होना इस बात का प्रमाण है कि जो विचार न्याय पर खड़े होते हैं, वे किसी एक देश के नहीं रहते—वे पूरी मानवता के हो जाते हैं।
बाबासाहेब आंबेडकर सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं।
एक ऐसा विचार, जो कहता है—इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसके अधिकारों से होनी चाहिए।
भारत को गर्व है बाबासाहेब पर।
और दुनिया आज भी उनके सपनों के समाज की ओर देख रही है।

26/01/2026

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