Reiki Healer Dr.Neeru Gill

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सूक्ष्म शरीर और डीएनए: रहस्यमय कड़ी जो आपके जीवन का रहस्य खोल सकती है!क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे भीतर एक ऐसा रहस्यमय...
26/12/2024

सूक्ष्म शरीर और डीएनए: रहस्यमय कड़ी जो आपके जीवन का रहस्य खोल सकती है!

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे भीतर एक ऐसा रहस्यमय तंत्र काम करता है, जो भौतिक शरीर से परे जाकर हमारी चेतना, भावनाओं और ऊर्जा को नियंत्रित करता है? योग और विज्ञान दोनों के अनुसार, हमारे भीतर सूक्ष्म शरीर और डीएनए का एक जादुई संबंध छिपा है, जो हमारे अस्तित्व के हर पहलू को परिभाषित करता है।

इस लेख में, हम आपको इस अद्भुत रहस्य से परिचित कराएंगे, जहां आध्यात्मिक परंपराएं और आधुनिक विज्ञान एकजुट होकर आपको आपके असली स्वरूप का एहसास कराएंगे।
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सूक्ष्म शरीर: ऊर्जा का अदृश्य जाल

योग शास्त्रों के अनुसार, हमारे शरीर में एक ऐसा अदृश्य तंत्र है, जिसे "सूक्ष्म शरीर" कहते हैं। यह नाड़ियों और चक्रों का एक जाल है, जो हमारी जीवन ऊर्जा (प्राण) को नियंत्रित करता है।

इसमें 72,000 नाड़ियां होती हैं, जिनमें से तीन मुख्य नाड़ियां – इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना – सबसे महत्वपूर्ण हैं।

ये नाड़ियां ऊर्जा के माध्यम से हमें मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ रखती हैं।

कल्पना करें, आपके शरीर में एक रहस्यमय ऊर्जा प्रणाली हर पल काम कर रही है, जिसे आप महसूस तो नहीं कर सकते, लेकिन इसका प्रभाव आपकी हर सांस, हर विचार और हर भावना में झलकता है।
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डीएनए: आपकी आत्मा का भौतिक कोड

दूसरी ओर, विज्ञान हमें बताता है कि हमारा डीएनए वह अद्भुत कोड है, जो हमारी हर कोशिका को निर्देशित करता है।

यह आपके रंग-रूप, सोचने का तरीका, और यहां तक कि आपकी आदतों को तय करता है।

डीएनए एक जीवित "ब्लूप्रिंट" की तरह है, जिसमें आपके पूर्वजों की हर स्मृति और क्षमता छिपी हुई है।

लेकिन क्या हो, अगर मैं आपसे कहूं कि यह डीएनए सिर्फ भौतिक कोड नहीं है? यह आपके सूक्ष्म शरीर और ऊर्जा चक्रों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
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जब सूक्ष्म शरीर और डीएनए मिलते हैं, तो चमत्कार होता है

योग और विज्ञान के इस अद्भुत संगम पर विश्वास करना कठिन हो सकता है, लेकिन कई शोध और प्राचीन ग्रंथ इस ओर इशारा करते हैं।

1. ऊर्जा और तरंगों का खेल:

वैज्ञानिकों ने पाया है कि डीएनए से विद्युत चुंबकीय तरंगें निकलती हैं, और यह हमारे ऊर्जा चक्रों के कंपन से मेल खा सकती हैं।

जब आप ध्यान करते हैं या प्राणायाम करते हैं, तो यह तरंगें आपके डीएनए को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं।

2. चक्र और जीन:

हमारे शरीर के सात चक्रों का सीधा संबंध हमारे डीएनए की कार्यक्षमता से है।

जब आपका अनाहत (हृदय) चक्र खुलता है, तो यह न केवल आपके भावनात्मक स्वास्थ्य को सुधारता है, बल्कि आपके डीएनए को भी "संतुलित और सक्रिय" करता है।

3. आध्यात्मिक स्मृतियां और आनुवंशिकी:

सूक्ष्म शरीर यह मानता है कि हमारे भीतर हमारी आत्मा की पिछली स्मृतियां संग्रहित हैं।

विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि डीएनए में आनुवंशिक स्मृतियां होती हैं, जो हमारे पूर्वजों की विशेषताओं और अनुभवों को संरक्षित करती हैं।
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विज्ञान ने क्या कहा इस रहस्य पर?

रूस के वैज्ञानिकों ने पाया कि डीएनए प्रकाश और ध्वनि तरंगों का उत्सर्जन करता है। यह ठीक वैसा ही है, जैसा प्राचीन योग ग्रंथों में "प्राण ऊर्जा" के बारे में बताया गया है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोध में यह साबित हुआ है कि ध्यान और प्राणायाम से डीएनए की मरम्मत होती है और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

टेलोमेरेस (डीएनए की सुरक्षा कवर) पर ध्यान का प्रभाव यह दर्शाता है कि आप न केवल अपनी ऊर्जा बल्कि अपनी कोशिकाओं को भी नियंत्रित कर सकते हैं।
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कैसे बदलें अपना जीवन: सूक्ष्म शरीर और डीएनए की शक्ति का उपयोग करें

1. प्राणायाम से करें डीएनए को सक्रिय

नाड़ी शोधन प्राणायाम से न केवल नाड़ियां शुद्ध होती हैं, बल्कि डीएनए की कार्यक्षमता भी बढ़ती है।

विधि: एक नथुने से सांस लें और दूसरे से छोड़ें। यह प्रक्रिया ऊर्जा को संतुलित करती है।

2. चक्र ध्यान से करें डीएनए की मरम्मत

अपनी रीढ़ के हर चक्र पर ध्यान केंद्रित करें और उससे संबंधित बीज मंत्र (जैसे "ओम") का जाप करें।

यह न केवल आपके ऊर्जा प्रवाह को मजबूत करता है, बल्कि डीएनए को भी स्थिर और संतुलित करता है।

3. सकारात्मक सोच से डीएनए को बदलें

वैज्ञानिक अध्ययनों ने साबित किया है कि सकारात्मक विचार और भावनाएं आपके डीएनए पर गहरा प्रभाव डालती हैं।

टिप्स:

हर दिन 10 मिनट के लिए गहरी सांस लें और अपने मन में सकारात्मक विचार दोहराएं।

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रहस्यमय यात्रा का समापन: आप स्वयं एक ब्रह्मांड हैं

सूक्ष्म शरीर और डीएनए के इस गहरे और अद्भुत रहस्य को जानकर क्या आप खुद को पहले से थोड़ा अलग महसूस कर रहे हैं?

आपके भीतर छिपा यह जादू केवल आपकी खोज की प्रतीक्षा कर रहा है।

ध्यान, प्राणायाम, और चक्र ध्यान के माध्यम से आप अपने डीएनए को पुनर्जीवित कर सकते हैं और अपनी आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर सकते हैं।

अब सवाल यह है: क्या आप अपने भीतर छिपे इस रहस्य को जागृत करने के लिए तैयार हैं?
अगर हां, तो आज ही से अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करें और अपने भीतर छिपी उस शक्ति को जानें, जो आपको ब्रह्मांड से जोड़ती है।

आपके जीवन का रहस्य आपके ही भीतर छिपा है!

अगर आपको यह लेख रोमांचक लगा, तो इसे अपने दोस्तों के साथ साझा करें और उन्हें भी इस रहस्यमय यात्रा का हिस्सा बनाएं।

सातों चक्रों सिद्धि कैसे हासिल करे ▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣▣●▬▬▬▬ஜ۩ॐ۩ஜ▬▬▬▬●*मानवशरीर में सप्तचक्रों का प्रभाव...*🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥*1. मूल...
11/11/2024

सातों चक्रों सिद्धि कैसे हासिल करे
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●▬▬▬▬ஜ۩ॐ۩ஜ▬▬▬▬●

*मानवशरीर में सप्तचक्रों का प्रभाव...*
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*1. मूलाधारचक्र*

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच 4 पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

*मंत्र : लं*

चक्र जगाने की विधि : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है- यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

*2. स्वाधिष्ठानचक्र*

यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से 4 अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी 6 पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

*मंत्र : वं*

कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश

होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हों तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

*3. मणिपुरचक्र*

नाभि के मूल में स्थित यह शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो 10 कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

*मंत्र : रं*

कैसे जाग्रत करें : आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं।

आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

*4. अनाहतचक्र*
हृदयस्थल में स्थित द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

*मंत्र : यं*

कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

*5. विशुद्धचक्र*

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो 16 पंखुरियों वाला है। सामान्य तौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

*मंत्र : हं*

कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर 16 कलाओं और 16 विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

*6. आज्ञाचक्र*

भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।

*मंत्र : उ*

कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति सिद्धपुरुष बन जाता है।

*7. सहस्रारचक्र :*
सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

*मंत्र : ॐ*

कैसे जाग्रत करें : मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।

🙏❤️🌺महाशिव महाशक्ति🌺❤️🌷

 #कुंडलिनी_शक्ति_साधना।‘सोऽहं’ का अर्थ है- ‘मैं वह हूँ’ ‘ॐ’ अर्थात् ‘आत्मा’। ‘वह’ अर्थात् ‘परमात्मा’। ‘सोऽहम्’ शब्द में ...
07/08/2024

#कुंडलिनी_शक्ति_साधना।

‘सोऽहं’ का अर्थ है- ‘मैं वह हूँ’ ‘ॐ’ अर्थात् ‘आत्मा’। ‘वह’ अर्थात् ‘परमात्मा’। ‘सोऽहम्’ शब्द में आत्मा और परमात्मा का समन्वय है, साथ ही शरीर और प्राण का भी। ‘सोऽहम्-साधना’ जितनी सरल है, बन्धन रहित है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी है। उच्चस्तरीय साधनाओं में ‘सोऽहम्-साधना’ को सर्वोपरि माना गया है, क्योंकि उसके साथ जो संकल्प जुड़ा हुआ है, वह चेतना को उच्चतम स्तर तक जाग्रत कर देने में, जीव और ब्रह्म को एकाकार कर देने में विशेष रुप से समर्थ है। इतनी इस स्तर की भाव संवेदना और किसी साधना में नहीं है। अस्तु, इसे सामान्य साधनाओं की पंक्ति में न रखकर स्वतंत्र नाम दिया गया है। इसे ‘हंसयोग’ भी कहा गया है। जीवात्मा सहज स्वभाव में सोऽहम् का जाप श्वाँस-प्रश्वाँस किया के साथ-साथ अनायास ही करता रहता है, यह संख्या चौबीस घण्टे में 21600 के लगभग हो जाती है। गोरक्ष-संहिता के अनुसार यह जीव ‘हकार’ की ध्वनि से बाहर आता है, और ‘सकार’ की ध्वनि से भीतर जाता है। इस प्रकार वह सदा हंस-हंस जाप करता रहता है। इस तरह एक दिन-रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ मन्त्र का जाप करता रहता है। संस्कृत व्याकरण के आधार पर ‘सोऽहम्’ का संक्षिप्त रुप ‘ओऽम्’ हो जाता है। सोऽहम् पद में से सकार और हकार का लोप करके शेष का सन्धि योजन करने से वह प्रणव (ॐकार) रूप हो जाता है।
‘सोऽहम्’ साधना गायत्री की योग-साधना है। यह साधना व्यक्ति के श्वास लेते-निकालते समय स्वतः होती रहती है। श्वास बाहर निकालते समय ‘हकार’ की ध्वनि और भीतर ग्रहण करते समय ‘सकार’ की ध्वनि होती है, विद्वान लोग इसी को ‘सोऽहम्’ साधना कहते है।
इस साधना की दूसरी प्रेरणा जीवात्मा और ब्रह्म कि तथा आत्मा और परमात्मा की तात्त्विक एकता का भी प्रतिपादन करती है। ‘सो’ अर्थात् ‘वह’। kiran'sअहम् अर्थात् मैं। इन दोनों का मिला-जुला निष्कर्ष निकला- वह मैं हूँ। वह अर्थात् परमात्मा, मैं अर्थात् ‘जीवात्मा’ दोनो का समन्वय-एकीभाव-सोऽहम्। इससे आत्मा और परमात्मा एक है- इस अद्वैत सिद्धान्त का समर्थन होता है। ‘तत्त्वमसि’, अयमात्मा ब्रह्म, शिवोऽहम्, सच्चिदानन्दोऽहम्- जैसे वाक्यों में इसी का प्रतिपादन हैं।
‘सोऽहम् साधना’ को ‘अजपा-जप’ अथवा प्राण-गायत्री भी कहा गया है। इसको अजपा-जाप इसलिए कहा गया है, क्योंकि यह जाप अपने आप होता रहता है। इसको जपने की नहीं बल्कि सुनने की आवश्यक्ता है। साथ ही इसको प्राण-गायत्री इसलिए कहा गया है क्योंकि यह जाप प्रत्येक श्वांस के साथ स्वतः ही होता रहता है।
अजपा गायत्री योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली है। उसका विज्ञान जानने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इसके समान और कोई विद्या नहीं है। इसके बराबर और कोई पुण्य न भूतकाल में हुआ है न भविष्य में ही होगा।
सोऽहम् को सद्ज्ञान, तत्वज्ञान, ब्रह्मज्ञान कहा गया है। इसमें आत्मा को अपनी वास्तविक स्थिति समझने, अनुभव करने का संकेत है। ‘वह परमात्मा मैं ही हूँ’, इस तत्त्वज्ञान में मायामुक्ति स्थिति की शर्त जुड़ी हुई है। नर-किट, नर-पशु और नर-पिशाच जैसी निकृष्ट परिस्थितियों में घिरी ‘अहंता’ के लिए इस पुनीत शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। ऐसे तो रावण, कंस, हिरण्यकश्यप जैसे अहंकारग्रस्त आतताई लोगों के मुख से अपने को ईश्वर कहलाने के लिए बाधित करते थे। अहंकार-उन्मत मनःस्थिति में वे अपने को वैसा समझते भी थे, पर इससे बना क्या? उनका अहंकार ही उन्हें ले डूबा।
‘सोऽहम्’ साधना में पंचतत्वों और तीन गुणों से बने शरीर को ईश्वर मानने के लिए नहीं कहा गया है। ऐसी मान्यता तो उल्टा अहंकार जगा देगी और उत्थान के स्थान पर पतन का नया कारण बनेगी, यह दिव्य संकेत आत्मा के शुद्ध स्वरूप का विवेचन है। वह वस्तुतः ईश्वर का अंश हैं। समुद्र और लहरों की, सूर्य और किरणों की मटाकाश और घटाकाश की, ब्रह्माण्ड और पिण्ड की, आग-चिंगारी की उपमा देकर परमात्मा और आत्मा की एकता का प्रतिपादन करते हुए मनीषियों ने यही कहा है कि मल-आवरण विक्षेपों से, कषाय-कल्मषों से मुक्त हुआ जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है।kiran's दोनों की एकता में व्यवधान मात्र अज्ञान का है, यह अज्ञान ही अहंता के रूप में विकसित होता है और संकीर्ण स्वार्थपरता में निमग्न होकर व्यर्थ चिन्तन तथा अनर्थ कार्य में निरत रहकर अपनी दुर्गति अपने आप बनाता है।
तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म, शिवोहम् सच्चिदानन्दोहम्, शुद्धोसि, बुद्धोसि, निरंजनोसि
जैसे वाक्यों में इसी दर्शन का प्रतिपादन है, उनमें जीव और ब्रह्म की तात्विक एकता का प्रतिपादन है।
सोऽहम् शब्द का निरन्तर जाप करने से उसका एक शब्द चक्र बन जाता है, जो उलट कर ‘हंस’ के समान प्रतिध्वनित होता है। योग-रसायन में कहा गया है, हंसो-हंसो इस पुनरावर्तित क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र ही ‘सोहं-सोहं’ ऐसा जाप होने लगता है। अभ्यास के अनन्तर चलते, बैठते और सोते समय भी हंस-मंत्र का चिंतन परम् सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो’, ‘सोऽहम्’ मंत्र कहते है।
Kiran'sजब मन उस हंस तत्व में लीन हो जाता है, तो मन के संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाता हैं और शक्ति रुप, ज्योती रुप, शुद्ध-बुद्ध, नित्य-निरंजन ब्रह्म का प्रकाश प्रकाशित होता है। समस्त देवताओं के बीच ‘हंस’ ही परमेश्वर है, हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है, हंस परम रुद्र है, हंस ही परात्पर ब्रह्म है।
समस्त देवों के बीच हंस अनुपम ज्योति बन कर विद्यमान है।
सदा तन्मयतापूर्वक हंस मन्त्र का जप निर्मल प्रकाश का ध्यान करते हुए करना चाहिए।
जो अमृत से अभिसिंचन करते हुए ‘हंस’ तत्त्व का जाप करता है, उसे सिद्धियों और विभूतियों की प्राप्ति होती है।
जो ‘हंस’ तत्त्व की साधना करता है, वह त्रिदेव रुप है। सर्वव्यापी भगवान को जान ही लेता है।
शिव स्वरोदय के अनुसारः- श्वाँस के निकलने में ‘हकार’ और प्रविष्ट होने में ‘सकार’ जैसी ध्वनी होती है। ‘हकार’ शिवरुप और ‘सकार’ शक्ति रुप कहलाता है।
प्रसंग आता है कि एक बार पार्वती जी ने भगवान् शंकर से सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाले योग के विषय में पूछा, तो भगवान् शंकर ने इसका उत्तर देते हुए पार्वती जी से कहा- अजपा नाम की गायत्री योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसके संकल्प मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह सुनकर पार्वती जी को इस विषय में और अधिक जानने की इच्छा हुई। इसके सम्पूर्ण विधि-विधान को जानना चाहा। तब भगवान शंकर ने पुनः कहा-हे देवी, यह देह (शरीर) ही देवालय है। जिसमें देव प्रतिमा स्वरुप जीव विद्यमान है। kiran'sइसलिए अज्ञान रुपी निर्माल्य (पुराने फ़ूल-मालाओं) को त्याग कर ‘सोऽहम्’ भाव से उस (देव) की आराधना करनी चाहिए।
देवी भागवत के अनुसार- हंसयोग में सभी देवताओं का समावेश है, अर्थात् ब्रह्य, विष्णु, महेश, गणेशमय हंसयोग है। हंस ही गुरु है, हंस ही जीव-ब्रह्म अर्थात् आत्मा-परमात्मा है।
सोऽहम् साधना में आत्मबोध, तत्त्वबोध का मिश्रित समावेश है। मैं कौन हूँ? उत्तर- ‘परमात्मा’। इसे जीव और ईश्वर का मिलना, आत्म-दर्शन, ब्रह्म-दर्शन भी कह सकते है और आत्मा परमात्मा की एकता भी। यही ब्रह्म-ज्ञान है। ब्रह्म-ज्ञान के उदय होने पर ही आत्म-ज्ञान, सद्ज्ञान, तत्त्व-ज्ञान, व्यवहार-ज्ञान आदि सभी की शाखाएँ-प्रशाखाएँ फ़ूटने लगती है।
साँस खींचते समय ‘सो’ की, रोकते समय ‘अ’ की और निकालते समय ‘हम्’ की सूक्ष्म ध्वनि को सुनने का प्रयास करना ही ‘सोऽहम्’ साधना है। इसे किसी भी स्थिति में, किसी भी समय किया जा सकता है। जब भी अवकाश हो, उतनी ही देर इस अभ्यास क्रम को चलाया जा सकता है। यों शुद्ध शरीर, शान्त मन और एकान्त स्थान और कोलाहल रहित वातावरण में कोई भी साधना करने पर उसका प्रतिफ़ल अधिक श्रेयस्कर होता है, अधिक सफ़ल रहता है।
‘सोऽहम्’ साधना का चमत्कारी परिणाम भी अतुल है। यह प्राण-योग ‘सोऽहम्’ साधना का चमत्कारी परिणाम भी अतुल है। यह प्राण-योग की विशिष्ट साधना है।
Kiran'sदस प्रधान और चौवन(54) गौण, कुल चौंसठ(64) प्राणायामों का विधि-विधान साधना-विज्ञान के अन्तर्गत आता है। इनकें विविध लाभ हैं। इन सभी प्राणायामों में ‘सोऽहम्’ साधना रुपी प्राण-योग सर्वोपरि है। यह अजपा-गायत्री जप, प्राण-योग के अनेक साधना-विधानों में सर्वोच्च है। इस एक के ही द्वारा सभी प्रणायामों का लाभ प्राप्त हो सकता है।
सोऽहम् और कुण्डलिनी शक्ति
षटचक्र भेदन में प्राण्तत्त्व का ही उपयोग होता है। नासिका द्वारा प्राण तत्त्व में जाने पर आज्ञाचक्र तक तो एक ही ढंग से कार्य चलता है, पर पीछे उसके भावपरक तथा शक्तिपरक ये दो भाग हो जाते हैं। भावपरक हिस्से में फ़ेंफ़ड़े में पहुँचा हुआ प्राण शरीर के समस्त अंग-प्रत्यगों में समाविष्ट होकर सत् का संस्थापन और असत् का विस्थापन करता है। शक्तिपरक प्राणधारा आज्ञाचक्र से मस्तिष्क के पिछले हिस्से को स्पर्श करती हुई मेरूदण्ड में निकल जाती है, जहाँ ब्रह्मनाड़ी का महानाद है। इसी ब्रह्म-नाद में इड़ा-पिंगला दो विधुत धाराएँ प्रभावित हैं, जो मूलाधार चक्र तक जाकर सुषुम्ना-सम्मिलन के बाद लौट आती है। मेरूदण्ड स्थित ब्रह्मनाड़ी के इस महानाद में ही षटचक्र भँवर की तरह स्थित है। इन्हीं षटचक्रों में लोक-लोकान्तरों से सम्बन्ध जोड़ने वाली रहस्यमय कुन्जियाँ सुरक्षित रखी हुई हैं। जो जितने रत्न-भण्डारों से सम्बन्ध स्थापित कर ले, वह उतना ही महान।
कुण्डलिनी शक्ति भौतिक एवं आत्मिक शक्तियों की आधारपीठ है। उसका जागरण षटचक्र भेदन द्वारा ही सम्भव है।kiran's चक्र-भेदन प्राणतत्त्व पर आधिपत्य के बिना सम्भव नहीं है। प्राणतत्त्व के नियन्त्रण में सहायक प्राणायामों में सोऽहम् का प्राणयोग सर्वश्रेष्ठ व सहज है।
सोऽहम् साधना द्वारा एक अन्य लाभ है- दिव्य गन्धों की अनुभूति। गन्ध वायु तत्त्व की तन्मात्रा है। इन तन्मात्रा द्वारा देवतत्त्वों की अनुभूति होती है। नासिका सोऽहम् साधना के समय गन्ध तन्मात्रा को विकसित करती है, परिणामस्वरूप दिक्गन्धों की अनायास अनुभूति समय-समय पर होती रहती है। इन गन्धों को कुतूहल या मनोविनोद की दृष्टि से नहीं लेना चाहिए। अपितु इनमें सन्निहित विभूतियों का उपयोग कर दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का प्रयास किया जाना चाहिए। उपासना स्थल में धूपबती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चन्दन, कपूर आदि के लेपन या इत्र-गुलाब जल के छिड़काव द्वारा सुगन्ध पैदा की जाती है और उपासना अवधि में उसी की अनुभूति गहरी होती चले तो साधना-स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिक्गन्ध आती रहेगी। ऐसी दिक्गन्ध एकाग्रता की अभिरूचि का चिन्ह है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों में घ्राण-शक्ति का महत्व सर्वविदित है। उसी के सहारे वे रास्ता ढूँढ़ते है, शत्रु को भाँपते और सुरक्षा का प्रबन्ध करते, प्रणय-सहचर को आमंत्रित करते, भोजन की खोज करते तथा मौसम की जानकारी प्राप्त करते है। इसी घ्राण-शक्ति के आधार पर प्रशिक्षित कुत्ते अपराधियों को ढूँढ़ निकालते हैं। मनुष्य अपनी घ्राण-शक्ति को विकसित कर अतीन्द्रिय संकेतों तथा अविज्ञात गतिविधियों को समझ सकते हैं। दिव्य-शक्तियों से सम्बन्ध का भी गन्धानुभूति एक महत्वपूर्ण माध्यम है। सोऽहम् साधना इसी शक्ति को विकसित करती है।
सोऽहम् साधना विधान
Kiran'sसाधना करते समय जब साँस भीतर जा रही हो तब ‘सो’ की भावना, भीतर रूक रही हो तब ‘अ’ का और जब उसे बाहर निकाला जा रहा हो तब ‘हम्’ ध्वनि का ध्यान करना चाहिए। इन शब्दों को मुख से बोलने की आवश्यकता नहीं है। मात्र श्वांस के आवागमन पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है और साथ ही यह भावना की जाती है कि आवागमन के साथ दोनों शब्दों की ध्वनि हो रही है।
आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती, किन्तु प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है और उसे सुनने में न केवल चित्त ही एकाग्र होता है, वरन् आनन्द का अनुभव होता है।
ध्यान से मन का बिखराव दूर होता है और प्रकृति को एक केन्द्र पर केन्द्रित करने से उससे एक विशेष मानसिक शक्ति उत्पन्न होती है। उससे जिस भी प्रयोजन के लिए- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाये, उसमें जाग्रति- स्फुरणा उत्पन्न होती है। मस्तिष्कीय प्रसुप्त क्षमताओं को, षट्चक्रों को, तीन ग्रन्थियों को, जिस भी केंद्र पर केन्द्रित किया जाय वहीं सजग हो उठता है और उसके अन्तर्गत जिन सिद्धियों का समावेश है, उसमें तेजस्विता आती है।
सोऽहम् साधना के लिए किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। न समय का, न स्थान का। स्नान जैसा भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी अवकाश हो, सुविधा हो, भाग-दौड़ का काम न हो, मस्तिष्क चिन्ताओं से खाली हो। तभी इसे आरम्भ कर सकते है। यों हर उपासना के लिए स्वच्छता, नियत समय, स्थिर मन के नियम हैं। धूप-दीप से वातावरण को प्रसन्नतादायक बनाने की विधि है। वे अगर सुविधापूर्वक बन सकें तो श्रेष्ठ अन्यथा रात्रि को आँख खुलने पर बिस्तर पर लेटे-लेटे भी इसे किया जा सकता है। यों मेरूदण्ड को सीधा रखकर पद्मासन से बैठना हर साधना में उपयुक्त माना जाता है, पर इस साधना में उन सबका अनिवार्य प्रतिबन्ध नहीं है।
एकाग्रता के लिए हर साँस पर ध्यान और उससे भी गहराई में उतरकर सूक्ष्म ध्वनि का श्रवण इन दो प्रयोजनों के अतिरिक्त तीसरा भाव पक्ष है, जिसमें यह अनुभूति जुड़ी हुई है कि ‘मैं वह हूँ’ अर्थात् आत्मा, परमात्मा के साथ एकीभूत हो रही है। इसके निमित्त वह सच्चे मन से आत्म-समर्पण कर रही है। यह समर्पण इतना गहरा है कि, दोनों के मिलने से एक की सत्ता मिट जाती है और दूसरे की रह जाती है। दीपक जलता है तो लौ ही दृष्टिगोचर होती है। तेल तो नीचे पेंदे में पड़ा अपनी सत्ता बत्ती के माध्यम से प्रकाश रूप में ही समाप्त करता चला जाता हैं। ॐ सोहं

12/01/2024
एक फ्रेंच खोजी, इजिप्त के पिरामिडों में दस वर्षों तक खोज करता रहा है। उस आदमी का नाम है--बोविस। वह एक वैज्ञानिक और इंजीन...
23/11/2023

एक फ्रेंच खोजी, इजिप्त के पिरामिडों में दस वर्षों तक खोज करता रहा है। उस आदमी का नाम है--बोविस। वह एक वैज्ञानिक और इंजीनियर है। वह यह देखकर बहुत हैरान हुआ कि कभी-कभी पिरामिड में कोई चूहा भूल से या बिल्ली घुस जाती है और फिर निकल नहीं पाती--भटक जाती और मर जाती है। पर पिरामिड के भीतर जब भी कोई चूहा या बिल्ली या कोई प्राणी मर जाता है तो सड़ता नहीं। सड़ता नहीं, उसमें से दुर्गंध नहीं आती। वह ममीफाइड हो जाता है--सूख जाता है, सड़ता नहीं।

यह हैरानी की घटना है और बहुत अदभुत है। पिरामिड के भीतर इसके होने का कोई कारण नहीं है। और ऐसे पिरामिड के भीतर जो कि समुद्र के किनारे हैं जहां कि ह्युमिडिटी काफी है, जहां कि कोई भी चीज सड़नी ही चाहिये, और जल्दी सड़ जानी चाहिये, उन पिरामिड के भीतर भी कोई मर जाए तो सड़ता नहीं। मांस ले जाकर रख दिया जाए तो सूख जाता है, दुर्गंध नहीं देता। मछली डाल दी जाए तो सूख जाती है, सड़ती नहीं। तो बहुत चकित हो गया। इसका तो कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता। बहुत खोजबीन की। आखिर यह खयाल में आना शुरू हुआ कि शायद पिरामिड का जो शेप है, वही कुछ कर रहा है।

लेकिन शेप, आकार कुछ कर सकता है! सब खोज के बाद कोई उपाय नहीं था। दस साल की खोज के बाद बोविस को खयाल आया कि कहीं पिरामिड का जो शेप, जो आकृति है, वह तो कुछ नहीं करती! तो उसने एक छोटा पिरामिड माडल बनाया--छोटा सा, तीन-चार फीट का बेस लेकर, और उसमें एक मरी हुई बिल्ली रख दी। वह चकित हुआ, वह ममीफाइड हो गई, वह सड़ी नहीं। तब तो एक बहुत नये विज्ञान का जन्म हुआ, और वह नया विज्ञान कहता है--ज्यामिट्री की जो आकृतियां हैं उनका जीवन ऊर्जाओं से बहुत संबंध है। और अब बोविस की सलाह पर यह कोशिश की जा रही है कि सारी दुनिया के अस्पताल पिरामिड की शक्ल में बनाये जाएं। उनमें मरीज जल्दी स्वस्थ होगा।

आपने सर्कस के जोकर को, हंसोड़े को जो टोपी लगाये देखा है, वह फूल्‍स कैप कहलाती है। उसी की वजह से कागज--जितने कागज से वह टोपी बनती है, वह फूल्‍स कैप कहलाता है। लेकिन बोविस का कहना है कि कभी दुनिया के बुद्धिमान आदमी वैसी टोपी लगाते थे। वह वाइज--कैप है, क्योंकि वह टोपी पिरामिड के आकार की है। और अभी बोविस ने प्रयोग किये हैं, फूल्‍स कैप के ऊपर। और उसका कहना है कि जिन लोगों को भी सिरदर्द होता है, वे पिरामिड के आकार की टोपी लगाएं तत्‍क्षण उनका सिरदर्द दूर हो सकता है। जिनको भी मानसिक विकार हैं वे पिरामिड के आकार की टोपी लगाएं उनके मानसिक विकार दूर हो सकते हैं। अनेक चिकित्सालयों में जहां मानसिक चिकित्सा की जाती है, बोविस की टोपी का प्रयोग किया जा रहा है, और प्रमाणित हो रहा है कि वह ठीक कहता है।
#ओशो

सुना है, सूफी फकीर स्त्री हुई राबिया...वह एक सांझ अपने घर के सामने कुछ खोज रही थी, दो-चार लोग आते थे, उन्होंने पूछा, क्य...
28/10/2023

सुना है,
सूफी फकीर स्त्री हुई राबिया...

वह एक सांझ अपने घर के सामने कुछ खोज रही थी, दो-चार लोग आते थे, उन्होंने पूछा, क्या खो गया? उसने कहा मेरी सुई गिर गयी। तो वे दो-चार भी उसको साथ देने लगे–बूढ़ी औरत है, आंखें भी कमजोर हैं!

लेकिन फिर उनमें से किसी एक को होश आया कि सुई बड़ी छोटी चीज है, जब तक ठीक से पता न चले कहां गिरी, तो इतने बड़े रास्ते पर कहां खोजते रहेंगे? तो उसने पूछा कि मां, यह बता दे कि सुई गिरी कहां है? तो वहीं आसपास हम खोज लें, इतने बड़े रास्ते पर!

उसने कहा बेटा! यह तो पूछो ही मत, सुई तो घर के भीतर गिरी है। वे चारों हाथ छोड़कर खड़े हो गये, उन्होंने कहा तू पागल हुई है! सुई घर के भीतर गिरी है, खुद भी पागल बनी, हमको भी पागल बनाया। जब सुई घर के भीतर गुमी है, तो भीतर ही खोज।

उसने कहा, वह तो मुझे भी पता है। लेकिन भीतर अंधेरा है, बाहर रोशनी है–सूरज अभी ढला नहीं,अंधेरे में खोजूं भी कैसे? खोज तो रोशनी में ही हो सकती है।

वे हंसने लगे। उन्होंने कहा कि मालूम होता है बुढ़ापे में तेरा सिर फिर गया है! सठिया गयी तू!अगर घर में रोशनी नहीं है,तो भी खोजना तो घर में ही पड़ेगा। तो रोशनी भीतर ले जा। दीया मांग ला उधार पड़ोसी से, अगर तेरे घर में दीया नहीं।

अब हंसने की बारी उस बुढ़िया की थी। वह बड़ी महत्वपूर्ण सूफी फकीर औरत हुई। वह हंसने लगी।

उसने कहा कि मैं तो सोचती थी कि तुम इतने समझदार नहीं हो जितनी समझदारी की बात कर रहे हो। मैं तो उसी तर्क का अनुसरण कर रही थी, जिसका तुम सब कर रहे हो। तुम सब भी बाहर खोज रहे हो, बिना बूझे कि खोया कहां?

भीतर खोया है, खोज बाहर रहे हो। और कारण जो मैंने बताया,वही तुम्हारा है!क्योंकि आंखों की रोशनी बाहर पड़ती है, आंखें बाहर देखती हैं,बाहर सब साफ-सुथरा है,भीतर बड़ा गहन अंधकार है।

भीतर तुमने कभी आंख बंद करके देखा? कबीर को पढ़ो, दादू को पढ़ो, नानक को पढ़ो, तो वे कहते हैं, हजार-हजार सूरजों जैसा प्रकाश! तुम भीतर आंख बंद करते हो, सिर्फ अंधेरा।

कुछ सूरज का प्रकाश वगैरह नहीं दिखायी पड़ता। सूरज तो दूर, मिट्टी का दीया भी नहीं टिमटिमाता। झट आंख खोलकर तुम फिर बाहर आ जाते हो। कम से कम रोशनी तो है! कम से कम रास्ते परिचित तो हैं। चीजें दिखायी तो पड़ती हैं। फिर खोज शुरू कर देते हो।

भीतर, जो आदमी बाहर का आदी हो गया है, जब पहली दफा जाएगा तो अंधेरा पायेगा। ऐसे ही जैसे तुम भरी दोपहरी में बाहर चलकर घर आते हो, एकदम अंधेरा मालूम पड़ता है। बैठ जाओ थोड़ा।

थोड़ी देर में आंखें अभ्यस्त होंगी। आंख प्रतिपल बड़ी और छोटी होती रहती है। कभी धूप से आकर आईने में आंख को देखना, तो तुम पाओगे कि आंख बड़ी छोटी हो गयी है। क्योंकि इतनी धूप भीतर नहीं ले सकती, तो छोटी हो जाती है। जब अंधेरे में बैठेते हो, तो आंख बड़ी होती है।

जैसे कैमरे का लेंस काम करता है, वैसे ही आंख काम करती है। थोड़ी देर बैठते हो तो घर में जहां पहले अंधेरा मालूम पड़ा था, अंधेरा समाप्त हो जाता है, रोशनी मालूम पड़ने लगती है।

अगर कोई व्यक्ति अंधेरे में देखने का अभ्यास करता ही रहे, जैसा कि चोर कर लेते हैं, तो दूसरे के घर में जहां बिलकुल अंधेरा है–घर का मालिक भी जहां बिना चीजों से टकराये नहीं चल सकता–वहां भी अपरिचित चोर दूसरे के अंधेरे घर में बड़ी व्यवस्था से चल लेता है, न तो चीज गिरती है, न आवाज होती है।

जिस घर में शायद कभी भी न आया हो! चोर की आंखों को अंधेरे का अभ्यास हो गया है। उसने धीरे-धीरे अंधेरे में देखने की पटुता पा ली है। उसकी आंखें अंधेरे से सामंजस्य कर ली हैं।

धूप से आते हो घर, अंधेरा मालूम पड़ता है। ऐसे ही बाहर जन्मों-जन्मों से भटके हो, जब आंख बंद करते हो तो भीतर अंधेरा मालूम पड़ता है। यह बिलकुल स्वाभाविक है।
कबीर और नानक और दादू गलत नहीं। हजार-हजार सूरज प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन थोड़ा अभ्यास! आज बस इतना ही....

🌹🌹ओशो 🌹🌹

*सूफी प्रेम के लिए दो शब्द होते हैं: इश्क और मौहोब्बत।*तुम सबने मौहोब्बत जानी है -- तथाकती साधारण प्रेम, जो एक उथला - उथ...
21/10/2023

*सूफी प्रेम के लिए दो शब्द होते हैं: इश्क और मौहोब्बत।*
तुम सबने मौहोब्बत जानी है -- तथाकती साधारण प्रेम, जो एक उथला - उथला मोह है। एक दिन तुम्हें किसीसी प्रेम होता है, दूसरे दिन तुम्हें उसीसे धृणा हो जाती है। एक दिन तुम्हें किसीसे प्रेम होता है और तुम उसके लिए मरने को तैयार हो जाते हो, और दूसरे ही दिन तुम उसी व्यक्ति को मार डालना चाहते हो। यह इश्क नहीं है, इश्क में एक गहराई होती है। तुम्हारा प्रेम केवल परिधि पर है, केवल एक मुखौटा है, तुम्हारे व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। इश्क तुम्हारे व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं है, वह तुम्हारा सार-तत्व है। वह तुम्हारे केंद्र से आता है। वह तुम्हारी सत्ता की भूमि से उगता है और तुम्हें अविभूत कर लेता है। वह तुम्हारे नियंत्रण में नहीं होता, बल्कि तुम उसके नियंत्रण में होते हो। तुम उसके नशे में धृत हो जाते, पागल हो जाते हो।

ओशो
प्रेम को प्रार्थना बनाओ

10/07/2023

कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग......49

लाहिड़ी महाशय का क्रिया योग चेतना के एकीकरण पर बल देता है । क्रिया योग हठयोग , राज योग और लय योग का अनूठा मेल है। यह साधक को उसकी स्वाभाविक अवस्था में लाता है जिसमें उसका शरीर ग्रंथियों और चक्रों से ही निर्देश प्राप्त करता है।

''सांसहीन अवस्था ' वर्षों के क्रिया अभ्यास के बाद अनुभव किया जाता है। जबरदस्ती सांस रोक कर रखने से इसका कोई संबंध नहीं है। यह वह अवस्था है जहाँ साधको को सांस लेने की जरूरत महसूस नहीं होती या वे बहुत कम सांस लेते हैं।

क्रिया सिद्धांत के अनुसार, यह अवस्था रीढ़ की हड्डी के अंदर सुषुम्ना चैनल जागरूक होने का परिणाम है। क्रियायोग एक सेतु का कार्य करता जिससे मंजिल का रास्ता कम हो जाता । किन्तु शुरुवात सामान्य योग प्राणयाम से कर साधक इस सेतु तक पहुंच सकते।

क्रिया योग के प्रमुख घटक जिस बारे विस्तार से बताते हम आने वाली पोस्टो में वो ये है।

1- तालव्य क्रिया

2- नाभि क्रिया

3-स्पाइनल सेंटरों को जगाने की तकनीक

4-होंग-सॉ तकनीक

5-योनि तथा शाम्भवी मुद्रा

6--मानसिक प्राणायाम

7-क्रिया योग प्राणायाम

8-महामुद्रा

यहां सबसे पहले हम चक्रों की स्थिति बारे बात करते । चक्र रीढ़ की हड्डी के अंदर सूक्ष्म एस्ट्रल अंग हैं। क्रिया योग में पंखुड़ियों के साथ चक्र की कल्पना करना उतना महत्वपूर्ण नहीं है । जब मानसिक मौन, विश्राम, आत्मा की तीव्र अभीप्सा ,क्रिया प्राणायाम का अभ्यास होता तो "आंतरिक मार्ग" और आध्यात्मिक वास्तविकता प्रकट होती है।

तब आप सूक्ष्म आयाम में चक्रों की वास्तविकता का अनुभव करेंगे। आप उनके सूक्ष्म कंपन के साथ-साथ उनके स्थानों से निकलने वाले प्रकाश के रंगों का अनुभव कर सकेंगे। खेचरी मुद्रा का अभ्यास इस अनुभव को बढ़ावा देता है, खासकर जब सांस की "हवा" कम हो जाती है।

प्रत्येक चक्र की प्रकृति दो पहलुओं को प्रकट करती है, एक आंतरिक और एक बाहरी। चक्र का आंतरिक पहलू, इसका सार, "प्रकाश" का एक कंपन है जो आपकी जागरूकता को ऊपर की ओर, आत्मा की ओर आकर्षित करता है।

चक्र का बाहरी पहलू, इसका भौतिक पक्ष, भौतिक शरीर के जीवन को जीवंत और बनाए रखने वाला एक फैला हुआ "प्रकाश" है। अब, क्रिया प्राणायाम के दौरान रीढ़ की सीढ़ी पर चढ़ते समय, आप चक्रों को छोटी "चमकती रोशनी" के रूप में देख सकते हैं।

एक खोखली नली को रोशन करना जो रीढ़ की हड्डी है। फिर जागरूकता को नीचे लाया जाता है, तब चक्रों को आंतरिक रूप से अंगों के रूप में माना जाता है। शरीर में ऊर्जा (उपरोक्त अनंत से आने वाली) वितरित करना, शरीर के उस हिस्से को जीवंत करना उनका कार्य है।

पहला चक्र, मूलाधार, टेलबोन के ठीक ऊपर रीढ़ की हड्डी का आधार होता है। दूसरा चक्र, स्वाधिष्ठान, सर्कल रीजन में, मूलाधार और मणिपुर के बीच में है। तीसरा चक्र, मणिपुर, लुम्बर रीजन में, नाभि के समान स्तर पर है। चौथा चक्र, अनाहत डोर्सल रीजन में है।

शोल्डर ब्लेड को करीब लाकर और उनके बीच या उनके ठीक नीचे के क्षेत्र में तनावपूर्ण मांसपेशियों पर ध्यान केंद्रित करके इसके स्थान को महसूस किया जा सकता है। पाँचवाँ चक्र, विशुद्ध, वहाँ स्थित है जहाँ गर्दन कंधों से जुड़ जाता है।

इसके स्थान का पता सिर को बगल से हिलाकर, छाती के ऊपरी हिस्से को स्थिर रखकर और उस बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके लगाया जा सकता है जहां आप "क्रैकिंग" ध्वनि का अनुभव करते हैं। छठे चक्र को आज्ञा कहा जाता है।

मेडुला ओबलोंगता और कुटस्य (भौंहों के बीच का बिंदु) आज्ञा से संबंधित हैं और इन्हें अलग-अलग संस्थाओं के रूप में नहीं माना जा सकता है।मेडुला को आज्ञा चक्र का भौतिक प्रतिरूप माना जाता है। तीन बिंदुओं में से किसी एक में एकाग्रता की स्थिरता पाकर।

आध्यात्मिक नेत्र, एक अनंत गोलाकार चमक के बीच में एक चमकदार बिंदु, आंतरिक दृष्टि पर प्रकट होता है। यह अनुभव आध्यात्मिक आयाम का रॉयल एंट्रेंस है। कभी-कभी भ्रुमध्य शब्द का प्रयोग कूटस्थ के स्थान पर किया जाता है।

रीढ़ की हड्डी के शीर्ष पर मेडुला का पता लगाने के लिए, अपनी ठुड्डी को ऊपर उठाएं और गर्दन की मांसपेशियों को आधार पर तनाव दें। फिर ओसीसीपिटल हड्डी{खोपड़ी के पीछे की हड्डी} के नीचे के छोटे होलो पर ध्यान केंद्रित करें।

मेडुला उस होलो के ठीक आगे है। मेडुला की सीट से भौंहों के बीच के बिंदु की ओर बढ़ते हुए, अजना की सीट का पता लगाना मुश्किल नहीं है: धीरे धीरे अपने सिर को बग़ल में (कुछ सेंटीमीटर बाएँ और दाएँ) घुमाएँ, जिसमें कुछ महसूस हो जैसे जुड़ाव दो मंदिरों में।

आज्ञा चक्र,भ्रूमध्य, एवम् कूटस्थ--क्रिया योग के अभ्यास के पूर्व साधक को स्पष्ट ज्ञात होना आवश्यक है कि आज्ञा चक्र क्या है तथा उसकी स्थिति मस्तक में कहाँ है। आज्ञा चक्र को भ्रूमध्य मान लिया जाता है जो कि एक सहज भूल है।

भ्रूमध्य वस्तुतः आज्ञा चक्र का आंतरिक परिक्षेत्र है; हाई टेंशन विद्युत क्षेत्र,अर्थात भ्रूमध्य पर एकाग्र होना आज्ञा चक्र पर एकाग्र होने के समरूप ही है। इसे ही पिनियल ग्लैंड तथा तृतीय नेत्र कहते हैं। यह मस्तक में मेडुला के ऊपर भ्रूमध्य की ओर अवस्थित है।

अतः भ्रूमध्य को ही आज्ञा चक्र मान लेने में भूल है भी और नही भी,क्योंकि तृतीय नेत्र की दिव्य ज्योति के दर्शन भ्रूमध्य के परिक्षेत्र में ही होते हैं। लेकिन इस तृतीय नेत्र का दर्शन सूक्ष्म है। वैज्ञानिक यदि तृतीय नेत्र को ढूंढने का प्रयास करेंगें तो उन्हें सिर्फ ग्लैंड मिलेगी।

कूटस्थ सूक्ष्म आध्यात्मिक अस्तित्व है जो देश-काल से परे है। कूट का अर्थ होता है "घन" -लोहार का घन। इसका गूढ़ अर्थ है "वह जो अपरिवर्तनीय है"।आत्मा के जैसे कूटस्थ भी अनश्वर है। योगी को यह विशुद्ध श्वेत तारे के रूप में दिखता है ,जो नीले एवम् सुनहरे मंडल के घेरे में है।

स्पष्ट करने वाली बात यह है कि आज्ञा चक्र एवम् कूटस्थ का मूल स्त्रोत मेडुला है। जब हम चेतना को अंतर्मुखी कर मेडुला पर एकाग्र होते हैं तब आज्ञा चक्र एवम् कूटस्थ की दिव्य ज्योति के दर्शन होते हैं। कोई आश्चर्य नही कि ऐसी अवस्था में हम भ्रूमध्य पर एकाग्र हो जाएं।

अतः स्मरण रहे कि मेडुला ही मुख्य स्त्रोत है। क्रिया में मेडुला तक प्राण का आरोहण पर्याप्त है। दूसरे शब्दों में,यदि हम प्राण ऊर्जा को भ्रूमध्य पर ले जाएं तो हम उसके मूल स्त्रोत मेडुला को ही देखेंगे। मध्य पर आना अर्थात मेडुला पर आना।

यही कारण है कि मेडुला को विश्वतोमुखो(माउथ ऑफ़ गॉड) की संज्ञा दी गई है। यही आत्मा का निवास,आत्म सूर्य की अवस्थिति है,अर्थात मूल स्त्रोत है। यही कारण है कि लाहिड़ी महाशय ने कहा कि आत्म सूर्य (medulla) की परिक्रमा करनी है।

क्रिया में योगी प्राण ऊर्जा को छह चक्रों के इर्द गिर्द (ऊपर नीचे) घुमाता है!अतः क्रिया के अभ्यास के पूर्व आज्ञा चक्र,कूटस्थ एवम् मेडुला का स्पष्ट ज्ञान होना आवश्यक है। मेडुला पर एकाग्र हों एवम् चेतना का प्रवाह भ्रूमध्य की ओर हो । लाहिड़ी महाशय जी ने इंग्लिश के मेडुला शब्द का प्रयोग तो किया नही; वे बोले "कूटस्थ"।अतः सार तत्व मेडुला ही है।

इस प्रकार आज्ञा चक्र का आसन दो रेखाओं का प्रतिच्छेदन बिंदु है । खेचरी मुद्रा के दौरान जीभ की नोक से बहने वाली ऊर्जा पिट्यूटरी ग्रंथि को उत्तेजित करती है। पिट्यूटरी ग्रंथि, या हाइपोफिसिस, एक मटर के आकार की एक अंतःस्रावी ग्रंथि है।

यह मस्तिष्क हाइपोथैलेमस के तल पर एक फैलाव बनाता है। आध्यात्मिक नेत्र का अनुभव प्राप्त करने के लिए इस ग्रंथि पर ध्यान देना सार्थक है। फिर पीनियल ग्रंथि की भूमिका पर जोर देता है। यह मस्तिष्क में एक और छोटी अंतःस्रावी ग्रंथि है।

यह एक छोटे पाइनकोन के आकार का है (प्रतीकात्मक रूप से, कई आध्यात्मिक संगठनों ने पाइन शंकु को एक आइकन के रूप में उपयोग किया है)। यह पिट्यूटरी ग्रंथि के पीछे, मस्तिष्क के तीसरे Ventricle के पीछे स्थित होता है।

पीनियल ग्रंथि पर लंबे समय तक एकाग्रता के बाद सफेद आध्यात्मिक प्रकाश का पूरा अनुभव होने के बाद, यह अंतिम क्रिया मानी जाती है जो आप समाधि में खो जाने से पहले अपने ध्यान को पूर्ण करने के लिए करते हैं। मस्तिष्क में दो और आध्यात्मिक केंद्र है: रूद्री और बामा।

रुद्री मस्तिष्क के बाईं ओर बाएं कान के ऊपर स्थित है, जबकि बामा दाएं कान के ऊपर मस्तिष्क के दाईं ओर स्थित है। हमें उन उच्च क्रियाओं के अभ्यास के दौरान उनका उपयोग करने का अवसर मिलता है। जो मस्तिष्क के ऊपरी भाग में होती हैं।

बिंदु ऑप्टिकल रीजन में स्थित है और इसे अपने आप में एक चक्र नहीं माना जाता है। हालाँकि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है क्योंकि यह एक दरवाजे के रूप में काम करता है जो जागरूकता को सहस्रार तक ले जाता है ।

सिर के शीर्ष पर स्थित है सातवां चक्र। बिन्दु वह स्थान है जहाँ केश रेखा एक प्रकार के भंवर में मुड़ जाती है (यह वह बिंदु है जहाँ चोटी रखते ) सहस्रार के बारे में जागरूक होने के लिए ब्रह्मरंध्र पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सलाह दी जाती हैं।

फॉण्टनेल को अधिक उचित रूप से ''ब्रेग्मा/ ब्रैनग्मा-शीर्षस्थ'' कहा जाता है।आठवां चक्र उच्चतम केंद्र है। यह फॉण्टनेल से लगभग 30 सेंटीमीटर ऊपर स्थित है।

क्रमशः

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