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31/10/2018

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02/08/2018

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युवा भारत
आओं साथीयों हम सब मिलकर पूंजीवादी साम्राज्‍यवाद को समाप्‍त कर शाेषण विहीन समाजवादी समाजव्‍यवस्‍था स्‍थापित करें !

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गरीबी आर्थिक नही बल्की राजनीतिक मुद्दा है !
– मनाली चक्रवर्ती

आज के जो हालात है एवं आजका जो समय ही उसको देखते हुये हमे मिल-बैठकर एक दुसरे कि बातो को सुनने कि जरुरत है.. कब तक हम हाथ में माईक लेकर हि बोलने के आदी रहेंगे.? माईक लेकर बोलने से यह दिलासा जरूर मिलता है कि, कोई तो हमारी बात सून रहा है. आज देश जिन हालातो से गुजर रहा है एवं हम जैसे प्रगतीशील लोगो कि जो स्थिती है उसको देखते हुए हमे इस दिलासा देनेवाली बात से मुक्त होना चाहिए.
दयानंदजी ने ७० सालो के संदर्भ मे बात रखते समय यह कहने कि कोशिश कि है कि,नाम बदले है,लोग बदले है,पार्टीया बदली है लेकीन नितीयो के स्तर पर कुछ परिवर्तन देखने को नही मिलता है,मोटा-मोटी तौर पर बाते सेम-सेम सी चली आ रही है एवं उसमे एक निरंतरता है.उनकी इस बात से मै इत्तेफाक रखती हु एवं साथ हि उसमे जो कुछ breaks है उसको समझने कि जरूरत भी महसूस करती हु. १९९१ से २०१७ के आज तक जो बदलाव हुए है उनको देखकर सब कहते है कि मेरा देश अब महान बन गया है.अखबार मे,रेडीओ,टीवी मे मै पढती,-सुनती-देखती हु .हमारे सगे-साथी भी इस बात का अहसास हमे दिलाते रहते है. महान होने कि बात वह भारी भरकम आंकडो मे करते है.आकडे भी ऐसे मानो कि जो चलाखीभरे भी होते है.आंकडो को ले तो वे जीडीपी एवं ग्रोथ इन दो चीजो कि बात करते है.जीडीपी माने gross domestic product मतलब कि उस साल देश कि सारी कंपनीयो ने एवं आप जैसे सारे लोगो ने जितना कमाया है या खर्च किया है.उन सबको calculate कर जो आंकडा आएगा वह आंकडा .. एक है nominal एवं दुसरा है PPP.लेकीन हम बात nominal GDP की करेंगे.हमारा जीडीपी २.७ ट्रीलियन डॉलर, मतलब १७० लाख करोड है.अगर भारत के हर एक बाशिंदे के बीच (१३० करोड जनसंख्या है हमारी) इसे समान रूप मे बांटे,छोटे बच्चे से लेकर बढे बुढे तक तो प्रतीव्यक्ती १,३४००० रुपया हो जाएगा.और चुंकी हम अकेले नही रहते.अगर पांच लोगो का एक परिवार माना जाए तो प्रति परिवार आमदनी तो ६ लाख हो रही है.ग्रोथ भी बडे जोर से भाग रहा है.वह ७ प्रतिशत पर चल रहा है.जीडीपी के हिसाब से भारत छठे नंबर पे है,PPP वाले आंकडे कि बात करे तो भारत तीसरे नंबर पर चढ जाता है.इसका मतलब है कि आंकडे तो उस महानता की कहानी के संदर्भ मे कोई विरोधाभास पैदा नही करते,लेकीन एक दिक्कत जो है वह गरीबी कि है.हमारा शाषकवर्ग इतने विकास के बावजुद गरीबी उन्मूलन कि दवाई को लेकर पसोपेश मे रहता है.परेशान रहता है कि इतने विकास के बावजुद भी लोग गरीब क्यों है..?वह कमीटीयो पे कमीटीया बनाते जाता है.पिछले १५ सालो मे ही सरकार द्वारा बनायी गयी तेंडूलकर कमिटी,सक्सेना कमिटी,रंगनाथन कमिटी,एन.सी.अय्यर कमिटी,अर्जुन सेनगुप्त कमिटी तथा वर्ल्ड बँक की कमिटीया भी इसी बात पर जुटी हुई है कि गरीब कितने है..? और मजे कि बात यह है कि उन्हे पता हि नही चल रहा कि,गरीब कितने और कौन है..?कोई कहता है १२ प्रतिशत तो कोई ८० प्रतिशत.(यानी कि आबादी के १/१०से लेकर ४/५ तक )इस तऱह यह फैलाव है.अगर उनको पता चल जाता तो वे तुरंत इसका हल कर भी देते..! इन्ही सब बातो के बीच जो एक दवाई बतायी गयी उसका नाम है LPG.बडा हि प्यारा नाम है यह.रसोईघर वाला LPG नही है. यह है Liberalization ,privatization, globalization उदारीकरण,निजीकरण एवं भूमंडलीकरन .इस LPG का डोज पिछले २५ सालो मे खूब कूट-कूट कर डाला गया है. इसके बावजुद गरीबी उन्मूलन का कोई अता-पता नही दिख रहा है ऐसा लोग कहते है. इस LPG का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पडा है इसे हम कुछ आंकडो के माध्यम से देखते है.ह्युमन डेवलपमेंट रिपोर्ट मे एक ईण्डेक्स होता है ह्युमन डेवलपमेंट इंडेक्स .उसके अंदर प्रतीव्यक्ती जीडीपी के अलावा स्वास्थ एवं शिक्षा को जोड इन तीन पैमाने पर जैसे हि भारत कि रैकिंग का मुद्दा आता है वह छ्ठे,तीसरे वाले स्थान से गिरकर १३० वे स्थान पर आ जाता है. चीन,श्रीलंका हमसे आगे है. हमारे बाद अगर कोई है तो हमारा दुश्मन, पाकिस्तान..!! इसी बात पे हम होने को खुश हो सकते है. आप कहेंगे कि श्रीलंका छोटासा देश है लेकीन चीन को ले लीजिये.! वह ७० वे स्थान पर है.तो हम देखते है कि हम HDI( ह्युमन डेवलपमेंट इंडेक्स) कि बात करते करते हम GDP वाले ६ से १३० पर आ गये है,यह भी आंकडा है…

अब थोडा और आगे बढते है. इन २५ सालो मे एक बच्चा जो पैदा हुआ है वह आज कि तारीख मे जवान हो गया है. इस यात्रा मे इस देश मे क्या हुआ..? सबसे पहले यह बताते चले कि,बच्चे जो कि जिनके नाम पर देश चलना चाहिए,उसमे से ५० प्रतिशत ०-५ के भीतर के बच्चे कुपोषित है. उन्हे जितना खाना-पीना मिलना चाहिए उतना नही मिलता,उससे कम मिलता है.सबसे पहले तो ० से ५ साल तक भीतर के २० लाख बच्चे हर साल मर जाते है.उनमे से चार लाख २४ घंटे के भीतर मर जाते है.२० लाख सालाना का मतलब है कि,१५ सेकंड मे एक बच्चा अपने मां-बाप के सारे सपने लेकर मर जाता है.इसके अलावा आधे बच्चे Stunted है,जितनी उंचाई होनी चाहिए उससे कम,आयु के हिसाब उंचाई नहि है.वजन भी नही है,ज्यादा तो Underweight हि है. कितने कमजोर कंधो पर हम तीसरे-चौथे स्थान पर पहुंचने कि उम्मीद पाल रहे है..! हमारे यहां गर्व करणे लायक एक और बात है कि टीबी के सबसे ज्यादा केसेस हमारे पास है.हर साल १ करोड नये केसेस होते है उसमे से २८ लाख हमारे देश मे है.जो १५ लाख मर जाते है उनमे ४ लाख बच्चे है.पढाई,लिखाई,शिक्षा कि अगर हम बात करे तो हम देखते है RTE. शिक्षा अधिकार कानून का लक्ष्य है, ६ से १४ साल के भीतर के हर एक बच्चे को स्कूल तक पहुचाना है.इसका जो नारा है उसे आप,हम-सब टीवी,रेडीओ,एफएम मे सुनते रहते है.आपको जानकर आश्चर्य नही होना चाहिए कि ४० से ४२ प्रतिशत बच्चे स्कूल आकर ड्रोप-आउट होते है.सरकारी स्कूलो कि हालात बहुत खराब है.बहुत सारे स्कूल एक या दो शिक्षको के जिम्मे है.एक चतुर्थांश स्कूलो मे शौचालय नही है .लडकीयो के लिये तो दो चतुर्थांश स्कूलो मे नही है.पीने का पानी गायब है.यह सब
आप जमीनी स्तर पर रोजाना अनुभव करनेवाले लोग है.
साक्षरता को जिसे हम खिंच-खांचके ६० प्रतिशत पर ला पाए है.उसमे भी महिलाओ का प्रतिशत थोडा कम है.साक्षरता का न्यूनतम अर्थ है,आप अपना नाम लिख सकते है. मेरे साथ मेरी एक साथी थी शीला. नोटबंदी के कुछ दिन पहले बँक मे खाता खुलवाते वक़्त जब वह अपना नाम लिख रही थी तब श कभी ल से दोस्ती करता तो कभी दुश्मनी करके उपर भाग जाता.जैसे हि बँक अधिकारी कुछ कहता तो ल इधर-उधर घुमते रहता जबकी वह बहुत अच्छा drawing करती है.ऐसे हालात मे जैसे-तैसे साक्षरता में ६० प्रतिशत तक पहुंचे है.एक और तथ्य कि बात करते है. औद्योगिक मजदूर कि अगर हम बात करे तो,८० के दशक मे salaries & wage bills वह भी workers & managers का मिलाके in average जो होता है उससे २.७ गुना मलिक का मुनाफा होता था.पिछले २५ सालो मे अब वह मलिक को मुनाफा अगर एक रुपया मिलता है तो wage bill २७ पैसा हो गया है.मतलब १० गुना घट गया है.आप मे से कई साथी कृषी से जुडे हुए है.कृषी सबंधी आंकडे एवं तथ्य पी.साईनाथ जब हिंदू मे थे तब काफी मिला करते थे अब थोडे कम मिलने लगेंगे. पिछले १५ सालो में ३ लाख के उपर किसानो ने आत्महत्या कि है.पिछले साल भी १५-२० हजार किसानो ने आत्महत्या कि.यह उस क्षेत्र कि बात हो रही है जिस मे ५० प्रतिशत आबादी काम करती है और जिस पर अपने भोजन के लिए १०० प्रतिशत आबादी निर्भर करती है.
एक साथी यहांपर दंगो पर अपनी बात रखनेवाले है.. मै थोडा उससे पहले विकास के बारे मे बात कर लेती हु आजादी के समय से लेकर आजतक करीबन ६ करोड लोग विस्थापित हुए है.यह आंकडा तो कम हि होगा,वास्तविकता तो इससे ज्यादा कुछ बयां करती है.कौन गिनने बैठता है विस्थापितो को ! जब देश का विभाजन हुआ था तब १० से १५ लाख लोग विस्थापित हुए थे.तो ६ करोड का आंकडा तो उससे कही ज्यादा है. विस्थापित लोगो मे ४० प्रतिशत दलित है, और ४० प्रतिशत आदिवासी है. ६ करोड लोगो मे से ८० प्रतिशत आबादी दलित और आदिवासी है तो विकास किसका हुआ है..?? विकास कि किमत जरूर वही चुका रहे है..नेहरू जी ने जो कहा था न कि, किसी को तो किम्मत चुकानी पडेगी वही है यह..!
जहां से मैने शुरुवात कि थी और अब मै जहां पहुंची हु तो छवी कुछ अटपटी-सी लग रही होगी
ना..! कहां पे वो तीसरा और छठवां स्थान और कहां पे है इस देश कि जनता ..? यह जो छवी है उसको ठीक से
समझने के लिए उसका दुसरा पक्ष भी जो अब तक ढक रखा था उसको भी सामने लाना पडेगा. वह है अमीर और अतीअमीर लोग. १३० करोड जनसंख्या में १० प्रतिशत लोग मतलब १३ करोड लोग अमीर है.युरोप मे कोई देश नही जिसकी जनसंख्या १३ करोड हो.! उपर के जो १३ करोड है वह पिछले २५ सालो मे अधिक अमीर हो गये है.उनके पास आज हाल हि मे प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार देश का तीन चतुर्थांश धन है. कहानी इसके आगे और भी है १ प्रतिशत अतीअमीर के पास देश का ६० प्रतिशत धन है और बाकी ९९ प्रतिशत लोगो के पास सिर्फ ४० प्रतिशत धन है. इसके और भी आगे कि मजेदार कहानी यह कि,सबसे अमीर ८ लोग जिनके नाम आप सब पेपर मे पढते है,अमीरी का गुणगान भी सुनते है और हम सबको उनके नाम पता है. उनके पास देश कि आधी आबादी ६५ करोड के पास जितना धन है उतना धन है. सोचिये, यह तो घोषित धन कि बात हो रही है,जो कानुनी है.कालाधन इसमे शामील नही है.अगर आपको किसी ने यह समझाया हो कि काला धन बोरी मे,गुल्लक मे रखते है,तो वह गलत है.काला धन पैसे मे नही रहता .बोरिया निकली है,गुल्लक भी टूटे है. हम अपने हि पैसे के लिए लाईन मे खडे रहकर गिडगिडाये है.मगर काला धन उससे नही आया.काले धन से जमीन खरीदी जाती है.रियल इस्टेट मे जाता है और काफी तो विदेशो मे,पिछले १५ सालो मे २८ लाख करोड रुपये गये है वह काला धन है एवं वह भी इन्ही १ प्रतिशत के पास होगा.यह है उस छवी का दुसरा पहलु..
अब मै अंतिम बात पर जल्द हि आ जाती हु.यदि आप शाषक होते,आपके हाथ मे देश का दारोमदार होता तो आप क्या करते..? आप बहुत जल्द यह कोशिश करते कि यह जो लंबी दुरी है उसको पाटा जाए.आप कहते, यह जो तरीके है इनसे काम नही चलेगा.सरकार कीस बात पर खर्च कर रही है..? कहां पर करना चाहिए..? अभी अभी बजेट आया है उसको आप लोग देख लीजियेगा.फिलहाल उसके विस्तार मै नही जाऊंगी लेकीन मोटा-मोटी बात कह्के आगे कि बात रखुंगी. एक सोशल सेक्टर एक्सपेंडीचर होता है जिसमे लोगो के लिए शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार,गरिमापूर्ण जीवन जिने हेतू जो जरूरते है उनको इसमे समाविष्ट किया जाता है.एक आंकडे के अनुसार दुनिया के विकसित देश अपनी जीडीपी का २५ प्रतिशत खर्च करते है. जो लोग खुशहाल देश है यांनी कि विकसित,ऐसा माना जाता है.कुछ देश तो और भी आगे है.जैसे कि,फ्रान्स ३३ प्रतिशत खर्च करता है तथा Scandinavian countries उससे भी आगे है. हमारा देश २.३० प्रतिशत खर्च करता है.इससे बाकी बात को समझ लीजिये. शाषक वर्ग का रवैय्या क्या है.?थोडी बात बजट कि अब कर लेते है.इस बार का बजेट २१ लाख करोड का था. कई लोग कहते है कि,बजट पर बात करने कि अब कोई अहमियत नही रह गयी है क्योंकी अब वह सिर्फ जीडीपी के १२ प्रतिशत का ही बजट रह गया है.फिर भी उस २१ करोड लाख रुपये मे से एक चतुर्थांश ब्याज देने मे और दुसरा एक चतुर्थांश रक्षा व्यय. आप सोचिये इस कंगाल देश मे किसकी रक्षा पर यह व्यय किया जा रहा है.आधा बजट तो चला गया.लगातार मनरेगा के बारे मे,उसके व्यय मे बढोत्तरी के बारे मे बहुत सारी बाते कही जा रही है.इस साल पिछले साल कि राशी मे अभी सिर्फ ५०० करोड बढा है.कुल
मिलाके ४८,००० करोड,उसपर जो रोजगार सृजन कि सबसे बडी योजना कही जाती है और उसका दस गुना रक्षा पे..सरकार क्या कहती है कि,हमारे पास पैसे नही है.सब्सिडी घटाओ,लगातार LPG Gas,Fertilizer पर सब्सिडी घटी है.. पिछले सालो सब्सिडी नही बढाई गयी है.महंगाई लगातार बढ रही है.सब्सिडी थोडी-बहुत अन्न-पदार्थो के मामले मे बढाई गयी है.PDS System तो एकदम हि चरमरा गयी है.आपको लगता होगा कि
सरकार को इतना ब्याज देना पडता है इसलिये सब्सिडी घटाती होगी. हमारी यही गरीब सरकार हमारे देश के अतीअमीरो को विशाल सब्सिडी देती है.उसको कहते है incentive. और एक दिलचस्प बात, पहले बजट कि वेबसाईट पर एक बात को दिया जाता था.उसका शीर्षक हुआ करता था, Revenue forgone .मतलब विभिन्न करो द्वारा प्राप्त आमदनी को छोड दिया गया.इसे भारी मशक्कत के बाद २००५ मे बजट मे पेश किया गया.पी.साईनाथ ने यह बताया कि यह कैसे अमीरो को मिल रहा है.पिछले साल यह आकडा था ६ लाख करोड और इस साल नये हिसाब के तरीके ३.२५ लाख करोड लेकीन इस साल कि छूट को पुराने हिसाब के तरीके से देखेंगे तो यह ६.२५ लाख करोड बनता है.यह है incentive. गरीबो को दो तो सब्सिडी एवं अमीरो के लिए incentive.पिछले दस सालो मे इस गरीब देश ने अमीर तबके को हर दिन १५०० करोड रुपये subsidy दिये है.
अब कहानी मोटा-मोटी साफ है.हमे लगता है कि यह एक देश है हि नही !दो देश है.एक अती अमीरो का जिसकी गिनती युरोप के किसी भी दो-चार देशो जितनी है एवं उनकी तुलना आप युरोप के अमीरो के साथ कर सकते है.सरकार भी उनकी है.जिन आंकडो कि हमने बात कि उससे तो साफ है कि वे उनको अमीर-अतीअमीर बनाने के लिए काम कर रही है. एक बात अब मै बोलुंगी तो यह आपको नागवार गुजरे.सरहद पर हमे कोई खास खतरा है ही नही.जो खतरा है वह भीतर है.आपको जिस देश से खतरा है उसके खिलाफ हि तो आप आर्मी लगाते है.अब आप को बेहतर समझ मे आ रहा होगा कि अपने देश के भूखमरी लोगो का रोजगार,शिक्षा,स्वास्थ का खर्चा काटकर लगातार रक्षा व्यय एवं incentive दोनो को बढा रहे है. हम ये मान ले कि ये दो देश है.एक युरोप कि तरह खुशहाल है और दुसरा अफ्रिका के इथीओपिया या अफगाणिस्तान जैसा.१३ करोड लोगो का एक देश और बाकी बचे हम सारे लोग एक देश.यह बात अगर हम न समझे और देशप्रेम,राष्ट्रवाद,राष्ट्रद्रोह वाली बात मे उलझ जायेंगे तो बहुत सारी चीजे गवां देंगे.
एक आखिरी बात मुद्दा आर्थिक नही है.पैसा बहुत है.आपको याद है उस २.७ ट्रीलियन डॉलर को हर एक परिवार के हिसाब से बाट दे तो हर एक परिवार को ६ लाख सालाना अच्छी खासी आमदनी होगी.तो यह मुद्दा राजनीतिक है.जब तक गरीबी को आर्थिक मुद्दे के रूप मे समझते रहेंगे तो हम उसका मुख्य पक्ष समझ नही पाएंगे..
(डॉ.मनाली चक्रवर्ती, स्वतंत्र शोधार्थी, कानपूर का युवा भारत के ८ वे अखिल भारतीय संमेलन के उद्घाटन सत्र मे दिया गया वक्तव्य..) (शब्दांकन :- संजय कुंभार,मुंबई )

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