04/09/2025
Last Time shared here on 08-07-2025, Mjf Lion Sanjay Khivesra, Alumni IIM Calcutta,Chennai
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*भक्तामर स्तोत्रम्*
*श्लोक -- 1*
भक्तामर-प्रणत-मौलिमणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमोवितानम्।
सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा-
वालम्बनं भवजले पततां जनानाम्।।
*भक्तामर स्तोत्र ( हिन्दी )*
भक्त अमर -गण के किरीत-मणियों की प्रभा निखरती है,
जिनके स्मरण मात्र से पापो की घटा बिखरती है ।
भव सागर मे पड़ने वालों को मिलता जिनसे आधार,
उन्हीं आदि प्रभु के चरणों में नमस्कार है बारम्बार।।
*भावार्थ*
भगवान ऋषभ के चरण-युगल को विधिवत् प्रणाम कर मैं उनकी स्तुति करूंगा, जो चरण-युगल भक्त देवताओं के झुके हुए मुकुट की मणियों की प्रभा को प्रकाशित करने वाले हैं, पाप रूपी अंधकार के विस्तार को विदलित करने वाले हैं, युग की आदि में संसार समुद्र में गिरते हुए प्राणियों को आलंबन देने वाले हैं।
*श्लोक -- 2*
य: संस्तुत: सकल-वाङ्मयतत्त्वबोधा-
दुद्भूतबुद्धिपटुभि: सुरलोक-नाथै:।
स्तोत्रैर् जगत्त्रितयचित्तहरैरुदारै:
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्।।
*भक्तामर स्तोत्र ( हिन्दी )*
सुन्दर मन-मोहक स्तोत्रो से श्री सुरेन्द्र गुण गाते हैं,
हैं पैनी प्रतिभा वाले पर फिर भी पार न पाते हैं।
हृदय देव श्री ऋषभ देव की मैं स्तवना करता हूं,
स्तवना क्या करता हूं सचमुच मंगल माला वरता हूं।।
*भावार्थ*
सम्पूर्ण वाड्मय के तत्त्वज्ञान से उत्पन्न बुद्धि से पटु इन्द्रों के द्वारा तीनों जगत् के चित्त को हरण करने वाला विशाल स्तोत्रों से जिसकी स्तुति की गई है, उस प्रथम तीर्थंकर ( भगवान ऋषभ ) की मैं भी स्तुति करूंगा।
*श्लोक -- 3*
बुद्धया विनाऽपि विबुधार्चितपादपीठ !
स्तोतुं समुद्यत-मतिर् विगत त्रपोऽहम् ।
बालं विहाय जलसंस्थितमिन्दुबिम्ब
मन्य:क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम्।।
*भक्तामर स्तोत्र ( हिन्दी )*
सुरेन्द्र पुजित है जिनेन्द्र ! तेरी महिमा है अपरम्पार
हैं बचकानी बात नहीं मति, फिर भी स्तुति हित हूं तैयार।
जल में पड़ती शशि छाया को समझ मनोहर चन्द्र उदार,
कौन पकड़ने हाथ बढ़ाता शिशु के बिना कहो जगन्नाथ?
*भावार्थ*
देवताओं द्वारा अर्चित पाद पीठ वाले प्रभो ! बुद्धि रहित होकर भी मेरी मति आप की स्तुति करने के लिए उद्यत हो