25/04/2026
अंगूर (Vitis vinifera)
द्राक्षा पक्वा सरा शीता चक्षुष्या बृंहणी गुरुः।
स्वादुपाकरसा स्वर्या तुवरा सूष्टमूत्रविट्।।
कोष्ठमारुतकृद् वृष्या कफपुष्टिरुचिप्रदा।
हन्ति तूष्णाज्वर श्वासवातवातास्त्र कामलाः।। कृच्छ्रास्त्रपित्तसम्मोहदाहशोषमदात्ययान्।।
- (भा. प्र . आम्रादिफलवर्ग)
दाख के पके फल सारक, शीतल, नेत्रों के लिए हितकर, बृंहण गुरु, स्वर को उत्तम करने वाले, मूत्र तथा मल की प्रवृत्ति कराने वाले कोष्ठ में वातकारक, वृष्य, कफ- पुष्टि तथा रुचि उत्पन्न करने वाले, तृषा, ज्वर, श्वास, वात, वातरक्त, कामला, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, मोह, दाह, शोष तथा मदात्मय का नाश करते हैं । (कच्चे दाख अल्प गुणयुक्त और भारी होते हैं यदि खट्टे हों तो रक्तपित्त कारक होते हैं।)
यह द्राक्षाकुल (Vitaceae) कुल की वनस्पति है। चरक, सुश्रुत आदि सभी प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में इस वनस्पति का वर्णन है।
आयुर्वेद में द्राक्षा का भूरिशः चिकित्सीय उपयोग होता आया है। इसके अलावा यूनानी और अरबी ग्रन्थों में इसका वर्णन है। अंगूर को सुखाकर बनायी हुयी द्राक्षा (दाख) को आयुर्वेदाचार्य पचा पचाया आहार और श्रेष्ठ पथ्य कहते हैं। उनका मानना है जब कोई आहार द्रव्य रोगी को पथ्य के रूप में न दिया जा सके तब द्राक्षा (मुनक्का) का सेवन किया जा सकता है। यह सामान्य दुर्बलता को दूर करता है और कृशता तथा शोष रोग में प्रयोग होता है। इसका वानस्पतिक (लैटिन) नाम (Vitis vin- ifera) वाइटिस विनिफेरा है। इसके संस्कृत में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे- द्राक्षा, मृद्वीका, गोस्तना, स्वादुफला, मधुरस, स्वाद्वी।
हिन्दी - दाख, मुनक्का, अंगूर, द्राक्ष
उर्दू - अंगूर
बंगला - द्राक्षा, आंगूर
उड़िया - द्राक्या, गोस्तोनी
पंजाबी - दाख, अंगूर, बूरी
मराठी - अंगूर, द्राक्ष
गुजराती - दराख, धराख
मलयालयम - गोस्तनी, मुन्टीरी
तेलगू - द्राक्षापाण्डू, गोस्तनी
तमिल - कोट्टन, कोडीमुन्दरी
फारसी - अंगूर (हरा), मवेझ (सूखा), मवेझ मुनक्की (सूखा और बीज निकाला हुआ)
अरबी - ऐनाएब
अंग्रेजी - ग्रेप (Grape)
गणवर्गीकरण - चरक ने इसे स्नेहोपग, विरेचनोपग, कासहर, ज्वरहर, संतापहर, तृषाहर, कण्ठ्य तृषाहर, कण्ठ्य और सुश्रुत ने काकोल्यादि, परुषकादि गण में माना है।
रासायनिक संघटन - फलों में ग्लूकोज, गोंद, टैनिन, टार्टरिक, साइट्रिक, मैलिक, थाइमिन, विटामिन सी, नियासिन, बायोटिन, कैल्शियम, सोडियम, पोटेशियम, मँग्नेशियम, लौह, कुछ एल्बुमिन और रेशमिक पाया जाता है। इसके कच्चे फलों में ऑक्जलिक एसिड भी होता है । मुनक्के में कैल्शियम, मैग्नेसियम, पोटेशियम, फॉस्फोरस और आयरन पाया जाता है। इसके अतिरिक्त गोंद और ग्लूकोज भी होता है। इसके बीजों में तैल और टैनिन पाया जाता है।
स्वरूप - यह पर्णपाती आरोही लता होती है। इसमें बड़ी, लम्बी शाखा और प्रशाखायें होती हैं। इसका तना मोटा, पोला, आरोही, रेखित तथा लगभग अरोमश होता है। इसके पत्ते सरल 15 से 20 से. मी. लम्बे-चौड़े प्रायः हृदयाकार पाँच किनारों से कटे हुये ऊपर पृष्ठ पर हरे, अरोमश तथा नीचे के पृष्ठ पर धूसर वर्ग के तथा रोमयुक्त होते हैं। इसमें छोटे-छोटे हरे वर्ण के और सुगन्धित पुष्प लगते हैं जो पत्तों के विपरीत गुच्छों में लगे हुए होते हैं।
इसका फल गोलाकार से अण्डाकार, बैंगनी, काले अथवा हरे रंग के मुलायम, मांसल और सरस होते हैं जो गुच्छों में लगते हैं। फलों के अन्दर 2-4 बीज पाये जाते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से मई तक होता है।
उत्पत्ति स्थान - यह विशेष रूप से उत्तर, पश्चिम भारत, पंजाब, हरियाणा, कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात तथा बलूचिस्तान और अफगानिस्तान में खेती की जाती है।
दाख और किशमिश का निर्माण - काले अंगूर, बैंगनी रंग के अंगूर, लम्बे अंगूर और बीज रहित अंगूरों सूखाकर किशमिश तैयार की जाती है और काले अंगूरों को सुखाकर मुनक्का बनाया जाता है।
रस पञ्चक
रस - मधुर
गुण - स्निग्ध, गुरु, मृदु
विपाक - मधुर
वीर्य - शीत
दोषाघ्नता - यह वात और पित्त को शमन करने में बहुत ही उत्तम है। स्निग्ध, गुरु, मधुर होने से वात का और मधुर तथा शीत होने से पित्त का शमन करता है।
कर्म - यह मन और मस्तिष्क पर उत्तम प्रभाव डालकर मन को प्रसन्न करता है तथा मेधा को बढ़ाता है। यह तृष्णा, निग्रहण, स्नेहन, अनुलोमन, हृद्य, रक्तपित्त शामक, रक्तप्रसादन, संधानकारक, श्वासवहस्रोतस बलदायक, संधान कारक, कफ निःसारक, मूत्रल, वृष्य, गर्भस्थापन, जीवनीय, बल्य, बृंहण, दाह, ज्वर, मोह, शोष, मदात्यय, कामला, उदावर्त, तिक्तास्यता, क्षय, दाह, चक्षुष्य, अरुचि, रक्तविकार, पाण्डु, कासश्वास, स्वरभेद, जीर्णज्वर।
रोगघ्नता - तृषा, जीर्णज्वर, श्वास, कामला, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, स्वरभंग, स्वर दौर्बल्य, अरोचक, अवसाद, स्मरण शक्ति हीनता, क्षय रोग, मस्तिष्क दौर्बल्य, विबंध, वातरक्त, रक्तविकार, रक्तपित्त, गर्भाशय दौर्बल्य, संतापाधिक्य, शुक्र दौर्बल्य, उरःक्षत, फुफ्फुस रोग, उत्साह हीनता।
नोट- इसके कच्चे फल अल्प गुणयुक्त, पचने में भारी, रक्तदोष को बढ़ाने वाले, वातरक्तकर, अम्लपित्तवर्धक तथा उदररोगवर्धक होते हैं।
प्रयोज्यांग - फल, पत्र ।
मात्रा- पाचनशक्ति के अनुसार।
विशिष्ट योग- द्राक्षारिष्ट, द्राक्षासव, रागषाडव, द्राक्षादि क्वाथ, द्राक्षादि, घृत, द्राक्षावलेह, द्राक्षादि चूर्ण।
➡️ रोगानुसार प्रयोग
👉 वातपित्तज शिरःशूल - मुनक्का 8, छोटी हरड़ 2, कालीमिर्च 5, इलायची 1 और धनियाँ 5 ग्राम। को 100 मि.ली. पानी में रात में भिगो दें। सुबह इसी पानी में इन सभी को अच्छी तरह पीसें । फिर 2 चम्मच चीनी और उपरोक्त पिसी औषधि मिलाकर 1 गिलास शर्बत तैयार करें। इसे खाली पेट सुबह सेवन करें। इसके सेवन से इसकी किसी-किसी को 2-3 दस्त आ सकते हैं। भूख लगने पर पतली खिचड़ी और घी खायें। भोजन सादा और सुपाच्य करें। इस प्रयोग से एक सप्ताह में ही शिर दर्द जड़ से नष्ट हो जाता है और जब तक रोग को बढ़ाने और पैदा करने वाले कारण नहीं जुड़ते तब तक पुनः रोग की उत्पत्ति नहीं होती।
👉 हृदय रोग -
1️⃣ - वातपित्तज हृदय रोगियों को 4 मुनक्के आग में भूनकर थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर चूसने को दें। इससे हृदय रोग में लाभ होता है तथा भोजन में रुचि बढ़ती है और शक्ति का संचार होता है ।
2️⃣ - 5-8 मुनक्के धोकर बीज निकाल लें फिर उन्हें कुचलकर 100 मि.ली. दूध बराबर पानी, 1 ग्राम अर्जुन चूर्ण और 500 मि.ग्रा. सोंठ मिलाकर धीमी आँच में पकायें। पकते - पकते जब केवल दूध बचे तब उतारकर ठण्डाकर सुबह खाली पेट सेवन करें। यह योग नित्य सेवन करने से वातपित्तज हृदय रोगों में लाभ मिलता है तथा दुर्बलता दूर होती है।
3️⃣ - अर्जुन छाल चूर्ण, छोटी हरड़, पोहकर मूल और द्राक्षा। सभी बराबर-बराबर लेकर कूटकर मटर के बराबर की गोलियाँ बना लें। 2-2 गोली सुबह - शाम भोजन के 1 घण्टे पूर्व चूसने से हृदय रोगों में लाभ होता है।
👉 हृदयशूल - इसे आयुर्वेद की भाषा में हृच्छूल भी कहते हैं । दाख, निशोथ, छोटी हरड़, वायविडंग, पोहकरमूल और लौंग । सभी बराबर-बराबर लेकर सभी को मिलाकर इतनी देर तक कूटें कि सभी एकजान हो जायें फिर 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1-1 गोली सुबह -शाम खाली पेट नित्य चूसें। इससे हृच्छूल का शमन होता है।
👉 उदरशूल - अंगूर का रस 50 मि.ली., खाने का सोड़ा 1 ग्राम मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से पेट का दर्द मिटता है और बलवर्धन होता है।
👉 कोष्ठबद्धता - 10 मुनक्का, अदरक रस 2 चम्मच और गाय का दूध डेढ़ पाव मिलाकर धीमी आँच में पकायें जब अच्छी तरह पक जाय तब उतार लें और हल्का गुनगुना रहने पर ही रात में सोते समय दूध पियें और मुनक्का चबाते जायें। यह प्रयोग कोष्ठबद्धता को दूर करता है और आँतों की रुक्षता मिटाता है तथा बल प्रदान करता है।
👉 अरुचि - मिश्री 5 ग्राम, लौंग और काली मिर्च पाउडर 250-250 मि.ग्रा., सेंधा नमक 1 ग्राम तथा मुनक्का 10। सभी को पीसकर 20 मि.ली. पानी 20 ग्राम दाख और 10 ग्राम सौंफ को 1 पाव ठण्डे पानी में अच्छी में घोल लें और धीमी आँच में पकायें। पकते - पकते जब चाटने योग्य बन जाय तो उतार लें और चाट लें। यह प्रयोग भोजन के पूर्व दिन में दो बार करने से अरुचि का नाश होता है, कब्ज दूर होता है तथा रक्तवर्धन होता निःसरण होता है।
👉 अम्लपित्त -
1️⃣ - दाख 100 ग्राम, छोटी हरड़ 80 ग्राम और लौंग 20 ग्राम। सभी को मिलाकर अच्छी तरह कूदें फिर 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1- 1 गोली सुबह-शाम चूसें। यह प्रयोग अम्लपित्त का नाश करता है और पेट साफ रहता है तथा आलस्य, अवसाद, अनुत्साह दूर होता है । यह प्रयोग क्षुधा को भी बढ़ाता है।
2️⃣- मुनक्का 100 ग्राम और छोटी सौंफ 50 ग्राम को लेकर अच्छी तरह कुचलें फिर 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें। इन गोलियों को सुबह - शाम खाली पेट और दोपहर में भोजन के बाद नित्य चूसने से अम्लपित्त में लाभ होता है।
👉 खूनी बवासीर -
1️⃣- अर्जुन की छाल का चूर्ण, छोटी हरड़ और मुनक्का तीनों बराबर- बराबर लेकर अच्छी तरह कुचलकर 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1- गोली सुबह-शाम खाली पेट नित्य चूसने से खूनी बवासीर में लाभ होता है।
2️⃣- मुनक्का 100 ग्राम, देशी कत्था 10 ग्राम और नीम की पत्ती 50 ग्राम सभी को मिलाकर कुचलकर मटर के बराबर की गोलियाँ बना लें। 2-2 गोली सुबह-शाम खाली पेट निगल लें। इस प्रयोग से खूनी बवासीर में लाभ होता है।
👉 दुर्बलता - मुनक्का 10 और दूध 200 मि.ली. मिलाकर अच्छी तरह पकायें। फिर ठण्डा कर लें। सोते समय इसमें 4 पंखुड़ी केशर मिला लें और मुनक्का चबाते जायें तथा दूध पियें। 40 दिन यह प्रयोग करने से दुर्बलता दूर होती है और बल तथा वीर्य की वृद्धि होती है।
👉 पाण्डु कामला - गाय का घी 5 वर्ष पुराना 5 किलो, मुनक्का 1 किलो, अदरक रस 1 लीटर तथा पानी 19 लीटर सबसे पहले मुनक्के को धोकर बीज निकाल लें फिर अदरक रस में अच्छी तरह घोंटे घोटकर चटनी बनायें। पश्चात् घी चटनी और पानी। सभी को मिलाकर धीमी आँच में पकायें। पकते - पकते जब केवल घी मात्र बचे तो छानकर रख लें। 5-10 ग्राम सुबह-शाम खाली पेट गरम पानी या दूध के साथ सेवन करने से पाण्डु कामला और जीर्णज्वर का नाश होता है। हम यह प्रयोग पाण्डु कामला के रोगियों को गरम पानी के साथ तथा जीर्णज्वर के रोगी को दूध से सेवन कराते हैं।
👉 पेशाब की रुकावट - 20 ग्राम दाख और 10 ग्राम सौंफ को 1 पाव ठंडे पानी में अच्छी तरह पीसें फिर छान लें। छाने हुए पानी में 1 ग्राम फिटकरी मिलाकर पिलाने से पेशाब की रुकावट दूर होती है तथा उदरगत वायु का भी नि:सरण होता हैं।
👉 नाक से खून गिरना - अनार की पत्ती और दूब 50-50 ग्राम तथा मुनक्का 100 ग्राम सभी को मिलाकर अच्छी तरह कुचलें और बड़े बेर के बराबर की गोलियाँ बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम चूसें और गरम आहार-विहार का त्याग करें। इस प्रयोग से धीरे-धीरे नाक से खून गिरने की बीमारी ठीक हो जाती है।
👉 योनि से रक्तस्त्राव -
1️⃣- रक्तपित्त के कारण योनि से रक्तस्राव होता है। जिसमें एलोपैथिक इंजेक्शन का प्रयोग करने पर तात्कालिक लाभ मिलता है और रोग की पुनरावृत्ति फिर से हो जाती है । पके और मीठे अंगूर का रस 50 मि.ली., इलायची पाउडर आधा ग्राम तथा खाने का सोड़ा 2 चुटकी मिलाकर 1- 2 माह नित्य खाली पेट सेवन करने से यह बीमारी समूल नष्ट हो जाती है। कई रोगियों को तो दूसरी खुराक से ही लाभ होने लगता है।
2️⃣ - मेंहदी की पत्तियों का रस 50 मि.ली. और मीठे अंगूर का रस 100 मि.ली. मिलाकर सुबह-शाम खाली पेट सेवन करने से इस बीमारी में लाभ होता है।
👉 मूत्रदाह - कवाब चीनी 50 ग्राम, फिटकरी 25 ग्राम और दाख (बीज निकाले हुये ) 100 ग्राम। सभी को कुचल कर मटर के बराबर की गोलियाँ बना लें। 1-1 गोली दिन में 3 बार चूसने से मूत्रदाह में तत्काल लाभ होता है।
👉 मस्तिष्क दौर्बल्य - काजू 100 ग्राम, बीज निकाले दाख 200 ग्राम, काली मिर्च 10 ग्राम, सौंफ 50 ग्राम। सभी को मिलाकर कुचलकर आधा-आधा ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1-1 गोली सुबह - शाम दिन में 3 बार शीतल जल से सेवन करें। प्रयास यह हो कि जिस समय पेट खाली हो उस समय ही सेवन करें। यह प्रयोग मस्तिष्क की दुर्बलता को दूर करता है और मेधाशक्ति को बढ़ाता है। यह प्रयोग 2 माह तक कम से कम करें।
👉 शारीरिक रुक्षता - वातवृद्धि के कारण शारीरिक रूक्षता होती है। 25 ग्राम मुनक्का धोकर रात्रि में पानी भिगो दें तथा सुबह खाली पेट मुनक्का चबाते हुए वही जल सेवन कर लें। यह प्रयोग नित्य करने से शारीरिक और आन्तरिक रूक्षता दूर होती है। नया बल, तेज और उत्साह की वृद्धि होती है।
👉 फुफ्फुस क्षय में - आजकल टी.बी. के रोगियों में एम. डी. आर. की स्थिति बन रही है।
एलोपैथ चिकित्सक हताश हैं तथा सरकारें परेशान हैं। किन्तु यदि फुफ्फुस क्षय के रोगियों को कोई भी दवा चलायी जा रही हो और साथ मैं नित्य प्रातः अंगूर का रस 50 मि.ली. खाली पेट सेवन करने से टी. बी. के रोगियों को आशातीत लाभ होता है और एम. डी. आर. की स्थिति नहीं बनती।
👉 हड्डी टूटने पर - मुनक्का 10 ग्राम, अर्जुन चूर्ण 5 ग्राम, दूध 200 मि.ली. लेकर मुनक्का और अर्जुन को अच्छी तरह कुचलकर दूध में डालकर पकायें फिर रात में सोते समय रोगी को सेवन करा दें। यह 40 दिन का प्रयोग टूटी हड्डी जोड़ता है और वेदना का भी शमन करता है।
👉 सूखी खाँसी - मुनक्का 50 ग्राम, हल्दी 25 ग्राम, लौंग 10 ग्राम, सेंधा नमक 5 ग्राम सभी को मिलाकर अच्छी तरह कुचलें और मटर के बराबर गोलियाँ बना लें। 2-2 गोली सुबह - शाम नित्य चूसें। इससे फेफड़ों में जमा हुआ कफ बाहर निकल जाता है तथा खाँसी दूर हो जाती है।
👉 श्वास रोग - बीज निकाला हुआ मुनक्का, खजूर और मिश्री 100-100 ग्राम, छोटी पिप्पली 20 ग्राम, अर्जुन चूर्ण 50 ग्राम अच्छी तरह मिलाकर कुचलें और 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें। 1 गोली को शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें। यह प्रयोग श्वास रोग में लाभकारी है । बल प्रदान करता है और रक्त की वृद्धि करता है ।
👉 बाँझपन में - मुनक्का 10 ग्राम, शिवलिंगी के बीज 2 ग्राम पीसकर सुबह खाली पेट बछड़े वाली गाय के दूध के साथ सेवन करने से गर्भस्थापना होती है।
👉 स्वरभंग - सोंठ, पीपल, कालीमिर्च 10-10 ग्राम तथा मुनक्का 50 ग्राम। मिलाकर कुचलकर मटर के बराबर गोलियाँ बना लें 2-2 गोली सुबह - शाम चूसें। इससे स्वरभंग का निवारण होता है।
👉 वातरक्त - गिलोय का टुकड़ा 5 ग्राम, मुनक्का 10 ग्राम दोनों को कुचलकर 1 पाव पानी में खौलायें जब 1 कप पानी बचे तब उतारकर छान लें और खाली पेट सुबह पी लें। यह प्रयोग वातरक्त को दूर करता है।
👉 रक्तवमन - मुनक्का 10 ग्राम, अडूसा पत्ती 5 ग्राम, छोटी हरड़ 5 ग्राम। सभी कुचल कर 1 पाव पानी में पकायें। पकते - पकते जब 1 कप पानी बचे तो उतारकर मसलकर छान लें। फिर आधा चम्मच मिश्री मिलाकर खाली पेट नित्य पीते रहने से रक्तवमन / रक्तष्ठीवन नष्ट होता है और बलवृद्धि होती है।
👉 रक्तदुष्टि - गिलोय 5 ग्राम, चोपचीनी 5 ग्राम, मुनक्का 10 ग्राम तीनों को कूटकर 1 पाव पानी में रात में भिगो दें फिर धीमी आँच में सुबह खौलायें। जब 1 कप पानी बचे तब उतारकर छान लें और सुबह खाली पेट नित्य सेवन करने से अनेकों प्रकार के रक्तविकार दूर होते हैं।
👉 कील मुहाँसे और झाइयाँ - मुनक्का 10 ग्राम और घृतकुमारी का गूदा 5 ग्राम। दोनों मिलाकर पीस लें। फिर रात में सोते समय 1 कप गरम पानी से सेवन करें। यह प्रयोग 6 माह तक लगातार करने से कील मुँहासे और झाइयाँ नष्ट होती हैं तथा चेहरा खिल जाता है। गरम, चटपटी, बासी और मैदे से बनी वस्तुओं का सेवन न करें।
👉 सर्वांग दाह - मुनक्का 200 ग्राम, जीरा, छोटी इलायची और बड़ी इलायची बीज, खीरा के बीज, खशखश दाना और सफेद चन्दन का बुरादा 100-100 ग्राम। सभी को मिलाकर अच्छी तरह कूटकर मिलाकर रख लें। 2-2 चम्मच सुबह-शाम खाली पेट शीतल जल से सेवन करें। यह प्रयोग सर्वांग दाह को नष्ट करता है।
👉 अत्यधिक प्यास लगना - पित्त और वातवृद्धि के कारण, शोक, चिन्ता, तनाव के कारण कई बार अत्यधिक प्यास लगने लगती है। ऐसी अवस्था में 100-100 मि.ली. अंगूर का रस सेवन करने से प्यास पर नियंत्रण होता है और शान्ति, ठण्डक तथा बल की वृद्धि होती है।
👉 ज्वर - यह ज्वर को भी कम करता है। जब कभी बहुत तीव्र ज्वर चढ़ जाय तो मीठे अंगूर का रस 30-30 मि.ली. बराबर गरम पानी मिलाकर हर 1 घण्टे में पिलाते रहें रोगी को कम्बल से ढके रहें। थोड़ी देर में ज्वर उतरने लगेगा तथा किसी प्रकार की आपत्ति नहीं आयेगी।
👉 मन्थर ज्वर (टायफायड) - मुनक्का 10, तुलसी पत्ती 10, खूबकलां 5 ग्राम और लौंग 5 नग । सभी को कुचल कर 1 पाव पानी में खौलायें । जब केवल 1 कप बचे तब उतारकर ठण्डा कर लें फिर मसलकर छान लें और रोगी को पिला दें। यह प्रयोग सुबह-शाम करने से टायफायड के रोगी को लाभ होता है। कई बार तो केवल एक मात्र यही प्रयोग टायफायड को नष्ट कर देता है।
👉 पित्त ज्वर - यह ज्वर प्राय: शरद ऋतु में होता है। मुनक्का, छोटी हरड़, नागर मोथा, कुटकी, अमलतास का गूदा और पित्त पापड़ा सभी 5-5 ग्राम लेकर कूटकर 1 पाव पानी में पकायें। पकते - पकते जब 1 कप पानी बचे तब उतारकर छान लें। यह योग सुबह और शाम दोनों समय पिलायें।
👉 श्वेत प्रदर - मुनक्का और पके हुए गूलर के फल जो छाया में सुखाये गये हों बराबर-बराबर लेकर कूटकर चूर्ण कर लें। 1-1 चम्मच चूर्ण सुबह- शाम खाली पेट सेवन करें यह प्रयोग श्वेत प्रदर को नष्ट करता है और बल
की वृद्धि होती है।
(साभार - चिकित्सा पल्लव : वनौषधि शतक विशेषांक 2017)