वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

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 #आम,  #सूती( #सितुही) और  #अमकली........इस बार आम खूब फरा है। आँधियाँ भी उन्हें धराशायी करने और वृक्षों का भार कम करने ...
10/05/2026

#आम, #सूती( #सितुही) और #अमकली........इस बार आम खूब फरा है। आँधियाँ भी उन्हें धराशायी करने और वृक्षों का भार कम करने में पीछे नहीं है। ऐसे में बागिया में आँधी के बाद आम का बिछौने जैसा भूमि पर बिछा होना सामान्य दृश्य है। जब-जब आम में प्रचुर बौर आता है और प्रकृति की मार से बच जाता है तो वृक्ष की डालियाँ आम के भार से झुक जाती हैं। ग्रीष्म ऋतु की तपन को भुला देने वाला यह मनोहर दृश्य होता है। ऐसे में जब आँधी आती है तो कच्चे आम बहुत अधिक संख्या में गिर जाते हैं। अब इन आमों का अचार तो बनाया नहीं जा सकता क्योंकि ये चोटिल होते हैं और इनके खराब होंने की संभावना अधिक होती है। इतने अधिक आमों को अमझोरा, चटनी और गलका बनाकर भी नहीं खाया जा सकता। अतः इन आमों के संरक्षण का एक ही उपाय बचता है वह है कि इनको छीलकर, काटकर, सुखाकर खटाई बनाया जाय और कई वर्षों तक सुरक्षित रख उपयोग किया जाय। सगे-संबंधियों, नातेदारों-रिश्तेदारों, बन्धु-बान्धवों को बाँटा जाय। ये आम पाँच-दस किलो नहीं कुन्तलों में होते हैं। इनको छीलकर, काटकर सुखाना भी बड़ा काम है। एक-दो दिन विलम्ब होने पर छील नहीं सकते।
अब इतने आमों को चाकू-छुरी से छीलना बहुत कठिन काम है क्योंकि उसमें हाथ में पीड़ा होने लगती है। बड़ी-वृद्ध महिलायें कहती हैं कि हमसे तो चाकू और छोलनी से सपरता ही नहीं अर्थात् आम छीला ही नहीं जाता। हमारे लिये तो सूती ही बहुत है। सूती से आम आसानी से छिल जाता है और छिलके भी पतले होते हैं। हाथ में पीड़ा भी नहीं होती। पहले इस सूती से आलू भी छीला जाता था और सुना है कि इसे मापन का मानक भी माना जाता था जैसे - छटाक। सूती से लोग बच्चे को दूध भी पिलाते थे और किसी पर क्रोधित होने पर हमारे अवध में लोगों का 'सूती भर खून' जल जाता था।
यह सूती वस्तुतः ताल और नदी में पायी जाने वाली सीपी है। जिसको नदी, झील, ताल आदि में पानी कम होंने पर लोग दिखाई देने पर उठा लाते थे। इसे दो भाग होते हैं। इसे सिल या किसी पत्थर पर घिसकर बीच में छोटा छेद बनाया जाता है। यही छीलने का काम करता है। छीलते समय कम से कम बल प्रयोग हो इस बात का ध्यान रखा जाता है। अन्यथा बल लगने से छेद टूटकर बड़ा होंने और सूती खराब होने का खतरा रहता है। इसलिए सबकी अलग-अलग सूती होती है क्योंकि सबका बल-प्रयोग अलग - अलग होता है। खराब होने के डर से बच्चों के हाथ में लोग नहीं देते।
आजकल यह सूती अनेक स्थानों पर दुर्लभ होती जा रही है क्योंकि जलाशय सिकुड़ रहे हैं। जहाँ जल है भी वहाँ जलकुम्भी, नीले-हरे शैवाल और रासायनिक पदार्थों का इतना प्रदूषण है कि सीप पल नहीं पाती। सार जलाशय अतिपोषकता के प्रदूषण (यूट्रोफिकेशन) से ग्रस्त हैं ऐसे में शुक्ति का जीवन कैसे संभव है। इसी कारण आजकल सूती की उपलब्धता कम हो गयी है और लोग चाकू पर निर्भर हो गये हैं। पता नहीं इतने आम चाकू से कैसे छीलने जाते होंगे। आँधी-तूफान से आम की चिर-शत्रुता तो बनी हुयी है परन्तु कच्चे आमों के समुचित उपयोग की व्यवस्था लड़खड़ा रही है। इसमें एक कारण कर्मठ लोगों की कमी तो दूसरा कारण है कि अब खटाई का उतना महत्व भी नहीं है। अन्यथा खटाई-अचार-कोहड़ौड़ी-पापड़-चिप्स-सतुआ-भुजिया चाउर बनाना भी एक उत्सव होता था।


तब जब आम सिर्फ फल नहीं, पूरा सीजन हुआ करता था। #फागुन के साथ बौर की महक से मन बौरा जाता था। #सतुआन तो #टिकोरे की चटनी बिना अधूरी रहती। फिर अप्रैल-मई में आंधी-पानी से बेपरवाह थोड़े बड़े और कच्चे आम बागों से बीनना बच्चों की और सुतुही से छीलना,काटना, सुखाना अम्मा, दादी का रोज का रूटीन था। इससे तैयार अमचुर पूरे साल खटाई, अंचार और मर्चा भरने के काम आता था।
#गौरजीत चैत-बैसाख में जब आम में गुठली पड़ जाती थी तब यह अंचार के साथ लू से बचने के अचूक नुस्खे #पन्ना के रूप में काम आता था। #जेठ की तपती दोपहरी में जब पूरी कायनात गर्मी से सूख रही होती तब रसीला आम भगवान की सौगात की तरह आता।

आम , सितुही और दादी मां का आँचर

लड़कपन लड़खड़ाते - लड़खड़ाते , खड़ा हो गया था या उससे भी दो कदम आगे बढ़ गया था , अब वह दौड़ने - भागने लगा था , जिन दरख़्तों ने बच्चों की मोहब्बत को मापने का मन बना लिया था , उन्होंने अपनी पीठ पर कूबड़ निकाल लिया था , बच्चे आयें , कूबड़ से खेले इस पर सवारी करें , क़मीज़ निकाल कर सिरहाने रखें , शहंशाहे - हुकूमत माफ़िक़ बेफ़िक्री से आराम करें , इतना ही नहीं , दरख़्तों ने अपनी शाख़ों को झुकने और बच्चों की जद में रहने की हिदायत दे रक्खी थी , विनम्रता से झुकने की अदा सिखा रखी थी कि - दोपहरी में जब लड़कों का झुंड यहाँ आये तो उनकी भरपूर ख़ातिरदारी करना , उनकी चुलबुली हरकत के साथ झूम कर जुगलबंदी करना , ये बच्चे कल बड़े होकर हमारी क़तार में एक दरख़्त और रोप देंगे , अपने लड़कपन की हरकतों को महफ़ूज़ रखाने के लिये , बाग की वंशावली को क़ायम रखेंगे । इस बिनाह पर हम बच्चे बागों की सैर करते , चिल्होर खेलते , टिकोरा खाते , पेड़ों की शाख़ पकड़ कर उसमे दोनों पैर फँसा कर उल्टे लटक जाते और बहुत करते लेकिन लड़कपन के भीतर ही । जेठ - बैसाख की मनमनाती दुपहरिया जब अपनी तमाम डाकनियों की बरात लिये आसमान घेरती तब हम बगीचे में “ मस्ती “
मारते ।
यह मस्ती बड़ी मारक होती , जब वापसी में हमारी माँयें कान उमेठ कर थप्पड़ लगाती और हम दर्द को ज्यादा ज़ाहिर करने के लिये ज़ोर ज़ोर से “ नरियाते “ । दरअसल हम अनजाने में नये नये शब्द बटोरते -
- भरी दुपहरिया में “ मस्ती “ सूझ रही है ? “ सितुही “
उठा ले गये ? “ नकसीर “ फूटेगा तो और
“नरीआओगे “ ! गगरी क “ उचकुनी “ के हटाऐस ?
अनगिनत शब्द मिलते थे , अनजाने में , लड़कपन में ये शब्द ज़ेहन में दर्ज हो जाते रहे। आज बड़ी बड़ी विद्वत् गोष्ठियों में इस पर चर्चा होती है कि “ गाँव के बच्चों की शब्द सम्पदा ज्यादा मज़बूत है ,शहरी बच्चों की अपेक्षा ।
आम को “सितुही “से छिलते थे , आम छीलना एक कला है , हर बच्चा जानता था । आम छीलने के लिये , सितुही से बेहतर कोई उपकरण नहीं बन पाया है , आँख मूद कर छीलते जाओ क्या मजाल कि छिलके के साथ उसका गूदा भी निकल जाय । आम छील कर खाना , नमक के बड़े बड़े “ ढोको “ को गमछे में रख कर ईंट से बूकना , आम की “ ढिपुनी “ को धूल में रगड़ कर विषहीन करना हर बच्चा जानता था । बापू के दर्शन को उठायें तो इसे कहते हैं “ सुराज “ । उत्पादक ( आम का पेड़ ) पर उपभोक्ता ( “ गदेलों “ ) का अधिकार , यानी वही उत्पादक , वही उपभोक्ता , बीच में कोई बिचौलिया नहीं । माँओं के मार का बचाव दादी के आँचर में रहता रहा , अब का नहीं मालूम

09/05/2026

#अमलतास_आयुर्वेद_की_बहुमूल्य_औषधि आयुर्वेद में अमलतास को राजवृक्ष के नाम से भी जाना जाता है, इसके फूल चमकीले पीले रंग के होते हैं। इसे भारत के सबसे खूबसूरत पेड़ों में से एक माना जाता है

अमलतास जेठ महीने की भरी दोपहरी में जब दुनिया की तमाम ,, जीव जगत धुप की प्रचंड ताप से झुलसकर छांव की आश्रय तलाशता रहता है तो यह फुल खुले आसमान में सोने की तरह चमकती हुई ,, दुनिया के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से राहत देती हुई प्रतीत होती है। सूरज की तेज तपन के बढ़ते ही अमलतास के वृक्ष पर ऎसे निखार आ जाता है, जैसे कि कोई मुरझाए पौधे को बारिश की प्रथम बौछार के पड़ते ही निखार आ जाता है! वास्तव में अमलतास हमें विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रहने की प्रेरणा देता है! जिस प्रकार कोई विशुध्द स्वर्ण धातु को शुद्ध करने के लिए दहकती हुई अग्नि में गरम कर के शुद्ध किया जाता है! ठीक उसी प्रकार मानो प्रकृति ने भी अमलतास के पर्ण विहीन वृक्षों को सूर्य की तेज किरणों के प्रभाव से स्वर्णमयी पीत पुष्पों से अलंकृत कर दिया हो!

अमलतास एक माध्यम आकार का वृक्ष होता है! इस के वृक्ष की ऊंचाई 25 से 30फिट तक होती है! यह एक सुंदर पीले फूलों वाला वृक्ष है! जो अनादि काल से अपने स्वर्ण आभा युक्त पुष्पों से सब के मन को मोहित करता आ रहा है! प्राचीनकाल से ही यह वृक्ष राज उद्यानों को अपने स्वर्णमयी पुष्पों से सुशोभित करता आ रहा है। शायद इसी कारण इस वृक्ष का एक नाम राजवृक्ष भी है!

केरल में इस वृक्ष के फूलों से भगवान विशु की पूजा की जाती है! जो कि भगवान कृष्ण का ही एक स्वरूप है!
इस वृक्ष के फूलों को केरल राज्य के राजकीय पुष्प का दर्जा प्राप्त है,वहीं इस वृक्ष के फूलों को थाईलैंड देश का राष्ट्रीय पुष्प होने का गौरव भी प्राप्त है!
जितनी इस वृक्ष की सुन्दरता है,
उस से कहीं ज्यादा इस वृक्ष के गुण, लाभ और उपयोग हैं!
इस वृक्ष के पत्ते लगभग 6 से 7 इंच लंबे, चिकने और जामुन के पत्तों के समान होते हैं! पत्तों के पीछे की ओर हल्की सफेदी लिए हुए, गहरे हरे रंग के होते हैं! जो सात या नौ पत्तों के युग्म में लगे होते हैं!

इस वृक्ष के फूल डेढ़ से ढाई इंच व्यास के चमकीले, मखमली, पांच पंखुड़ियों वाले पीले रंग के होते हैं! इस के फूल की हरे रंग की पेड़ की डंडियों में लड़ियों के रूप में लटके हुए होते हैं! इस के फूलों में कोई सुगंध नहीं होती है! य‍ह फूल गंध रहित होते हैं!

अमलतास में फूलों के बाद फल के रूप में फलियाँ लगती है, जो एक से दो फीट लंबी बेलनाकार होती हैं! इस की कच्ची फलियाँ हरी तथा पक जाने पर गहरे भूरे रंग की हो जाती हैं! इस की फलियाँ पक जाने पर लगभग पूरे वर्ष वृक्ष पर लगी रहती हैं! फली के अंदर गूदे के साथ लगभग 50 से 100 तक चपटे, हल्के पीले रंग के बीज होते हैं! फली के अंदर का भाग कई प्रकोष्ठों में विभाजित होता है जिस के प्रत्येक प्रकोष्ठ में एक-एक बीज पाया जाता है!
फली पक जाने पर फली का गूदा कॉफी के रंग जैसा हो जाता है! इस का गूदा गाड़ा,कुछ चिपचिपाहट लिए होता है, इस का गूदा स्वाद में मीठा किन्तु कुछ कड़वापन लिए हुए होता है!
इस वृक्ष पर बसंत ऋतु में पतझड़ आता है, इस के पश्चात अप्रैल - मई में इस में फूल और नए पत्ते एक साथ ही आना शुरू हो जाते हैं, किंतु कुछ वृक्षों में पहले फूल तत्पश्चात नए पत्ते आते हुए भी देखा गया है! किसी किसी वृक्ष में तो यह फूल अगस्त के महीने तक भी देखे गए हैं!

अमलतास के वृक्ष भारत के पूर्वोत्तर हिमालय क्षेत्र की 4000 फीट की ऊंचाई तक पाए जाते हैं, जो यह वृक्ष हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं को अपने पीत पुष्पों से और भी रमणीक बना देते हैं!
अमलतास के पुष्प प्राचीन समय से ही स्त्रियों को परम प्रिय रहे हैं! जिस का उल्लेख हमे आसानी से प्राचीन संस्कृत साहित्य में पढ़ने को मिल जाएगा! इस वृक्ष के संबंध में एक प्राचीन दंत कथा भी सुनने में आती है कि यह वृक्ष सुंदर स्त्रियों को देख कर इस के फूलों में और भी निखार आ जाता है, यह बात किस हद तक सत्य है यह कहा नहीं जा सकता है!
अमलतास के वृक्ष पूरे भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के अनेकों द्वीपों, महाद्वीपों और उप महाद्वीपों के विभिन्न देशों में पाए जाते है, जो कुछ इस प्रकार है!

अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया,बरमूडा, बर्मा, कंबोडिया , मध्य अमेरिका, चीन, कोस्टारिका, पूर्वी अफ्रीका, पूर्वीतिमोर, इथियोपिया, गुयाना, हैती, हवाई, इंडोचाइना, इंडोनेशिया, केन्या, लाओस , मलावी, मलेशिया, मोजाम्बिक, म्यांमार, नाउरू, नेपाल, निकारागुआ, पाकिस्तान, पनामा, पापुआ न्यू गिनी, पीएनजी, फिलीपींस, एसई एशिया, सेनेगल, सिंगापुर , दक्षिण अमेरिका, श्रीलंका, तंजानिया, थाईलैंड , तिमोरलेस्ते, यूएसए, वानुअतु, वियतनाम, पश्चिम अफ्रीका, वेस्टइंडीज, जिम्बाब्वे आदि!

आकर्षक पीले फूलों और कम देख रेख में भी शीघ्र लग जाने के कारण इस वृक्ष को पार्कों और सड़क के दोनों ओर सजावट के लिए विशेष रूप से लगाए जाते हैं!
प्राचीन काल से ही यह वृक्ष शृंगार रस के कवियों की रचनाओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा है! तभी तो प्राचीन साहित्यकारों ने इस वृक्ष के रूप और गुणों के कारण अनेक नामों से अपने साहित्य में इस का वर्णन किया है!
इस वृक्ष के जितने नाम सुनने को और पढ़ने को मिले हैं! इस से पहले शायद ही आप ने कोई और वृक्ष के नाम सुने या पढ़े होंगे!

संस्कृत में -आरग्वध, राजवृक्ष, नृपद्रुम, हेमपुष्प, शम्पाक, चतुर रंगुल, आरवेत, व्याधिघाती, कृतमाला, सुवर्णक, कर्णिकार, दर्धिकार, स्वर्णभूषण आदि!
हिंदी में - अमलतास, धनबहेड़ा!

#अमलतास को संस्कृत में आरग्वध भी कहते हैं हमारी क्षेत्रीय बोली में इसे किल्वार कहा जाता है। आइए इसके गुणधर्म के विषय में जानते हैं।

#आरग्वधगुणाः

आरग्वधोगुरुः स्वादुःशीतलोमुदुरेचनः । ज्वरहृद्रोगपित्तास्त्रवातोदावर्तशूलनुत् ।।

अर्थ-अमलतास- भारी, स्वादिष्ठ, शीतल, मृदु, रेची तथा ज्वर, हृदयरोग, रक्तपित्त वात, उदावर्त और शूलको निर्मूल करता है।

#एतत्फलगुणाः
एतत्फलं'सनंरुच्यंकुष्ठपित्तकफापहम् । ज्वरेतत्सततंपथ्यंकोष्ठशुद्धिकरंपरम् ।। (भा.प्र.)

अर्थ-अमलतासकी कली-संसन, रुचिकारक, कुष्ठनाशक, पित्तनिवारक, कफघ्न, ज्वरमें सर्वदा पथ्य है और कोठे को शोधित करता है।

#एतत्पत्रगुणाः

पत्रमारग्वधस्यापिकफमेदोविशोषणम् । ज्वरेचसततंपथ्यंमलदोषसमन्विते ।।

अर्थ-अमलतास के पत्ते-कफ और मेदाशोषक हैं, ज्वरमें सदा पथ्य है और मलको ढीला करते हैं।

#एतत्पुष्पगुणाः

पुष्पाणिस्वादुशीतानितिक्तानिग्राहकाणिच । तुवराणिवातलानिकफपित्तहराणिच ।।

अर्थ-अमलतासके फूल-स्वादिष्ठ, शीतल, कडूवे, ग्राहक, कषेले, वात बर्द्धक, कफ और पित्तको दूर करे हैं।

#एतन्मज्जागुणाः

मज्जातुमधुरापाकेस्निग्धाचांग्निविर्वाद्धनी । रेचिकापित्तवातानांनाशिकासमुदाहृता ।।

अर्थ-अमलतासकी मज्जा पाकमें मधुर, स्निग्ध, जठराग्निको वर्धक, रेचक तथा पित्त और बादीका नाश करे है।

#एतन्मूलगुणाः

कृतमालस्यमूलन्तुदुग्धेनसहपाचयेत् । वातरक्तंनिहंत्याशुदद्रुमण्डलकान्यपि ।।

अर्थ-अमलतासकी जड-दूधमें औटाई हुई वातरक्तनाशक, दाह और मण्डलकुष्ठको नष्ट करे है।

#कर्णिकारगुणाः

कर्णिकारःसरस्तिक्तः कटूष्णः कफशूलहा । उदरक्रिमिमेहघ्नोव्रणगुल्महरोनृप ।। (नि. र.)

अर्थ-कर्णिकार- (दूसरे प्रकारका अमलतास) सारक, कडवा, चरपरा, गरम तया-कफ, शूल, उदररोग, क्रिमि, प्रमेह, व्रण और गुल्मका नाश करे है।

गजकर्ण, कुष्ठ, दद्रु, खुजली, विचिकादि रोगोंपर अमलतासके पत्तोंको पीस उसमें कांजी मिलाकर लेप करते हैं।

गण्डमाला रोगमें अमलतासकी जड़ को चावलों के पानी में पीसकर नास (नाकके द्वारा पीना) देते हैं।

इसका बडा वृक्ष होता है, पत्ते लाल चंदनके पत्तोंके समान होते हैं, फूल पीले, तरवट आमलेकी सदृश होते हैं। फली गोल और १-१ हाथ लम्बी होती है, उसमेसे गुदा निकलता है, उस गूदेका जुलाब लगता है। व्यवहार-गूदा, पत्ते, फूल, मूल मात्रा गूदेकी ३ मासेसे लेकर १।। तोलेतक है।

इन नामों के अलाव भी इस वृक्ष के कई नाम और भी हैं, जो अनेकों देशों, स्थानीय या क्षेत्रीय लोग के द्वारा अपनी भाषाओं में उपयोग किए जाते हैं!


#रासायनिक_संगठन:-
अमलतास के पत्तों और फूलों में ग्लाइकोसाइड, तने की छाल में 10 से 20 प्रतिशत टैनिन, जड़ की छाल में टैनिन के अलावा ऐन्थ्राक्विनीन, फ्लोवेफिन तथा फल के गूदे में शर्करा 60 प्रतिशत, पेक्टीन, ग्लूटीन, क्षार, भस्म और पानी होता है।

#गुण_धर्म :-
अमलतास मधुर, प्रकृति में शीतल, भारी, स्वादिष्ट, स्निग्ध (चिकना), कफनाशक और पेट साफ करने वाला है। साथ ही यह ज्वर (बुखार), दाह (जलन), हृदय रोग, रक्तपित्त, वातरोग, दर्द, गैस, प्रमेह (वीर्य विकार) एवं मूत्ररोग नाशक है। यह गठिया रोग, गले की तकलीफ, आंतों का दर्द, रक्त की गर्मी और नेत्र रोगों में उपयोगी होता है। दोपहर के भोजन और रात के खाने के बाद गर्म पानी के साथ अमलतास चूर्ण लेना रक्त शर्करा के स्तर को प्रबंधित करने में फायदेमंद हो सकता है क्योंकि यह अपनी एंटीऑक्सीडेंट और सूजन-रोधी गतिविधि के कारण इंसुलिन स्राव को बढ़ाता है। यह वजन प्रबंधन में भी मदद करता है क्योंकि यह शरीर के चयापचय में सुधार करता है। अमलतास अपनी मूत्रवर्धक गतिविधि के कारण मूत्र उत्पादन को बढ़ाकर मूत्र संबंधी विकारों को प्रबंधित करने और शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने में भी मदद कर सकता है। यह अपनी ज्वरनाशक (बुखार कम करने वाली) और ज्वरनाशक (खांसी से राहत देने वाली) गतिविधि के कारण बुखार और खांसी के लिए भी उपयोगी है। गर्म पानी के साथ अमलतास फल के गूदे के पेस्ट का सेवन करने से इसके रेचक गुण के कारण कब्ज को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
इस वृक्ष के इस्तेमाल से हम ज्वर , ह्रदय रोग , गैस , प्रमेह , मूत्र कष्ट , बवासीर , लकवा , गले की तकलीफ का इलाज कर सकते है पेट से संबंधित बीमारियों के लिए यह रामबाण औषधि है ।
आयुर्वेद में इस वृक्ष के सब भाग (तना, जड़, फूल, पत्ते, और फल) औषधि के काम में आते हैं।

#अमलतास_का_ज्योतिषीय_महत्व : मनुष्य के जीवन काल में ग्रह अपना प्रभाव हमेशा दिखलाते हैं, मनुष्य के कर्मों के फल ग्रह के अनुसार ही मिलते!
रोग, शोक, लाभ, हानि, सुख, दुःख आदि ग्रह के कारणों से ही मनुष्य की जीवन शैली को प्रभावित करते हैं! कुछ ग्रहों का प्रभाव शुभ फलदायी रहता है तो कुछ ग्रहों का प्रभाव अति दु:खदायी भी हो सकता है!
यहां पर हम अमलतास वृक्ष के संबंध में कुछ ऎसे ही ग्रह के शांति उपायों पर बात करने जा रहे हैं!
जो मनुष्य गुरु ग्रह की पीड़ा से ग्रसित हो, उस जातक को नित्य प्रति दिन स्नान करके अमलतास के वृक्ष का स्पर्श करना चाहिए! ऎसा करना उस के लिए बहुत शुभ फलदायी होता है! इस वृक्ष को अगर प्रति दिन स्नान करके जल अर्पित कर सकते हैं! तो गुरु ग्रह से ग्रसित व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ की प्राप्ति होती है!

जिन जातकों का जन्म रेवती नक्षत्र में हुआ हो, उन्हें गुरुवार के दिन अमलतास के वृक्ष की 7 या 11 परिक्रमा करनी चाहिए!ऎसा करने से उनकी गुरु ग्रह की पीड़ा शांत होती है!
पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी अगर अमलतास के वृक्ष के नीचे बैठकर विद्या अध्ययन करते तो उन का परिश्रम कभी निष्फल नहीं होता है!
मंद बुद्धि बच्चों के लिए अमलतास वृक्ष की छाँव का आश्रय विशेष लाभ प्रदान करने वाला माना गया है!

#अमलतास_वृक्ष_का_वास्तु_में_महत्व : वैसे तो प्रकृति ने हमे अनेकों पेड़ पौधे दिए हैं जिन को घर में लगाना वास्तु शास्त्र के अनुसार शुभ फलदायी होता है! किन्तु अमलतास के वृक्ष का घर की सीमा में होना भी बहुत शुभकारी होता है!
यह वृक्ष घर की सीमा में पश्चिम दिशा में अथवा दक्षिण दिशा में होना चाहिए! जिस घर में अमलतास का वृक्ष होता है, इस के प्रभाव से घर में हमेशा सुख - समृध्दि बनी रहती है! घर में सुख समृद्धि बनी रहने से परिवार के सभी सदस्य अपने अपने क्षेत्र में बहुत उन्नति करते हैं और उस घर में रहने वालों को मानसिक शांति मिलती है, तनाव भी नहीं होता है!

#अमलतास_का_धार्मिक_महत्व :- जिस प्रकार सनातन धर्म में बड़, पीपल,आंवला और अन्य वृक्षों का धार्मिक महत्व होता है, उसी प्रकार अमलतास के वृक्ष का भी धार्मिक महत्व है! जिसका उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों और संस्कृत साहित्य में देखने को मिलता है! इस के फूलों का उपयोग पौराणिक काल से ही नायिकाएँ अपने रूप श्रृंगार के लिए करती आई हैं!
यह वही वृक्ष है जिस के फूलों ने शिव चरणों को माता पार्वती से पहले स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त किया था!

शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग पर चढ़ाई जाने वाली भस्म तैयार करने के लिए जो सामग्री उपयोग की जाती है उस में कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़,और बेर की लकड़ियों के साथ साथ अमलतास वृक्ष की लकड़ी का भी उपयोग किया जाता है, इन सब सामाग्री को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार किए जाते हैं। इन सभी सामाग्री को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार तैयार की गई भस्म शिवजी को अर्पित की जाती है।ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार तैयार की गई भस्म को यदि कोई इंसान भी धारण करता है तो वह सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है। शिवपुराण के अनुसार ऐसी भस्म धारण करने से व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है।

यह वृक्ष बृज में जहां एक ओर तो राधा और कृष्ण के अगाध प्रेम का साक्षी है, वहीं दूसरी ओर इस वृक्ष ने चित्रकूट में भगवान राम और सीता के वियोग को भी देखा है!

इस प्रकार अनेकों पौराणिक कथाओं में इस वृक्ष का उल्लेख मिलता है!

आधुनिक खानपान और कामकाज की भागदौड़ के कारण जब व्यक्ति अनेक प्रकार के तनाव तथा चिंताओं में घिर जाता है! इस के कारण से रात्रि को व्यक्ति को ठीक से नींद भी नहीं आती है, और अनेकों व्यक्ति इसी कारण से अनिंद्रा के शिकार हो जाते हैं! ऎसी स्थिति में अमलतास की फली अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है! अमलतास की पकी फली पेड़ से साबुत तोड़ लाएं, इस फली को पास में रख कर अथवा सिरहाने की तरफ तकिये के नीचे रख कर शयन करने मात्र से ही रात्रि में दु:स्वप्न नहीं आते हैं और आराम दायक नींद आती है!

अमलतास की पकी फली का गूदा जो चाकलेटी रंग का गाड़ा होता है! इसे चमेली के तेल में मिला कर उस तेल से काजल तैयार कर लें, इस काजल को एक सफेद कागज पर एक रुपये के सिक्के के आकार का गोला बना कर उस पर त्राटक करने (ध्यान केंद्रित करने) से शीघ्र ही ध्यान लगने लगता है!

अमलतास के 5 बीज, लाल गुंजा के 5 बीज, कचनार के 5 बीज तथा विष्णुकन्‍ता (अपराजिता) के 5 बीज इन सभी बीजों को एकत्र करके एक स्वच्छ धातु के पात्र में रख कर अपने पूजा के स्थान में रखें! धूप, दीप, अक्षत, पुष्प आदि से पात्र में रखे इन बीजों की पूजा करें तथा अपने इष्ट देव के किसी भी मंत्र की एक माला जाप करें! इस के बाद प्रणाम करके इन्हें उठाकर एक स्वच्छ लाल सूती वस्त्र की थैली में डालकर अपनी जेब में रख लें! ऎसा करने से व्यक्ति को पैसे की समस्या कभी परेशान नहीं करती है! रात्रिकाल में भी बीज शर्ट की जेब में ही रखे रहने दें!

इन बीजों को इसी प्रकार से प्राप्त कर आप अपनी तिजोरी या अलमारी में रख सकते हैं तो वहां धन की कभी कमी नहीं रहती है!

अगर आपका व्यवसाय है तो इन्हें अपने गल्ले में रखें, इस के पश्चात प्राप्त होने वाले परिणाम आपको चौंका देने वाले होंगे!

अमलतास के बीजों को धन के साथ तिजोरी में सुरक्षित रखने से धन की वृद्धि होती है उस तिजोरी में कभी भी धन की कमी नहीं होती है!
अमलतास के वृक्ष के बीज धन की वृध्दि करने वाले होते हैं इस कारण इस वृक्ष का एक नाम धन बहेड़ा भी है!

#अमलतास_का_आर्थिक_महत्व:-
कृषि कार्यों के लिए यह वृक्ष बहुत महत्वपूर्ण माना गया है! इस की लकड़ी बहुत मजबूत होती है इसी कारण प्राचीन काल से ही इस की लकड़ी का उपयोग कई प्रकार के कृषि औजार बनाने के लिए किया जाता रहा है!

खेत की मेढों पर इस वृक्ष का होना बहुत लाभदायक माना गया है! जहाँ एक ओर इस के सुंदर फूलों के कारण खेतों में मधुमक्खियां आकर्षित होती हैं,और मधुमक्खियों के कारण फसलों की उत्पादन क्षमता बढ़ती है!वहीं दूसरी ओर इस के पेड़ों से गिरने वाले पत्ते भूमि में कार्बनिक तत्वों की मात्रा में वृध्दि करते हैं! जिस से भूमि का उपजाऊपन बढ़ता है और भूमि की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है! जिस से भू-जल स्तर बढ़ता है!

दुनियाभर के अनेकों देशों में इस वृक्ष की लकड़ी का उपयोग आदिवासियों और ग्रामीण क्षेत्रों में घर बनाने एवं ईंधन के रूप में उपयोग कर खाना पकाने के लिए किया जाता है!

मैक्सिको में यह वृक्ष आग जलाने के स्रोत के रूप में जाना जाता है। इसकी लकड़ी लाल भूरा रंग लिए होती है तथा बहुत मज़बूत होती है जिससे कई प्रकार के आकर्षक फर्नीचर भी बनाए जाते हैं!
यह वृक्ष दुनियाभर के कई देशों में आदिवासियों के लिए आय का साधन है!
भारतीय डाकतार विभाग ने भी अमलतास की सुंदरता तथा औषधीय गुणों को ध्यान में रखते हुए 20-नवम्बर-2002 को 20 रुपये के दो डाक-टिकट भी जारी किए थे! और साथ ही अमलतास की फोटो लगा लिफ़ाफ़ा भी जारी किया गया था!

#अमलतास_का_औषधीय_महत्व:- प्राचीन काल में ऋषि मुनियों द्वारा इस वृक्ष पर हजारों अनुसंधान करके इस के दिव्य औषधीय गुणों का पता लगा लिया था! उन प्राचीन ऋषि मुनियों की खोज के कारण ही आज हम इस वृक्ष के औषधीय गुणों का स्वास्थ्य लाभ ले पा रहे हैं!
मानव स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए यह वृक्ष एक वरदान सिद्ध हुआ है!
इस वृक्ष के दिव्य औषधीय गुणों के कारण प्राचीन काल से ही इस वृक्ष के विभिन्न भागों का उपयोग विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए औषधि के रूप में किया जाता रहा है!

#अमलतास_का_विभिन्न_रोगों_में_औषधीय_उपयोग :-

#गले_के_रोग में_अमलतास_का_प्रयोग :-अमलतास की जड़ की छाल 10 ग्राम की मात्रा में लेकर उसे 200 मिली लीटर पानी में डालकर उबालें और धीमी आँच पर पकाएं जब पानी एक चौथाई रह जाए उतार कर छान लें! अब इसमें 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से गले की सूजन दर्द, टाँसिल से शीघ्र आराम मिलता है!
अमलतास की छाल (पेड़ की छाल) के काढ़े से गरारे करने पर गले की प्रवाह जलन, ग्रंथिशोध (गले की सूजन) आदि रोग ठीक हो जाते हैं!

#बिच्छू_का_विष_दूर_करने_में_अमलतास_का_प्रयोग :-अमलतास के बीजों को पानी के साथ पत्थर पर घिसकर बिच्छू के दंश वाले स्थान पर लगाने से विष का प्रभाव दूर हो जाता है!

#बच्चों_के_पेट_दर्द_में_अमलतास_का_प्रयोग :- अमलतास के बीजों की गिरी को पानी के साथ पत्थर पर घिसकर नाभि के आसपास लेप लगाने से बच्चों के पेट दर्द और पेट की गैस की तकलीफ में आराम मिलता है!

#त्वचा_से_संबंधित_रोगों_में_अमलतास_का_प्रयोग :- अमलतास के पत्तों को सिरके में पीस कर बनाए लेप को चर्म रोगों यानि कि दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी पर लगाने से त्वचा के रोग ठीक हो जाते हैं!यह प्रयोग आवश्यक रूप से कम से कम तीन हफ्ते तक करना चाहिए!अमलतास के पंचांग (पत्ते, छाल, फूल, बीज और जड़) को सामान मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लेप बना लें! इस लेप को लगाने से उपरोक्त त्वचा संबंधी रोगों में लाभ होता है!

अमलतास कनेर और मकोय के पत्तों को बराबर मात्रा में लेकर छाछ के साथ मिलाकर पत्थर पर पीसकर लेप बनाकर लगाने से त्वचा के रोगों में आराम मिलता है!

#मुख_के_छालों_में_अमलतास_का_प्रयोग :-अमलतास के बीजों की गिरी और साबुत धनियां को लेकर बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चुटकी भर कत्था मिलाकर चूर्ण तैयार कर लें, अब इस तैयार चूर्ण की आधा - आधा चम्मच मात्रा को दिन में 2-3 बार मुख में डालकर चूसने से मुंह के छालों में आराम मिलता है!

अमलतास की फलियों के गूदे को धनिया के साथ पीसकर थोड़ा कत्था मिलाकर मुख में रखने से अथवा केवल अमलतास की फलियों के गूदे को मुख में रखने से मुखपाक रोग दूर होता है!

#वमन(उल्टी)कराने_के_लिए_अमलतास_का_प्रयोग :- कभी कोई व्यक्ति अगर गलती से जहरीला पदार्थ या कुछ ऎसी चीज खा लेता है जो शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है, ऎसी स्थिति में अमलतास के 5-6 बीजों को पानी साथ पीसकर पीडि़त व्यक्ति को पिला देने से जहरीली या हानिकारक खाई हुई चीज वमन (उल्टी) के द्वारा बाहर निकल जाती है!

#पेशाब_का_खुलकर_नहीं _आने_पर_अमलतास_का_प्रयोग :- पेशाब का खुलकर नहीं आने पर अमलतास के बीजों की गिरी को पानी के साथ पीसकर तैयार किए गए गाढ़े लेप को नाभि के निचले भाग (यौनांग से ऊपर) पर लेप करने से रुकी हुई पेशाब खुलकर आने लगती है!

#त्वचा_के_चकतों_को_ठीक_करने_में_अमलतास_का_प्रयोग:-कभी - कभी हमारी त्वचा पर किन्हीं कारणों से लाल भूरे रंग के चकते बन जाते हैं, ऎसे में अमलतास के नरम पत्तों को पीसकर लेप करने से लाभ होता है!


#नाक_की_फुंसी_में_अमलतास_का_प्रयोग :- नाक में यदि फुंसी हो जाए तो दर्द से बुरा हाल होता है ऎसे में अमलतास के पत्ते व छाल को लेकर पीसकर पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को नाक की फुंसी पर एक - दो दिन तक सुबह शाम लगाने से नाक की फुंसी ठीक हो जाती है!

#घाव_को_सुखाने_में_अमलतास_का_प्रयोग :- शरीर के किसी भाग में यदि घाव हो गया है और तमाम तरह की औषधियों के उपयोग करने से भी घाव सूख नहीं रहा हो तो ऎसी स्थिति में आप अमलतास का उपयोग कर सकते हैं... अमलतास के पत्ते, चमेली के पत्ते और करंज के पत्ते लेकर गौ मूत्र मिलाकर पीसकर पेस्ट तैयार कर लें.. अब इस तैयार पेस्ट को कुछ दिनों तक घाव पर लगाएं... इस प्रयोग से पुराने से पुराना घाव भी ठीक हो जाता है! या अमलतास के पत्तों को दूध के साथ पीसकर घाव पर लगाएं!

#शरीर_की_जलन_में_अमलतास_का_प्रयोग :- शरीर की जलन में अमलतास की 10-15 ग्राम जड़ ले लें.. जड़ न मिलने की स्थिति में पेड़ की छाल भी ले सकते हैं... इस छाल को दूध में अच्छी तरह से उबाल कर पीसकर पेस्ट बना लें.. इस पेस्ट को जलन वाले स्थान पर लगाने से लाभ मिलता है!

#खांसी_में_अमलतास_का_प्रयोग :- अमलतास के बीजों की 5-10 ग्राम गिरी को पानी के साथ मिलकर अच्छी तरह से पीस लें अब इस तैयार पेस्ट से तीन गुना इस में शक्कर का बूरा मिला कर चासनी तैयार कर लें.. इस चासनी का सुबह शाम सेवन करने से सूखी खांसी में आराम मिलता है!

अमलतास के फल का गूदा 10-15 ग्राम लेकर काढ़ा बना लें अब इस काढ़े में 5-10 ग्राम इमली का गूदा मिलाकर सुबह शाम पिएं... यदि रोगी में कफ की अधिकता हो तो इस में थोड़ा सा निशोथ का चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाने से विशेष लाभ होता है!

#पेट_के_रोगों_में_अमलतास_का_प्रयोग :- अमलतास के 2-3 पत्तों को लेकर नमक और मिर्ची मिलाकर चटनी बना लें इस चटनी के सेवन करने से पेट साफ हो जाता है!

अमलतास के फलों का 10-20 ग्राम गूदे को 500मि.ली. पानी में भिगो कर रात को रख दें.. सुबह इस पानी को छान कर पीने से पेट साफ हो जाता है... पेट की सारी गंदगी बाहर निकल जाती है!

#दमा(श्वासन विकार) में अमलतास का प्रयोग :-अमलतास के पेड़ के तने का गूदा दमा रोग के लिए औषधी के रूप में प्रयोग किया जाता है... श्वासन विकार में पेड़ के गूदे का काढ़ा बनाकर इस काढ़े की सुबह शाम 20-40 मि. ली. मात्रा में सेवन करने से श्वासन विकार में लाभ मिलता है!

#गर्भ_अवस्था_के_दौरा_पेट_पर_बनने_वाले_निशान_को_ठीक_करने_में_अमलतास_का_प्रयोग :-स्त्रियों में गर्भ अवस्था के दौरान पेट की त्वचा पर लंबी आकृति के निशान (स्ट्रैच मार्क्स) बन जाते हैं इन निशानों को ठीक करने के लिए अमलतास के पत्तों को दूध में पीसकर उन निशानों पर कुछ दिनों तक लैप लगाते रहने से पेट की त्वचा के निशान ठीक हो जाते हैं!

#पित्त_विकार_में_अमलतास_का_प्रयोग :पित्त विकार के रोगियों को चाहिए कि वह अमलतास के फल के गूदे का काढ़ा बना लें... इस काढ़े में 5-10 ग्राम इमली का गूदा मिलाकर सुबह शाम 20-40 मि. ली. पिलाने से पित्त विकार ठीक होता है... यदि रोगी में कफ की अधिकता हो तो इस में थोड़ा सा निशोथ का चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाने से विशेष लाभ होता है!

अमलतास के फल के गूदे का काढ़ा बनाकर पिलाने या अमलतास के फल का गूदा निकाल कर पेस्ट बना लें।

 #आयुर्वेदिक_औषधि_क्या_है ? आयुर्वेदिक औषधि की प्रभावशीलता एक प्रामाणिक तथ्य है, लेकिन आधुनिक युग में इस प्रणाली की औषधि...
05/05/2026

#आयुर्वेदिक_औषधि_क्या_है ? आयुर्वेदिक औषधि की प्रभावशीलता एक प्रामाणिक तथ्य है, लेकिन आधुनिक युग में इस प्रणाली की औषधि के प्रति चिंता जताई जाती है। जैसा हम सभी जानते हैं कि महर्षि चरक और आचार्य शुश्रुत द्वारा रचित ग्रंथ आयुर्वेद के नींव है और वे भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जीविका के लिए आहार आवश्यक है।

महर्षि चरक ने ६ पहलू स्पष्ट किये हैं जिससे यह तय किया जा सके कि किस परिस्थिति में क्या खाने योग्य है अथवा नहीं। वे कहते हैं कि भोजन को पथ्य (खाने योग्य, स्वास्थ्य) और अपथ्य (खाने योग्य नहीं, हानिकारक) बनाने के लिए निम्न कारक प्रमुख है:

1) मात्रा (भोजन की)
2) समय (कब उसे पकाया गया और कब उसे खाया गया)
3) प्रक्रिया (उसे बनाने की)
4) जगह या स्थान जहां उसके कच्चे पदार्थ उगाए गए हैं (भूमि, मौसम और आसपास का वातावरण इत्यादि)
5) उसकी रचना या बनावट (रासायनिक, जैविक, गुण इत्यादि)
6)उसके विकार (सूक्ष्म और सकल विकार और अप्राकृतिक प्रभाव और अशुद्ध दोष, यदि कोई है तो)

आचार्य शुश्रुत चिकित्सा के दृष्टिकोण से विभिन्न प्रकार के आहार को उसके सकल मूल गुण से उसका अंतर बताते हैं, और किस को किस परिस्थिति में क्या ग्रहण करना चाहिए बताते हैं।

(1) #शीत (ठंडा)
इस किस्म के भोजन में ठंडा करने की प्रकृति होती है और यह उन के लिए अच्छा होता है जो पित्त, गर्मी और हानिकारक रक्त वृद्धि से पीड़ित है। आत्यादिक यौन भोग या विषाक्त प्रभाव से कमजोर व्यक्तियों को इसकी सलाह दी जाती है।

(2) #उष्ण (गर्म)
जो लोग वात और कफ दोष के रोगों और समस्याओं से पीड़ित है उन्हें इसकी सलाह दी जाती है। पूरा पेट साफ होने के बाद और उपवास इत्यादि के बाद आहार ग्रहण करने की मात्र कम होनी चाहिए।

(3) #स्निग्ध (कोमल और स्वाभाविक रूप से तैलाक्त)
उचित मात्रा में इस किस्म के भोजन को ग्रहण करने से वात दोष को दबाया जा सकता है। शुष्क त्वचा, कमजोर या दुबला और अत्यधिक दुबलेपन से पीड़ित लोगों के द्वारा इसका उपयोग लाभकारी होता है।

(4) #रुक्स (ऊबड और शुष्क)
कफ दोष को नियंत्रित करने में सहयक है। जिन्हें मोटेपन की प्रवृति होती है और जिनकी तेलयुक्त त्वचा होती है उन्हें ऐसा भोजन आवश्यक है।

(5) #द्रव्य (तरल या जल)
यह आहार उन लोगों के लिए हैं जो शरीर के भीतर रूखेपन से पीड़ित है ( जिससे फोंडे, पेप्टिक अल्सर और अस्थि बंधन इत्यादि जैसे विकार हो सकते हैं) उन्हें इस प्रकार के आहार को काफी मात्र में ग्रहण करना चाहिये।

(6) #शुष्क (सूखा)
जो लोग कुष्ठ रोग, मधुमेह ( मूत्र से शुक्राणु या महत्वपूर्ण हार्मोन का निकास ), विसर्प (तीव्र त्वचा रोग ) या घावों से पीड़ित है उन्हें सूखा आहार देना चाहिये।

(7) #वत्ति_प्रयोजक (स्वाभाविक रूप से सुखदायक)
स्वस्थ लोगों के लिए पोषक आहार वह है जो महत्वपूर्ण तत्वों और आतंरिक शक्ति को मजबूत और स्थिर रख सके और जिससे रोगों के प्रति प्रतिरोध बढ़ जाए।

(8) #प्रशमनकारक (त्रिदोष का संतुलन)
स्वस्थ और बीमार लोगों में भोजन का चुनाव मौसम और दोष के स्तर के अनुसार होना चाहिये। जैसे गर्म और खट्टा और मीठा भोजन बारिश के मौसम में वात दोष को दबाने में सहायक है।

(9) #मात्राहीन (प्रकाश)
जिन लोगों को यकृत की समस्या होती है, जो किसी अन्य रोग के कारण ज्वर या भूख की कमी से पीड़ित है ने हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन ग्रहण करना चाहिये। (यह सूखा या तरल, गर्म और ठंडा प्रकार, रोग की प्रकृति के अनुसार और त्रिदोष की स्वाभाविक प्रवृति के अनुसार होना चाहिये।

(10) ालिक (एक समय)
जो लोग भूख की कमी या कमजोर पाचन तंत्र से पीड़ित हैं उन्हें भूख और उपापचयी विकारों को सामान्य होने के लिए एक बार भोजन लेना चाहिये।

(11) #द्विकालिक (दो बार)
सामान्यतः स्वस्थ लोगों ने उचित भोजन दिन में दो बार लेना चाहिये।

(12) #औषधियुक्त (चिकित्सायुक्त भोजन)
जो लोग मुंह से दवाई नहीं ले सकते उन्हें उचित भोजन में मिला कर दिया जा सकता है। कभी कभी चिकित्सक वनस्पति या जड़ी बूटी विशिष्ठ रोगों में आवश्यक आहार के रूप लेने की भी सलाह देते हैं।

दोनों महर्षि चरक और आचार्य सुश्रुत हमें अच्छा स्वास्थ्य बनाने और उसे स्थिर रखने की सलाह देते हैं और इससे भी सचेत करते हैं कि कोई क्या खाता है और उसे कैसे खाता है, वह रोग होने का प्रमुख कारण बन सकता है और वे हमें इस बात से भी सजग करते हैं कि वह दूषित भी हो सकता है। हमें इन पहलुओं को ध्यान में रखकर स्वास्थ्यप्रद भोजन करना चाहिये और स्वस्थ रहना चाहिये।

आपका स्वागत है। यहाँ आपको हम आयुर्वेद, योग , आसन , प्राणायाम , स्वास्थ आदि विषयों के सम्बन्ध में सभी तरह की सही एवं शुद्ध जानकारी मिलेगी।

हमारा उद्देश्य यह है कि सभी लोग भारत के महान वेदों , उपनिषदों , पुराणों आदि में उपलब्‍ध ज्ञान को ग्रहण करे एवं अधिक से अधिक लोग इसका लाभ ले सके हैं।

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* #हमारा_का_उद्देश्य :-* हमारा उद्देश्य ही यही रहता है या फिर ये कह लीजिए की आयुर्वेद का प्रयोग हम स्वस्थ रहने के लिए करते है। ये आयुर्वेद ऐसा है की ये हमे रोगों से दूर रखता है और स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करता है।

#स्वस्थ रहना है तो भारतीय चिकित्सा पद्धति को अपनाना ही होगा अन्यथा एक बार एलोपैथी चिकित्सा के चक्कर में फंसे तो बिमारियों के जाल से निकलना मुश्किल होगा

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
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