21/01/2026
*हर भर्ती में एक–एक, दो–दो नंबर से पीछे रह जाने वाले युवा अक्सर अपनी किस्मत को कोसकर चुप हो जाते हैं। घर वाले समझाते हैं, दोस्त दिलासा देते हैं और समाज यही कहता है कि शायद मेहनत में कहीं कमी रह गई होगी। धीरे–धीरे वह छात्र खुद को ही दोषी मान लेता है और आगे बढ़ने की कोशिश करता है।*
*लेकिन उसे क्या पता कि उसकी किस्मत कहीं और लिखी जा रही थी। उसे क्या मालूम कि उसके नंबर किसी कॉपी, किसी उत्तर पुस्तिका या किसी OMR पर नहीं, बल्कि चयन बोर्ड के किसी कर्मचारी या अधिकारी की मेज पर घटाए-बढ़ाए जा रहे थे। वह एक या दो नंबर का फर्क, जो बाहर से बहुत मामूली लगता है, किसी के लिए पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल देता है।*💔
*यहीं से सबसे बड़ा अपराध शुरू होता है। सिर्फ नौकरी छिनना ही नहीं, बल्कि मेहनत पर से भरोसा छिन जाना। जब एक ईमानदार छात्र यह देखता है कि सालों की पढ़ाई, रातों की जागरण और परिवार की उम्मीदें भी सिस्टम के खेल के आगे बेबस हैं, तो उसके मन में सवाल उठता है कि फिर मेहनत का मतलब ही क्या है।*
*यह व्यवस्था छात्रों को चुप रहना सिखा देती है। उन्हें लगता है कि आवाज़ उठाने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि सामने एक नहीं, पूरा तंत्र खड़ा है। यही चुप्पी सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह अन्याय को सामान्य बना देती है।*
*अगर आज इस सच्चाई को स्वीकार नहीं किया गया, अगर दोषियों को सज़ा नहीं मिली, तो आने वाली पीढ़ी किताबों पर नहीं, जुगाड़ पर भरोसा करना सीखेगी। और जिस समाज में मेहनत पर विश्वास खत्म हो जाए, वहाँ भविष्य सिर्फ अंधेरे की तरफ जाता है।*
*आज सवाल सिर्फ चयन का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम अपने युवाओं को यह भरोसा लौटा पाएँगे कि ईमानदारी और मेहनत अब भी इस देश में मायने रखती है।*
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