28/12/2025
IMA (Indian Medical Association) द्वारा आयुर्वेदिक डॉक्टरों (BAMS) को सर्जरी की अनुमति दिए जाने के विरोध पर, आयुर्वेदिक डॉक्टरों के अपने मजबूत तर्क हैं।
आयुर्वेदिक डॉक्टरों का मानना है कि सर्जरी उनके लिए कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह उनकी चिकित्सा पद्धति का एक अभिन्न हिस्सा रही है। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
1. ऐतिहासिक विरासत (सुश्रुत का योगदान)
आयुर्वेदिक डॉक्टरों का सबसे बड़ा तर्क यह है कि आचार्य सुश्रुत को पूरी दुनिया "सर्जरी का जनक" (Father of Surgery) मानती है।
सुश्रुत संहिता में सदियों पहले मोतियाबिंद, प्लास्टिक सर्जरी (Rhinoplasty), और पथरी निकालने जैसी जटिल सर्जरी का वर्णन मिलता है।
उनका कहना है कि जिस सर्जरी को आज आधुनिक विज्ञान अपना मानता है, उसकी नींव आयुर्वेद ने ही रखी थी।
2. गहन शैक्षणिक प्रशिक्षण (Training)
IMA का आरोप है कि आयुर्वेदिक डॉक्टरों के पास पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं होती, जिसके जवाब में उनके तर्क हैं:
BAMS के बाद MS (Ayurveda) करने वाले छात्र 3 साल तक सर्जरी का कड़ा प्रशिक्षण लेते हैं।
उनके पाठ्यक्रम (Syllabus) में भी मॉडर्न एनाटॉमी, फिजियोलॉजी और सर्जिकल प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है।
वे अपनी ट्रेनिंग के दौरान हजारों सर्जरी में सहायक होते हैं और स्वयं भी ऑपरेशन करते हैं।
3. कानूनी मान्यता और 'शल्य तंत्र'
आयुर्वेद में सर्जरी के लिए पहले से ही दो समर्पित विभाग हैं:
शल्य तंत्र (General Surgery) और शालाक्य तंत्र (ENT & Ophthalmology)।
डॉक्टरों का तर्क है कि सरकार ने केवल उन्हीं 58 प्रकार की सर्जरी की अनुमति दी है, जिन्हें वे अपनी पोस्ट-ग्रेजुएशन के दौरान पहले से ही सीखते आ रहे हैं। यह कोई नया 'अतिक्रमण' नहीं है, बल्कि पुरानी प्रक्रिया का स्पष्टीकरण है।
4. ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार
भारत के ग्रामीण इलाकों में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी है।
आयुर्वेदिक डॉक्टरों का तर्क है कि यदि वे छोटी और सामान्य सर्जरी (जैसे हर्निया, बवासीर, अपेंडिक्स) करते हैं, तो गरीब मरीजों को बड़े शहरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
इससे देश की स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ कम होगा और समय पर इलाज मिल सकेगा।
5. आधुनिक तकनीक पर सबका अधिकार
आयुर्वेदिक डॉक्टरों का मानना है कि तकनीक (Technology) किसी एक पैथी की जागीर नहीं है।
यदि एक सर्जन आधुनिक एनेस्थीसिया (Anesthesia) और एंटीबायोटिक्स का उपयोग करके आयुर्वेद के सिद्धांतों के साथ सर्जरी करता है, तो इसे 'मिक्सोपैथी' कहना गलत है। इसे 'एकीकृत चिकित्सा' (Integrated Medicine) कहा जाना चाहिए जो मरीज के हित में है।
निष्कर्ष:
आयुर्वेदिक डॉक्टरों का कहना है कि वे आधुनिक सर्जनों की जगह नहीं लेना चाहते, बल्कि अपनी प्राचीन विशेषज्ञता को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर समाज की सेवा करना चाहते हैं। उनका मुख्य सवाल यह है कि "जब डिग्री, पढ़ाई और ट्रेनिंग समान मापदंडों पर हो रही है, तो भेदभाव क्यों?"