03/01/2022
. #ग्रहों_की_दृष्टियाँ :
आज आप लोगों को ग्रहों की दृष्टियों का मूलभूत सिद्धाँत अवगत कराने जा रहा हूँ !
जैसा कि आप सब अवगत ही हैं कि, सभी ग्रहों की अलग अलग दृष्टियाँ होती हैं ! पर यह शायद ही किसी को ज्ञात हो कि यह दृष्टियाँ अलग अलग ग्रह की अलग अलग प्रकार से क्यों होती हैं ? वैसे तो सब कोई न कोई भ्रामक कहानी गढ़ कर सुनाता है, पर वासतविक खगोलीय व वैज्ञानिक कारण कोई नहीं बताता है !
जैसे हमारी आपकी दृष्टि होती है, वैसे ही ग्रहों की भी दृष्टि होती है ! ग्रहों के कम अधिक फासले और गति की तीव्रता के अनुसार यह दृष्टियाँ कम या अधिक होती हैं !
जैसे — जब हम मोटर सायकिल से बहुत तीव्र गति से जा रहे होते हैं तब दुर्घटना से बचने के लिए केवल सामने देखते हैं, दाहिने बाँये देखने की गुंजाइश नहीं रहती है ! चन्द्रमा व बुद्ध की तरह !
वहीं जब कार से जा रहे हों तब कार में पीछे की सीट पर बैठकर जा रहे हों तब कार कितनी भी तेज गति से चल रही हो हम सामने और अपनी तरफ की खिड़की से दूर तक साफ देख सकते हैं, परन्तु दूसरी तरफ की खिड़क़ी से कुछ सीमित क्षेत्र ही स्पष्ट देख पाते हैं मंगल की तरह ! बीच में बैठा व्यक्ति सामने स्पष्ट व दूर तक देख सकता है, दोनो खिड़कियों से बगल में दोनो तरफ बैठे व्यक्तियों के कारण साइड में व पीछे नहीं देख सकता है शुक्र की तरह ! दूसरी खिड़की की तरफ बैठा व्यक्ति भी सामने व अपनी तरफ की खिड़की से स्पष्ट देख सकता है परन्तु दूसरी तरफ की खिड़की से सीमित दूरी तक ही देख सकता है गुरु की तरह ! वहीं चालक सामने तो देखता ही देखता है बैक मिरर से दोनो तरफ पीछे भी दूर तक साफ देख सकता है ! चालक के बगल में बैठा व्यक्ति शनि की तरह चालक की खिड़की से थोड़ी दूर तीसरे स्थान तक व अपनी तरफ की खिड़की से सामने व पीछे बहुत दूर दसवें स्थान तक देख सकता है ! राहु केतु की दृष्टियाँ नहीं होती क्योंकि छाया ग्रह हैं, काल्पनिक रूप से उनकी पाँचवी सातवीं व नवम गुरु के समान दृष्टि मान ली गयी है !
बस यही ग्रहों की दृष्टियों का सिद्धाँत है !
जिस ग्रह का परिक्रमा पथ जितना छोटा होता है वह उतनी ही तीव्र गति से चलता है, और इसी तेज गति व कम दूरी के कारण वह दाहिने बाँये नहीं देख सकता और उसकी केवल एक दृष्टि ही सामने 180॰ पर होती है !
इनमें चन्द्रमा, बुद्ध व शुक्र आते हैं ! वैसे सूर्य की भी एक ही दृष्टि मानी गयी है जिसका कारण भिन्न है !
सूर्य सौरमंडल के नवग्रहों के सापेक्ष स्थिर है, गति करता ही नहीं ! परन्तु हम चूंकि पृथ्वी से उसे देखते हैं अतः वह गति करता दिखाई देता है ! वैसे सूर्य की बारहों राशियों व नवो ग्रहों पर बराबर दृष्टि वनी रहती है, परन्तु पृथ्वी से हम पृथ्वी की चाल के कारण केवल एक ही दृष्टि सप्तम का ही अवलोकन कर पाते हैं ! चन्द्रमा एक राशि को सवा दो दिन में पार करता है ! बुध, शुक्र व सूर्य एक महीने में एक राशि को पार करते हैं ! अतःइसी तेज गति के कारण इनको केवल सामने ही देख पाने की विवशता होती है !
यही नहीं, सूर्य, बुद्ध व शुक्र एक दूसरे से इतने कम फासले से गति करते हैं कि इन तीनो की आपस में एक दूसरे को देख पाने का अवसर ही नहीं मिलता अतः इनकी आपस में कोई दृष्टि नहीं होती है !
बुद्ध ग्रह, सूर्य से चाहे आगे या पीछे अधिकतम 28॰ की दूरी तक ही दूर जा सकता है अन्यथा इससे कम दूरी पर ही हमेशा रहेगा !
इसी प्रकार शुक्र सूर्य से चाहे आगे हो या पीछे अधिकतम 48॰ की दूरी तक ही रह सकता है, अन्यथा इससे कम दूरी पर ही रहेगा ! अतः फासला कम होने के कारण यह तीनो ग्रह इतने कम फासले के कारण आपस में एक दूसरे पर दृष्टि डाल ही नहीं सकते हैं !
मंगल एक राशि को लगभग डेढ़ महीने में पार करता है, अतः वह सातवी, चौधी और आठवीं दृष्टि का प्रयोग कर पाता है !
गुरु एक राशि को पार करने में बारह माह से कुछ अधिक समय लेता है, अतः उसको पर्याप्त अवसर दाहिने वाये व सामने देखने को उपलब्ध होता है, अतः उसकी पांचवी, सातवीं और नौवीं दृष्टि होती है !
राहु और केतु एक राशि को डेढ़ वर्ष में पार करते हैं, जो गुरु से कुछ ही अधिक होने के कारण वह भी गुरु की भाँति ही सातवीं, पाँचवी और नौवीं दृष्टि से देख सकते हैं !
वहीं शनि एक राशि को लगभग ढाई वर्ष में पार करता है और मंथर गति से चलता है, अतः वह अपने बिल्कुल करीब तीसरे स्थान को, सामने सातवें स्थान को व दुरस्थ पीछे की तरफ दसवें स्थान तक भी दृष्टि डालने में