श्री कनिष्क ज्योतिष & कर्मकांड सेवा केंद्र डेगाना

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💠विवाह💠दुर्गापाठ💠अनुष्ठान (ग्रहशांति/गृहप्रवेश)💠रूद्राभिषेक 💠पूजा-अर्चना 💠वास्तुशास्त्र/वास्तुशांति/वास्तुहवन💠देव प्राणप्रतिष्ठा 💠अखंड रामचरित मानस पाठ(संगीतमय)💠सुंदरकांड पाठ (संगीतमय)💠वाल्मीकि रामायण पाठ 💠वाल्मीकि सुंदरकांड पाठ 💠श्रीमद्भागवत

मौनी अमावस्या का महत्व स्नान, दान, तप और पितरों के तर्पण में है, जो आत्म-शुद्धि, पाप-मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए होत...
18/01/2026

मौनी अमावस्या का महत्व स्नान, दान, तप और पितरों के तर्पण में है, जो आत्म-शुद्धि, पाप-मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए होता है; इस दिन मौन रहकर गंगा स्नान, पीपल पूजा, और तर्पण करने से पुण्य मिलता है और पितृदोष दूर होता है, जिससे घर में सुख-शांति व समृद्धि आती है। यह दिन आध्यात्मिक उन्नति, एकाग्रता और संयम के लिए विशेष माना जाता है, खासकर प्रयागराज संगम स्नान के लिए।
मौनी अमावस्या का महत्व:
मौन व्रत और आत्म-शुद्धि: इस दिन मौन रहकर स्नान, ध्यान और पूजा करने से मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और आंतरिक शांति मिलती है, इसलिए इसे मौनी अमावस्या कहते हैं।
गंगा स्नान: माघ मास की अमावस्या पर पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा या त्रिवेणी संगम में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है, जिससे जन्म-जन्मांतर के पाप धुलते हैं।
पितृ पूजा और तर्पण: यह दिन पितरों की आत्मा की शांति और उन्हें प्रसन्न करने के लिए समर्पित है; मौन व्रत के साथ पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से पितृदोष दूर होता है।
दान और तप: स्नान के बाद मौन रहकर दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य मिलता है; जरूरतमंदों की सहायता करना और गौसेवा करना भी महत्वपूर्ण है।
पीपल पूजा: पीपल वृक्ष की पूजा और 108 परिक्रमा करने का भी विशेष विधान है, जिससे मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

13/01/2026

मकरसंक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं. इसी उपलक्ष में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है और इसे उत्तरायण का शुभ आरंभ माना जाता ह.
मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण के हो जाते हैं. इसलिए इस समय किया गया जप, तप और दान अत्यंत फलदायी माना जाता है. यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन लोग दूर-दूर से पवित्र नदी के घाटों पर पहुंचते हैं और आस्था की डुबकी लेने के बाद दान-धर्म के कार्य करते हैं.

 #मकरसंक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं. इसी उपलक्ष में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है और इसे उ...
13/01/2026

#मकरसंक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं. इसी उपलक्ष में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है और इसे उत्तरायण का शुभ आरंभ माना जाता ह.
मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण के हो जाते हैं. इसलिए इस समय किया गया जप, तप और दान अत्यंत फलदायी माना जाता है. यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन लोग दूर-दूर से पवित्र नदी के घाटों पर पहुंचते हैं और आस्था की डुबकी लेने के बाद दान-धर्म के कार्य करते हैं.

मानव इतिहास पुराण .......पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। उन में लिखित ज्ञ...
06/01/2026

मानव इतिहास पुराण .......

पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है।

पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं। विशेष तथ्य यह है कि पुराणों में देवा-देवताओं, राजाओ, और ऋषि-मुनियों के साथ साथ जन साधारण की कथायें भी उल्लेख किया गया हैं जिस से पौराणिक काल के सभी पहलूओं का चित्रण मिलता है।

महृर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा विष्णु तथा महेश्वर उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। इन 18 पुराणों के अतिरिक्त 16 उप-पुराण भी हैं किन्तु विषय को सीमित रखने के लिये केवल मुख्य पुराणों का संक्षिप्त परिचय ही दिया गया है। मुख्य पुराणों का वर्णन इस प्रकार हैः-

( १ ) : - *ब्रह्म पुराण* – ब्रह्म पुराण सब से प्राचीन है। इस पुराण में 246 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा की महानता के अतिरिक्त सृष्टि की उत्पत्ति, गंगा आवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक की कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

( २ ) : - *पद्म पुराण* - पद्म पुराण में 55000 श्र्लोक हैं और यह गॅंथ पाँच खण्डों में विभाजित है जिन के नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं। इस ग्रंथ में पृथ्वी आकाश, तथा नक्षत्रों की उत्पति के बारे में उल्लेख किया गया है। चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज, अणडज तथा जरायुज की श्रेणा में रखा गया है। यह वर्गीकरण पुर्णत्या वैज्ञायानिक है। भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तरित वर्णन है। इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है। शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और पश्चात भारत पडा था।

( ३ ) : - *विष्णु पुराण* - विष्णु पुराण में 6 अँश तथा 23000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु, बालक ध्रुव, तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं। इस के अतिरिक्त सम्राट पृथु की कथा भी शामिल है जिस के कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था। इस पुराण में सू्र्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास है। भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है जिस का प्रमाण विष्णु पुराण के निम्नलिखित शलोक में मिलता हैःउत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से घिरा हुआ है भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले सभी जन भारत देश की ही संतान हैं।) भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है।

( ४ ) : - *शिव पुराण* – शिव पुराण में 24000 श्र्लोक हैं तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है। इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं। इस में कैलास पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व, सप्ताह के दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है। सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं।

( ५ ) : - *भागवत पुराण* – भागवत पुराण में 18000 श्र्लोक हैं तथा 12 स्कंध हैं। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है। भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है। विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं के अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण का देहत्याग, दूारिका नगरी के जलमग्न होने और यादव वँशियों के नाश तक का विवर्ण भी दिया गया है।

( ६ ) : - *नारद पुराण* - नारद पुराण में 25000 श्र्लोक हैं तथा इस के दो भाग हैं। इस ग्रंथ में सभी 18 पुराणों का सार दिया गया है। प्रथम भाग में मन्त्र तथा मृत्यु पश्चात के क्रम आदि के विधान हैं। गंगा अवतरण की कथा भी विस्तार पूर्वक दी गयी है। दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र, मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध ऐवम कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है। संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है। जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं उन के लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे तथा संगीत की थि्योरी का विकास शून्य के बराबर था। मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने है।

( ७ ) : - *मार्कण्डेय पुराण* – अन्य पुराणों की अपेक्षा यह छोटा पुराण है। मार्कण्डेय पुराण में 9000 श्र्लोक तथा 137 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषि मार्कण्डेय तथा ऋषि जैमिनि के मध्य वार्तालाप है। इस के अतिरिक्त भगवती दुर्गा तथा श्रीक़ृष्ण से जुड़ी हुयी कथायें भी संकलित हैं।

( ८ ) : - *अग्नि पुराण* – अग्नि पुराण में 383 अध्याय तथा 15000 श्र्लोक हैं। इस पुराण को भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोष (इनसाईक्लोपीडिया) कह सकते है। इस ग्रंथ में मत्स्यावतार, रामायण तथा महाभारत की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं। इस के अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं। धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है।

( ९ ) : - *भविष्य पुराण* – भविष्य पुराण में 129 अध्याय तथा 28000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य का महत्व, वर्ष के 12 महीनों का निर्माण, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों आदि कई विषयों पर वार्तालाप है। इस पुराण में साँपों की पहचान, विष तथा विषदंश सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गयी है। इस पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले नन्द वँश, मौर्य वँशों, मुग़ल वँश, छत्रपति शिवा जी तक का वृतान्त भी दिया गया है । सत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है। यह पुराण भी भारतीय इतिहास का महत्वशाली स्त्रोत्र है जिस पर शोध कार्य करना चाहिये।

( १० ) : - *ब्रह्मावैवर्ता पुराण* – ब्रह्माविवर्ता पुराण में 18000 श्र्लोक तथा 218 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा, गणेश, तुल्सी, सावित्री, लक्ष्म सरस्वती तथा क़ृष्ण की महानता को दर्शाया गया है तथा उन से जुड़ी हुयी कथायें संकलित हैं। इस पुराण में आयुर्वेद सम्बन्धी ज्ञान भी संकलित है।

( ११ ) : - *लिंग पुराण* – लिंग पुराण में 11000 श्र्लोक और 163 अध्याय हैं। सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प आदि की तालिका का वर्णन है। राजा अम्बरीष की कथा भी इसी पुराण में लिखित है। इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है।

( १२ ) : - *वराह पुराण* – वराह पुराण में 217 स्कन्ध तथा 10000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में वराह अवतार की कथा के अतिरिक्त भागवत गीता महामात्या का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है। श्राद्ध पद्धति, सूर्य के उत्तरायण तथा दक्षिणायन विचरने, अमावस और पूर्णमासी के कारणों का वर्णन है। महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले थे।

( १३ ) : - *सकन्द पुराण* – सकन्द पुराण सब से विशाल पुराण है तथा इस पुराण में 81000 श्र्लोक और छः खण्ड हैं। सकन्द पुराण में प्राचीन भारत का भूगौलिक वर्णन है जिस में 27 नक्षत्रों, 18 नदियों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों, तथा गंगा अवतरण के आख्यान शामिल हैं। इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है। इसी पुराण में सोमदेव, तारा तथा उन के पुत्र बुद्ध ग्रह की उत्पत्ति की अलंकारमयी कथा भी है।

( १४ ) : - *वामन पुराण* - वामन पुराण में 95 अध्याय तथा 10000 श्र्लोक तथा दो खण्ड हैं। इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उप्लब्द्ध है। इस पुराण में वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था। इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूद तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है।

( १५ ) : - *कुर्मा पुराण* – कुर्मा पुराण में 18000 श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं। इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है। कुर्मा पुराण में कुर्मा अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा विस्तार पूर्वक लिखी गयी है। इस में ब्रह्मा, शिव, विष्णु, पृथ्वी, गंगा की उत्पत्ति, चारों युगों, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी वर्णन है।

( १६ ) : - *मतस्य पुराण* – मतस्य पुराण में 290 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों, चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है। कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी पुराण में है।

( १७ ) : - *गरुड़ पुराण* – गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है। साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं क्यों कि इस ग्रंथ को किसी सम्वन्धी या परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है। वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है जिसे वैतरणी नदी आदि की संज्ञा दी गयी है। समस्त योरुप में उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी। अंग्रेज़ी साहित्य में जान बनियन की कृति दि पिलग्रिम्स प्रौग्रेस कदाचित इस ग्रंथ से परेरित लगती है जिस में एक एवेंजलिस्ट मानव को क्रिस्चियन बनने के लिय त्साहित करते दिखाया है ताकि वह नरक से बच सके।

( १८ ) : - *ब्रह्माण्ड पुराण* - ब्रह्माण्ड पुराण में 12000 श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं। मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक प्रथक ग्रंथ है। इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में वर्णन किया गया है। कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर (काल) बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है। परशुराम की कथा भी इस पुराण में दी गयी है। इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है। भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को इण्डोनेशिया भी ले कर गये थे जिस के प्रमाण इण्डोनेशिया की भाषा में मिलते है।

हिन्दू पौराणिक इतिहास की तरह अन्य देशों में भी महामानवों, दैत्यों, देवों, राजाओं तथा साधारण नागरिकों की कथायें प्रचिलित हैं। कईयों के नाम उच्चारण तथा भाषाओं की विभिन्नता के कारण बिगड़ भी चुके हैं जैसे कि हरिकुल ईश से हरकुलिस, कश्यप सागर से केस्पियन सी, तथा शम्भूसिहं से शिन बू सिन आदि बन गये। तक्षक के नाम से तक्षशिला और तक्षकखण्ड से ताशकन्द बन गये। यह विवरण अवश्य ही किसी ना किसी ऐतिहासिक घटना कई ओर संकेत करते हैं।

स्वतंत्र पुराण
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वायु पुराण
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इस पुराण में शिव उपासना चर्चा अधिक होने के कारण इस को शिवपुराण का दूसरा अंग माना जाता है, फिर भी इसमें वैष्णव मत पर विस्तृत प्रतिपादन मिलता है। इसमें खगोल, भूगोल, सृष्टिक्रम, युग, तीर्थ, पितर, श्राद्ध, राजवंश, ऋषिवंश, वेद शाखाएं, संगीत शास्त्र, शिवभक्ति, आदि का सविस्तार निरूपण है।

इस पुराण में इसमें ११२ अध्याय एवं ११,००० श्लोक हैं। विद्वान लोग 'वायु पुराण' को स्वतन्त्र पुराण न मानकर 'शिव पुराण' और 'ब्रह्माण्ड पुराण' का ही अंग मानते हैं। परन्तु 'नारद पुराण' में जिन अठारह पुराणों की सूची दी गई हैं, उनमें 'वायु पुराण' को स्वतन्त्र पुराण माना गया है।

इस पुराण में वायुदेव ने श्वेतकल्प के प्रसंगों में धर्मों का उपदेश किया है। इसलिये इसे वायु पुरण कहते है। यह पूर्व और उत्तर दो भागों से युक्त है। जिसमें सर्ग आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, जहां भिन्न भिन्न मन्वन्तरों में राजाओं के वंश का वर्णन है और जहां गयासुर के वध की कथा विस्तार के साथ कही गयी है, जिसमें सब मासों का माहात्मय बताकर माघ मास का अधिक फ़ल कहा गया है जहां दान दर्म तथा राजधर्म अधिक विस्तार से कहे गये हैं, जिसमें पृथ्वी पाताल दिशा और आकाश में विचरने वाले जीवों के और व्रत आदि के सम्बन्ध में निर्णय किया गया है, वह वायुपुराण का पूर्वभाग कहा गया है। मुनीश्वर !

उसके उत्तरभाग में नर्मदा के तीर्थों का वर्णन है, और विस्तार के साथ शिवसंहिता कही गयी है जो भगवान सम्पूर्ण देवताओं के लिये दुर्जेय और सनातन है, वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते है, वही यह नर्मदा का जल ब्रह्मा है, यही विष्णु है, और यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात शिव है। यह नर्मदा जल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है, निश्चय ही भगवान शिवने समस्त लोकों का हित करने के लिये अपने शरीर से इस नर्मदा नदी के रूप में किसी दिव्य शक्ति को ही धरती प्रर उतारा है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर निवास करते है, वे भगवान रुद्र के अनुचर होते है, और जिनका दक्षिण तट पर निवास है, वे भगवान विष्णु के लोकों में जाते है, ऊँकारेश्वर से लेकर पश्चिम समुद्र तट तक नर्मदा नदी में दूसरी नदियों के पैतीस पापनाशक संगम है, उनमे से ग्यारह तो उत्तर तटपर है, और तेईस दक्षिण तट पर। पैंतीसवां तो स्वयं नर्मदा और समुद्र का संगम कहा गया है, नर्मदा के दोनों किनारों पर इन संगमों के साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ है। मुनीश्वर ! इनके सिवाय अन्य साधारण तीर्थ तो नर्मदा के पग पग पर विद्यमान है, जिनकी संख्या साठ करोड साठ हजार है। यह परमात्मा शिव की संहिता परम पुण्यमयी है, जिसमें वायुदेवता ने नर्मदा के चरित्र का वर्णन किया है, जो इस पुराण को सुनता है या पढता है, वह शिवलोक का भागी होता है।

प्राचीन काल में इतिहास, आख्यान, संहिता तथा पुराण को ऐक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता था। इतिहास लिखने का कोई रिवाज नहीं था और राजाओ नें कल्पना शक्तियों से भी अपनी वंशावलियों को सूर्य और चन्द्र वंशों से जोडा है। इस कारण पौराणिक कथायें इतिहास, साहित्य तथा दंत कथाओं का मिश्रण हैं।

रामायण, महाभारत तथा पुराण हमारे प्राचीन इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत्र हैं जिन को केवल साहित्य समझ कर अछूता छोड़ दिया गया है। इतिहास की विक्षप्त श्रंखलाओं को पुनः जोड़ने के लिये हमें पुराणों तथा महाकाव्यों पर शोध करना होगा।
।।साभार।।
श्री कनिष्क ज्योतिष & वास्तु डेगाना जंक्शन
शास्त्री अनिल कुमार इंदौरिया पालड़ी कलां डेगाना 9829862379

तिल चतुर्थी ।
06/01/2026

तिल चतुर्थी ।

02/01/2026

श्रीखोजीजी महाराज: संक्षिप्त परिचय
​जन्म: 16वीं शताब्दी, मार्गशीर्ष पूर्णिमा।
​स्थान: ईटाखोई (किशनगढ़, राजस्थान)।
​बचपन का नाम: चतुर्भुज।
​पिता: चेतनदासजी (वत्स गोत्रीय लापस्या जोशी)।
​गुरु: श्री अनन्तानन्दजी के शिष्य श्री गयेशजी (अथवा माधवदासजी)।
​प्रसिद्ध नाम: 'खोजीजी' (गुरु की खोज करने के कारण)।
​प्रमुख जीवन घटनाएँ और चमत्कार
​गंगा-यमुना के दर्शन: मात्र 11 वर्ष की आयु में, हरिद्वार जाने के हठ के दौरान, 'धानणी के तालाब' पर ही उन्हें साक्षात् गंगा-यमुना ने दर्शन दिए। उनके पूर्वजों की अस्थियां तालाब में डालने पर ही हरिद्वार पहुँच गईं, जिसका प्रमाण उनके साथियों ने वहाँ देखा।
​पथवारी के जौ का प्रमाण: जब लोग उनकी यात्रा पर संदेह कर रहे थे, तब उनके द्वारा बोए गए 'जौ' (यव) चमत्कारिक रूप से बड़े हो गए, जो उनकी सिद्धता का प्रमाण बना।
​तपस्या: उन्होंने पुष्कर के पास 'नाग पहाड़' की गुफा में और फिर 'बालू के घड़े' पर तपस्या की। आज भी पुष्कर में "खोजीजी का घड़ा" और चतुर्भुज मंदिर प्रसिद्ध है।
​राव मुकुन्दसिंह का गर्व भंग: पालडी के जागीरदार मुकुन्दसिंह ने जब उन्हें स्थान छोड़ने को कहा, तो खोजीजी ने अपनी चद्दर में धूनी की अग्नि भरकर अपनी शक्ति दिखाई, जिससे राव उनके शिष्य बन गए।
​गंगा का प्रकटीकरण: पालडी में उनके आह्वान पर गंगाजी प्रकट हुईं। आज भी "खोजीजी की बावड़ी" का मीठा जल इसका साक्ष्य है।
​परम भक्त रानाबाई: उनकी शिष्या रानाबाई (हरनावा गाँव) एक महान सिद्ध संत हुईं, जिन्होंने प्रेतराज का दमन किया और आज राजस्थान में लोकदेवी के रूप में पूजी जाती हैं।
​भगवान का 'कांजर' रूप में दर्शन: भगवान श्रीकृष्ण ने एक अछूत (कांजर) का वेश धरकर उन्हें दर्शन दिए। जब लोगों ने संदेह किया, तो खोजीजी ने स्पष्ट किया कि वह साक्षात् 'कमलाकान्त' थे।
​आध्यात्मिक शिक्षा और रचनाएँ
​खोजीजी महाराज ने अपने गुरु के अंतिम समय की घटना (आम के फल में जीव) के माध्यम से "अन्ते या मतिः सा गतिः" (अंत समय में जैसी मति वैसी गति) के गूढ़ रहस्य को समझाया।
​प्रमुख रचनाएँ: श्री उपदेश वल्लरी और श्री जनकजा प्रपत्तिसार।
​प्रमुख पीठ: पालडी (मारवाड़), त्रिवेणी धाम (जयपुर), डाकोर (गुजरात), अयोध्या और जनकपुर।

श्रीखोजीजी महाराज: संक्षिप्त परिचय​जन्म: 16वीं शताब्दी, मार्गशीर्ष पूर्णिमा।​स्थान: ईटाखोई (किशनगढ़, राजस्थान)।​बचपन का ...
02/01/2026

श्रीखोजीजी महाराज: संक्षिप्त परिचय
​जन्म: 16वीं शताब्दी, मार्गशीर्ष पूर्णिमा।
​स्थान: ईटाखोई (किशनगढ़, राजस्थान)।
​बचपन का नाम: चतुर्भुज।
​पिता: चेतनदासजी (वत्स गोत्रीय लापस्या जोशी)।
​गुरु: श्री अनन्तानन्दजी के शिष्य श्री गयेशजी (अथवा माधवदासजी)।
​प्रसिद्ध नाम: 'खोजीजी' (गुरु की खोज करने के कारण)।
​प्रमुख जीवन घटनाएँ और चमत्कार
​गंगा-यमुना के दर्शन: मात्र 11 वर्ष की आयु में, हरिद्वार जाने के हठ के दौरान, 'धानणी के तालाब' पर ही उन्हें साक्षात् गंगा-यमुना ने दर्शन दिए। उनके पूर्वजों की अस्थियां तालाब में डालने पर ही हरिद्वार पहुँच गईं, जिसका प्रमाण उनके साथियों ने वहाँ देखा।
​पथवारी के जौ का प्रमाण: जब लोग उनकी यात्रा पर संदेह कर रहे थे, तब उनके द्वारा बोए गए 'जौ' (यव) चमत्कारिक रूप से बड़े हो गए, जो उनकी सिद्धता का प्रमाण बना।
​तपस्या: उन्होंने पुष्कर के पास 'नाग पहाड़' की गुफा में और फिर 'बालू के घड़े' पर तपस्या की। आज भी पुष्कर में "खोजीजी का घड़ा" और चतुर्भुज मंदिर प्रसिद्ध है।
​राव मुकुन्दसिंह का गर्व भंग: पालडी के जागीरदार मुकुन्दसिंह ने जब उन्हें स्थान छोड़ने को कहा, तो खोजीजी ने अपनी चद्दर में धूनी की अग्नि भरकर अपनी शक्ति दिखाई, जिससे राव उनके शिष्य बन गए।
​गंगा का प्रकटीकरण: पालडी में उनके आह्वान पर गंगाजी प्रकट हुईं। आज भी "खोजीजी की बावड़ी" का मीठा जल इसका साक्ष्य है।
​परम भक्त रानाबाई: उनकी शिष्या रानाबाई (हरनावा गाँव) एक महान सिद्ध संत हुईं, जिन्होंने प्रेतराज का दमन किया और आज राजस्थान में लोकदेवी के रूप में पूजी जाती हैं।
​भगवान का 'कांजर' रूप में दर्शन: भगवान श्रीकृष्ण ने एक अछूत (कांजर) का वेश धरकर उन्हें दर्शन दिए। जब लोगों ने संदेह किया, तो खोजीजी ने स्पष्ट किया कि वह साक्षात् 'कमलाकान्त' थे।
​आध्यात्मिक शिक्षा और रचनाएँ
​खोजीजी महाराज ने अपने गुरु के अंतिम समय की घटना (आम के फल में जीव) के माध्यम से "अन्ते या मतिः सा गतिः" (अंत समय में जैसी मति वैसी गति) के गूढ़ रहस्य को समझाया।
​प्रमुख रचनाएँ: श्री उपदेश वल्लरी और श्री जनकजा प्रपत्तिसार।
​प्रमुख पीठ: पालडी (मारवाड़), त्रिवेणी धाम (जयपुर), डाकोर (गुजरात), अयोध्या और जनकपुर।

इनके साथ शास्त्री अनिल कुमार इंदौरिया – मुझे लगातार सराहना मिल रही है! मैं लगातार 17 महीनों से टॉप फ़ैन की लिस्ट में बना...
31/12/2025

इनके साथ शास्त्री अनिल कुमार इंदौरिया – मुझे लगातार सराहना मिल रही है! मैं लगातार 17 महीनों से टॉप फ़ैन की लिस्ट में बना हुआ हूँ. 🎉

30/12/2025

. #एकादशी_व्रत_शंका_समाधान :
श्री हरि को प्रिय एकादशी आदि कुछ व्रतों को वेध रहित तिथियों में ही करना चाहिए अर्थात शुद्ध तिथि में ही व्रत करना चाहिए ! कोई भी तिथि उदया तिथि मिलने पर ही शुद्ध मानी जाती है ! परन्तु चन्द्रमा से सम्बन्धित व्रत जैसे गणेश चतुर्थी, करवा चौथ, आदि चन्द्रोदय पर वह तिथि मिलने पर ही शुद्ध होती हैं !
एकादशी दो प्रकार की होती है सम्पूर्णा तथा विद्धा इसमे विद्धा भी दो प्रकार की होती है पूर्व विद्धा और पर विद्धा, पूर्व विद्धा अर्थात दशमी मिश्रित एकादशी जो परित्याज्य होती है !

सम्पूर्णा वह एकादशी होती है जिसमें सूर्योदय एकादशी तिथि में हो और अगले सूर्योदय के पूर्व ही एकादशी तिथि समाप्त हो जाय !

परन्तु तीसरे प्रकार की एकादशी जिसे विशेष रूप से पर विद्धा ( द्वादशी युक्त एकादशी ) कहते हैं, शुद्ध होने के कारण व्रत उपवास योग्य सर्वथा उपयुक्त होती है, किन्तु दशमी युक्त पूर्व विद्धा एकादशी में कभी भी उपवास नहीं करना चाहिए !
इन्हे ही विद्धा तिथि कहते हैं !

#सौरधर्मोत्तर !
अरुणोदय काल में अर्थात सूर्योदय से पहले चार दण्ड-काल ( सूर्योदय से 1 घण्टा 36 मिनट पूर्व तक ) में यदि दशमी नाममात्र भी पड़ रही हो तब उक्त एकादशी पूर्व विद्धा दोष से दोषयुक्त होने के कारण सर्वथा वर्जनीय है ! भविष्य पुराण !

द्वादशी मिश्रित एकादशी सर्वदा ही ग्रहण योग्य है -
"द्वादशी मिश्रित ग्राह्या सर्वत्रैकादशी तिथि: !" - पद्मपुराण !

नारद पुराण मे वर्णित है कि जिस समय बहुवाक्य-विरोध के कारण संदेह उपस्थित हो उस समय द्वादशी में उपवास करते हुए त्रयोदशी में पारण करना चाहिए किन्तु "जिस शास्त्र में दशमी विद्धा एकादशी पालन कि बात कही गयी है वह स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा कहे होने पर भी शास्त्र रूप मे गण्य नहीं है" ! -नारद पुराण !

धर्मसिंधु के अनुसार एकादशी दो प्रकार की होती है- 1. विद्धा और 2. शुद्धा !
यदि एकादशी तिथि दशमी तिथि से युक्त हो तब वह विद्धा एकादशी कही जाती है, और यदि सूर्योदय काल में एकादशी द्वादशी तिथि से युक्त होती है तब वह शुद्धा एकादशी कही जाती है अर्थात अरुणोदयकाल में दशमी के वेध से रहित एकादशी हो तब उसे शुद्धा एकादशी माना जाता है ! - धर्मसिंधु !

अग्नि पुराण के अनुसार द्वादशी – विद्धा एकादशी में स्वयं श्रीहरि स्थित होते हैं, इसलिये द्वादशी – विद्धा एकादशी के व्रत का त्रयोदशी को पारण करने से मनुष्य सौ यज्ञों का पुण्यफल प्राप्त करता हैं ! जिस दिन के पूर्वभाग में एकादशी कलामात्र अविशिष्ट हो और शेषभाग में द्वादशी व्याप्त हो, उस दिन एकादशी का व्रत करके त्रयोदशी में पारण करने से सौ यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है ! दशमी- विद्धा एकादशी को कभी उपवास नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह नरक की प्राप्ति करानेवाली है ! . - अग्नि पुराण !

पद्मपुराण मे भगवन एवं ब्रह्मा जी के संवाद में वर्णित है - कि दशमी विद्धा एकादशी दैत्यों कि पुष्टिवर्द्धिनी है इसमें कोई संदेह नहीं है !

ब्रह्म पुराण मे धृतराष्ट्र के प्रति मैत्रेय मुनि कि उक्ति में देखा जाता है कि पहले पत्नी के साथ उन्होंने दशमीयुक्त एकादशी में व्रतोपवास किया था जिसके कारण उनके 100 पुत्रों का विनाश हो गया था !
स्कंदपुराण मे स्पष्ट वर्णित है कि जो लोग दशमी द्वारा दूषित हरिवासर मे उपवास करने के लिए उपदेश करते हैं वह सब पाप पुरुष निश्चय ही शुक्र माया द्वारा मोहित हुए हैं ऐसा जानना शास्त्र सम्मत है !

उक्त पुराण मे ही उमा महेश्वर संवाद में भीे कहा गया है कि जो लोग दशमी विद्धा एकादशी का अनुष्ठान करते हैं वह निश्चय ही नरकवास का रास्ता चुनने की इच्छा करते हैं !

प्राय: सभी शास्त्रों में दशमी से युक्त एकादशी व्रत करने का निषेध माना गया है ! यदि शुद्धा एकादशी सूर्योदय से दो घड़ी तक भी मिल रही हो और वह द्वादशी तिथि से युक्त हो तब भी उसे ही व्रत के लिए ग्रहण करना चाहिए ! परन्तु दशमी से युक्त एकादशी का व्रत कभी नहीं रखना चाहिए !

सामान्य जन साधारण को शुद्धा एकादशी का व्रत रखना ही पुण्यदायक माना गया है !

गरूण पुराण के अध्याय 125 में कहा गया है कि गांधारी ने दशमी से युक्त एकादशी (विद्धा एकादशी) का व्रत रखा लिया था ऐसा करने पर ही उन्हे अपने सभी 100 पुत्रों का वध अपने जीवनकाल में ही देखना पड़ा ! इसलिए दशमी से युक्त एकादशी का व्रत कभी नहीं रखना चाहिए ! यदि कभी ऐसा होता है कि किसी महीने में दशमी से युक्त एकादशी पड़ती है तब मन में संदेह न रखें बल्कि द्वादशी का व्रत रखकर त्रयोदशी में पारण कर व्रत समाप्त करें !

शुक्लपक्ष की एकादशी में पुनर्वसु, श्रवण, रोहिणी और पुष्य नक्षत्र हो, तब वह बहुत शुभ फल प्रदान करने वाली होती है !

त्रिस्पृशा, जिसमें एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथि भी सम्मिलित हो रही हो, वह बड़ी शुभ तिथि मानी जाती है ! कोई ऐसी एकादशी तिथि का व्रत एक बार भी कर ले, तो उसे एक सौ एकादशी करने का फल प्राप्त होता है !

जो लोग एकादशी व्रत नहीं कर पाते हैं, उन्हें इस दिन सात्विक तो रहना ही चाहिए !

एकादशी के दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अण्डा आदि मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए ! छल-कपट और मैथुन आदि का त्याग भी जरूरी है ! एकादशी को चावल भी नहीं खाना चाहिए ।
कनिष्क ज्योतिष & वास्तु सेवा केंद्र डेगाना जंक्शन नागौर राजस्थान

30/12/2025

वास्तु शास्त्र के अनुसार वास्तु की उत्पति कैसे हुई।

पंचक विचार।
24/12/2025

पंचक विचार।

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